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एक प्रयास : View Blog Posts
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एक प्रयास

मेरी सीमितताएँसीमित संसाधन सीमित सोच उठने नहीं देते तल से मुझेफिर कैसे एक नया आसमां उगाऊँहोंगे औरों के लिए तुम चितचोर भँवरे माखनचोर नंदकिशोर लड्डूगोपाल और न जाने क्या क्या मगर इक नशा सा तारी हो गया है जब से तुम्हारा संग किया मेरे लिए तो मेरी 'वासना'भी तुम हो और 'व्यसन'भ...
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वन्दना
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  October 5, 2017, 11:47 am
राम जाने क्यों हम तुम्हें मानव ही न मान पाए महामानव भी नहीं ईश्वरत्व से कम पर कोई समझौता कर ही न पाए शायद आसान है हमारे लिए यही सबसे उत्तम और सुलभ साधन वर्ना यदि स्वीकारा जाता तुम्हारा मानव रूप तो कैसे संभव था अपने स्वार्थ की रोटी का सेंका जाना ?आसान है हमारे लिए ईश्वर बन...
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वन्दना
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  September 30, 2017, 4:50 pm
मुझ सी हठी न मिली होगी कोई तभी तो तुमने भी चुनी उलट राह ... मिलन की दुखी दोनों ही अपनी अपनी जगह दिल न समंदर रहा न दरिया सूख गए ह्रदय के भाव पीर की ओढ़ चुनरिया अब ढूँढूं प्रीत गगरिया और तुम लेते रहे चटखारे खेलते रहे , देखते रहे छटपटाहट फिर चाहे खुद भी छटपटाते रहे मगर भाव पुष्ट क...
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वन्दना
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  August 21, 2017, 11:31 am
पूछना तो नहीं चाहिए लेकिन पूछ रही हूँ क्या जरूरी है हर युग में तुम्हारे जन्म से पहले नन्हों का संहार ...कंसों द्वारा कहो तो ओ कृष्ण जबकि मनाते हैं हम तुम्हारा जन्म प्रतीक स्वरुप सोचती हूँ यदि सच में तुम्हारा जन्म हो फिर से तो जाने कितना बड़ा संहार हो सिहर उठती है आत्मा क्य...
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वन्दना
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  August 14, 2017, 3:40 pm
 मित्रता किसने किससे निभाई ये बात कहाँ दुनिया जान पाई निर्धन होते हुए भी वो तो प्रेम का नाता निभाता रहा अपनी गरीबी को ही बादशाहत मानता रहा उधर सम्पन्न होते हुए भीअपने अहम के बोझ तले तुमने ही आने/अपनाने में देर लगाई तुम्हारे लिए क्या दूर था और क्या पास मगर ये सच है नह...
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वन्दना
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  August 6, 2017, 1:50 pm
तुम थे तो जहान में सबसे धनवान थी मैं अब तुम नहींतुम्हारी याद नहीं तुम्हारा ख्याल तक नहीं तो मुझ सा कंगाल भी कोई नहीं वो मोहब्बत की इन्तेहा थी ये तेरे वजूद को नकारने की इन्तेहा है जानते हो न इसका कारण भी तुम ही हो फिर निवारण की गली मैं अकेली कैसे जाऊँ?मुझे जो निभाना था , नि...
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वन्दना
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  August 2, 2017, 12:52 pm
उलझनों में उलझी इक डोर हूँ मैं या तुम नही जानती मगर जिस राह पर चली वहीं गयी छली अब किस ओर करूँ प्रयाण जो मुझे मिले मेरा प्रमाण अखरता है अक्सर अक्स सिमटा सा , बेढब सा बायस नहीं अब कोई जो पहन लूँ मुंदरी तेरे नाम की और हो जाऊँ प्रेम दीवानी कि फायदे का सौदा करना तुम्हारी फितर...
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वन्दना
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  July 19, 2017, 11:20 am
मैं निर्जन पथगामी अवलंब तुम्हारा चाहूँसाँझ का दीपक स्नेह की बाती तुमसे ही जलवाऊँमैं, तुमसी प्रीत कहाँ से पाऊँ मन मंदिर की देह पे अंकित अमिट प्रेम की लिपि फिर भी खाली हाथ पछताऊँ मैं, रीती गागर कहलाऊँ जो पाया सब कुछ खोकर खुद से ही निर्द्वंद होकर तर्कों के महल दोमहलों में ...
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वन्दना
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  July 8, 2017, 5:00 pm
मैं भाग रही हूँ तुमसे दूर अब तुम मुझे पकड़ो रोक सको तो रोक लो क्योंकि छोड़कर जाने पर सिर्फ तुम्हारा ही तो कॉपीराइट नहीं गर पकड़ सकोगे फिर संभाल सकोगे और खुद को चेता सकोगे कि हर आईने में दरार डालना ठीक नहीं होता शायद तभी तुम अपने अस्तित्व से वाकिफ करा पाओ और स्वयं को स्थापित ...
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वन्दना
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  June 19, 2017, 12:36 pm
संवाद के आखिरी पलों में नहीं झरते पत्ते टहनियों से नहीं करती घडी टिक टिक नहीं उगते क्यारियों में फूल रुक जाता है वक्त सहमकर कसमसाकर कि नाज़ुक मोड़ों पर ही अक्सर ठहर जाती है कश्ती कोई गिरह खुले न खुले कोई जिरह आकार ले न ले बेमानी है कि हंस ने तो उड़ना ही अकेला है ये तमाशे का व...
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वन्दना
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  May 23, 2017, 12:54 pm
जाने किस खजुराहो की तलाश में भटकती है मन की मीन कि एक घूँट की प्यास से लडती है प्रतिदिन आओ कि घूँघट उठा दो जलवा दिखा दो अभिसार को फागुन भी है और वसंत भी द्वैत से अद्वैत के सफ़र में प्रीत की रागिनी हो तो ओ नीलकमल !मन मीरा और तन राधा हो जाता है अलौकिकता मिलन में भी और जुदाई में ...
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वन्दना
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  February 16, 2017, 12:17 pm
  मैं बंजारन आधी रात पुकारूँ पी कहाँ पी कहाँ वो छुपे नयनन की कोरन पे वो लुके पलकों की चिलमन में वो रुके अधरों की थिरकन पे अब साँझ सवेरे भूल गयी हूँ इक पथिक सी भटक गयी हूँ कोई मीरा कोई राधा पुकारे पर मैं तो बावरी हो गयी हूँ प्रेम की पायल प्रीत के घुँघरू मुझ बंजारन के बने स...
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वन्दना
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  February 13, 2017, 11:59 am
एक गुनगुनाहट सी हर पल थिरकती है साँसों संग एक मुस्कराहट फिजाँ में करती है नर्तन उधर से आती उमड़ती - घुमड़ती आवाज़ दीदार है मेरे महबूब का अब और कौन सी इबादत करूँ या रब किसे मानूँ खुदा और किससे करूँ शिकवा वो है मैं हूँ मैं हूँ वो है मन के इकतारे पर बिखरी इक धुन है 'यार मेरा मैं या...
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वन्दना
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  October 21, 2016, 1:43 pm
मोर वचन चाहे पड़ जाए फीको संत वचन पत्थर कर लीको  तुमने ही कहा था न तो आज तुम ही उस कसौटी के लिए हो जाओ तैयार बाँध लो कमरबंध कर लो सुरक्षा के सभी अचूक उपाय इस बार तुम्हें देनी है परीक्षा  तो सुनो मेरा समर्पण वो नहीं जैसा तुम चाहते हो यानि भक्त का सब हर लूं तब उसे अपने चर...
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वन्दना
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  September 23, 2016, 11:55 am
मैं पथिक*********मैं पथिक किस राह की ढूँढूँ पता गली गली मैं विकल मुक्तामणि सी फिरूँ यहाँ वहाँ मचली मचली ये घनघोर मेघ गर्जन सुन कर ह्रदय हुआ कम्पित कम्पित ये कैसी अटूट प्रीत प्रीतम की आह भी निकले सिसकी सिसकी ओ श्यामल सौरभ श्याम बदन तुम बिन फिरूँ भटकी भटकी गह लो बांह मेरी अब म...
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वन्दना
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  September 12, 2016, 12:35 pm
  तेरी कस्तूरी से महकती थी मेरे मन की बगिया और अब फासलों से गुजरती है जीवन की नदिया ये इश्क के जनाजे हैं और यार का करम है जहाँ प्यास के चश्मे प्यासे ही बहते हैं तुम क्या जानो विरह की पीर और मोहब्बत का क्षीर बस माखन मिश्री और रास रंग तक ही सीमित रही तुम्हारी दृष्टि ........मो...
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वन्दना
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  September 6, 2016, 12:01 pm
  मन महोत्सव बने तो गाऊँ गुनगुनाऊँ उन्हें रिझाऊँ कमली बन जाऊँ मगर मन मधुबन उजड़ गया उनका प्यार मुझसे बिछड़ गया अब किस ठौर जाऊँ किस पानी से सींचूं जो मन में फिर से उनके प्रेम की बेल उगाऊँमन महोत्सव बने तो सखी री मैं भी श्याम गुन गाऊँ युगों की अविरल प्यास बुझाऊँ चरण क...
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वन्दना
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  August 25, 2016, 12:02 pm
आज जन्मदिन है तुम्हारा मना रहे हैं सब अपने अपने ढंग से जिसके पास जो है कर रहा है तुम पर न्यौछावर मगर वो क्या करे जिसके पास अपना आप भी न बचा हो मेरे पास तो बचा ही नहीं कुछ और जो तुमने दिया है वो ही तो तुम्हें दे सकती हूँ विरह की अग्नि से दग्ध मेरा मन स्वीकार सको तो स्वीकार लेन...
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वन्दना
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  August 25, 2016, 11:37 am
मन का मरना मानो निष्प्राण हो जाना जानते तो हो ही अब सावन बरसे या भादों जो मर जाया करते हैं कितना ही प्राण फूँकोहरे नहीं होते जब से गए हो तुम मन प्राण आत्मा रूह कुछ भी नाम दे लो रूठा साज सिंगार वो देह का विदेह हो जाना वो आत्मा के नर्तन पर आनंद का पारावार न रहना जाने किस सूखे ...
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वन्दना
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  August 5, 2016, 1:48 pm
सब तहस नहस कर देना नेस्तनाबूद कर देना बर्बाद कर देना देकर सब छीन लेना कोई तुमसे सीखे बर्दाश्त जो नहीं होता किसी का सुख फिर वो लौकिक हो या पारलौकिक कर ही देते हो सब ख़त्म उस पर चाहते हो सब तुम्हें चाहें आखिर क्यों ?तुम निर्मोही तो कुछ निर्मोह का अंश हम में भी आना ही हुआ तो क्...
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वन्दना
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  July 27, 2016, 6:21 pm
कभी कभी लगता है समाधान तो तुम्हारे पास भी नहीं है जब नहीं कर पाते समाधान दुनियावी नीतियों का दुनिया के व्यवहार का तो बुला लिया करते हो अपने चाहने वाले को अपने पास और दिखा देते हो खुद को ज़माने की नज़र में पाक साफ़ तुम्हें चाहने वाले करोड़ों होंगे और हैं लेकिन तुमने किसी को न...
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वन्दना
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  May 30, 2016, 12:27 pm
ये जानते हुए भी कि तुम ही हो मेरे तर्क वितर्क संकल्प विकल्प आस्था अनास्था फिर भी आरोप प्रत्यारोप से नहीं कर पाती ख़ारिज तुम्हें ऊँगली तुम पर ही उठा देती हैं मेरी चेतना और तुम प्रश्नचिन्ह का वो कटघरा बन जाते होजो किसी उत्तर का मोहताज नहीं ये कैसा बनवास है मेरा और तुम्हार...
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वन्दना
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  May 7, 2016, 4:29 pm
आस्तिकता से नास्तिकता की ओर प्रयाण शायद ऐसे ही होता है जब कोई तुम्हें जानने की प्रक्रिया में होता है और जानेगा मुझे ?मानो पूछ रहे हो तुम हाँ , शायद उसी का प्रतिदान है जो तुम दे रहे हो पहले भी कहा था आज भी कहती हूँ नहीं हो तुम किसी के माता पिता , सर्वस्व या स्वामी क्योंकि यदि ...
एक प्रयास...
वन्दना
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  April 30, 2016, 5:46 pm
जन्मदिन हो या वैवाहिक वर्षगाँठ , यदि भूल जाए कोई एक भी तो उसकी आफत .......लेकिन क्यों ? क्या ये सोचने का विषय नहीं ? अब जन्मदिन तुम्हारा . तुम जन्मे उस दिन जरूरी थोड़े ही तुम्हारा पार्टनर भी उसे याद रखे और खुश होने का दिखावा करे . एक तो तुम पार्टनर की ज़िन्दगी में कम से कम २० से २५ स...
एक प्रयास...
वन्दना
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  April 21, 2016, 12:47 pm
सुना है गोपाला नंदलाला तुम्हें लाड लड़ाना बहुत प्रिय है लेकिन मैं झूठा आडम्बर नहीं ओढ़ सकती देखा देखी नहीं कर सकती तर्क कुतर्क के बवंडर में घिर जो अक्सर तुम्हारे कान उमेठ लिया करती है तुम पर ही आरोप प्रत्यारोप किया करती है तुम्हें ही कटघरे में खड़ा कर दिया करती है यहाँ तक ...
एक प्रयास...
वन्दना
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  April 19, 2016, 1:00 pm
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