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clicks 116 View   Vote 0 Like   7:19pm 26 Jan 2016   Catogery:   
Blogger: अमिताभ त्रिपाठी at रचनाधर्मिता...
माँ तुम अपने साथ ले गयीमेरा बचपन भी।जब तक थीं तुममुझमें मेराशिशु भी जीवित थावात्सल्य से सिंचितमन काबिरवा पुष्पित थारंग-गंघ से हीन हो गएरोली-चन्दन भी।झिड़की, डांट-डपट भी तुम थीतुम थी रोषमयीसहज स्नेह सलिलाभी तुम थीतुम थी तोषमयीसुधियाँ दुहराती हैं खट्टी-मीठी अनब...
 
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