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बेचैन आत्मा

वह अस्तबल नहीं, देश का जाना माना, एक प्राइवेट प्रशिक्षण संस्थान था जहाँ देश भर से घोड़े उच्च शिक्षा के लिए आते। संस्थान में कई घोड़े थे। मालिक चाहता कि सभी घोड़े और तेज दौड़ें. और तेज..और तेज। इस 'और'की हवस को पाने के लिए वह अनजाने में ही घोड़ों के प्रति क्रूर होता चला गया। धीरे-ध...
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Tag :व्यंग्य
  July 14, 2019, 8:25 pm
ट्रेन बहुत देर से रुकी थी। उस प्लेटफॉर्म पर रुकी थी जहाँ उसे नहीं रुकना चाहिए। ऐसे रुकी थी जैसे पढ़ाई पूरी करने के बाद, नौकरी की तलाश में, अनचाहे प्लेटफार्म पर, कोई युवा रुक जाता है। ट्रेन बहुत देर से रुकी थी। मैं बाहर उतरकर देखने लगा..माजरा क्या है? कब होगा हरा सिगनल?मेरे इ...
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Tag :संस्मरण
  July 12, 2019, 12:33 pm
इस मौसम की पहली बारिश हुई जफराबाद स्टेशन में। झर्र से आई, फर्र से उड़ गई। ढंग से सूँघ भी नहीं पाए, माटी की खुशबू। प्रयागराज जाने वाली एक पैसिंजर आ कर भींगती हुई खड़ी हो गई। बड़ी इठला रही थी! गार्ड ने हरी झण्डी दिखाई तो कूँ€€€ चीखते, शोर मचाते/भींगते चली गई। अभी थोड़ी दूर नहीं ग...
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Tag :
  June 22, 2019, 9:21 am
        गंगा की लहरें, नाव, बाबूजी और तीन बच्चे। इन तीन बच्चों में मैं नहीं हूँ। तब मेरा जन्म ही नहीं हुआ था।पिताजी के साथ अपनी बहुत कम यादें जुड़ी हैं लेकिन जो भी हैं, अनमोल हैं। सबसे छोटा होने के कारण मैं उनका दुलरुआ था। इतना प्यारा कि शायद ही कोई मेरा बड़ा भाई हो जिसन...
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Tag :
  June 18, 2019, 11:03 am
गरमी के तांडव से घबराकर घुस गए ए. सी. बोगी में। दम साधकर बैठे हैं लोअर बर्थ पर। बाहर प्रचण्ड गर्मी, यहाँ इतनी ठंडी कि यात्री चादर ओढ़े लेटे हैं बर्थ पर! ए. सी.बोगी में गरमी तांडव नहीं कर पाती, गेट के बाहर चौकीदार की तरह खड़ी हो, झुनझुना बजाती है। पैसा वह द्वारपाल है जो हर मौसम क...
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Tag :संस्मरण
  June 18, 2019, 10:58 am
इतने तनाव में क्यों हो? धूप में पैदल चलकर आ रहे हो? नहीं भाई, समाचार देख कर आ रहा हूँ। अरे! रे! रे! इतना जुलुम क्यों किया अपने ऊपर? जेठ की दोपहरी में दस किमी पैदल चलना मंजूर, समाचार देखना नामंजूर। क्या बताएं यार! आज छुट्टी थी, कोई काम भी नहीं था, बाहर धूप थी, सोचा समाचार ही ...
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Tag :व्यंग्यकीजुगलबन्दी
  June 18, 2019, 10:46 am
कुछ शब्द दोउछालूँ दर्द भर कर हवा मेंनभ चीर कर बरसें बादल उमड़-घुमड़भर जाएताल-तलैयों सेधरती का ओना-कोनाहरी-भरी होधरती।कुछ शब्द दोतट पर जाअंजुलि-अंजुलि चढ़ाऊँस्वच्छ/निर्मलकल-कल बहने लगेगंगा।कुछ शब्द दोगूँथ कर पाप, सारे जहाँ केहवन कर दूँबोल दूँ..स्वाहा!शब्दों से हो सकता ह...
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Tag :पर्यावरण
  June 4, 2019, 10:00 pm
बुद्धिजीवी वह जो खाली पेट तो भगवान से भोजन की याचना करे और जब पेट भरा हो, उसी भगवान को गाली देने में रत्ती भर भी संकोच न करे। बुद्धिजीवी वह परजीवी होता है जो खुद को सबसे बड़ा श्रमजीवी समझता है। बुद्धिजीवी वह जो चौबीस घण्टे काम करे मगर अपने कुर्ते में धूल की हल्की-सी परत भी ...
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Tag :व्यंग्य की जुगलबंदी
  May 31, 2019, 5:22 pm
पिता स्वर्ग में रहतेघर मेंबच्चों के संगमां रहती थीं।बच्चों के सुख की खातिरजाने क्या-क्यादुःख सहती थीं।क्या बतलाएं साथी तुमकोमेरी अम्माक्या-क्या थीं?देहरी, खिड़की,छत-आंगनघर का कोना-कोना थीं।चोट लगे तोमरहम मां थींभूख लगे तोरोटी मां थींमेरे मन की सारी बातेंसुनने वा...
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Tag :माँ
  May 13, 2019, 8:44 pm
वहघाट की ऊँची मढ़ी पर बैठनदी में फेंकता हैकंकड़!नदी किनारेनीचे घाट पर बैठे बच्चेखुश हो, लहरें गिनने लगते हैं...एक कंकड़कई लहरें!एक, दो...सात, आठ, नौ दस...बस्स!!!वहऊँची मढ़ी पर बैठनदी में,दूसरा कंकड़ फेंकता है..।देखते-देखते,गिनते-गिनतेबच्चे भी सीख जाते हैंनदी में कंकड़ फेंकनापहले स...
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Tag :व्यंग्य
  May 12, 2019, 1:20 pm
अच्छा हैबनारस कीपूरी एक युवा पीढ़ीदेखे बिनाजवान हो गई लेकिनअपने किशोरावस्था मेंहमने खूब देखेकर्फ्यू।गंगा तट के ऊपर फैलेपक्के महाल की तंग गलियों मेंकर्फ्यू का लगनाबुजुर्गों के लिएचिंता का विषय,बच्चों/किशोरों/युवाओं के लिएउत्सव के शुरू होने काआगाज़ होता था!स्कूलों...
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Tag :संस्मरण
  April 27, 2019, 8:13 pm
बनारस की एक गलीगली में चबूतराचबूतरे पर खुलतीबड़े से कमरे की खिड़कीखिड़की से झाँकोकमरे में टी.वी.टी.वी. में दूरदर्शनएक से बढ़कर एकसीरियलहम लोग, बुनियाद, नीम का पेड़सन्डे की रंगोली, चित्रहार, रामायण..सुबह हो या शामतिल रखने की खाली जगह भी न होती थीचबूतरे से कमरे तकजब शुरू होते ...
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Tag :संस्मरण
  April 25, 2019, 12:39 pm
लोहे के घर की खिड़की से बाहर झाँक रहे हैं एक वृद्ध। सामने की खिड़की पर उनकी श्रीमती जी बैठी हैं। वे भी देख रही हैं तेजी से पीछे छूटते खेत, घर, मकान, वृक्ष....। ढल रहे हैं सुरुज नारायण। तिरछी होकर सीधे खिड़की से घर में घुस रही हैं सूरज की किरणें। जल्दी-जल्दी, बाय-बाय, हाय-हैलो कर ल...
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Tag :संस्मरण
  April 24, 2019, 11:58 am
गली मेंबच्चे खेलते थेक्रिकेटबड़ेपान की दुकान के पासखड़े-खड़ेदेर तकसुनते रहते थे कमेंट्रीबूढ़ेचबूतरे पर बैठ करकोसते रहते थे..क्रिकेट ने बरबाद कर दियादेश को।देश कितना बर्बाद हुआ, नहीं पता!टेस्ट, वन डे, ट्वेंटी-ट्वेन्टीघरेलू, विश्वकप, आई.पी.यलक्रिकेट का इतना फैला बाजा...
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Tag :संस्मरण
  April 24, 2019, 11:49 am
ढूँढ रहा था अपने ही शहर की गलियों में भटकते हुए बचपन का कोई मित्र जिसके साथ खेले थे हमने आइस-पाइस, विष-अमृत या लीलो लीलो पहाड़िया. हार कर बैठ गया पान की एक दुकान के सामने चबूतरे पर. बड़ी देर बाद एक बुढ्ढा नजर आया. बाल सफ़ेद लेकिन चेहरे में वही चमक. ध्यान से देखा तो वही बचानू था! ज...
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Tag :संस्मरण
  April 21, 2019, 12:57 pm
गली में भीड़ देखठिठक जाते थे कदमघुसकरझाँकते थे हम भीचबूतरे परबिछी होती थीशतरंज की बाजीखेलने वाले तोदो ही होते थेचाल बताने वाले होते थेकई।हर मोहल्ले में थींदो/चारचाय और पान की दुकानेंदुकानों के पासचबूतरों परसजती थीं अड़ियाँहोती थींखेल, फ़िल्म, नाटक, संगीत, साहित्य और.....
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Tag :बनारस की गलियाँ
  April 20, 2019, 7:03 pm
सोम से रवि तकअलग-अलगसभी भगवानों के दिन निर्धारित हैं।जब हम छोटे थेजाते थे समय निकालनिर्धारित वारनिर्धारित भगवान के दरबारसोमवार-विश्वनाथ जी,मंगलवार-संकटमोचन,बुद्धवार-बड़ा गणेश,बी वार-बृहस्पति भगवान,शुक्रवार-संकठा जी,शनिवार-शनिदेव,रविवार-काशी के कोतवाल, भैरोनाथ के ...
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Tag :व्यंग्य
  April 20, 2019, 12:10 am
चबूतरे पर बैठे होते थेप्याऊबड़े-से मिट्टी के घड़े में लेकरठंडा-ठंडा पानीपेट भर पीते थे हमहोने पर कभी दे भी देेते थेएक पइसा, दो पइसा या फिर पूरे पाँच पैसे भीलेकिन नहीं माँगता था कभीअपने मुँह सेएक पइसा भीप्याऊ!गर्मी की दोपहरी मेंबनारस की गली में।.........................सहमकरचढ़ जाते...
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Tag :बनारस की गलियाँ
  April 19, 2019, 11:29 pm
ढेरा सारादाल-भात, साग-सब्जी खाकरमस्त सांड़-साखिड़की के पासपसर जाता था तोंदियलभरता रहता थाजोर-जोर खर्राटेपास बैठी उसकी पत्नीनिरीह गाय-सीघुमाती रहती थीगोल-गोलघिर्रीदार हाथ का पंखापर्दा हटाकरखिड़की से घर मेंझांकना चाहता थापूरा शहरझांक पाते थे मगरकुछ मेरी ही उम्र क...
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Tag :बनारस की गलियाँ
  April 19, 2019, 11:25 pm
उस गली सेलगते थे नारे..दो बैलों की जोड़ी हैएक अंधा एक कोढ़ी है।इस गली सेलगते थे नारे...जिस दिये में तेल नही हैवह दिया बेकार है।पता नहींवे गर्मियों के दिन थे या जाड़े केपर याद हैहम भीनिकलते थे घर सेइन्कलाब जिंदाबाद कोतीन क्लास जिंदाबाद कहते हुएबनारस की गली में।...........................
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Tag :बनारस की गलियाँ
  April 19, 2019, 11:22 pm
खिड़की के रास्तेकमरे मेंआ ही जाते हैंकबूतरमैने इन्हें कई बार कहा..कहाँ तुम शांति के प्रतीक,कहाँ यह सरकारी कार्यालय!यहाँ मत आओ।तुम चाहे जितने भी निर्बल वर्ग के हो,इसमें तुम्हारा कोई स्थान नहीं!प्राकृतिक संसाधनों परहम मनुष्यों का हो चुका है सम्पूर्ण कब्जा,आरक्...
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Tag :फेसबुक
  April 9, 2019, 7:18 pm
जब तक एक भी बनारसी में फक्कड़पन है तब तक यह वाक्य सत्य है कि बनारस में मोक्ष मिलता है। मोक्ष मतलब आवागमन से मुक्त हो जाना। लाभ/हानी से मुक्त हो जाना। जय/पराजय से मुक्त हो जाना। यश/अपयश से मुक्त हो जाना। अपने/पराए से मुक्त हो जाना। मुक्त होने के लिए मुक्त करना आना चाहिए। त...
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Tag :दर्शन
  March 24, 2019, 2:07 pm
जब भी चुनाव आता, भेड़ों का मालिक अपनी भेड़ों को लेकर उस कसाई के पास जाता जो बकरे काट रहे होते..देखा! इनका मालिक कितना निर्दयी है!!! घास-फूस के बदले अपने ही प्यारे-प्यारे पालतू जानवरों को काट कर बेच देता है। भेड़ें भीतर तक सहम जातीं..आप कितने अच्छे हैं! हम अभी उन मूर्ख बकरों को अप...
बेचैन आत्मा...
Tag :
  March 23, 2019, 3:41 pm
जूते का यह अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान। .......................................................एक मंदिर के द्वार पर जूतों का एक झुण्ड अपने-अपने चरणों की प्रतीक्षा में भजन-कीर्तन का आनन्द ले रहा था। उन्हें देख चप्पलों ने तंज किया.. यहाँ तो ये भजन सुनते हुए आराम फरमा रहे हैं और वहाँ इनके एक साथी को एक नेत...
बेचैन आत्मा...
Tag :व्यंग्य की जुगलबंदी
  March 23, 2019, 3:37 pm
भागो भागो चीखतीसहम करघोसलों में दुबक गईंचिड़ियां।जुगाली करने लगींगाय भैंसेंउठने लगाझोपडिय़ों सेधुआं।गाजी कीरा औरचार मुन्नियों से छुपाकरधनियांजल्दी-जल्दी खिलाने लगीमुन्ने कोदूध भात।उल्लुओं की नज़रघने वृक्षों के बीच छुपेजुगनुओं परपड़ने लगीचमकने लगाएक टुकड़...
बेचैन आत्मा...
Tag :लोहे का घर
  March 23, 2019, 3:26 pm
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