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विमर्श

 कृषक तू अभिशप्त है , तड़पने को धूप में जलने को, पाई-पाई जोड़ने को फिर उसे खाद बीज में खर्च करने को हर रोज अपना खून पसीना बहाने को, पर उसका नगण्य प्रतिफल पाने को हे कृषक तू अभिशप्त है तू अभिशप्त है क्योंकि तू गाँव में रहता है तू देहाती है, तू गँवार है मानवी जोंकों से अनभिज्ञ तू...
विमर्श...
Tag :बाजार
  April 23, 2012, 2:27 pm
जिन लोगों ने कभी ब्याज(सूद) पर कर्ज लिया या दिया होगा उन्हें यह भली प्रकार पता होगा कि लेनदार को मूलधन से कहीं ज्यादा ज्यादा फ़िक्र ब्याज की होती है| आप उसका मूलधन भले बीस साल बाद लौटायें, उसको कोई दिक्कत न होगी पर यदि सूद के भुगतान में जरा भी देरी हुई तो उसकी त्योरियाँ चढ़ ज...
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Tag :मूल
  February 25, 2012, 2:36 pm
ना तो मैं हताश हूँ, ना ही मैं निराश हूँ|पर अपनी कमरफ्तारी पर, थोड़ा सा उदास हूँ||कुछ कमी है रौशनी की अभी, रास्ते भी कुछ धुंधले से हैं|कभी दूर हूँ मैं रास्ते से, तो कभी रास्ते के पास हूँ ||कर रहा है प्रश्न निरंतर, ये विचारों का अस्पष्ट प्रवाह|किसी की तलाश में हूँ मैं, या खुद किसी क...
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Tag :कविता
  February 6, 2012, 11:40 pm
जंगल अब कुछ बदल रहा है ,अंदर ही अंदर कुछ चल रहा है ,एक हिस्सा खुद को सहेज रहा है ,परिवर्तन की बयार में संभल रहा है |दूसरा हिस्सा हावी होने के लिए ,आसमान को छूने के लिएशिद्दत से मचल रहा है ||एक हिस्सा है सूखे दरख्तों का ,दूसरा उनके बाल-बच्चों का |एक हिस्सा है पुराने , जीर्ण वृक्ष...
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Tag :
  January 19, 2012, 4:08 pm
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