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सुबह की चाय के साथ अखबार न पलटें तो चाय मजेदार नहीं लगती और पलटते, पढ़ते अंत तक आते वो फिर अपना स्वाद खो देती है। रोज़ ही वही राजनैतिक उठा-पटक, आरोप-प्रत्यारोप, भ्रष्टाचार, बेईमानी, हत्या ...न जाने क्या-क्या। दिल सा डूबता चला जाता है। हर रोज़ सोचतीं हूँ कल से नहीं पढूंगी ये ...
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  May 21, 2013, 12:30 am
कभी गौर करें तो सब अलग- अलग तरह से लड़ते हैं। भाई-बहिन, पति -पत्नी, मित्र, बच्चे, स्त्रियाँ, पुरुष, बड़ी गाड़ी वाले और छोटी गाड़ी वाले, ...सबके अलग- अलग तेवर। मुझे सबसे अच्छी लड़ाई लगती है ..... प्रेमी जोड़ों की।चेहरों से भाव टपका जाता है ....कि बस एक-दूसरे को गले लगा लो, परन्तु उन...
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  May 14, 2013, 12:23 am
जब देखो अपनी ही मिच - मिच .....क्या समझते हो तुम लोग, मुझे भावनाओं का प्रदर्शन करना नहीं आता तो क्या मुझे कभी कोई तकलीफ नहीं होती। पत्थर की बनी हूँ मैं? तुम लोगों को क्या लगता है , मुझे कभी दर्द नहीं होता .......नहीं सुनना अब मुझे, तुम लोगों का ......कुछ भी......समझे तुम सब बिलकुल नहीं स...
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  May 7, 2013, 11:23 pm
"कोमरेड देखा तुमने, गुलमोहोर फिर खिलने लगे हैं""हाँ देखा और उसमें रचे-बसे तुम्हें भी देखा""शाम को मिलो तो ......उसी अपने वाले गुलमोहोर के नीचे बैठ कर ढेर सारी बातें करेंगे। तुमसे अच्छे से बातें किये हुए भी बहुत दिन हो गए " "तुम सुनती ही कहाँ हो, मेरे पास भी कितना कुछ है ...
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  April 25, 2013, 1:21 am
अक्सर सुनते हैं.....औरतों का सम्मान करो, औरतों का आदर करो, उनकी रक्षा करो, उनके हित के लिए ये करो , वो करो, उनको  ........औरतें बेहद खुश सोच कर कितनी चिंता है सभी को। फिर बैठती है सब्र से हाथ में हाथ रखे, आएगा कभी कोई तारन हार और तब उनके सारे दुःख दूर हो जायेंगे।वैसे ये बात कुछ विश...
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  April 17, 2013, 1:26 am
आजकल १८  घंटे काम को दे दिए हैं, फिर भी शरीर कभी नहीं थकता .....परन्तु यदा -कदा  दिल और दीमाग थक जाता है। कितना कुछ सोचना होता है बेचारे को .....घर का, बाहर का , दुनियादारी, रिश्तेदारी, समाज, मित्र और पता नहीं क्या-क्या ........देर शाम तक आते-आते मन बोझिल हो जाता है। तब याद आते हैं वो कुछ ...
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  April 5, 2013, 10:56 pm
उसने कहा -"दोस्त तुम कितने खुश रहते हो, हमेशा हँसते - खिलखिलाते ....तुम्हारे चेहरे पर दमकती प्रसन्नता देख कर सभी प्रसन्न हो जाते हैं। तुम इसी तरह हमेशा खुश रहा करो।"और मैं खुश हो जाती हूँ। तुमने कहा -" सुन रहे हो मुझे तुम्हारी ये झूठी हंसी बिलकुल अच्छी नहीं लगती। बहने दो न...
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  March 30, 2013, 10:43 am
कभी यूँ भी होता है जब चाँद ओढ़ लेता है बादल रात हो जाती है सड़कों सी लम्बी मुरझा जाता है बसंत हवा सुनाने लगती है उदास नग्मे  ऐसे व्यथित दिनों के लिए कुछ यादें हैं मेरे पास जो संभाली थी मैंने उन दिनों जब भोर की हवाएं सुनाती थी प्यार के नगमें शाम सहलाती थीं अपनी बाहो...
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  March 22, 2013, 9:37 pm
बहुत शोर है बाहर बहुत व्यस्तता सब कुछ दौड़ रहा है रात और दिन बदल रहें हैं तेज रफ़्तार से सुबह और शाम नदारत हैं ज़िंदगी सेये बाहर की दुनिया भी कमाल है मन लगाए रखती है फिर भीतर ये खामोशी कैसी खाली बर्तन सा बैचैन छटपटाता हुआ टीसता है कुछ उस सुबह की उम्मीद करता जब सुकू...
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  March 18, 2013, 12:45 am
St. Beatus Caves - Interlaken Switzerlandजब भी स्विटज़रलैंड जाती हूँ तो बेहद उत्त्साह से भर जाती हूँ, परन्तु जब वहाँ पहुँच कर यूरोप दर्शन पर निकलती हूँ तो मन बेचैन होने लगता है। बर्फ, नदि, हिमाच्छादित पहाड़, हरे-भरे बुग्याल ( मीडोज ), झरने, विभिन्न प्रकार के रंग-बिरंगे फूल, वनस्पतियाँ, फल, बसंत, पक...
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  March 6, 2013, 9:14 pm
एक दिन ऐसे ही खड़े होकर हम देखेंगे देर तक इस विशाल समुद्र को लहरों को भी देखेंगे आते जाते मचलते हुए खिलखिलाते फिसलते हुए और साकार कर लेंगे इन्ही की अठखेलियों में अपने सपनों को भी सुन यही सपना तो देख रहे हैं न हम अपने भीतर हहराते हुए समुद्र को लेकर एक दिन होंगे हम दोन...
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  February 28, 2013, 8:47 pm
एक दिन ऐसे ही खड़े होकर हम देखेंगे देर तक इस विशाल समुद्र को लहरों को भी देखेंगे आते जाते मचलते हुए खिलखिलाते फिसलते हुए और साकार कर लेंगे इन्ही की अठखेलियों में अपने सपनों को भी सुन यही सपना तो देख रहे हैं न हम अपने भीतर हहराते हुए समुद्र को लेकर एक दिन होंगे हम दोन...
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  February 28, 2013, 8:43 pm
सुबह कार तक पहुँचने पर अपराधी सा महसूस करने लगती हूँ। अपनी याददाश्त पर कोफ़्त भी होने लगती है। रोज सोचती हूँ सरकार की गुनाहगार हूँ  ....वक्त मिलते ही कार के शीशे से काली फिल्म हटवा दूंगी .......वापस आने तक अँधेरा हो जाता है , इस गुनाह पर पर्दा पड़ जाता है तो भूल जाना मानव स्वभा...
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  February 19, 2013, 9:44 pm
कल रात मेरी छत पर सुहानी चांदनी फ़ैली थी ज़माने बाद उसमें भीगती फिर मैं मुस्कुराई थोड़ा सकुचाई थोड़ा शरमाई ज़माने बाद कोई क्या देखे गुमशुदा चाँद को कल चाँद भी निकला था ज़माने बाद चलो बहुत हुआ मिलना उससे अब फिर मिलेंगे कभी ज़माने बाद किसी और को क्या कहें हम तो अपन...
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  February 15, 2013, 10:15 pm
" क्या सोच रहे हो ?""सोच रही हूँ तुझे इस पहाड़ी  से नीचे धकेल दूँ ......""फिर ......देर किस बात की  ..."" तू पका मत .....वैसे ही बहुत दिनों से दीमाग खाली-खाली लग रहा है ......अब तू जा मुझे आज कोई बात करने का मन नहीं है  ......"" अच्छा है ......वर्ना तुम्हारा ये शैतानी दीमाग न खुद चैन से रहता ...
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  February 10, 2013, 5:52 pm
उसएक दिन पार्क की दूब पर नंगे पैर टहल रही थी कांच की किरच धंस गई पैरों में  दर्द से कसकते हुए झुक कर निकाला सोचा किनारे पर बने कूड़ेदान में फेंक दूंगी कोई और दर्द से बचा रहे तो अच्छा हाथ में रख कर निहारा  सुर्ख लाल किरच फिर हर सुबह पार्क में कुछ और किरचें इकठ्ठा करती ...
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  February 2, 2013, 10:00 am
दिसम्बर (2012) में कुछ दिन थाईलैंड ( बैन्कोक, पटाया ) में थी, थाईलैंड जाने का ये मेरा पहला अवसर था। वहाँ क्या-क्या देखना है यात्रा करने से पहले इसकी जानकारी ली गूगल से और कुछ मित्रों से। टूरीस्म की दृष्टी से ये सफ़र बहुत आनंददायक रहा। कुछ बातें बहुत अच्छी भी थीं।मसलन था...
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  January 18, 2013, 7:03 pm
हर वर्ष की तरह दुनिया दिखाते दुनियादारी सिखाते फिर से तारीखें बदल गई कैलेंडर बदल गए। सभी ने जोश और उत्त्साह के साथ नए-नए संकल्पों की सूची भी तैयार कर ली होगी। क्या अच्छा करना है, क्या बुरा त्यागना है, क्या हासिल करना है, कौन सी मंजिल पानी है, किस मुकाम पर पहुंचना है आदि।...
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  January 3, 2013, 7:31 pm
मिलन एक सुन्दर अहसास है जो जीवन को आनंदित और आशावान बना देता है। वही अलविदा उस शाम की तरह है जहाँ ढलता हुआ सूरज एक लम्बी स्याह रात के अकेले उदास टुकड़े को बेचैन छोड़ जाता है।पिछली सारी बातें, मुलाकातें, ज़िंदगी के तमाम उठाव-चढ़ाव, फुरसतें और मेहरबानियों का ब्योरा हाथ म...
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  December 24, 2012, 10:08 am
बचपन में जब हम समाचार की सार्थकता समझते भी नहीं थे तब सुबह-सुबह घर पर चल रहे रेडियो में जैसे ही भजन की स्वरलहरिया समाप्त होतीं थीं अचानक से धीर-गंभीर, मिठास और अपने सारे सम्मोहन के साथ एक आवाज़ आकर्षित कर लेती थी -' ये आकाशवाणी है, अब आप देवकी नंदन पाण्डेय से समाचार सु...
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  November 27, 2012, 10:42 am
एक साधारण इंसान बने रहना इतना भी आसान नहीं है कुछ बातें थोड़ा सा होंठ हिलाकर बस कह देनी होती हैं मगर कहा नहीं जाता मन के भीतर शब्द हिलोरे मारते हैं अगले ही पल बाहर आने को तैयार, लगता है जैसे बस कह डालो और मन हल्का कर लो मगर होंठ हैं की खुलते ही नहीं..... ऐसी परिस्थिती में इंस...
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  July 11, 2012, 6:04 pm
आज मेरे पास तुम्हे देने के लिए कुछ भी नहीं है सिवा कुछ लम्हों का इंतज़ार और मीलों लम्बी खामोशियाँ....
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  May 31, 2012, 10:48 pm
इन ऊंची चढ़ती इमारतों में ऊंची उड़ान और ऊंचे सपने बोने इस शहर की भीड़ में खोने क्यों आये थे उस दिन अब याद नहीं आताबचपन की खिलखिलाहटें जवानी की आहटें झूले, पेड़ और प्यारा सा अंगना वार त्यौहार और सजना संवरना छुपाते बताते किस्से कहना कुछ भी तो याद नहीं आतानदियाँ पहा...
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  May 16, 2012, 10:21 am
कैसे भूल जाऊं वर्षों पहले मेरा हाथ थामे तुम चले थे दूर तक उस अंतहीन सड़क पर आज भी मेरी हथेलियों में उस शाम की खुश्बू बसी हुई है कैसे भूल जाऊं वो रंगीन सपने जो देखे थे कभी तारों की छावं में पूनम की चांदनी रात में  बेवजह ही होंठ गुनगुनाने लगते थे खुशियों के गीत कैसे ...
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  May 7, 2012, 8:45 am
 फुर्सत और उत्त्सुकता भी कमाल की चीज है, कहाँ से कहाँ पहुंचा देती है....सोचती हूँ यदि आदिमानव घुम्मकड़ नहीं होता तो ये सब जगहें भी कमसकम इस हाल में नहीं होती, दूसरा दिन भोपाल में स्थित भीमबेटका के लिए तय था.....सुबह से ही गर्माते हुए सूरज से बचने के सारे साधन एकत्रित करके न...
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  May 2, 2012, 9:20 am
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