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Blog: ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र

Blogger: वन्दना गुप्ता
1मेरे इर्द गिर्द टहलता हैकोई नगमे सामैं गुनगुनाऊं तो कहता हैरुक जरा इस कमसिनी पर कुर्बान हो तो जाऊँजो वो एक बार मिले तो सहीखुदा की नेमत सा2दिल अब न दरिया है न समंदर ...तुम चीरो तो सहीशोख नज़रों के खंजर सेरक्स करती मिलेगी रूह की रक्कासाउदासियों के उपवन में3आओ आमीन कहेंऔर ... Read more
clicks 251 View   Vote 0 Like   9:07am 22 Nov 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
राम क्या तुम आ रहे हो क्या सच में आ रहे हो राम तुम जरूर आओगे राम तुम्हें जरूर आना ही होगा आह्वान है ये इस भारतभूमि का हे मर्यादापुरुषोत्तम मर्यादा का हनन नित यहाँ होता है करने वाला ही सबसे बड़ा बिगुल बजाता है तुम्हारे नाम का डंका बजवाता है ये आज का सच है र... Read more
clicks 291 View   Vote 0 Like   11:13am 6 Nov 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
बुरा वक्त कहता है चुप रहो सहो कि अच्छे दिन जरूर आयेंगे सब मिटा दूँ, हटा दूँ कि आस की नाव पर नहीं गुजरती ज़िन्दगी छोड़ दूँ सब कुछ हो जाऊँ गायब समय के परिदृश्य से अपने दर्द की लाठी पकड़ फिर वक्त खोजे मुझे और कहे आओ न मैंने संजोये हैं तुम्हारे लिए अच्छे दिन तुम्हारे मनचाहे दिन क... Read more
clicks 178 View   Vote 0 Like   11:01am 29 Oct 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
हुआ करते थे कभी चौराहों पर झगडे तो कभी सुलह सफाई वक्त की आँधी सब ले उड़ी आज बदल चुका है दृश्य आपातकाल के मुहाने पर खड़ा देश नहीं सुलझा पा रहा मुद्दे चौराहों पर सुलग रही है चिंगारी नफरत की अजनबियत की आतंक की जाति की धर्म की फासीवाद की गवाह सबूत और वायरल विडियो हथियार हैं आज ... Read more
clicks 299 View   Vote 0 Like   7:14am 23 Oct 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
आजकल हम उस चौराहे पर खड़े हैं जिससे किसी भी ओरकोई भी रास्ता नहीं जाता एक दिशाहीन जंगल में भटकने के सिवा जैसे कुछ हाथ नहीं लगता वैसे ही अब न कोई पथ प्रदर्शक मिलता यदि होता भी तो हम नहीं रहे सभ्य जो उसकी दिखाई दिशा में बढ़ लें आगे लम्पटता में प्रथम स्थान पाने वाले हम आजकल ईश्... Read more
clicks 200 View   Vote 0 Like   11:47am 2 Oct 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
न जाने किसके अख्तियार में हैं मुद्दा ये है, कि हम प्यार में हैं वो कह दें इक बार जो हमको अपना हम समझेंगे उनके दिल-ओ-जान में हैं अब पराई अमानत है न परायेपन का भरम कमाई है दिल की दौलत बस इस गुमान में हैं नज़र तुम्हारी उठे या हमारी गिरे मुद्दा अब अंखियों के ईमान में है नज़र भर देख... Read more
clicks 246 View   Vote 0 Like   7:44am 26 Sep 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
आज एक हफ्ते बाद यहाँ वापसी हुई है. मम्मी एडमिट थीं उन्हें खून की उल्टियाँ हो गयी थीं लेकिन ईश्वर की कृपा से बहुत बड़ी बीमारी नहीं निकली और जो आई है उसके लिए प्रीकाशन लेनी होंगीं. अब भी तबियत पूरी तरह ठीक नहीं हुई है तो इसी वजह से साहित्य संसार से पूरी तरह कटी हुई थी. कुशल मं... Read more
clicks 250 View   Vote 0 Like   6:52am 11 Sep 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
सूरजमल रस्तोगी “शांत” जी किसी परिचय के मोहताज नहीं लेकिन मैं उनके बारे में नहीं जानती थी. पिछले दिनों उनके उपन्यास “सृष्टि-जनक” पर प्रतिक्रिया पढ़ी तो पढने की जिज्ञासा हुई. उन्हें पता चला तो उन्होंने स्वयं मुझसे पता लिया और भेज दिया. उपन्यास मुझे वीरवार को मिला और उसी ... Read more
clicks 183 View   Vote 0 Like   10:35am 19 Aug 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
1जार जार है अस्मिता मेरी आज भीव्यथित हूँ , उद्वेलित हूँ , मर्मान्तक आहत हूँकरती हूँ जब भी आकलनपाती हूँ खुद को ठगा हुआमेरा क्या दोष थाआज तक न कहीं आकलन हुआतप शक्ति से वरदान पा भविष्य सुरक्षित कियातो क्या बुरा कियाहर स्त्री का यही सपना होता हैजीवनसाथी का संग जन्म जन्म चाह... Read more
clicks 148 View   Vote 0 Like   7:27am 10 Aug 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
सुनो मत कुरेदो हमें हम अवसाद में हैं मत पूछना कैसा अवसाद नकारात्मकता के ढोल जब बेतहाशा बज रहे हों कान के परदे जब फट रहे हों बेचैनियों के समुन्दर जब ठाठें मार रहे हों और सोच के कबूतर जब उड़न-छू हो गए हों तल्खियों के पैरों में मोच आई हुई हो तब चुप के तहखाने में सिसकती है मानव... Read more
clicks 123 View   Vote 0 Like   8:01am 25 Jul 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
भीड़ का कोई धर्म नहीं होता सच ही तो कहा गया भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता सच ही तो कहा गया फिर आज प्रश्न क्यों?फिर आज उस पर लगाम लगाने की जरूरत क्यों?आदत है तुम्हारी हर उक्ति-लोकोक्ति को स्वीकारना उसी की बनायी लकीर पर चलना बिना सोचे समझे उसके परिणाम तो फिर आज क्यों डर रहे हो क्... Read more
clicks 177 View   Vote 0 Like   7:51am 18 Jul 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
करूँ क्या संवाद दिन से बहुत से दिन बीते सखी रीते नयापन न मिला दिन में तब बाँझ हुईं आस मन में न घट भरा न सुरा ने तृप्त किया किस शुभ दिन के मोह में रहें जीते आह ! मेरी दग्ध हुई चेतना कौन से सावन से कहो बुझे मिलन हो जिस पल प्रियतम से उसी दिन की हो गणना जीवन में जर्जर काया सुलग सुल... Read more
clicks 136 View   Vote 0 Like   7:08am 10 Jul 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
उसने कहा तुम्हारी नज़र में दिल्ली क्या है ?वो नज़र कहाँ से लाऊँ जो आत्मा में झाँक सके जो धड़कन को सुन सके जो साँसों का संगीत हो कौन कर सका है उसे व्याख्यायित दिल्ली कोई शहर नहीं , राजधानी नहीं ये दिल है न केवल मेरा बल्कि सारे देश का जहाँ धडकता है सुगम संगीत 'मिले सुर मेरा तुम्... Read more
clicks 130 View   Vote 0 Like   5:45am 9 Jul 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
न रास्ता था न मंज़िलन साथी न साहिल औरएक दिन दृश्य बदल गया कछुआ अपने खोल में सिमट गया शब्द हिचकियाँ लेकर रोते रहेअब बेमानी था सबखोखली थीं वहां भावनाएं, संवेदनाएंएक शून्य आवृत्त हो कर रहा था नर्तनये था ज़िन्दगी का क्रूरतम अट्टहास ... Read more
clicks 146 View   Vote 0 Like   12:25pm 7 Jul 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
दर्द जब कट फट जाता है मैला हो जाता है तब बहुत मुस्काता है शब्दबाण विहीन हो फैला है यूँ, बिखरा हो जैसे पानी और रपट जाए कोई बेध्यानी में कचोट कितना छलछलाये मौन को नहीं तोड़ पाती मूक अभिव्यक्तियों से बंधा है गठजोड़ अब खुश्क हैं आँखें और अंतर्मन दोनों ही कहते हैं उस तरफ बज रही ... Read more
clicks 131 View   Vote 0 Like   12:46pm 2 Jul 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
दर्द की नदी में छप छप करते नंगे पाँव आओ तुम और मैं खेलें एक बार फिर इश्क की होली उदासियों के चेहरे पर बनाते हुए आड़ी तिरछी रेखाएं आओ तुम और मैं लायें एक बार फिर इश्क का मौसम सूनी आँखों के संक्रमण काल में डालकर बेखुदी की ड्राप आओ तुम और मैं करें एक बार फिर इश्क का मोतियाबिंद ... Read more
clicks 121 View   Vote 0 Like   6:31am 22 Jun 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
कैनेडा में रहने वाले "उड़न तश्तरी "के नाम से प्रसिद्ध लेखक, कवि, उपन्यासकार "समीर लाल"जी द्वारा उपन्यास "अँधेरे का मध्य बिंदु"की एक सारगर्भित समीक्षा सेतु पत्रिका के मई अंक में प्रकाशित ..........समीर जी ब्लॉग के वक्त से मित्र हैं और ब्लॉग मित्र जितने हैं लगता है जैसे हम एक परिव... Read more
clicks 174 View   Vote 0 Like   5:45am 2 Jun 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
मैं एक चुका हुआ ख्याल हूँ तू क्यूँ उम्मीद की गाँठ बाँधता है मुसाफिर चलता चल जहाँ ले जाएँ कदम कि सूखे हुए दरख़्त हरे नहीं हुआ करते नदी वापस नहीं मुड़ा करती और रूहें आलिंगनबद्ध नहीं हुआ करतीं इक सोये हुए शहर के आखिरी मकान पर दस्तक नहीं तोड़ा करती शताब्दियों की नींद आओ फासलों... Read more
clicks 132 View   Vote 0 Like   5:41am 20 May 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
ये जिन्ना गोडसे रावण और कंसों को पूजने का दौर है तुम निश्चित कर लो अपनी पगडण्डी वक्त ने बदल दिए हैं अपने मन्त्र उच्च स्वर में किये गए उच्चारण ही बनेंगे अब वेदों की ऋचाएं ये खौलती खदबदाती भावनाओं को व्यक्त न करने का दौर है जी हजूरी और गुलामी के ही शिखर पर पहुँचने की प्रबल ... Read more
clicks 147 View   Vote 0 Like   9:49am 4 May 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
जब आ चुको तुम आजिज़ रोजमर्रा के कत्लोआम से शून्य हो जाती हैं संवेदनाएं नहीं दीखता तुम्हें फिर आस पास बिखरा समंदर, नीला आकाश या उडती तितलियाँ अजीजों का महाप्रयाण हो या नन्हें कमलों का असमय नष्ट होना या फिर हो अर्धविकसित कलियों से व्यभिचार दिमाग की नसें करने लगती हैं चीत... Read more
clicks 134 View   Vote 0 Like   6:54am 27 Apr 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
हम सब एक काल्पनिक दुनिया में विचरण करते हैं अक्सर ...शायद वही जीने का एक बहाना बन जाती है, एक आस का पंछी ही जीवन को दिशा दे जाता है लेकिन क्या हो यदि हम उस काल्पनिक दुनिया में वीभत्सता को जीने लगें? हमें पता है ये गलत है लेकिन फिर भी एक सोच अपनी जकड़न में ऐसे जकड़े कि चाहकर भी न... Read more
clicks 131 View   Vote 0 Like   9:06am 23 Apr 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
आज क्यूँ है खड़ी, ये उदासी बड़ी सुलगे क्यूँ हैंअरमान, बेबसी है कड़ीज़िन्दगी दुल्हन बनी, बेजारी की घडी राख क्यूँ है पड़ी, मासूमियत है झड़ीरूह क्यूँ है मरी, बेसाख्ताअट्टहास करी लाश पे लाश पे लाश, आखिर क्यूँ है गिरी कब्र में क्यूँ है दबी, वो खामोश सिसकी अनारकली जब भी चिनी, क्यूँ ह... Read more
clicks 129 View   Vote 0 Like   11:46am 19 Apr 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
धर्म एक ऐसी अफीम है जिसके नाम पर सौ गुनाह भी माफ़ हो जाते हैं. धर्म की अफीम जिसने चाटी वो बुलंदियों पर पहुँच गया, कौन नहीं जानता. सबसे आसान है धर्म के नाम पर शोषण. उसमें भी यदि धर्म इस्लाम हो तो वहाँ की जटिलताओं से कौन वाकिफ नहीं. आम इंसान को नहीं पता होता आखिर उनके शास्त्रो... Read more
clicks 239 View   Vote 0 Like   12:27pm 5 Apr 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
नहीं ये मैं नहीं नहीं वो भी मैं नहींमैं कोई और थीअब कोई और हो गयीबेदखली के शहर का आखिरी मज़ार हूँजिस पर कोई दीया अब जलता नहींहाँ, मैं वो नहींमैं ये नहींमैं कोई और थीजिसकी चौखट पर आसमाँ का सज़दा थापीर फ़क़ीर दरवेश का कहकहा थासच, वो कोई और थीये कोई और हैपहचान के चिन्हों से परेइ... Read more
clicks 174 View   Vote 0 Like   5:27am 31 Mar 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
राम बधाई और शुभकामनाओं तक ही बची है तुम्हारी प्रासंगिकता जानते हो प्रयोग होते हो तुम अब एक अस्त्र की तरह जिससे जीती जाती हैं जंग तुम, तुम्हारी मर्यादा और तुम्हारा औचित्यमहज प्रायोगिक हथियार हैं जिनसे काटी जाती हैं सभ्यताओं की नस्लें इस मर्यादाविहीन समय में मर्यादा ... Read more
clicks 178 View   Vote 0 Like   7:00am 25 Mar 2018 #

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