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जज़्बात

आज वह एक बार फिर मरा हैपर यह कोई खबर नहीं है वैसे भी, उसके मरने की खबर किसी खबरनवीस के लिए खबर की बू नहीं देती, क्योंकि खबर तभी खबर बन पाती है जब उसमें पंचातारे की नजाकत हो; या फिर बिकने की ताकत हो. .यूं तो यह विषय है अनुसन्धान का कि वह पहली बार कब मरा ?स्वयं यह प्रश्न खुद के अस्...
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Tag :कविता
  May 17, 2012, 8:10 pm
खाना नहीं, बिजली और पानी नहीं है इस नगर में और कोई परेशानी नहीं है . चूहों ने कुतर डाले हैं कान आदमी के शायद इस शहर में चूहेदानी नहीं है  . चहलकदमी भी है, सरगोशियाँ भी हैं मंज़र मगर फिर भी तूफानी नहीं है . आये दिन लुट जाती है अस्मत यहाँ कौन कहता है यह राजधानी नहीं है . अपनों ...
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Tag :गज़ल
  May 8, 2012, 9:55 pm
जिस्म को बेइंतिहाँ उछाला मैंनेबिखरकर खुद को संभाला मैंने.बेदर्द का दिया दर्द सह नहीं पायापत्थर का एक ‘वजूद’ ढाला मैंने.किरदार छुपा लेते हैं एहसासों कोखुद को बना डाला रंगशाला मैंने.एहसास उनके रूबरू ही नही होतेन जाने कितनी बार खंगाला मैंने .अब क्या दिखेंगे जख्म के निश...
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Tag :गज़ल
  May 2, 2012, 7:03 pm
शातिर ये शिकारी हैं ‘कृपा’ के व्यापारी हैं.बीमारी दूर करेंगे क्याखुद ये तो बीमारी हैं .इनके सफ़ेद वस्त्रों मेंजेब नहीं आलमारी हैं .रिश्तों को किश्तों में बेचने वाले पंसारी हैं .घुटनों के बल रेंग रहे फिर भी क्रांतिकारी हैं .जोड़कर माया-स्विश बनते ये अवतारी हैं .धन-साधन यु...
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Tag :गज़ल
  April 26, 2012, 9:28 pm
शातिर ये शिकारी हैं ‘कृपा’ के व्यापारी हैं.बीमारी दूर करेंगे क्याखुद ये तो बीमारी हैं .इनके सफ़ेद वस्त्रों मेंजेब नहीं आलमारी हैं .रिश्तों को किश्तों में बेचने वाले पंसारी हैं .घुटनों के बल रेंग रहे फिर भी क्रांतिकारी हैं .जोड़कर माया-स्विश बनते ये अवतारी हैं .धन-साधन यु...
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Tag :
  April 26, 2012, 9:28 pm
मैं शांत और सरल दिखना चाहता हूँ; मैं एक प्रेम गीत लिखना चाहता हूँ,ऐसा भी नहीं कि शब्द नहीं हैं मेरे पास शब्दकोष से मैंने चुन रखा है स्पर्श, आलिंगन और मनुहार जैसे शब्द, जो प्रेमगीत में अवगुंठित हो निश्चय ही,करेंगे सबको निःशब्द.पर इससे पहले कि मैं कुछ लिख पाऊँ सहसा दिख जाते...
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Tag :कविता
  April 22, 2012, 3:32 pm
आज वह मर गया; ऐसा नहीं कि पहली बार मरा है अपने जन्म से मृत्यु तक होता रहा तार-तार; और मरता रहा हर दिन कई-कई बार, उसके लिए रचे जाते रहे चक्रव्यूह, और फिर यह जानते हुए भी कि वह दक्ष नहीं है - चक्रव्यूह भेदनकला में, उसे ही कर्तव्यबोध कराया गया; और उतारा गया बारम्बार समर में, ह...
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Tag :कविता
  April 15, 2012, 8:47 pm
कभी हतप्रभ तो कभी हताश ढूढता है वह अपना आकाश. यूं तो वह अत्यंत सहनशील है; पथप्रदर्शकों (?) द्वारा बताए मार्ग पर निरंतर गतिशील है, कोल्हू के बैल सा वृत्ताकार मार्ग के मार्ग-दोष से बेखबर चलता ही जा रहा है; या शायद बेबस और लाचार खुद को छलता ही जा रहा है. कदाचित उसे पता ही न...
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Tag :कविता
  April 2, 2012, 9:23 pm
चेहरे इतने पीले क्यूं हैं ? नयन कोर गीले क्यूं हैं ? . माना अपनी मौत मरे हैं इनके शरीर नीले क्यूं हैं ? . तुम जहां जश्न मना रहे आसमान में चीलें क्यूं हैं ? . जो राह मुहैया की तुमने वे इतने पथरीले क्यूं हैं ? . शांति सन्देशा लेकर आये नज़रों में पर कीलें क्यूं हैं ? . गमगीनी के इस...
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Tag :गज़ल
  March 28, 2012, 7:58 am
रंग बदलती दुनिया में, खुद को बदल न पाये हम उलझी हुई उलझनों को और अधिक उलझाये हम भैस बराबर अक्षर फिर भी है वह ज्ञाता रिश्तों के देहरी पर अनुबंधों का तांता भ्रमित करने के चक्कर में, खुद ही को भरमाये हम उलझी हुई उलझनों को और अधिक उलझाये हम नौ-नब्बे के चक्कर में जम कर हुई उग...
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Tag :गीत
  March 18, 2012, 7:12 pm
माना कि ये रक्तपान करते हैं पर हर रोज गंगास्नान करते हैं . शक के दायरे से बचने के लिए खुद ही को लहुलुहान करते हैं . लूटते हैं जब भी काफिले को मुक्तहस्त से फिर दान करते हैं . हादसे जब होकर गुजर जाते हैं शिद्दत से ये सावधान करते हैं . मुर्दों से इनकी जान पहचान है कब्रिस्ता...
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Tag :गज़ल
  February 28, 2012, 12:29 pm
अपनी बेगुनाही का हरपाल गवाह रखियेखुद पर खुद ही ख़ुफ़िया निगाह रखिये.दस्तूरन ‘सच’ जब शक के दायरे में होहो सके तो ‘झूठ’ को गुमराह रखिये.बचना चाहो जो बेवजह के ‘सलाहों’ से औरों को लिए आप भी सलाह रखिये . ‘मौत’ की खबर आम हो इससे पहले ही सुगबुगा कर जिंदगी की अफवाह रखिये. माना कि क...
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Tag :गज़ल
  February 19, 2012, 1:42 pm
भीड़ में होते हैंअनगिनत पाँव पर नहीं होता है भीड़ का अपना पाँव. भीड़ देखती हैअनगिन आँखों से पर नहीं होती हैं भीड़ की अपनी आँखें. भीड़ अक्सर नारे लगाती हैपर नहीं होता है भीड़ का अपना कोई नारा. भीड़ को देखकर भीड़ मुड़ जाती है क्योंकि भीड़,भीड़ से कतराती है. उजाड देती है पल मेंआशियाना, न...
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Tag :नज़रिया
  February 7, 2012, 8:36 pm
आईने के सामने बैठ खुद को पहचानने की कोशिश मेंरूबरू हो गए मेरे समस्त अन्तर्निहित और अनाहूत किरदार.मेरे वजूद की धज्जियाँ उड़ाते कुछ थे रंगदार; तो कुछ स्वयम्भू सरदार, कोई धारदार हथियारों से लैस था;तो किसी की निगाहों मेंबेवजह तैस था, कुछ न जाने क्या गा रहे थे;तो कुछ लगातार ख...
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Tag :एहसास
  January 6, 2012, 3:58 pm
चुप रहिएवे कुछ बोलने जा रहे हैंउपलब्धियों को वे तौलने जा रहे हैंभाइयों और बहनोंहमारा देश स्मूथली 'रन' कर रहा हैदेखते नहीं कितनी आसानी से अपना काम'गन' कर रहा हैक्या कहा ?बलात्कार बहुत ज्यादा हुआ हैअरे! इतना भी नहीं पताउम्मीद से बिल्कुल आधा हुआ हैघोटाले-घोटाले क्यूँ चिल...
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Tag :पुनर्प्रस्तुत
  December 30, 2011, 11:58 am
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