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Blog: ज़ख्म…जो फूलों ने दिये

Blogger: वन्दना गुप्ता
तुम नहीं सुधरोगी कोई सुधारना चाहे तब भी नहीं कब खुद को पहचानोगी?कब खुद के लिए जीना सीखोगी?क्या सारा स्वाभिमान बेच दिया एक नपुंसक के हाथों ?हाँ, नपुंसक ही है वो जो आधी रात वस्त्रहीन कर घर से निकाल देता है फिर भी नहीं जागता तुम में तुम्हारा स्वाभिमान ?क्यों कठपुतली बन खुद क... Read more
clicks 4 View   Vote 0 Like   5:35am 5 Apr 2021 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
 पानी आँख का सूख जाए पानी जिस्म का सूख जाए पानी संबंधों के मध्य भी सूख जाए नहीं फर्क पड़ेगा सृष्टि को जहाँ जल ही जीवन हो वहाँ पानी के सूखने से समाप्त हो जाती हैं प्रजातियाँ समाप्त हो जाती हैं सभ्यताएं जैसे जीवन के लिए साँसों का होना जरूरी है जैसे जी... Read more
clicks 15 View   Vote 0 Like   7:49am 22 Mar 2021 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
हम सभी शेर हैं बधाई देने में फिर वो जन्मदिन हो शादी की सालगिरह या कोई उपलब्धि ...इसी तरह निभाते हैं हम श्रद्धांजलियों का सिलसिला करके नमन या कहकर बेहद दुखद कर ही देते हैं प्रगट अपनी संवेदनाएं ....बस नहीं हो पाते इतने उदारवादी किसी भी अच्छी कविता, कहानी या पोस्ट पर ...हाँ होत... Read more
clicks 113 View   Vote 0 Like   7:29am 5 Mar 2021 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
 मुझे दस्तकों से ऐतराज नहींयहाँ अपनी कोई आवाज़ नहींये किस दौर में जीते हैंजहाँ आज़ादी का कोई हिसाब नहींचलो ओढ़ लें नकाबचलो बाँध लें जुबानकिये दौर-ए बेहिसाब हैयहाँ किसी का कोई खैरख्वाह नहींदाँत अमृतांजन से मांजो या कॉलगेट सेसाँसों पे लगे पहरों परतुम्हारा कोई अख्तिया... Read more
clicks 25 View   Vote 0 Like   10:09am 1 Mar 2021 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
 खुद को समेटकर रखती है अपने अन्दर ही बाहर नहीं मिलता कोई कोना या ठिकाना सुस्ताने को बिछे नहीं मिलते हरसिंगार खोखले सन्दर्भों से परिभाषित नहीं किए जा सकते सम्बन्ध आग्नेय नेत्रों और बोलियों से हिल जाती हैं पुख्ता नींवें भी एक दिन रबड़ को एक हद तक खींचना ही शोभा देता ह... Read more
clicks 21 View   Vote 0 Like   6:28am 25 Feb 2021 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
दो जून की रोटी के लिए एक जून को खुला देश और सब आत्मनिर्भर हो गए इसके बाद न प्रश्न हैं न उत्तर ये है महिमा तंत्र की जान सको तो जान लो ...अपनी परतंत्रता नहीं माने तो क्या होगा ?छोडो, क्या अब तक कुछ कर पाए ...जाने दो तुम पेट भरो और मरो बस यहीं तक है तुम्हारी उपादेयतातुम्हें जो चाहि... Read more
clicks 80 View   Vote 0 Like   6:14am 2 Jun 2020 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
बेशक मैं कतार का अंतिम आदमी हूँ लेकिन सबसे अहम हूँ मेरे बिना तुम्हारे महल चौबारे नहीं पूँजी के नंगे नज़ारे नहीं फिर भी दृष्टि में तुम्हारी नगण्य हूँ मत भूलो स्वप्न तुम देखते हो पूरा मैं करता हूँ फिर भी मारा मारा मैं ही यहाँ वहां फिरता हूँ तुम तभी चैन से सोते हो जब मैं धूप ... Read more
clicks 76 View   Vote 0 Like   11:29am 21 May 2020 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
विकल्पहीन होती है माँ बच्चों की हसरतों के आगे भूल जाती है दर्दोगम अपना कर देती है खुद को किनारे अपनी चाहतों को मारे कि खुद को मारकर जीना जो सीख चुकी होती है तो क्या हुआ जो उम्र एक अवसाद बन गयी हो और जीवन असरहीन दवा ममता का मोल चुकाना ही होता है अपनी चा... Read more
clicks 80 View   Vote 0 Like   11:59am 10 May 2020 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
सच ही तो है मर चुके हैं मेरे सपने और नए देखने की हिम्मत नहीं अब बताये कोई वो क्या करे ?हाँ , गुजर रही हूँ उसी मुकाम से जहाँ कोई तड़प बची ही नहीं एक मरघटी सन्नाटा बांह पसारे लील रहा है मेरी रूह कैसे पहुँचे कोई मेरे अंतस्थल तक जबकि वक्त के अंतराल में तो बदल जाती हैं सभ्यताएंमो... Read more
clicks 78 View   Vote 0 Like   8:19am 12 Apr 2020 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
सुनिए अपनी नाराज़गी की पुड़िया बनाइये और गटक जाइए गए वो ज़माने जब कोल्हू के बैल सी जुती दिखाई देती थी दम भर न जो साँस लेती थी साहेब डाल लीजिये आदत अब हर गली, हर मोड़, हर नुक्कड़ पर दिख जायेंगी आपको खाली बैठी औरतें जानते हैं क्यों?जाग गयी हैं वो न केवल अपने अधिकारों के प्रति बल्क... Read more
clicks 84 View   Vote 0 Like   6:04am 13 Feb 2020 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
 1तुम   कहती  हो  "जीना है मुझे "मैं कहती हूँ ………… क्यों ?आखिर क्यों आना चाहती हो दुनिया में ? क्या मिलेगा तुम्हे जीकर ?बचपन से ही बेटी होने के दंश  को सहोगी बड़े होकर किसी की निगाहों में चढोगीतो कहीं तेज़ाब की आग में खद्कोगीतो कहीं बलात्कार की  त्रासदी सहोगी ... Read more
clicks 61 View   Vote 0 Like   7:58am 2 Dec 2019 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
जाने किस मोड़ पर छोड़ आयीआँसू, आहें और दर्दअब जिद की नोक पर कर रही है नृत्यप्रज्ञा उसकीतुम्हारी भौंहों के टेढ़ेपन को बनाकर जमीनयूँ ही चलते फिरते खींच रही है वो अपनी लकीरन तुमसे छोटी और न ही तुमसे बड़ीजाने क्यों गुनगुनाहट के घुंघरुओं से दहल उठा है आसमां...... Read more
clicks 52 View   Vote 0 Like   9:16am 28 Nov 2019 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
इस दौड़ती भागती दुनिया में समय की धुरी पर ठहरा मन मेरा कहता है आ अब लौट चलें एक बार फिर उसी दौर में जहाँ पंछियों से रोज मुलाकात हो मेरे आँगन में रोज उनकी आमद हो मैं सितार सी बजती फिरूँ उमंगों का संगीत रूह में बजता रहे मन की अलंगनी पर इक ख्वाब रोज नया सजता रहे वो गली चौराहों ... Read more
clicks 209 View   Vote 0 Like   6:05am 2 Sep 2019 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
मरे हुए लोग हाय हाय नहीं करतेमरे हुए लोगों की कोई आवाज़ नहीं होतीमरे हुए लोगों की कोई कम्युनिटी नहीं होतीजो कोशिशों के परचम लहराएऔर हरी भरी हो जाए धरा मनोनुकूलआइये हम अपने लिए शांति पाठ करेंयूँ कहकरहम शर्मिंदा हैं कि हम मर चुके हैंबच्चों हम से कोई उम्मीद मत रखनाहम बस त... Read more
clicks 122 View   Vote 0 Like   1:04pm 18 Jun 2019 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
न जाने किस पर गुस्सा हूँ न जाने क्यों उदास हूँ खोज के बिंदु चुक गए मौसम सारे रुक गए फिर किस चाह की आस में हूँ जब कोई कहीं नहीं अपना पराया भी नहीं मृग तृष्णा की किस फाँस में हूँ किस जीवन की तलाश में हूँ यूँ लगता है कभी कभी मैं बस इक जलता अलाव हूँ किसी दिशा का भान नहीं अब बचा को... Read more
clicks 205 View   Vote 0 Like   6:00am 12 Dec 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
मैं सो रहा था मुझे सोने देते चैन तो था अब न सो पाऊंगा और न जागा रह पाऊँगामझधार में जैसे हो नैया कोई एक विशालकाय प्रेत की मानिंद हो गया हूँ अभिशप्त तुम्हारी बनायीं मरुभूमि में शापित बना दिया नहीं सोचा तुमने अपनी महत्वाकांक्षा से ऊपर अब झेलना है मुझे शीत ताप और बरसात यूँ ... Read more
clicks 204 View   Vote 0 Like   7:16am 5 Nov 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
कहानियां, हमारे जीवन का आधार रही हैं आदिम काल से. जैसे जैसे सभ्यता विकसित होती गयी, कहानियाँ उसी के अनुसार आकार लेती रहीं. वक्त के साथ कहानियों के स्वरुप में भी परिवर्तन आया लेकिन कहानियों का जो मुख्य स्वरुप है वो ही पाठक/श्रोता के जेहन पर मुख्यतः कब्ज़ा जमाये रहता है. कह... Read more
clicks 197 View   Vote 0 Like   11:03am 25 Sep 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
किसी के जाने के बाद झरती हैं यादें रह रह ये जाना वास्तव में जाना नहीं होता जाने वाला भी तो समेटे होता है रिश्तों की धार कराता है अहसास पल पल मैं हूँ तुम्हारी ज़िन्दगी में उपस्थित कभी बूँद की तरह तो कभी नदी की तरह कभी पतझड़ की तरह तो कभी बसंत की तरह कभी सावन की रिमझिम फुहारों ... Read more
clicks 342 View   Vote 0 Like   7:48am 27 Aug 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
मेरे चेहरे पर एक जंगल उगा है मतलबपरस्ती का मेरी दाढ़ों में माँस अटका है खुदगर्जी का आँखों पर लगा है चश्मा बेहयाई का मारकाट के आईने में लहू के कतरे सहमा रहे हैं पूरी सभ्यता को भूख के ताबीज चबा रही हैं आने वाली पीढ़ियाँकोहराम और ख़ामोशी के मध्य साँसों की आवाजाही ज़िन्दगी की ... Read more
clicks 236 View   Vote 0 Like   5:52am 26 Jul 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
मेरे पास उम्मीद की कोई सड़क नहीं कोई रास्ता नहीं कोई मंजिल नहीं फिर भी जिंदा हूँ मेरे पास मोहब्बत का कोई महबूब नहीं कोई खुदा नहीं कोई ताजमहल नहीं फिर भी जिंदा हूँ मेरे पास जीने की कोई वजह नहीं कोई आस नहीं कोई विश्वास नहीं फिर भी जिंदा हूँ मेरे पास खोने को कोई दिल नहीं कोई ... Read more
clicks 191 View   Vote 0 Like   6:30am 11 Jul 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
मेरी ये कविता शनिवार 16 जून को जयपुर से प्रकाशित होने वाले पेपर 'बुलेटिन टुडे'में प्रकाशित कविता हुई और आज @kusum kapoor जी के पति सुरेन्द्र नाथ कपूर जी द्वारा उसका अंग्रेजी में अनुवाद कर दिया गया ........दोनों साथ में लगा रही हूँ :) :) ठहरना एक खामोश क्रिया है****************************         ... Read more
clicks 209 View   Vote 0 Like   7:40am 30 Jun 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
उपन्यास लेखन एक साधना है. सिर्फ शब्दों का खेल भर नहीं. ऐसे में जब कोई पहला उपन्यास लिखता है तो पाठकों को उम्मीद होती है कुछ नया मिलेगा. पहले उपन्यास में लेखक अपने आस पास के घटनाक्रमों से प्रभावित होता है तो उनका आना लाजिमी है. जरूरी नहीं वो उनकी ज़िन्दगी का हिस्सा हों या उ... Read more
clicks 256 View   Vote 0 Like   7:02am 19 Jun 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
मैं वक्त की नदी में तैरती इकलौती कश्ती ...दूर दूर तक फैले सूने पाट और ऊपर नीला आकाश...गुनगुनाऊं गीत तो तैरता है नदी की छाती पर हिलोर बनकर तो कभी हवाएं बेशक ले जाती हैं बहाकर अपने संग...शायद पहुँचे किसी मीत तक फ़रियाद बन ...तन्हाइयों के शहर में बेबसी की आवाज़ बन....शायद दर्द बह जाए ... Read more
clicks 209 View   Vote 0 Like   6:05am 25 May 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
जाने कैसा ये साल आया है एक के बाद एक सभी छोड़ कर जा रहे हैं. Vijay Kumar Sappattiपिछले कई सालों से एक के बाद एक मुश्किलों से गुजर रहे थे...हम ब्लॉग के वक्त से मित्र रहे और उसी दौरान उनके जीवन में पहले नौकरी की समस्या शुरू हुई जो कई सालों तक लगातार चलती रही. उसके बाद उनकी पत्नी बीमार रहीं और... Read more
clicks 242 View   Vote 0 Like   7:06am 25 Apr 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
कृष्णपक्ष से शुक्लपक्ष तक की यात्रा है ये आकाशगंगाओं ने खोल लिए हैं केश और चढ़ा ली है प्रत्यंचा खगोलविद अचम्भे में हैं ब्रह्माण्ड ने गेंद सम बदल लिया है पाला ये सृष्टि का पुनर्जन्म है लिखी जा रही है नयी इबारत मनु स्मृति से परे ये न इतिहास है न पुराणचाणक्य की शिखा काट कर ... Read more
clicks 234 View   Vote 0 Like   11:56am 18 Apr 2018 #
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