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Blog: ज़ख्म…जो फूलों ने दिये

Blogger: वन्दना गुप्ता
दो जून की रोटी के लिए एक जून को खुला देश और सब आत्मनिर्भर हो गए इसके बाद न प्रश्न हैं न उत्तर ये है महिमा तंत्र की जान सको तो जान लो ...अपनी परतंत्रता नहीं माने तो क्या होगा ?छोडो, क्या अब तक कुछ कर पाए ...जाने दो तुम पेट भरो और मरो बस यहीं तक है तुम्हारी उपादेयतातुम्हें जो चाहि... Read more
clicks 58 View   Vote 0 Like   6:14am 2 Jun 2020 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
बेशक मैं कतार का अंतिम आदमी हूँ लेकिन सबसे अहम हूँ मेरे बिना तुम्हारे महल चौबारे नहीं पूँजी के नंगे नज़ारे नहीं फिर भी दृष्टि में तुम्हारी नगण्य हूँ मत भूलो स्वप्न तुम देखते हो पूरा मैं करता हूँ फिर भी मारा मारा मैं ही यहाँ वहां फिरता हूँ तुम तभी चैन से सोते हो जब मैं धूप ... Read more
clicks 54 View   Vote 0 Like   11:29am 21 May 2020 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
विकल्पहीन होती है माँ बच्चों की हसरतों के आगे भूल जाती है दर्दोगम अपना कर देती है खुद को किनारे अपनी चाहतों को मारे कि खुद को मारकर जीना जो सीख चुकी होती है तो क्या हुआ जो उम्र एक अवसाद बन गयी हो और जीवन असरहीन दवा ममता का मोल चुकाना ही होता है अपनी चा... Read more
clicks 66 View   Vote 0 Like   11:59am 10 May 2020 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
सच ही तो है मर चुके हैं मेरे सपने और नए देखने की हिम्मत नहीं अब बताये कोई वो क्या करे ?हाँ , गुजर रही हूँ उसी मुकाम से जहाँ कोई तड़प बची ही नहीं एक मरघटी सन्नाटा बांह पसारे लील रहा है मेरी रूह कैसे पहुँचे कोई मेरे अंतस्थल तक जबकि वक्त के अंतराल में तो बदल जाती हैं सभ्यताएंमो... Read more
clicks 58 View   Vote 0 Like   8:19am 12 Apr 2020 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
सुनिए अपनी नाराज़गी की पुड़िया बनाइये और गटक जाइए गए वो ज़माने जब कोल्हू के बैल सी जुती दिखाई देती थी दम भर न जो साँस लेती थी साहेब डाल लीजिये आदत अब हर गली, हर मोड़, हर नुक्कड़ पर दिख जायेंगी आपको खाली बैठी औरतें जानते हैं क्यों?जाग गयी हैं वो न केवल अपने अधिकारों के प्रति बल्क... Read more
clicks 66 View   Vote 0 Like   6:04am 13 Feb 2020 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
 1तुम   कहती  हो  "जीना है मुझे "मैं कहती हूँ ………… क्यों ?आखिर क्यों आना चाहती हो दुनिया में ? क्या मिलेगा तुम्हे जीकर ?बचपन से ही बेटी होने के दंश  को सहोगी बड़े होकर किसी की निगाहों में चढोगीतो कहीं तेज़ाब की आग में खद्कोगीतो कहीं बलात्कार की  त्रासदी सहोगी ... Read more
clicks 46 View   Vote 0 Like   7:58am 2 Dec 2019 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
जाने किस मोड़ पर छोड़ आयीआँसू, आहें और दर्दअब जिद की नोक पर कर रही है नृत्यप्रज्ञा उसकीतुम्हारी भौंहों के टेढ़ेपन को बनाकर जमीनयूँ ही चलते फिरते खींच रही है वो अपनी लकीरन तुमसे छोटी और न ही तुमसे बड़ीजाने क्यों गुनगुनाहट के घुंघरुओं से दहल उठा है आसमां...... Read more
clicks 40 View   Vote 0 Like   9:16am 28 Nov 2019 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
इस दौड़ती भागती दुनिया में समय की धुरी पर ठहरा मन मेरा कहता है आ अब लौट चलें एक बार फिर उसी दौर में जहाँ पंछियों से रोज मुलाकात हो मेरे आँगन में रोज उनकी आमद हो मैं सितार सी बजती फिरूँ उमंगों का संगीत रूह में बजता रहे मन की अलंगनी पर इक ख्वाब रोज नया सजता रहे वो गली चौराहों ... Read more
clicks 186 View   Vote 0 Like   6:05am 2 Sep 2019 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
मरे हुए लोग हाय हाय नहीं करतेमरे हुए लोगों की कोई आवाज़ नहीं होतीमरे हुए लोगों की कोई कम्युनिटी नहीं होतीजो कोशिशों के परचम लहराएऔर हरी भरी हो जाए धरा मनोनुकूलआइये हम अपने लिए शांति पाठ करेंयूँ कहकरहम शर्मिंदा हैं कि हम मर चुके हैंबच्चों हम से कोई उम्मीद मत रखनाहम बस त... Read more
clicks 106 View   Vote 0 Like   1:04pm 18 Jun 2019 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
न जाने किस पर गुस्सा हूँ न जाने क्यों उदास हूँ खोज के बिंदु चुक गए मौसम सारे रुक गए फिर किस चाह की आस में हूँ जब कोई कहीं नहीं अपना पराया भी नहीं मृग तृष्णा की किस फाँस में हूँ किस जीवन की तलाश में हूँ यूँ लगता है कभी कभी मैं बस इक जलता अलाव हूँ किसी दिशा का भान नहीं अब बचा को... Read more
clicks 192 View   Vote 0 Like   6:00am 12 Dec 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
मैं सो रहा था मुझे सोने देते चैन तो था अब न सो पाऊंगा और न जागा रह पाऊँगामझधार में जैसे हो नैया कोई एक विशालकाय प्रेत की मानिंद हो गया हूँ अभिशप्त तुम्हारी बनायीं मरुभूमि में शापित बना दिया नहीं सोचा तुमने अपनी महत्वाकांक्षा से ऊपर अब झेलना है मुझे शीत ताप और बरसात यूँ ... Read more
clicks 187 View   Vote 0 Like   7:16am 5 Nov 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
कहानियां, हमारे जीवन का आधार रही हैं आदिम काल से. जैसे जैसे सभ्यता विकसित होती गयी, कहानियाँ उसी के अनुसार आकार लेती रहीं. वक्त के साथ कहानियों के स्वरुप में भी परिवर्तन आया लेकिन कहानियों का जो मुख्य स्वरुप है वो ही पाठक/श्रोता के जेहन पर मुख्यतः कब्ज़ा जमाये रहता है. कह... Read more
clicks 185 View   Vote 0 Like   11:03am 25 Sep 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
किसी के जाने के बाद झरती हैं यादें रह रह ये जाना वास्तव में जाना नहीं होता जाने वाला भी तो समेटे होता है रिश्तों की धार कराता है अहसास पल पल मैं हूँ तुम्हारी ज़िन्दगी में उपस्थित कभी बूँद की तरह तो कभी नदी की तरह कभी पतझड़ की तरह तो कभी बसंत की तरह कभी सावन की रिमझिम फुहारों ... Read more
clicks 322 View   Vote 0 Like   7:48am 27 Aug 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
मेरे चेहरे पर एक जंगल उगा है मतलबपरस्ती का मेरी दाढ़ों में माँस अटका है खुदगर्जी का आँखों पर लगा है चश्मा बेहयाई का मारकाट के आईने में लहू के कतरे सहमा रहे हैं पूरी सभ्यता को भूख के ताबीज चबा रही हैं आने वाली पीढ़ियाँकोहराम और ख़ामोशी के मध्य साँसों की आवाजाही ज़िन्दगी की ... Read more
clicks 216 View   Vote 0 Like   5:52am 26 Jul 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
मेरे पास उम्मीद की कोई सड़क नहीं कोई रास्ता नहीं कोई मंजिल नहीं फिर भी जिंदा हूँ मेरे पास मोहब्बत का कोई महबूब नहीं कोई खुदा नहीं कोई ताजमहल नहीं फिर भी जिंदा हूँ मेरे पास जीने की कोई वजह नहीं कोई आस नहीं कोई विश्वास नहीं फिर भी जिंदा हूँ मेरे पास खोने को कोई दिल नहीं कोई ... Read more
clicks 171 View   Vote 0 Like   6:30am 11 Jul 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
मेरी ये कविता शनिवार 16 जून को जयपुर से प्रकाशित होने वाले पेपर 'बुलेटिन टुडे'में प्रकाशित कविता हुई और आज @kusum kapoor जी के पति सुरेन्द्र नाथ कपूर जी द्वारा उसका अंग्रेजी में अनुवाद कर दिया गया ........दोनों साथ में लगा रही हूँ :) :) ठहरना एक खामोश क्रिया है****************************         ... Read more
clicks 191 View   Vote 0 Like   7:40am 30 Jun 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
उपन्यास लेखन एक साधना है. सिर्फ शब्दों का खेल भर नहीं. ऐसे में जब कोई पहला उपन्यास लिखता है तो पाठकों को उम्मीद होती है कुछ नया मिलेगा. पहले उपन्यास में लेखक अपने आस पास के घटनाक्रमों से प्रभावित होता है तो उनका आना लाजिमी है. जरूरी नहीं वो उनकी ज़िन्दगी का हिस्सा हों या उ... Read more
clicks 237 View   Vote 0 Like   7:02am 19 Jun 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
मैं वक्त की नदी में तैरती इकलौती कश्ती ...दूर दूर तक फैले सूने पाट और ऊपर नीला आकाश...गुनगुनाऊं गीत तो तैरता है नदी की छाती पर हिलोर बनकर तो कभी हवाएं बेशक ले जाती हैं बहाकर अपने संग...शायद पहुँचे किसी मीत तक फ़रियाद बन ...तन्हाइयों के शहर में बेबसी की आवाज़ बन....शायद दर्द बह जाए ... Read more
clicks 194 View   Vote 0 Like   6:05am 25 May 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
जाने कैसा ये साल आया है एक के बाद एक सभी छोड़ कर जा रहे हैं. Vijay Kumar Sappattiपिछले कई सालों से एक के बाद एक मुश्किलों से गुजर रहे थे...हम ब्लॉग के वक्त से मित्र रहे और उसी दौरान उनके जीवन में पहले नौकरी की समस्या शुरू हुई जो कई सालों तक लगातार चलती रही. उसके बाद उनकी पत्नी बीमार रहीं और... Read more
clicks 227 View   Vote 0 Like   7:06am 25 Apr 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
कृष्णपक्ष से शुक्लपक्ष तक की यात्रा है ये आकाशगंगाओं ने खोल लिए हैं केश और चढ़ा ली है प्रत्यंचा खगोलविद अचम्भे में हैं ब्रह्माण्ड ने गेंद सम बदल लिया है पाला ये सृष्टि का पुनर्जन्म है लिखी जा रही है नयी इबारत मनु स्मृति से परे ये न इतिहास है न पुराणचाणक्य की शिखा काट कर ... Read more
clicks 221 View   Vote 0 Like   11:56am 18 Apr 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
सुनो देवी तुम तो नहीं हिन्दू या मुसलमानफिर कैसे देखती रहीं अन्याय चुपचापक्यों न काली रूप में अवतरित हो किया महिषासुर रक्तबीज शुम्भ निशुम्भ का नाश सुनो देवी क्या संभव है तुम्हें भी तालों में बंद रखना?फिर क्यों नहीं खोले तुमने चंड मुंडों के दिमाग क्यों नहीं दुर्गा रूप... Read more
clicks 211 View   Vote 0 Like   12:09pm 14 Apr 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
जीवन का उल्लास हैं रंग. ज़िन्दगी में इंसान चाहता ही क्या है सिवाय रंगों के होने के. बिना रंगों के कैसा जीवन? कितना नीरस होता जीवन यदि उसमें रंग न होते. यहाँ तक कि प्रकृति भी समेटे हुए है जाने कितने रंग और शायद यही है कारण इंसान ने रंगों के महत्त्व को जाना , समझा और अपनाया. ऐसा... Read more
clicks 228 View   Vote 0 Like   10:54am 8 Apr 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
लड़की बोल रही है चट्टान, लिख रही है दूब...लड़की खोज रही है संसार, पा रही है खार...वाकिफ नहीं हकीकत के प्रवाह से ...लड़की बह रही है नदी सी समय के चक्रव्यूह में...नहीं जानती, तोड़ी जायेगी, मरोड़ी जाएगी, काटी जायेगी, छिली जायेगी, तपाई जायेगी तब बनेगी बांसुरी जिस पर गुनगुनायी जायेगी कोई ... Read more
clicks 225 View   Vote 0 Like   12:55pm 4 Apr 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
आशा की देह से उतार दी है चमड़ी और निराशा को दी हो ऐसा भी नहीं...साजन के प्यार का तबस्सुम घूँघट की ओट में ज्यादा खिलता है...जाना जब से, खुमारी है कि उतरती ही नहीं, सोच लड़की खिल उठी. किताबी ज्ञान ही उसकी प्रथम गुरु...दिन सोने की सान चढ़ाए उगता और रातें चाँदी के केश फैला करती पदार्प... Read more
clicks 197 View   Vote 0 Like   11:58am 31 Mar 2018 #
Blogger: वन्दना गुप्ता
भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव हम नमन के सिवा तुम्हें कुछ नहीं दे सकते बदल चुकी है हवा बदल चुकी हैं प्रतिबद्धताएं वो दौर और था ये दौर और है बस इतने से समझ लेना सार आज नहीं पैदा होती वो मिटटी जिससे पैदा होते थे तुमसे लाल और सुनो ये नमन भी बस कुछ सालों तक चलेगा आने वाला दौर शायद ... Read more
clicks 158 View   Vote 0 Like   6:33am 23 Mar 2018 #
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