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कही-अनकही : View Blog Posts
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कही-अनकही

             अपना गड्ढा खुद खोदना, अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना जैसे न जाने कितने मुहावरे हैं जिन्हें बचपन से नकारात्मक संदर्भों से जोड़कर सिखाया जाता रहा है। इसका फायदा कितनों को हुआ यह तो नहीं जानता, लेकिन कुछ बातें आपको बताना चाहूंगा जिसके बाद आप भूल जाएंगे अपने बच्चों क...
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  July 25, 2017, 4:28 pm
कहते हैं कि विदेशों में कामचोर भूखे मरते हैं तो भारत में दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करने वाला किसान भूख से दम तोड़ता है. उस किसान के लिए पानी और बारिश क्या अहमियत रखते हैं यह हम सभी जानते हैं. किसान और पानी के बीच के इसी रिश्ते को समझने की कोशिश है पहिली पानी. कीमती वक्त निकालकर एक ...
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  July 19, 2017, 1:13 pm
आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता को जोड़कर देश—विदेश के सैकड़ों बुद्धिजीवियों ने सिद्धांतों के जुमले गढ़े हैं। इन सिद्धांतों को हमारे लोकतंत्र, खासकर विकेंद्रीयकरण के बाद इसकी आधारभूत इकाई गांव की परिस्थितियों से जोड़कर परखें तो स्थिति साफ हो सकती है। कहानी का नायक...
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  July 8, 2017, 12:39 pm
मोबाइल, इंटरनेट, टेक्नोलॉजी, ऊर्जावान युवा... विकसित होता दिखाई देता देश. पर हम आखिर जा कहाँ रहे हैं. क्या ऊर्जा समाज को आइना दिखाकर रोशन कर रहा है या मोहरा बनकर सिमट जाना चाह रहा है. दूसरी ओर, देश में कुछ ऐसे हिस्से आज भी बचे हुए हैं जिन्हें मुख्यधारा वाले तो पिछड़ेपन की निश...
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  June 22, 2017, 4:52 pm
ये हम जो थोड़े—थोड़े इकॉनॉमिस्ट हैं, थोड़ा पॉलिटिशियंस हैं और थोड़ा बुद्धिजीवी का कीड़ा जो बैठा है खोपड़िया में ठोनकतेच रहता है बीच—बीच में। इस अलकरहा टाइप के दर्द को भूलाने कोई मोदी भक्त बना बैठा है तो कोई ऐसा लिख मार रहा है जिसे भक्तों के नजरिए से बराबर देशद्रोही कर...
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  December 31, 2016, 4:22 pm
     हाल ही में मैंने “सर्वश्रेष्ठ हिंदी कहानियां (२०००-२०१०) पीडीऍफ़ फोर्मेट” में वंदना राग की लिखी कहानी यूटोपिया पढ़ी है, जिसमें एक दक्षिणपंथी विचारधारा से अतिरंजित नवयुवक की कुंठाओं को सरल ढंग से अभिव्यक्त किया गया है. कहानी पढ़ने के चंद रोज बाद १४ फरवरी अर्थात प्...
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  May 2, 2016, 11:45 am
आमतौर पर हम सरकारों को सरोकार के प्रति संवेदनशीलता और संवेदनहीनता के तराजू पर तौलते हैं. अब इसका पैमाना विकास हो गया है. लेकिन एक सवाल पर गौर फ़र्माइएगा कि सत्ता पर बैठा सख्श क्या सचमुच विकास कर रहा है या विकास होते दिखा रहा है. मार्केटिंग और विज्ञापन के इस दौर में ये फर्...
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  April 30, 2016, 4:03 pm
               हां मैं गाँव का वही गंवार हूँ, जिसे गरीबी की सोंधी मिटटी ने जहां ममत्व का खजाना दिया तो उसी ने वो औकात भी दिखाया जहां से महलों की एक-एक सीढ़ी कदमों को बौना कर देता है. कोरबा में बीते बचपन के भोर की धुंधली शहराती यादों के साथ गवई के ठेठ मिजाज को जीता आय...
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  April 22, 2016, 4:31 pm
"नईदुनिया के पत्रकार दिलीप यादव के FB वाल से साभार"कभी एक-एक एक प्याली चाय बेचने वाले पीएम नरेंद्र मोदी गरीबी को नजदीक से समझते ही नहीं, बल्कि गरीबी का दंश भी झेल चुके हैं. लोकसभा चुनाव के दौरान ‘अच्छे दिन आने वाले हैं...’ नारे के साथ मजदूर, किसान और गरीबों के बीच गए. मोदी का ज...
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  July 12, 2015, 11:20 pm
कलम का एक नन्हा सिपाही हूं, जो जाने अनजाने मुझसे जिंदगी के फलसफों और अनुभवों को कागज से मेल कराकर नए-नए कैनवास बनवाते रहता है। मेरा बचपन कोरबा जैसे शहर से लेकर करुमहूं(karumahun) जैसे छोटे से गांव के सिवाने से भी दूर बियाबान में भी बीता है। कभी बस्ती के यारों की टोली से संबंध र...
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  January 14, 2013, 9:28 pm
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