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वीरांशवीरांश : View Blog Posts
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वीरांशवीरांश

अब हमने धक्का देना छोड़ दिया है! रिश्तों को कांधों पर ढोना छोड़ दिया है | या हम दाना हुए या तुम में वो बात नहीं, या इश्क ने ही जादू टोना छोड़ दिया है | रिश्तों को कांधों पर ढोना छोड़ दिया है… कोई पूछे तो अब भी तेरा ही नाम लेते हैं, मुद्दत [...]...
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Tag :ग़ज़ल
  June 4, 2013, 10:09 am
मेरे लफ्ज़ मुझसे पराये तो नहीं, मेरी तरह वो तुम्हें पसंद आये तो नहीं | क्या लफ़्ज़ों को है गिला-शिकवा बहुत ? क्या कहीं वो भी मेरे सताये तो नहीं | मेरे लफ्ज़ मुझसे पराये तो नहीं… सहरा तक पहुँचती हर एक मौज से पूछो, क्या उसने कोई सफीने डुबाये तो नहीं | मेरे लफ्ज़ [...]...
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Tag :ग़ज़ल
  June 4, 2013, 9:36 am
आखरी वस्ल था लंबे फिराक से पहले, दोनों खामोश थे दिल-ए-बेबाक से पहले | अब के जो फूँक से उड़ा देते हो मुझे, मैं जो शोला था मुश्त-ए-ख़ाक से पहले | आखरी वस्ल था लंबे फिराक से पहले… पहचान नहीं पाता हूँ इस दिल को मैं, ये जो गुलिस्तां था हज़ारों चाक से पहले | [...]...
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Tag :ग़ज़ल
  April 24, 2013, 5:28 pm
तेरी मामूली सी बातों में, न-मामूली सा प्यार छुपा है | खामोश गहरी आँखों में, मीठा सा इकरार छुपा है | न तुमने कोई कसमें दी, न मैंने कोई अहद किया | मगर दोनों के दरमियाँ, अनकहा सा ऐतबार छुपा है | तेरी मामूली सी बातों में, न-मामूली सा प्यार छुपा है… दो जिंदिगियाँ वैसे [...]...
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Tag :ग़ज़ल
  April 24, 2013, 4:39 pm
क्या तुमसे बयां करूँ सबब-ए-हिज्र हमनफस, पैरों में तेरे बेडियाँ हैं और हाथ मेरे बंधे हुए | कहने को एक जिंदिगी दोनों के पास है मगर, इन मुस्कुराते चेहरों के पीछे हैं दिल जले हुए | पैरों में तेरे बेडियाँ हैं और हाथ मेरे बंधे हुए… एक आंधी चली और गुबार से उड़ गए हम, ज़माना [...]...
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Tag :ग़ज़ल
  April 5, 2013, 9:20 pm
किसी को कुछ समझाया न करो, लोगों को ठोकर से बचाया न करो | वो अपनी गलती के मालिक हैं, बेवजह अपना खून जलाया न करो | किसी को कुछ समझाया न करो… तजुर्बे का निचोड़ अपनी हलक में रखो, अपना फ़साना जुबां तक लाया न करो | किसी को कुछ समझाया न करो… खाई [...]...
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Tag :ग़ज़ल
  March 25, 2013, 7:30 pm
कीमती जिंदिगी लुटाते फिर रहे हैं, हम खुद को बहलाते फिर रहे हैं | तुम्हारा होने की सज़ा मिली है हमें, ज़र्रा ज़र्रा खुद को मिटाते फिर रहे हैं | हम खुद को बहलाते फिर रहे हैं… मुझे ज़माने भर में बाट आया है वो, हर शख्स से खुद को बचाते फिर रहे हैं | [...]...
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Tag :ग़ज़ल
  March 16, 2013, 5:09 pm
बस खामोश हूँ मगर बेज़ुबां नहीं हूँ, एक आग है मेरे अंदर सिर्फ धुआं नहीं हूँ | पत्थर की लकीर नहीं हैं उसूल मेरे, दिल रखता हूँ, गुलाम ए इमां नहीं हूँ | एक आग है मेरे अंदर सिर्फ धुआं नहीं हूँ… वक्त आने पर बता देंगे कूबत क्या है, काबलियत से वाकिफ हूँ, बदगुमां [...]...
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Tag :ग़ज़ल
  March 16, 2013, 4:40 pm
सच, क्या तुझे भी सच सुनना पसंद है ? मैं झूठ हूँ, मुझे सच बुनना पसंद है | गाँठ जीस्त की खोल रहा है गुज़रता वक्त, मैं लम्हा हूँ, मुझे उलझना पसंद है | उम्मीद की डोर से पिरोई है आरजू मगर, मैं हसरत हूँ, मुझे बिखरना पसंद है | मेरे बाद तुझे तलब न [...]...
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Tag :ग़ज़ल
  March 16, 2013, 4:23 pm
कहीं माँ का दुलार नहीं मिलता, कहीं बाप का प्यार नहीं मिलता | कुछ अभागि औलादें ऐसी भी हैं, जिन्हें अपना अधिकार नहीं मिलता | उम्र भर ढूंढते फिरते हैं बेगानों में, मगर कोई तलबगार नहीं मिलता | जैसे किसी वीरान पड़े मकां को, बरसों किरायेदार नहीं मिलता | मौत से एक लम्हें का भी, [...]...
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Tag :कविता
  March 16, 2013, 4:05 pm
दुआ मांगते बहुत हैं पर इबादत चंद से होती है, इश्क बहुतों से हुआ पर मोहब्बत कम से होती है | तुम मेरी आवाज़ को यूँ नज़रंदाज़ मत किया करो, हर इंकलाब की आगाज़ ज़ुल्म ओ सितम से होती है | इश्क बहुतों से हुआ पर मोहब्बत कम से होती है… कभी मेरे इस ज़हन [...]...
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Tag :ग़ज़ल
  March 1, 2013, 8:49 pm
वक्त से पहले ही मिल गयी मंजिल मुझे, और फिर न हुआ ताउम्र कुछ हासिल मुझे | मैं पूरा समंदर पी गया था लड़कपन में, फिर कभी दोस्त सा न मिला साहिल मुझे | और फिर न हुआ ताउम्र कुछ हासिल मुझे… और कोई नहीं बस एक ही खता हुई तुझसे, क्यों दे दिया तुने [...]...
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Tag :ग़ज़ल
  March 1, 2013, 8:14 pm
निभा रहा था अब-तलक वो मेरा किरदार नहीं है, आईने में जो शख्स है वो मेरा वफादार नहीं है | उस तक पहुँचते-पहुँचते खो दिया है खुद को, अब उस तक पहुंचा हूँ जो मेरा तलबगार नहीं है | आईने में जो शख्स है वो मेरा वफादार नहीं है… सबका अलग रास्ता है और सबका अपना [...]...
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Tag :ग़ज़ल
  March 1, 2013, 8:01 pm
मिलता है मगर बिछड़ने की शर्त पर, जिंदा तो है मगर मरने की शर्त पर | जिंदिगी तेरी अदा है या बेबसी मेरी, होसला मिलता है मगर डरने की शर्त पर | जिंदा तो है मगर मरने की शर्त पर… पल दो पल से ज़्यादा कहीं भी रुकता नहीं, वक्त अच्छा आता है गुजरने की [...]...
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Tag :ग़ज़ल
  March 1, 2013, 7:35 pm
शब्दों के वार से अभिमान मरोड़ा गया, फिर मेरे आत्मसम्मान को तोड़ा गया| टूट के जब में गिरा अपनी नज़रों से, फिर मुझे रिश्तों की गोंद से जोड़ा गया| शब्दों के वार से… यही क्रम चलता रहा सालों साल निरंतर, … Continue reading →...
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Tag :ग़ज़ल
  July 10, 2012, 11:30 am
मुझ पर दावा-ए-हक का तलबगार न बन, ये शौक़ है ज़माने का, तुम पर जचता नहीं | रोज़ कमाते हैं तब ही रोज़ खाते हैं, महीने के आखरी में, जेब में कुछ बचता नहीं | ये शौक़ है ज़माने का, … Continue reading →...
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Tag :ग़ज़ल
  June 18, 2012, 11:42 am
चल उठ के देर हो गयी है घर जाने में, तेरे सिवा अब कोई नहीं, इस मयखाने में | एक लम्हा था जो कमज़ोर कर गया मुझे, वरना एक उम्र छोटी थी, उसको भुलाने में | तेरे सिवा अब कोई नहीं, … Continue reading →...
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Tag :ग़ज़ल
  June 15, 2012, 12:09 pm
अपना सर उठाने की, एक कीमत होती है, हर किसी को कहाँ नसीब, ये ज़ीनत होती है | ख्वाब तो हर आँख में होते हैं मगर, सब में कहाँ इन्हें जीने की नीयत होती है | अपना सर उठाने की, एक कीमत होती है … मुश्किल हालत से गुज़रते … Continue reading →...
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Tag :ग़ज़ल
  June 14, 2012, 8:23 am
इस शहर की दुकानों में, मुझे बेंच रहा है हुनर मेरा| मैं खरीद रहा हूँ अपने रास्ते, और नीलाम हो रहा है सफ़र मेरा| एक शख्स मेरे अन्दर मुझे, जीस्त की मजबूरियां गिनाता है| मैं ढल रहा हूँ बदलते सांचों में, और बदनाम हो रहा है सफ़र मेरा| मैं खरीद रहा हूँ अपने रास्ते, … Continue reading →...
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Tag :ग़ज़ल
  June 13, 2012, 10:54 am
अंदाज़ मेरा मुझे बेगाना सा लगने लगा है, हर ख्याल कोई दुश्मन पुराना सा लगने लगा है| एक लम्हें में इतनी दूर चला आया हूँ सबसे, ये दिन भी गुजरा ज़माना सा लगने लगा है| अंदाज़ मेरा मुझे बेगाना सा … Continue reading →...
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Tag :ग़ज़ल
  June 7, 2012, 10:55 am
ख्वाब देखा न करो, खुली आँखों से, इसकी कीमत देनी होती है, अधूरी सांसों से| हकीकत बदलती नहीं बस धुंधला जाती है, लकीरें कहाँ मिटती हैं, किसी के हाथों से| ख्वाब देखा न  करो, खुली आँखों से… आदमी अकेला था और अकेला ही रहेगा, क्या उम्मीद लगाई है तुमने रिश्ते-नातों से| ख्वाब दे...
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Tag :ख्याल
  June 7, 2012, 10:29 am
न खैरात में मिला है, न वसीयत काम आई है, एक-एक रुपया मेरी जेब का, गाढ़े पसीने की कमाई है| न शागिर्दी है मिजाज़ में, न बेपनाह हुनर है कोई, मैंने ठोकरें खा-खा कर, अपनी रह बनाई है| एक-एक रुपया … Continue reading →...
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Tag :ग़ज़ल
  April 30, 2012, 3:33 pm
सब आसपास हैं तो फिर मुलाक़ात क्यों नहीं होती? अरसा गुज़र जाता है, दिल से दिल की बात नहीं होती| ये दुनिया भी अजीब शय है दोस्तों, साथ रहती है मगर साथ नहीं होती| दिल से दिल की बात नहीं होती… दिन मान भी जाता है लकीरों के लिखे को, तुम्हारे बिन मगर गुज़र ये रात [...]...
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Tag :ग़ज़ल
  April 24, 2012, 6:21 pm
मुझे ये कलाकारी, बर्दाश्त नहीं होती| ये नकाबों की बिमारी, बर्दाश्त नहीं होती| मैंने देखे हैं तुम्हारे कई सुन्दर रंग, मुझसे तुम्हारी अदाकारी, बर्दाश्त नहीं होती| मुझे ये कलाकारी, बर्दाश्त नहीं होती… हमने फूँका है खुद को वफ़ा में मगर, अब तंज की चिंगारी, बर्दाश्त नहीं होत...
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Tag :ग़ज़ल
  April 24, 2012, 3:50 pm
...
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Tag :ग़ज़ल
  April 6, 2012, 10:36 am
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