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बेचैन आत्मा

भारतीय रेल में सफ़र करते करते जिंदगी जीने के लिए जरूरी सभी गुण स्वतः विकसित होने लगते हैं। धैर्य, सहनशीलता, सामंजस्य आदि अगणित गुण हैं जो लोहे के घर में चंद्रकलाओं की तरह खिलते हैं। कष्ट में भी खुश रहने के नए नए तरीके ईजाद होते हैं। कोई तास खेलता है, कोई मोबाइल में लूडो य...
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Tag :लोहे का घर
  May 12, 2018, 4:35 pm
किशन लाल परेशान थे। हों भी क्यों न? बेटी जवान हो चुकी और अभी तक शादी के लिए योग्य तो क्या अयोग्य वर भी नहीं मिला! बेटी पढ़ी लिखी, खूबसूरत थी मगर हाय! दोनों पैरों से अपाहिज ही बड़ी हुई थी अभागन। लड़के की तलाश में रिश्तेदारों, परिचितों के दरवाजे-दरवाजे माथा टेकते कई दिन बीत च...
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Tag :
  May 6, 2018, 4:15 pm
आज बनारस से छपरा रूट वाले लोहे के घर में बैठे हैं। सद्भावना सही समय पर चल रही है। इस रूट में भीख मांगने वाले बहुत मिलते हैं। अभी औड़िहार नहीं आया और चार भिखारी एक एक कर आ चुके। एक दोनों हाथ से लूला था, दूसरा रोनी सूरत लिए लंगड़ा कर चल रहा था, तीसरा अंधा था और चौथी एक महिला थी...
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Tag :लोहे का घर
  April 30, 2018, 9:21 pm
#फिफ्टी_डाउन दो घंटे लेट है। #ट्रेन हो या महबूबा, लेट होना मिलन का शुभ संकेत है। हम टाइम से पहुंच नहीं सकते, वो टाइम पर आ गई तो हमारे लिए रुक नहीं सकती। सीटी बजाएगी और चल देगी। पकड़ना, चढ़ना और बैठ कर उखड़ती सांसों को ठीक करना हमारा काम है। कुछ तो चढ़ते ही बर्थ पकड़ कर ल...
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Tag :लोहे का घर
  April 30, 2018, 9:18 pm
(1)झूठ .......दिल काथोड़ा थोड़ा टूटनामन काथोड़ा थोड़ा गिरनाजिस्म कोथोड़ा थोड़ामारता हैलोग झूठ बोलते हैंवोअचानक चला गया।.................(2)अंतिम स्टेशन....................हे ईश्वर!रेलवे का गार्डहर स्टेशन परट्रेन को हरी झंडी दिखाता है तू मुझे दिखा!बचपन,जवानी तो ठीक थाआगेबुढ़ापा है।............
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Tag :क्षणिकाएँ
  April 30, 2018, 9:11 pm
हम जब छोटे थे तो कक्षा में गुरुजी और घर में बाउजी दंडाधिकारी थे। दोनों को सम्पूर्ण दंडाधिकार प्राप्त था। स्कूल में गलती किया तो मुर्गा बने, घर में गलती किया तो थप्पड़ खाए। एक बार जो कक्षा में मुर्गा बन गया, दुबारा गलती करने का विचार भी मन में आता तो उसकी रूह कांप जाती। अच...
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Tag :व्यंग्य
  March 27, 2018, 8:06 am
गंगा किनारे फैले बनारस की गलियों में जिसे पक्का महाल कहते हैं, प्रायः घर घर में मन्दिर है। मेरे घर में भी मन्दिर था, मेरे मित्र के घर में भी। मेरे राम काले थे। मेरे मित्र के गोरे। मेरे काले संगमरमर से बने, मित्र के सफेद संगमरमर वाले। बचपन में जब हम दोनों में झगड़ा होता तो ...
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Tag :संस्मरण
  March 25, 2018, 8:52 pm
आज फिर झटके वाली #बेगमपुरा में बैठा हूं। हम समझते थे जब हम #डाउन होते हैं तभी झटके मारती है लेकिन ये तो #अप में भी मार रही है! मतलब झटके मारना इस #ट्रेन की पुरानी आदत है। कित्ती पुरानी? ठीक ठीक नहीं पता। कांग्रेस के जमाने से चली आ रही है या २-३ साल पुरानी है कुछ ...
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Tag :लोहे का घर
  March 3, 2018, 4:39 pm
उंगलियों में गुलाब पकड़े मीलों चले हैं पैदल-पैदल न झरी एक भी पंखुड़ी न भूले राहमंजिल से पहले।वेलेंटाइन के दिन भी पटरियों पर दौड़ रही हैं ट्रेनें। चउचक नियंत्रण है ऊपर वाले का। जब हरी झंडी दिखाए चलना है, जब लाल तो रुक जाना है। न आगे वाली माल को छू सकती है न पीछ...
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Tag :लोहे का घर
  March 3, 2018, 4:31 pm
यह लोहे का घर जरा हट कर है। इसमें सभी गरीब ए.सी. में सफ़र करते हैं। कोई भेदभाव नहीँ। न जनरल, न स्लीपर सभी ए. सी. कमरे। नाम भी क्या बढ़िया! गरीब रथ । शाम को बनारस से चढ़कर सो जाओ, सुबह दिल्ली पहुंच जाओ। गरीबों के लिए भी दिल्ली दूर नहीं। समाजवादी कल्पना साकार होगी तो ऐसे होगी। च...
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Tag :दिल्ली
  March 3, 2018, 4:19 pm
39gtc गोरखा रेजीमेंट की मिलेट्री छावनी के किनारे किनारे चल रही है अपनी ट्रेन। काले नाली सी वरुणा नदी के पार भी हैं बबूल के जंगल। ये कांटे भरे जंगल के बाढ़ सुरक्षा की दृष्टि से लगाए गए होंगे।शिवपुर स्टेशन पर नहीं रुकती ट्रेन। प्लेटफॉर्म के किनारे - किनारे रखे थे सीमेंट के ...
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Tag :लोहे का घर
  March 3, 2018, 3:32 pm
खत में गुलाब क्या आया! बिचारे कवि जी की खाट खड़ी, बिस्तरा गोल हो गया। उसने लाख अपने श्री मुख से अपनी श्रीमती को समझाने का प्रयास किया कि आज वेलेंटाइन डे है। फेसबुक में एक प्रेम कविता पोस्ट करी थी। बहुत सी लड़कियों को पसंद आया था। किसी बुढढे कवि मित्र को हृदयाघात लगा है और...
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Tag :व्यंग्य की जुगलबंदी
  March 3, 2018, 3:22 pm
तुम स्वेटर/जैकेट कब उतारोगे बन्धु? अब तो होली भी आ गई! जब तुमने दूसरों की देखा देखी पहनना शुरू किया था तब चउचक ठंड थी। अब तो धूप जलाने लगी है। बुजुर्गों की हर बात को कान नहीं देते। वे तो कहेंगे ही ...यही समय ठंड लगती है! स्वेटर पहन कर, मफलर से कान बांध कर चलो।सरसों कटने का समय ...
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Tag :व्यंग्य
  March 3, 2018, 3:10 pm
ठंडी में बेगमपुरा मिली। और सभी ट्रेनें अत्यधिक लेट हैं। यह भी अपने समय के अनुसार अत्यधिक लेट है मगर रोज के यात्रियों के समय पर है। नेट में ट्रेनों का समय देख सभी अपने-अपने दड़बे से निकल सीटी स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर जमा हो गए। प्लेटफार्म के बाहर नगर पालिका ने आज गीली लकड...
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Tag :लोहे का घर
  February 4, 2018, 7:34 pm
सभी अपनी अपनी हैसियत के हिसाब से बजट बनाते हैं। सरकार और व्यापारी साल भर का, आम आदमी महीने भर का और गरीब आदमी का बजट रोज बनता/बिगड़ता है। सरकारें घाटे का बजट बना कर भी विकास का घोड़ा दौड़ा सकती है लेकिन आम आदमी घाटे का बजट बनाकर आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो जाता है। आम आ...
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Tag :व्यंग्य की जुगलबंदी
  January 28, 2018, 7:57 pm
जब कोई ट्रेन हवा से बातें करते हुएपुल पार करती हैबहुत शोर करता हैपुलशांत दिखती हैनदी।आदमियों कोलोहे के घर में बैठबिना छुएऊपर ऊपर से यूं जाते देखदुख तो होता होगा नदी को?क्या जानेकितना रोई होजब बन रहा थापुल!किसी केचन्द सिक्के फेंक देने सेखुश हो जाती होगी?हमारे सिक...
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Tag :ट्रेन
  January 28, 2018, 1:14 pm
काशी में मराठी भाषा का एक कथन मुहावरे की तरह प्रयोग होता रहा है.. "काशी मधे दोन पण्डित, मी अन माझा भाऊ! अनखिन सगड़े शूंठया मांसह।"जजमान को लुभाने के लिए कोई पण्डित कहता है.. काशी में दो ही पण्डित हैं, एक हम और दूसरा हमारा भाई। बाकी सभी मूर्ख मानव हैं। ऐसे ही हमारे देश के लोकत...
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Tag :व्यंग्य की जुगलबंदी
  January 20, 2018, 7:29 pm
एक बार बलिया के पशु मेले में गए थे, एक बार दिल्ली के पुस्तक मेले में। दोनों मेले में बहुत भीड़ आई थी। जैसे पशु मेले में लोग पशु खरीदने कम, देखने अधिक आए थे वैसे ही पुस्तक मेले में भी लोग पुस्तक खरीदने कम, देखने अधिक आए थे। दर्शकों के अलावा दोनों जगह मालिकों की भीड़ थी। कहीं...
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Tag :व्यंग्य की जुगलबंदी
  January 14, 2018, 1:17 pm
लोहे के घर में तास खेलने वालों की मंडली में एक सदस्य कम था और तीन साथियों ने मुझे खेल से जोड़ लिया। उधर कलकत्ता जा रहे बंगाली परिवार के बच्चों का झुंड शोर मचा रहा था, इधर मेरे बगल में बैठकर कनाडा से भारत दर्शन के लिए आईं एक गोरी मेम पुस्तक पढ़ रही थीं। मेरा ध्यान कभी बच्चो...
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Tag :लोहे का घर
  January 7, 2018, 9:56 am
देर सबेर प्लेटफार्म पर ट्रेन आ गई तो ट्रेन को देखते ही रोज के यात्रियों की पहली समस्या होती है कि किस बोगी में चढ़ें? 60 किमी की दूरी के लिए बर्थ रिजर्व तो होता नहीं। लगभग सभी ए सी क्लास के यात्री होते हैं जो जनरल की भीड़ में रोज चल सकते नहीं। रोज के यात्रियों के लिए रेल...
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Tag :लोहे का घर
  December 24, 2017, 10:50 am
सुबह उठा तो देखा-एक मच्छर मच्छरदानी के भीतर! मेरा खून पीकर मोटाया हुआ,करिया लाल। तुरत मारने के लिए हाथ उठाया तो ठहर गया। रात भर का साफ़ हाथ सुबह अपने ही खून से गन्दा हो, यह अच्छी बात नहीं। सोचा, उड़ा दूँ। मगर वो खून पीकर इतना भारी हो चूका था क़ि गिरकर बिस्तर पर बैठ गया! मैं जैसे...
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Tag :सुबह की बातें
  December 17, 2017, 7:39 pm
भण्डारी स्टेशन जौनपुर के प्लेटफार्म नंबर 1 पर एक ट्रेन दुर्ग-नौतनवां 18201आधे घंटे से अधिक समय से खड़ी है। दुर्ग से आई है और शाहगंज आजमगढ़ होते हुए गोरखपुर नौतनवां जाना है। इसके परेशान यात्री गोल बनाकर स्टेशन मास्टर के कमरे के बाहर खड़े हैं। स्टेशन मास्टर यहां नहीं बैठ...
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Tag :लोहे का घर
  December 17, 2017, 1:00 pm
जिंदगीचार दिन की नहींफकतएक दिन की होती है।हर दिननई सुबहनया दिननई शाम और..अंधेरी रात होती है।सुबहबच्चे सापंछी-पंछी चहकताफूल-फूल हंसतादिनजैसे युवाकभी घोड़ाकभी गदहाकभी शेरकभी चूहाशामजैसे प्रौढ़ढलने को तैयारभेड़-बकरी की तरहगड़ेरिए के पीछे-पीछेचलने को मजबूररातजैस...
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Tag :दर्शन
  December 17, 2017, 12:39 pm
मेहमान नवाजी शब्द में वो मजा नहीं है जो अतिथि सत्कार में है.  मेहमान का स्वागत तो मोदी जी भी कर सकते  है,अतिथि का कर के दिखाएँ तो जाने! मेहमान वो जो बाकायदा प्रोटोकाल दे कर आये. फलां तारिख को, फलां गाडी से, फलां समय आयेंगे. ये घूमना है, यह काम है और इतने बजे लौट जायेंगे. सब क...
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Tag :व्यंग्य की जुगलबंदी
  December 10, 2017, 2:13 pm
यह मेरा नया ब्लॉग है. इसमें सारनाथ के चित्र, उससे सम्बन्धित जानकारी और प्रातः भ्रमण के दौरान मन में आये विचार सुबह की बातें शीर्षक से प्रकाशित करने का मूड बनाया है. कोशिश है कि आज नहीं तो कल सारनाथ के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए यह एक बढ़िया लिंक बने. इस ब्लॉग से ज...
बेचैन आत्मा...
Tag :
  December 10, 2017, 10:06 am
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