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ठाले बैठे

<!--[if gte mso 9]> <![endif]--> आज फेसबुक पर कई जगह एक स्टेटस पढ़ने को मिला We are back in the 90s.....GDP is back to 5%, Dalmiya is back in BCCI, Murthy is back in Infosys, Nawaz Sharif is back in Pakistan, Madhuri is back in bollywood &; Sanjay Dutt is back in Jail.. कितनी सही बात है न.......... सब कुछ 90 वाला माहौल। यार हमें वह शेर याद आ रहा है  कहते हैं उम्र-ए-रफ़्ता कभी लौटती ...
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Tag :दोहा छंद
  June 8, 2013, 9:18 pm
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Tag :V
  June 8, 2013, 1:30 pm
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Tag :V
  June 8, 2013, 9:59 am
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Tag :दोहा छंद
  June 8, 2013, 9:25 am
<!--[if gte mso 9]> <![endif]--> दिन इक के बाद एक गुजरते हुये भी देख इक दिन तू अपने आप को मरते हुये भी देख हर वक़्त खिलते फूल की जानिब तका न कर मुरझा के पत्तियों को बिखरते हुये भी देख हाँ देख बर्फ़ गिरती हुई बाल-बाल पर तपते हुये ख़याल ठिठुरते हुये भी देख अपनों में रह के किस लिये सहमा ह...
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Tag :बहरे मुजारे मुसमन अखरब मकफूफ़ महजूफ
  June 7, 2013, 7:26 am
<!--[if gte mso 9]> <![endif]--> मुरझा के काली झील में गिरते हुए भी देख सूरज हूँ मेरा रंग मगर दिन ढले भी देख. हरचन्द राख़ हो के बिखरना है राह में जलते हुये परों से उड़ा हूँ मुझे भी देख हरचन्द - हालाँकि आलम में जिस की धूम थी उस शाहकार पर दीमक ने जो लिखे वो कभी तब्सिरे भी देख कागज़ की कत...
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Tag :बहरे मुजारे मुसमन अखरब मकफूफ़ महजूफ
  June 7, 2013, 7:25 am
<!--[if gte mso 9]> <![endif]--> ऐसा व्यंग्य नहीं पढ़ा :) अद्भुत..... ................  प्रथमोध्याय : अनुमोदन यमराज के दरबार में कई युगों से एक मुकदमा लटका हुआ है। कारण है पर्याप्त जानकारी एवं सबूतों का अभाव। यमराज कई बार सोचते हैं कि अपराधिन को नर्क भेजकर जैसे तैसे मामले को निपटा दिया जाय मगर...
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Tag :V
  June 7, 2013, 7:14 am
नमस्कार..................... भीषण गर्मी के दौरान मुम्बई को हल्की-फुल्की फुहारों के तुहफ़े मिलने शुरू हो गए हैं। मन मुताबिक़ काम करना और दिये हुये काम को अंज़ाम देना दो अलग बातें हैं, दूसरे काम का महत्व ज़ियादा होता है। यही बात जीवन पर भी लागू होती है। अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ जीना ...
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Tag :दोहा छंद
  June 6, 2013, 9:34 pm
नमस्कार...... अगले आयोजन की घोषणा के पूर्व एक और पोस्ट डालना ज़रूरी लग रहा है। मेरा शुरू से यह मानना रहा है कि दोहे के प्रथम और तृतीय चरण में 212 पदभार तथा दूसरे और चौथे चरण के अंत में 21 पदभार अनिवार्य है। सम्भव है कभी कभार कहीं चूक भी हो गयी हो और अब तक इन्टरनेट पर कहीं पड़ी हुई ह...
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Tag :दोहा छंद
  June 5, 2013, 6:00 am
अच्छा लगता है जब कोई हम पर अधिकार जताते हुये शिकायत करता है। विगत दिनों आ. सलिल जी, सौरभ पाण्डेय जी, राजेन्द्र स्वर्णकार जी, मयंक अवस्थी जी, धर्मेन्द्र कुमार सज्जन जी तथा अरुण निगम जी सहित तमाम  सहकर्मियों ने शिकायत दर्ज़ की कि ठाले-बैठे पर छंद-साधना की गति कुछ मंथर हुई है...
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Tag :दोहा छंद
  June 4, 2013, 10:58 am
मुझे पहले यूँ लगता था करिश्मा चाहिये मुझको मगर अब जा के समझा हूँ क़रीना चाहिये मुझको करिश्मा – चमत्कार, क़रीना – तमीज़, शिष्टता तो क्या मैं इतना पापी हूँ कि इक लाड़ो नहीं बख़्शी बहू के रूप में ही दे – तनूजा चाहिये मुझ को तनूजा – बेटी हिमालय का गुलाबी जिस्म इन हाथों से छूना है...
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Tag :बहरे हजज मुसम्मन सालिम
  June 2, 2013, 1:00 pm
जहाँ तलक भी ये सहरा दिखाई देता है मेरी तरह से अकेला दिखाई देता है सहरा - रेगिस्तान न इतनी तेज़ चले, सरफिरी हवा से कहो शजर पे एक ही पत्ता दिखाई देता है शजर - पेड़  ये एक अब्र का टुकड़ा कहाँ-कहाँ बरसे तमाम दश्त ही प्यासा दिखाई देता है अब्र - बादल, दश्त - जंगल / कानन वहीं पहुँच क...
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Tag :Shakeb Jalali
  June 1, 2013, 9:28 am
हरेक डूबता मंज़र दिखाई देता है हमारे घर से समन्दर दिखाई देता है मैं जिस के साये से बच कर निकलना चाहता हूँ वो मुझको राह में अक्सर दिखाई देता है  उसे कभी भी न इस बात की ख़बर हो पाये वो अपने आप से बेहतर दिखाई देता है  हमारे बीच ये नज़दीकियाँ ही काफ़ी हैं तुम्हारे घर से मेरा घ...
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Tag :बहरे मुजतस मुसमन मखबून महजूफ
  June 1, 2013, 9:28 am
दिलों की ओर धुआँ सा दिखाई देता हैये शहर तो मुझे जलता दिखाई देता है  जहाँ कि दाग़ है याँ आगे दर्द रहता थामगर ये दाग़ भी जाता दिखाई देता है  पुकारती हैं भरे शह्र की गुज़र-गाहेंवो रोज़ शाम को तन्हा दिखाई देता है  ये लोग टूटी हुई कश्तियों में सोते हैंमेरे मकान से दरिया दिखा...
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Tag :बहरे मुजतस मुसमन मखबून महजूफ
  June 1, 2013, 8:27 am
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Tag :बहरे मुजतस मुसमन मखबून महजूफ
  June 1, 2013, 8:23 am
बड़ा अजीब सा मंज़र दिखाई देता है   तमाम शह्र ही खंडर दिखाई देता है   जहाँ, उगाई थी हमने फ़सल मुहब्बत की वो खेत आज तो बंजर दिखाई देता है जो मुझको कहता था अक्सर कि आइना हो जा उसी के हाथ में पत्थर दिखाई देता है    हमें यह डर है किनारे भी बह न जाएँ कहीं अजब जुनूँ में समन्दर दि...
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Tag :बहरे मुजतस मुसमन मखबून महजूफ
  June 1, 2013, 8:23 am
पिछले कई दिनों से लगातार अनेक नज़्में पढ़ने को मिलीं। कुछ बहुत अच्छी और कुछ अच्छी भी। आज अपने कॉलेज के ज़माने की डायरी पढ़ी, कितना कुछ बकवास भरा पड़ा है उस में। उस बहुत सारे बकवास में से कुछ ठीक-ठाक सी नज़्में हाथ लगीं तो सोचा एक को यहाँ चिपका देता हूँ ब्लॉग पर :) कुकर से गैस रिस ...
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Tag :नज़्म
  May 31, 2013, 8:32 pm
मुहतरम बानी मनचन्दा की साहब ज़मीन ‘क़दम ज़मीं पे न थे राह हम बदलते क्या’ पर एक कोशिश।बदल बदल के भी दुनिया को हम बदलते क्यागढ़े हुये थे जो मुर्दे वो उठ के चलते क्याडगर दिखाने गये थे नगर जला आयेहवस के शोले दियों की तरह से जलते क्यातरक़्क़ियों के के तमाशों ने मार डाला हमेंअनाज़ उ...
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Tag :बहरे मुजतस मुसमन मखबून महजूफ
  May 30, 2013, 6:35 pm
<!--[if gte mso 9]> <![endif]--> हजरत अल्ताफ़ हुसैन साहब हाली की ज़मीन “है जुस्तजू कि ख़ूब से है ख़ूबतर कहाँ” पर एक कोशिश फ़ानी जहाँ में होनी है अपनी बसर कहाँ पर इस से बच के जाएँ तो जाएँ किधर? कहाँ? फ़ानी - नश्वर / नाशवान, बसर - गुजर-बसर / निर्वाह ख़्वाबों ने हमको छोड़ा तो यादों ने धर लिया तुम स...
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Tag :बहरे मुजारे मुसमन अखरब मकफूफ़ महजूफ
  May 28, 2013, 2:32 pm
<!--[if gte mso 9]> <![endif]--> जनाब शकेब ज़लाली साहब की ज़मीन ‘कोई इस दिल का हाल क्या जाने’ पर एक कोशिश सच तभी हैं कि जब कोई माने वरना झूठे हैं सारे अफ़साने हम ने समझा है यूँ ख़लाओं को जैसे तहख़ानों में हों तहखाने ख़ला –अन्तरिक्ष यूँ ही थोड़ा गुरूर है उस को सर किये हैं सराब दरिया ने ...
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Tag :ghazal
  May 28, 2013, 2:30 pm
<!--[if gte mso 9]> <![endif]--> हजरत अकबर इलाहाबादी साहब की ज़मीन ‘बाज़ार से गुजरा हूँ ख़रीदार नहीं हूँ’ पर एक कोशिश जो कुछ भी हूँ पर यार गुनहगार नहीं हूँ दहलीज़ हूँ, दरवाज़ा हूँ, दीवार नहीं हूँ छह गलियों से असबाब चले आते हैं मुझ में किस तरह से कह दूँ कि ख़रीदार नहीं हूँ छह गली - छह इंद्...
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Tag :बहरे हजज़ मुसमन अखरब मकफूफ महजूफ
  May 28, 2013, 2:28 pm
<!--[if gte mso 9]> <![endif]--> मुहतरम अमीर मीनाई साहब की ज़मीन “सरकती जाये है रूख़ से नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता” पर एक कोशिश ज़मीं में मिल गये सब इन्क़लाब आहिस्ता-आहिस्ता मगर हम पर खुले थे ये सराब आहिस्ता-आहिस्ता  सराब - मृगतृष्णा हमारी कोशिशों को ये जहाँ समझा न समझेगा हमें होना था या...
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Tag :बहरे हजज मुसम्मन सालिम
  May 28, 2013, 2:24 pm
<!--[if gte mso 9]> <![endif]--> शान-ए-शायरी हजरत ग़ालिब साहब की ज़मीन ‘दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है” पर एक कोशिश ये न गाओ कि हो चुका क्या है ये बताओ कि हो रहा क्या है इस ज़माने को कौन समझाये अब का तब से मुक़ाबला क्या है हम फ़क़ीर इतना सोचते ही नहीं बन्दगी का मुआवज़ा क्या है मुआवज़ा – प्रतीकार...
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Tag :ghazal
  May 28, 2013, 2:22 pm
महज 28 जी हाँ अट्ठाईस साल की उम्र वाले अभिषेक भाई झटके पर झटके :) दिये जा रहे हैं। मुमकिन है आप में से कई लोग अभिषेक शुक्ला को पढ़ चुके होंगे। मैंने सब से पहले जब उन्हें पढ़ा तो माथापीट लिया [भाई जो सच है वही बता रहा हूँ]; उस के बाद उन्हें बार-बार पढ़ा तो उन की बातें समझ में आने लगी...
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Tag :बहरे मुजतस मुसमन मखबून महजूफ
  May 25, 2013, 8:44 am
मुहतरम फ़िराक़ गोरखपुरी साहब की ज़मीन “कुछ इशारे थे जिन्हें दुनिया समझ बैठे थे हम” पर एक कोशिश होश में थे फिर भी जाने क्या समझ बैठे थे हम बादलों को नूर का चेहरा समझ बैठे थे हम किस के सर पर ठीकरा फोड़ें अब इस भटकाव का दूर के हर अक्स को आला समझ बैठे थे हम अक्स – परछाईं हाल ये होन...
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Tag :बहरे रमल मुसमन महजूफ
  May 22, 2013, 7:04 pm
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