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अनुभूति !

मन की बेचैनी का ज़िक्रे -बयाँ अब क्या करें तुमसे मिलना भी चाहे है , और दूर जाना भी तुम पास हो तो भूल जाते हैं हम ,कहनी होती हैं न जाने कितनी ही बातें .तुम ,जब पास नही  होते , तनहाइयों में सपनो के महल बनाते हैं .बिठाते हैं तुम्हे अपने मन - मंदिर में पूजा के फूल तु...
अनुभूति !...
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  May 9, 2012, 9:32 pm
बारहा टूटे हैं सपने !बारहा ठेस लगी है दिल पर ,ना-समझ फिर भी बाज़ नहीं आता .उनसे मिलने की ख्वाहिशें लिए बैठा है,जो हर बार ही फेर लेते हैं नज़रें कैसे समझाएं , रास्तें अलग है ,फिर भी खुद को ही चोटिल किये बैठा है !उम्मीदें हर रोज़ बदती जाती हैंतम्मनाओं की उम्र घटती नहीं लेकिन ,ख...
अनुभूति !...
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  April 30, 2012, 3:38 pm
सच है , कभी किसी को मुक्कम्मल जहाँ नहीं मिलता ,चाहता है ये दिल , जब तुम पास होते,खुबसूरत रेशमी एहसास के साये में जब हम अपनी कहते , तुम्हारी सुनतेहवाएं जब मदहोश कर रही होंतीतुम्हारे थरथराते होंठ , जब अठखेलियाँ कर रहे होते तल्खियाँ ज़िन्दगी की बेज़ार होंती. तब, तब केवल तुम औ...
अनुभूति !...
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  April 29, 2012, 10:15 am
 आए भी__चले भी गए खबर हो न पाई .दावानल से जूझता ही रहा था ये दिल,तब फिर  तुमने ही दी थी एक बार -ज़माने की दुहाई ! आखिर क्यूँ ---हर बार ही होता है ऐसा ,क्या अस्तित्व  की पनप  भी सीमित होती है  !फिर लो ही क्यूँ, ऐसे कुछ रिश्ते खो जाते हैं जो, अँधेरे मे,गुमनामी केमहज़ दिल की तसल्ली को ,तु...
अनुभूति !...
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  March 31, 2012, 9:32 pm
नैनों की भाषा गर समझ पाए होतेजीवन को तुम भी हसीं बनाये होतेये जो दिमाग आड़े आता रहा तुम्हारेदिल से सोचा होता , तो मुस्कुराये होते ...!चलते-चलते राह में ,कई साथी मिले ,कुछ राह में ही रह गए , कुछ हमराज़ बनेदिया कुछ थोडा सा , पाया हमने इन्तहाखुश होते बहुत,गर खुद को लुटाये होते ..!...
अनुभूति !...
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  January 7, 2012, 8:51 pm
कई बार दिल ने चाहामजलिसों के हमराह न हों पर ख्वाहिशें कुछ ऐसी बढीं हम बारहा मजलिस हुए   !...
अनुभूति !...
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  December 18, 2011, 8:54 pm
कोई रोज़ आता है , सपनो में मेरेचुपके से कानो में कह जाता है ,ढेर सी बातेंबातें , जो बेमानी नहीं होतींबातें , जिनका सरोकार होता है ,जीवन की तल्खियों से , खुशिओं सेरुसवाइयों से ,शहनाइयों सेबातें ,जो कह जातीं हैं,चुपके से कानो मेंकल आएगा , एक दिन ऐसापूरे होंगें, ख्वाब तुम्हारे...
अनुभूति !...
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  December 11, 2011, 8:21 pm
एक और बरस बीत गया जीवन घट रीत गया साथी और मंजिल यूँ ही मिलते गए संकट -विकट कट ,पीट गया चाहा था छूना आसमान मैंने भी  कुछ पहुँच पाया , कुछ गीत गया मेरा तो कुछ भी अपना न था जो तुमने दिया वह मीत नया  !मेरे मन की पीड़ा हर ली संग तुम्हरे , पल नवनीत नया .एक और बरस बीत गया जीवन घट रीत गय...
अनुभूति !...
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  December 8, 2011, 10:15 am
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