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नई बात

हम पूरबियों, खासकर भोजपुरियों, के मन में नाच के अनेक संस्करण हैं. कोई एक चीज जिसके लिए पक्ष और विपक्ष के सर्वाधिक तर्क हमने सुने वो 'नाच' ही था. नचनिये का धर्म या मरजाद हमेशा से चर्चा का विषय रहा है, इसके किस्से रहे हैं. प्रस्तुत कहानी भी उन्हीं स्मृतियों का एक शानदार संस्क...
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  May 22, 2012, 9:34 pm
 ( बीते वर्ष 2011 की महत्वपूर्ण साहित्यिक गतिविधियों पर यह टीप ख्यात आलोचक डॉ. कृष्णमोहन की है. )हिंदी साहित्य में वर्ष 2011 की एक ऐतिहासिक घटना शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी के उपन्यास ‘कई चाँद थे सरे आस्माँ’ का प्रकाशन रही। मूल रूप से उर्दू में लिखे गए इस उपन्यास का रूपांतर स्वयं ...
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Tag :कृष्णमोहन
  January 2, 2012, 9:01 am
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