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Kalam Ka Sipahi /a blog by Rajesh Tripathi

भाग-4तब क्यों होता फर्ककितने जन भोजन बिना तड़प-तड़प मर जांय।सरकारी  गोदाम  में  अन्न पड़ा सड़ जाय ।।सब जन प्रभु की देन हैं, तब क्यों होता फर्क।कुछ  तो सिंहासन चढ़े, कुछ का बेड़ा गर्क ।।कलियुग में  सब  जनों  पर नहीं करें विश्वास।मधुर मधुर बतियाय कुछ सज्जन को ले ...
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  December 4, 2018, 8:30 pm
अप्रैल की गरमी में वाघा बार्डर का बीटिंग रिट्रीटराजेश त्रिपाठी  वाघा बार्डर पर ब्लागर (बायें) और अपने पापा के साथ देवा  ‘सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहां, जिंदगानी गर रही तो नौजवानी फिर कहां’ जब से होश संभाला तब से ये पंक्तियां जैसे चाबुक मार-मार कर कहत...
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  November 26, 2018, 8:05 pm
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  October 31, 2018, 9:17 am
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  October 22, 2018, 9:32 am
भाग-3नया संदर्भ नयी मान्यताएंभोर  होत  जो ‘बेड टी’  पावै । अंत  समय सो सुरपुर जावै।।धन संपत्ति अपार जग माही । बिन तिकड़म कोउ पावत नाहीं।।चाटुकार  जितने  जग माही।  सकल सुलभ कछु दुर्लभ नाहीं ।।परिजन   संग  प्रेम अचि गाढ़ा। लागत नीक सिनेमा भांड़ा ।।पाइपगन, ...
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  October 16, 2018, 12:21 am
भाग-2एक फूल की कामनात्रेता से द्वापर तक   मैंने, पाया  था सम्मान।किंतु आज कलियुग में मेरा, होता है अपमान।। तब देवों के मस्तक पर चढ़,फूला नहीं समाता।सबसे बड़ा मान अपने को, झूम-झूम इतराता।।मेरा हृदय चीर कर माली, गूंथे जब-जब हार।तब-तब वह बलात् करता था, मुझ पर अत्याचार।।...
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  October 9, 2018, 12:23 pm
                     _____________________डॉ. रुक्म (रामखिलावन त्रिपाठी 'रुक्म')  मेरे गुरु मेरे बड़े भैया कई पत्र-पत्रिकाओं के  संपादक रहे। उन्होंने पूर्वी भारत के सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय हिंदी दैनिक 'सन्मार्ग'से   आधी  शताब्दी   तक जुड़े रहे। उसके साहित्य...
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  October 8, 2018, 7:52 pm
कथा सौ साल पुराने शंख कीराजेश त्रिपाठीअपने पूर्वजों की वस्तुओं को सहेज, संभाल कर रखना अपने आप में एक सुखद और गौरवपूर्ण एहसास होता है। उन वस्तुओं को देखते ही आपका पुरानी यादों में खो जाना, उन क्षणों को महसूस करना जो बहुत-बहुत पीछे छूट चुके हैं, स्वाभाविक है।आज मैं यहां अ...
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  October 5, 2018, 10:06 pm
 एक दुर्घटना ने बदल दी जिंदगी ‘महानगर न्युमैंस गार्जियन’  में रुक्म जी का कार्य सुचारु रूप से चल रहा था। लेकिन भाग्य में कुछ और ही लिखा था। उनकी उम्र को देखते हुए हम लोगो ने कह रखा था कि वे बस स्टाप तक रिक्शे से जाया करें फिर वहां टैक्सी या बस जो मिले उससे दफ्तर चले जाय...
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  October 5, 2018, 7:54 pm
उन्हें खोकर हर दिल रोया, हर आंख हुई नमराजेश त्रिपाठी  2 नवंबर 2014 का वह दिन जिस दिन हमारे भैया रुक्म जी हमें छोड़ कर चले गये हमारी जिंदगी का सबसे मनहूस दिन था। इसके पहले मैं अपनी मां और फिर भाभी को खो चुका था। हमारे परिवार में बुजुर्ग भैया ही बचे थे जिनकी सलाह लेकर ही हम को...
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  August 20, 2018, 8:29 pm
उनका एक-एक बोल सीधे दिल में उतर जाता थाराजेश त्रिपाठीनीरज जी  नीरज जी का जाना हिंदी गीत विधा के एक सशक्त अध्याय की परि समाप्ति जैसा है। कारण, नीरज जी जैसे गीतकार और जन-जन के कवि धरा पर बार-बार नहीं आते। नीरज यह नाम गीतों की दुनिया में ऐसे अमर हो गया कि उनका मूल नाम गोपा...
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  July 20, 2018, 12:23 pm
भाग-5तब क्यों होता फर्ककितने जन भोजन बिना तड़प-तड़प मर जांय।सरकारी  गोदाम  में  अन्न पड़ा सड़ जाय ।।सब जन प्रभु की देन हैं, तब क्यों होता फर्क।कुछ  तो सिंहासन चढ़े, कुछ का बेड़ा गर्क ।।कलियुग में  सब  जनों  पर नहीं करें विश्वास।मधुर मधुर बतियाय कुछ सज्जन को ले ...
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  June 28, 2018, 10:05 am
और हमसे छिन गया अभिभावक का साया   राजेश त्रिपाठी   पहले तो आप सबसे इस जीवनगाथा को एक साल से अधिक समय तक न लिख    पाने के लिए क्षमा मांग लूं। इसकी निरंतरता में आये व्यवधान के कई कारण थे। पहले तो शारीरिक अस्वस्थता व अन्य परेशानियां दूसरी बात ये कि जाने क्यों इस क...
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  June 3, 2018, 11:30 pm
भाग-4मानव – कृत्यसृष्टि-विनाशक ताप अब बढ़ता जाता नित्य।नहीं प्रकृति की देन यह, मानव का है कृत्य।।मानव  का  है  कृत्य  प्रदूषण  जो फैलाता।पिघल रहे  हिमखंड,  प्रलय वह स्वयं बुलाता।कहें रुक्म कविराय जलधि की वक्र देखते दृष्टि।जलप्लावन से जलमग्न करके नष्ट करेग...
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  June 1, 2018, 9:52 pm
,भाग-3क्यों?आज सभी यह सोचा करते,आगे जाने क्या होना है।महंगाई यों उछल पड़ी क्यों,बहुतों का बस यह रोना है।।पहले ऐसा कभी न होता,गुजर-बसर हो जाया करता।पर गरीब आहें भर कर अब,आजादी को कोसा करता।।सोच रहा पहले अच्छे थे,लोग नहीं भूखे मरते थे।अन्न, दाल, चीनी सस्ती थी,लोग प्रशासन से ...
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  May 29, 2018, 10:31 pm
भाग-2एक फूल की कामनात्रेता  से   द्वापर  तक  मैंने,  पाया  था  सम्मान।किंतु आज कलियुग में मेरा, होता है अपमान।।तब देवों के मस्तक पर चढ़, फूला नहीं समाता।सबसे बड़ा मान अपने को, झूम-झूम इतराता।।मेरा   हृदय   चीर  कर  माली,  गूंथे जब-जब हार।तब-तब वब बलात ...
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  May 28, 2018, 9:08 pm
महामानव!मानवता के शत्रु अनेकों,ईर्ष्या, द्वेष, जलन परनिंदा।ये ऐसा धीमा विष होते,रहने दें ना सुख से जिंदा।।पर की घी से चुपड़ी लख कर,सूखी रोटी खाने वाले।ईर्ष्या से जल भुन जाते हैं,कोस-कोस खा रहे निवाले।।ऐसा यत्न नहीं करते वे,जिससे मालपुआ खुद खायें।नहीं दूसरों को कोसें फ...
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  May 23, 2018, 12:13 pm
वक्त कुछ इस कदर हम बिताते रहे ।दर्द  दिल  में  छिपा मुसकराते रहे ।।      जिसपे भरोसा किया उसने हमको छला।     परोपकार करके हमें क्या मिला।।     पंख हम बन गये जिनके परवाज के।     आज बदले हैं रंग उनके अंदाज के।।  मुंह फेरते हैं वही गुन हमारे जो गाते र...
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  March 7, 2018, 11:23 am
राजेश त्रिपाठीअपने पूर्वजों की वस्तुओं को सहेज, संभाल कर रखना अपने आप अपने पूर्वजों की वस्तुओं को सहेज, संभाल कर रखना अपने आप में एक सुखद और गौरवपूर्ण एहसास होता है। उन वस्तुओं को देखते ही आपका पुरानी यादों में खो जाना, उन क्षणों को महसूस करना जो बहुत-बहुत पीछे छूट चु...
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  December 16, 2017, 1:49 pm
क्या सचमुच भारत महाशक्ति है?हालांकि यह आतंकवादियों से भी नहीं जीत पायावे आते हैं और निर्दोषों का शिकार कर चले जाते हैंकश्मीर में रह कर महीनों रेकी करते हैंस्थानीय लोगों की मदद के बिना ऐसा मुमकिन है क्या?इजरायल जैसा छोटा देश आतंकवाद को कुचलने में सक्षमहम सिर्फ ‘बख्शे...
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  July 11, 2017, 10:53 am
सुनिए मेरा गीत- प्यारा सा वह गांव                     ...
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  June 21, 2017, 12:19 pm
तत्कालीन ग्रह स्थितियों से हुआ प्रमाणितराजेश त्रिपाठीकुछ लोग ऐसे हैं जो हर उस चीज को सिरे से नकारते हैं जिसे इतिहास की कसौटी पर खरा न पाया जाये। इसमें कुछ भी अनुचित नहीं लेकिन मेरे विचार से ऐसे भावों का स्तर व्यापक होना चाहिए और किसी काल विशेष या धर्म या पात्र विशेष क...
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  April 10, 2017, 8:48 pm
  पत्नी नीरू को खोने के बाद वे हमेशा उदास रहने लगे थे भाभी के निधन के बाद से भैया पहले जैसे नहीं रहे। रोतों को हंसानेवाला आदमी हमेशा खोया-खोया और उदास लगने लगा। हमारी हमेशा कोशिश होती कि उनको ढांढस बंधायें और उन्हें गम के उस दर्द से बाहर लायें जिसमें शायद वे तिल-तिल ...
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  January 28, 2017, 9:37 pm
कितने आंसू पिये अभी तक, कितनी बार पड़ा था रोना।कितने दिन तक फांका काटे, बिन खाये पड़ा था सोना।।कितने अधिकार गये हैं छीने, कब-कब खायी थी मात।राजनीति के छल-प्रपंच में, कितने ठगे गये हो तात।।           मत की कीमत को पहचानो, मत देने अवश्य ही जाना।       &...
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  January 13, 2017, 12:09 pm
सीरत कुछ की काली देखी           राजेश त्रिपाठीहमने  इस जग की हरदम रीत निराली देखी।सूरत देखी साफ, मगर सीरत* कुछ की काली देखी।।     कुछ खाये-अघाये इतने  खा-खा कर  जो बने हैं रोगी।     शील, सौम्यता खो  गयी  बने आज ज्यादातर भोगी।।     परम...
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  December 17, 2016, 11:15 am
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