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बेचैन आत्मा : View Blog Posts
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बेचैन आत्मा

मेहमान नवाजी शब्द में वो मजा नहीं है जो अतिथि सत्कार में है.  मेहमान का स्वागत तो मोदी जी भी कर सकते  है,अतिथि का कर के दिखाएँ तो जाने! मेहमान वो जो बाकायदा प्रोटोकाल दे कर आये. फलां तारिख को, फलां गाडी से, फलां समय आयेंगे. ये घूमना है, यह काम है और इतने बजे लौट जायेंगे. सब क...
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Tag :व्यंग्य की जुगलबंदी
  December 10, 2017, 2:13 pm
यह मेरा नया ब्लॉग है. इसमें सारनाथ के चित्र, उससे सम्बन्धित जानकारी और प्रातः भ्रमण के दौरान मन में आये विचार सुबह की बातें शीर्षक से प्रकाशित करने का मूड बनाया है. कोशिश है कि आज नहीं तो कल सारनाथ के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए यह एक बढ़िया लिंक बने. इस ब्लॉग से ज...
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Tag :
  December 10, 2017, 10:06 am
लघुशंका जाने से पहले पत्नी को जगा कर गये हैं वृद्ध। पत्नी की नींद टूटी। पहले बैग की तरफ निगाह थी, अब करवट बदल ऊपर के बर्थ की ओर मुंह कर सीधे लेटी हैं। नींद में दिखती हैं पर नींद में नहीं हैं। चौकन्नी हैं। सोच रही होंगी.. "सामने बैठा अधेड़ बड़ा स्मार्ट बन मोबाइल चला रहा है, द...
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Tag :लोहे का घर
  December 8, 2017, 10:41 pm
साइकिल ले कर भोर में सैर को निकला तो मॉर्निंग हो ही रही थी और थोड़ा गुड-गुड लगना शुरू ही हुआ था।  पूरा गुड लगता कि सजे हुए मैरिज लॉन दिखने लगे। भीगी_पलकेंका समय था। बिदाई की बेला थी। घर की अजोरिया परायों की होने वाली थी। अपना भी मन शोकाकुल हो इससे पहले तेज पैडिल मार कर आग...
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Tag :व्यंग्य
  December 2, 2017, 1:16 pm
ट्रेन ने बदली पटरियाँ लोहे के घर की खिड़की से हौले से आई और..दाएं गाल को चूमकर गुम हो गई जाड़े की धूप।..........पुत्रों को सौंपधानी चुनरियासन बाथ ले रही हैधरती माँपटरी पर चल रही हैअपनी गाड़ी।........सुबह के समय लोहे के घर की खिड़कियों से दिखते हैं सुनहरे धूप में नहाए स्वर्णिम ख...
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Tag :लोहे का घर
  November 29, 2017, 10:45 am
जब कोई बड़ा लेखक मरता हैहमारे पास आता है।अखबारें करती हैंउनकी चर्चाछापती हैंउनकी कविताएं, संस्मरण, कृतियाँ और,..पुरस्कारों के नाम।जब कोई बड़ा लेखक मरता हैयकबयकजागृत हो जाता हैमृतप्रायः साहित्यिक समाजचमकने लगती हैंगोष्ठियाँराजनैतिक चर्चा छोड़चाय पान की अढ़ियों मेंह...
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Tag :व्यंग्य
  November 29, 2017, 10:21 am
हम नहीं करेंगेतुम नहीं करोगेलेकिन वह जरूर करेगाजिसे सहन नहीं होगासंघर्ष तो होगा।उतनी ही चलती है तानाशाहीजितनी झुक पाती हैरीढ़ की हड्डीउतना ही रो पाती हैंआँखेंजितने होते हैंआँसूपांच गांव मिल जातातो क्यामहाभारत होता?संघर्ष तो होगा।झूठ की ही नहींआँच अधिक होने परफ...
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Tag :
  November 29, 2017, 10:18 am
सुबह का समय है, लोहे के घर की खिड़की है और सामने हरे-भरे खेतों में दूर दूर तक फैली जाड़े की धूप। #ट्रेन छोटे छोटे स्टेशनों पर रुकती है, अपनी वाली की प्रतीक्षा में खड़े लोग दिखते हैं फिर ट्रेन चल देती है। लगभग हम उम्र पॉच बच्चों के साथ बैठी एक देहातन देर तक याद आती है। लग...
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Tag :यात्रा
  November 19, 2017, 11:27 am
आज छठ की भीड़ है लोहे के घर में। साइड अपर में सामानों के बीच चढ़ कर बैठ गए हैं हम। सामने एक महिला ऊपर के बर्थ पर दो बच्चों को टिफिन में रखा दाना चुगा रही हैं। चूजे कभी इधर फुदकते हैं, कभी उधर। गिरने-गिरने को होते हैं कि मां हाथ बढ़ाकर संभाल लेती हैं। बगल के बर्थ में एक लड...
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Tag :
  November 19, 2017, 8:54 am
रेलगाड़ी में बैठ कर रेलगाड़ी पर व्यंग्य लिखने का मजा ही कुछ और है। बन्दा जिस थाली में खायेगा उसी में तो छेद कर पायेगा। दूसरा कोई अपनी थाली क्यों दे भला? पुराने देखेगा और नया बनाकर सबको दिखायेगा। ट्रेन में चलने वाले ही ट्रेन को समझ सकते हैं। हवा में उड़ने वाले जमीनी हकीकत स...
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Tag :लोहे का घर
  September 16, 2017, 10:28 am
धर्म और अधर्म का अर्थ समझाते हुए तुलसी दास जी लिखते हैं...परहित सरिस धर्म नहीं भाई। पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।।परोपकार के बड़ा कोई धर्म नहीं है और दूसरों को कष्ट देने से बड़ा कोई अधर्म नहीं है।वे यहीं नहीं रुकते। आगे जटायू सन्दर्भ में लिखते हैं..परहित बस जिनके मन माहीं।तिन्ह ...
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Tag :निबन्ध
  September 9, 2017, 9:45 pm
सुबह (दफ्तर जाते समय)ट्रेन हवा से बातें कर रही है। इंजन के शोर से फरफरा के उड़ गए धान के खेत में बैठे हुए बकुले। एक काली चिड़िया उम्मीद से है। फुनगी पकड़ मजबूती से बैठी है। गाँव के किशोर, बच्चे सावन में भर आये गढ्ढे/पोखरों के किनारे बंसी डाल मछली मार रहे हैं। क्या बारिश के साथ...
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Tag :लोहे का घर।
  September 2, 2017, 12:36 pm
बारिश से पहलेतेज हवा चली थीझरे थेकदम्ब के पातछोटे-छोटे फलदुबक कर छुप गये थेफर-फर-फर-फरउड़ रहे परिंदेतभी उमड़-घुमड़ आयेबदरी-बदराझम-झम बरसेबादलसुहाना हो गया मौसमबारिश के बाद सहमे से खड़े थेसभी पेड़-पौधेकोई बात ही नहीं कर रहा थाकिसी से!सबसे पहलेबुलबुल चहकीकोयल ने छेड़ी लम्बी...
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Tag :प्रकृति
  September 2, 2017, 9:54 am
कर्फ्यू वाले दिनों में बनारस की गलियाँ आबाद, गंगा के घाट गुलजार हो जाते । इधर कर्फ्यू लगने की घोषणा हुई, उधर बच्चे बूढ़े सभी अपने-अपने घरों से निकल कर गली के चबूतरे पर हवा का रुख भांपने के लिए इकठ्ठे हो जाते। बुजुर्ग लड़कों को धमकाते..अरे! आगे मत जाये!!बनारस की गलियों में लड़क...
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Tag :व्यंग्यकीजुगलबन्दी
  August 22, 2017, 11:29 pm
नदीअब वैसी नहीं रहीनदी में तैरते हैंनोटों के बंडल, बच्चों की लाशेंगिरगिट हो चुकी हैनदी!माझी नहीं होतानदी की सफाई के लिए जिम्मेदारवो तो बस्सइस पार बैठो तोपहुँचा देगाउस पारनदीके मैली होने के लिए जिम्मेदार हैंइसमें गोता लगानेऔरहर डुबकी के साथपाप कटाने वालेपाप ऐसे कट...
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Tag :व्यंग्य
  August 18, 2017, 11:15 pm
सच हैयह मौसमसृजन और संहार का है।खूब बारिश होती हैइस मौसम मेंलहलहाने लगते हैंसूखे/बंजर खेतधरती मेंअवतरित होते हैंझिंगुर/मेंढक/मच्छर और..न जाने कितनेकीट,पतंगे!आंवला या कदम्ब के नीचेबैठ कर देखोहवा चली नहीं किटप-टपशाख से झरते हैंनन्हे-मुन्नेफल।सबतुम्हारी तरहनहीं कर ...
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Tag :कृष्ण
  August 15, 2017, 9:28 pm
शायद ही कोई पुरुष हो जिसने किसी को छेड़ा न हो। शायद ही कोई महिला हो जो किसी से छिड़ी न हो। किशोरावस्था के साथ छेड़छाड़ युग धर्म की तरह जीवन को रसीला/नशीला बनाता है। छेड़छाड़ करने वाले लेखक ही आगे चलकर व्यंग्यकार के रूप में प्रतिष्ठित हुए। यश प्राप्त करने के बाद भी व्यंग्यकार ...
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Tag :व्यंग्यकीजुगलबन्दी
  August 13, 2017, 1:51 pm
धोबियाsssधुल दे मोरी चदरिया मैं ना उतारूँ नाएक जनम दूँखड़े-खड़े मोरी धुल दे चदरिया!आया तेरे घाट बड़ी आस लगा केजाना दरश को शिव की नगरियाधुल दे चदरिया।रंगरेजवाsssरंग दे मोरी चदरिया मैं ना उतारूँ नाएक जनम दूँखड़े-खड़े मोरी रंग दे चदरियाजइसे उजली धुली धोबिया...
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Tag :कविता
  July 12, 2017, 1:51 pm
उमड़-घुमड़ जब बादल गरजते हैं तो मनोवृत्ति के अनुरूप सभी के मन में अलग-अलग भाव जगते हैं। नर्तक के पैर थिरकने लगते हैं, गायक गुनगुनाने लगते हैं, शराबी शराब के लिए मचलने लगता है, शाबाबी शबाब के लिए तो कबाबी कबाब ढूँढने लगता है। सभी अपनी शक्ति के अनुरूप अपनी प्यास बुझाकर तृप्त ...
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Tag :व्यंग्य की जुगलबंदी
  July 8, 2017, 8:43 pm
बाहर लाख अँधेरा होउजाला हैलोहे के घर मेंमौन हैंअंधेरे में डूबे हुए खेतहलचल हैघर मेंबाहर भी श्रमिक थे, किसान थेजब तक सूरज थासूरज के डूबते हीमौन हो गये खेतउजाले के साथशोर काअँधरे के साथमौन कागहरा नाता दिखता है!मौन थे बुद्ध भीजब तक अँधेरा थाअँधेरा हो तो चुप रहना चाहिये...
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Tag :ट्रेन
  July 3, 2017, 8:00 pm
पटरी के किनारेमालगाड़ी सेसीमेंट की बोरियाँ उतारकरबीड़ी, खैनी के साथबतकही कर रहे हैंढेर सारे मजदूरचीखता है ट्रेन का इंजनघबरा कर उड़ते हैंखेतों मेंचुग रहे पँछीखुश होते हैं हमलोहे के घर की खिड़की सेइन्हें देखकर!खेतों मेंजमा हो रहा हैबारिश का पानीकिसी ने करी है गुड़ाईकहीं ...
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Tag :ट्रेन
  July 3, 2017, 9:39 am
सुहानी शाम आईमन सशंकित हो गयातेरे शहर मेंआज बारिश हुई होगी!खुद से खपादिन भर का तपाठंडी हवाओं के स्पर्श से भीचकरा जाता हैबारिश में भीगे?माटी की सोंधी सुगन्ध पा आल्हादित हुए?या तपते रहे मेरी तरहदिन भर?लोहे के घर की खिड़कियों सेआ रही है ठंडी हवाघास के बोझ का गठ्ठर सर पर लाद...
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Tag :ट्रेन
  July 2, 2017, 4:53 pm
बहुत दर्द होता है मरने से पहलेएक बार मर जाओ तो आसान होता है जीना!हँसो मतअपने जीवित होने का सुबूत दोमरने के बाद जानते हो क्&#...
बेचैन आत्मा...
Tag :
  June 30, 2017, 9:05 pm

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बेचैन आत्मा...
Tag :
  June 30, 2017, 7:53 pm
गेंहूँ की कटाई जोरों पर है. जहाँ देखो वहीं खड़ी फसल से ज्यादा कटे ढेर दिख रहे हैं. कहीँ-कहीं दवाई भी चल रही है, कहीं पूरे साफ हैं खेत. धरती पुत्र सरसों की चादर के बाद अब गेहूं की चादर भी उतार रहे हैं. रोज नये नजारे दिखाती हैं लोहे के घर की खिड़कियाँ जारी है&n...
बेचैन आत्मा...
Tag :यात्रा
  June 26, 2017, 6:02 pm
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