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बेचैन आत्मा

रेलगाड़ी में बैठ कर रेलगाड़ी पर व्यंग्य लिखने का मजा ही कुछ और है। बन्दा जिस थाली में खायेगा उसी में तो छेद कर पायेगा। दूसरा कोई अपनी थाली क्यों दे भला? पुराने देखेगा और नया बनाकर सबको दिखायेगा। ट्रेन में चलने वाले ही ट्रेन को समझ सकते हैं। हवा में उड़ने वाले जमीनी हकीकत स...
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Tag :लोहे का घर
  September 16, 2017, 10:28 am
धर्म और अधर्म का अर्थ समझाते हुए तुलसी दास जी लिखते हैं...परहित सरिस धर्म नहीं भाई। पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।।परोपकार के बड़ा कोई धर्म नहीं है और दूसरों को कष्ट देने से बड़ा कोई अधर्म नहीं है।वे यहीं नहीं रुकते। आगे जटायू सन्दर्भ में लिखते हैं..परहित बस जिनके मन माहीं।तिन्ह ...
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Tag :निबन्ध
  September 9, 2017, 9:45 pm
सुबह (दफ्तर जाते समय)ट्रेन हवा से बातें कर रही है। इंजन के शोर से फरफरा के उड़ गए धान के खेत में बैठे हुए बकुले। एक काली चिड़िया उम्मीद से है। फुनगी पकड़ मजबूती से बैठी है। गाँव के किशोर, बच्चे सावन में भर आये गढ्ढे/पोखरों के किनारे बंसी डाल मछली मार रहे हैं। क्या बारिश के साथ...
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Tag :लोहे का घर।
  September 2, 2017, 12:36 pm
बारिश से पहलेतेज हवा चली थीझरे थेकदम्ब के पातछोटे-छोटे फलदुबक कर छुप गये थेफर-फर-फर-फरउड़ रहे परिंदेतभी उमड़-घुमड़ आयेबदरी-बदराझम-झम बरसेबादलसुहाना हो गया मौसमबारिश के बाद सहमे से खड़े थेसभी पेड़-पौधेकोई बात ही नहीं कर रहा थाकिसी से!सबसे पहलेबुलबुल चहकीकोयल ने छेड़ी लम्बी...
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Tag :प्रकृति
  September 2, 2017, 9:54 am
कर्फ्यू वाले दिनों में बनारस की गलियाँ आबाद, गंगा के घाट गुलजार हो जाते । इधर कर्फ्यू लगने की घोषणा हुई, उधर बच्चे बूढ़े सभी अपने-अपने घरों से निकल कर गली के चबूतरे पर हवा का रुख भांपने के लिए इकठ्ठे हो जाते। बुजुर्ग लड़कों को धमकाते..अरे! आगे मत जाये!!बनारस की गलियों में लड़क...
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Tag :व्यंग्यकीजुगलबन्दी
  August 22, 2017, 11:29 pm
नदीअब वैसी नहीं रहीनदी में तैरते हैंनोटों के बंडल, बच्चों की लाशेंगिरगिट हो चुकी हैनदी!माझी नहीं होतानदी की सफाई के लिए जिम्मेदारवो तो बस्सइस पार बैठो तोपहुँचा देगाउस पारनदीके मैली होने के लिए जिम्मेदार हैंइसमें गोता लगानेऔरहर डुबकी के साथपाप कटाने वालेपाप ऐसे कट...
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Tag :व्यंग्य
  August 18, 2017, 11:15 pm
सच हैयह मौसमसृजन और संहार का है।खूब बारिश होती हैइस मौसम मेंलहलहाने लगते हैंसूखे/बंजर खेतधरती मेंअवतरित होते हैंझिंगुर/मेंढक/मच्छर और..न जाने कितनेकीट,पतंगे!आंवला या कदम्ब के नीचेबैठ कर देखोहवा चली नहीं किटप-टपशाख से झरते हैंनन्हे-मुन्नेफल।सबतुम्हारी तरहनहीं कर ...
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Tag :कृष्ण
  August 15, 2017, 9:28 pm
शायद ही कोई पुरुष हो जिसने किसी को छेड़ा न हो। शायद ही कोई महिला हो जो किसी से छिड़ी न हो। किशोरावस्था के साथ छेड़छाड़ युग धर्म की तरह जीवन को रसीला/नशीला बनाता है। छेड़छाड़ करने वाले लेखक ही आगे चलकर व्यंग्यकार के रूप में प्रतिष्ठित हुए। यश प्राप्त करने के बाद भी व्यंग्यकार ...
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Tag :व्यंग्यकीजुगलबन्दी
  August 13, 2017, 1:51 pm
धोबियाsssधुल दे मोरी चदरिया मैं ना उतारूँ नाएक जनम दूँखड़े-खड़े मोरी धुल दे चदरिया!आया तेरे घाट बड़ी आस लगा केजाना दरश को शिव की नगरियाधुल दे चदरिया।रंगरेजवाsssरंग दे मोरी चदरिया मैं ना उतारूँ नाएक जनम दूँखड़े-खड़े मोरी रंग दे चदरियाजइसे उजली धुली धोबिया...
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Tag :कविता
  July 12, 2017, 1:51 pm
उमड़-घुमड़ जब बादल गरजते हैं तो मनोवृत्ति के अनुरूप सभी के मन में अलग-अलग भाव जगते हैं। नर्तक के पैर थिरकने लगते हैं, गायक गुनगुनाने लगते हैं, शराबी शराब के लिए मचलने लगता है, शाबाबी शबाब के लिए तो कबाबी कबाब ढूँढने लगता है। सभी अपनी शक्ति के अनुरूप अपनी प्यास बुझाकर तृप्त ...
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Tag :व्यंग्य की जुगलबंदी
  July 8, 2017, 8:43 pm
बाहर लाख अँधेरा होउजाला हैलोहे के घर मेंमौन हैंअंधेरे में डूबे हुए खेतहलचल हैघर मेंबाहर भी श्रमिक थे, किसान थेजब तक सूरज थासूरज के डूबते हीमौन हो गये खेतउजाले के साथशोर काअँधरे के साथमौन कागहरा नाता दिखता है!मौन थे बुद्ध भीजब तक अँधेरा थाअँधेरा हो तो चुप रहना चाहिये...
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Tag :ट्रेन
  July 3, 2017, 8:00 pm
पटरी के किनारेमालगाड़ी सेसीमेंट की बोरियाँ उतारकरबीड़ी, खैनी के साथबतकही कर रहे हैंढेर सारे मजदूरचीखता है ट्रेन का इंजनघबरा कर उड़ते हैंखेतों मेंचुग रहे पँछीखुश होते हैं हमलोहे के घर की खिड़की सेइन्हें देखकर!खेतों मेंजमा हो रहा हैबारिश का पानीकिसी ने करी है गुड़ाईकहीं ...
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Tag :ट्रेन
  July 3, 2017, 9:39 am
सुहानी शाम आईमन सशंकित हो गयातेरे शहर मेंआज बारिश हुई होगी!खुद से खपादिन भर का तपाठंडी हवाओं के स्पर्श से भीचकरा जाता हैबारिश में भीगे?माटी की सोंधी सुगन्ध पा आल्हादित हुए?या तपते रहे मेरी तरहदिन भर?लोहे के घर की खिड़कियों सेआ रही है ठंडी हवाघास के बोझ का गठ्ठर सर पर लाद...
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Tag :ट्रेन
  July 2, 2017, 4:53 pm
बहुत दर्द होता है मरने से पहलेएक बार मर जाओ तो आसान होता है जीना!हँसो मतअपने जीवित होने का सुबूत दोमरने के बाद जानते हो क्&#...
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Tag :
  June 30, 2017, 9:05 pm

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Tag :
  June 30, 2017, 7:53 pm
गेंहूँ की कटाई जोरों पर है. जहाँ देखो वहीं खड़ी फसल से ज्यादा कटे ढेर दिख रहे हैं. कहीँ-कहीं दवाई भी चल रही है, कहीं पूरे साफ हैं खेत. धरती पुत्र सरसों की चादर के बाद अब गेहूं की चादर भी उतार रहे हैं. रोज नये नजारे दिखाती हैं लोहे के घर की खिड़कियाँ जारी है&n...
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Tag :यात्रा
  June 26, 2017, 6:02 pm
लोहे के घर मेंपापाबेटे को सुला रहे हैं कंधे परहिल रहे हैं, हिला रहे हैंबेटाले रहा है मजाखुली आंखों से!पापासोच रहे हैंसो चुका है बेटालिटाना चाहते हैं बर्थ परबेटा हँसता हैपापामुस्कुराकर डाँटते हैं..नहीं मानेगा?धरती परजब तक बच्चे हैंबचपना हैजब तक युवा हैंजवानी हैकोई...
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Tag :लोहे का घर
  June 25, 2017, 2:12 pm
आसन और प्राणायाम की शिक्षा तो बचपन में उपनयन संस्कार के साथ ही मिल गई थी लेकिन महत्व तब समझ मे आया जब बाबा को टी.वी. में सिखाते हुए देखा! उस समय बाबा को देख कर लगा था...हांय! ये तो हमारे गुरुजी पहले ही बता चुके हैं!!! इसमें नया क्या है?अंहकार को चोट लगी। गलती का एहसास ह...
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Tag :व्यंग्य
  June 25, 2017, 12:08 pm
लोहे के घर मेंखिड़की के पास ड्रम के ऊपर बैठी बच्चीकभी इस खिड़की सेकभी उस खिड़की सेझाँक रही है बाहरगोधुली बेला हैतेजी से बदल रहे हैं दृश्यचर रही हैं बकरियाँलड़के खेल रहे हैं क्रिकेटआ/जा रही हैं झुग्गी-झोपड़ीएक झोपड़ी के बाहर आंगन बुहार रही हैएक लड़कीबच्ची के दुधमुँहे भाई को ...
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Tag :ट्रेन
  May 25, 2017, 7:05 am
बच्चों की चाँद-चाँदनी लहर-लहर संसार हाथों के गट्टे सहलाते माझी के पतवार....
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Tag :गोमती
  April 14, 2017, 11:19 am
घने वृक्ष की छाँव क्या करे?मन बैसाखी धूप!सूखी रोटी कैसे खायें?चाँद पी गया दूध!...
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Tag :सारनाथ
  April 14, 2017, 11:14 am
मंदिर के दरवाजों में लिखे दोहे भावनाएं हैं जिन्हें पढ़ना और समझना आनन्द दायक है.अनित्य भावना राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असबार.मरना सबको एक दिन, अपनी-अपनी बार.. अनित्य यानि अस्थिर, चंचल, छणिक, परिवर्तनशील, विनाशी, संसार की हर वस्तु, हर नाता रिश्ता, हमारा शरीर, आयु, रूप-ल...
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Tag :जैन धर्म
  April 4, 2017, 10:01 am
यूँ तो मॉर्निंग रोज ही गुड होती है लेकिन नौकर की मॉर्निंग तभी गुड होती है जब नौकरी से छुट्टी का दिन हो और लगे आज तो हम अपने मर्जी के मालिक हैं। कैमरा लेकर, मोबाइल छोड़ कर सुबह ही घर से निकलने के बाद हरे-भरे निछद्द्म वातावरण में अकेले घूमते हुए एहसास होता है कि हम भी इसी स्वत...
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Tag :सुबह की बातें
  February 19, 2017, 9:04 pm
नींद से जाग कर/करवट बदल फिर सो गया/ लोहे के घर में/ खर्राटे भरता आदमी. भीड़ नहीं है ट्रेन में/ जौनपुर पहुँचने वाली है / किसान. मजे-मजे में सुन रहे थे सभी रोज के यात्री उसके खर्राटे. तास खेलने वाले खर्राटे के सुर से सुर मिलाकर जोर से पटकते हैं अपने पत्...
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Tag :यात्रा
  February 19, 2017, 8:50 pm
न आम में बौर आया, न गेहूँ की बालियों ने बसन्ती हवा में चुम्मा-चुम्मी शुरू करी, न धूल उड़े शोखी से और न पत्ते ही झरे शाख से! अभी तो कोहरा टपकता है पात से। सुबह जब उठ कर ताला खोलने जाता हूँ गेट का तो टप-टप टपकते ओस को सुन लगता है कहीं बारिश तो नहीं हो रही! कहाँ है बसन्त? कवियों के ब...
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Tag :व्यंग्य की जुगलबंदी
  February 19, 2017, 8:20 pm
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