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कारवॉं karvaan

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कारवॉं karvaan...
कुमार मुकुल
Tag :
  February 1, 2017, 3:43 pm
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कुमार मुकुल
Tag :
  January 11, 2017, 5:37 pm
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कुमार मुकुल
Tag :
  January 11, 2017, 5:36 pm
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कुमार मुकुल
Tag :
  January 11, 2017, 5:35 pm
दोनों नंगे ही पैदा होते हैं। तो क्‍या सच व झूठ आवरणों के नाम हैं।पैदा होते हैं तो दोनों मर भी जाते हैं। मतलब सच-झूठ दोनों ही अमर नहीं हैं।दोनों को जन्‍मते और मरते ईश्‍वर देखता है। तो क्‍या उसकी भूमिका दर्शक से ज्‍यादा है।  ...... खलील जिब्रान को पढते हुए।...
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कुमार मुकुल
Tag :खलील जिब्रान
  August 18, 2016, 12:23 pm
केरल में 100 करोड की लागत से जटायु नेचर पार्क में जो मूर्ति कलाकार ने बनायी है 70 फीट उंची वह देखने में साफ-साफ एक चील लग रही है जबकि जटायु गिद्ध था। चील की गर्दन छोटी होती है और गिद्ध की लंबी। ...
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कुमार मुकुल
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  December 18, 2015, 5:47 pm
सोसल साइट पर देश भर के युवा अपना डी पी बदल रहे हैं। इसपर लिखा है यूथ फॉर राइट टू एम्प्लॉयमेंट। ये बेरोज़गार युवा हैं, इन्हें रोज़गार चाहिए। अगर यह आंदोलन बढ़ा तो मोदी जी के लिए कठिनायी हो सकती है।     इनका कहना है कि भारत के राजनीतिक दल बेरोजगारों के प्रति अमानवीय हद त...
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कुमार मुकुल
Tag :
  November 20, 2015, 9:45 am
राम रथी विरथि लव- कूशादेखहिं सीता भयउ कलेशा।जो रामराज 12 साल के वनवास में सीता को गंवाने और पाने के बाद मिला और जिसमे फिर वे सीता को गंवा बैठे। जिसमे भाई लक्ष्मण को राजनिकाला के कारण सरयू मे डूबना पड़ा और उस दुख में फिर राम को भी डूबना पड़ा। जिसमे उनकी रावण जयी सेना को उनके ह...
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कुमार मुकुल
Tag :जिंदगी का मकसद
  October 24, 2015, 7:44 pm
ऋग्वेद - जिन्हें पुरुष कहते हैं वे वस्तुत: स्त्री हैं-----स्त्रिय: सतीस्तां उ मे पुंस आहु: पश्यदक्षण्वान्न बिचेतदन्ध:।प्रकृति की रचना में प्रत्येक पुरुष के भीतर स्त्री और प्रत्येक स्त्री के भीतर पुरुष की सत्ता है। ऋग्वेद में अस्यवामीय सूक्त में कहा है—जिन्हें पुरुष कह...
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कुमार मुकुल
Tag :उपनिषद
  October 24, 2015, 10:19 am
आशीष मिश्र कविता में लोकतत्त्व और ख़ासकर नब्बे के बाद की कविता में इसके स्वरूप पर बातचीत करना चाहता हूँ। प्रश्न पूछना चाहता हूँ, कि सवर्ण मर्दों को ही यह लोक इतना क्यों याद आता है? जानना चाहता हूँ, कि इन कविताओं में लोक का क्रांतिकारी सार कितना है और कितना यह बाजार का उ...
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कुमार मुकुल
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  October 14, 2015, 9:28 am
“मेरी चाय को तुम्हारी फूंक चाहिए सादिया हसन”मेरी चाय को तुम्हारी फूंक चाहिए सादिया हसनये चाय इतनी गर्म कभी न थीइसकी मिठास इतनी कम कभी न थी.मैं सूंघता हूँ मुल्क की हवा में लहू की गंध हैकल मेरे कमरे पर आये लड़के ने पूछा मुझसेकि क्रिया की प्रतिक्रिया में पेट फाड़ अजन्मे शि...
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कुमार मुकुल
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  August 22, 2015, 8:29 am
’जो सौंदर्य के पक्ष में खड़ा होता है वह असौंदर्य के विरोध में भी खड़ा होता है।‘’—अर्चना वर्माहिन्दी की ज़मीनी रचनाशीलता को अनौपचारिक मंच देने के उद्देश्य से गठित साहित्यिक संस्था ‘हुत’ की ओर से आयोजित रवीन्द्र के. दास के कविता-संग्रह ‘स्त्री-उपनिषद’ के बहाने “स्त्रीव...
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कुमार मुकुल
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  August 2, 2015, 10:30 pm
हम निकले थे विभूति एक्सप्रेस पकड़ने. स्टेशन पहुंचा तो पंजाब मेल के आने की खबर हो रही थी. टिकट कटाया और भागते-भुगते चार नंबर प्लेटफार्म पहुंच गया. अभी सुस्ताने के लिए नजर कोई जगह ढूंढ ही रही थी कि पंजाब मेल की लाइट दिखी. मन में आया, चलो, सुबह तीन बजे जगना शुभ-शुभ रहा. अच्छे दि...
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कुमार मुकुल
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  May 28, 2015, 5:14 pm
अकेला हूं मैंजैसेअकेले हैं तारेसारे के सारेटिमटिमाते हें अकेलेऔर टूट जाते हैं ...अकेले हैं वेशि‍खरों को छूती सभ्यताअकेली है जैसेअकेला है वहभरे हुए घर मेंमोमबत्ती की लौ की ओरबढता बच्चाअकेला है जैसे ... इस कविता पर फेसबुक पर आयी टिप्‍पणियां - पसंद· टिप्पणी· साझाकरें...
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कुमार मुकुल
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  May 23, 2015, 6:18 pm
Anupama Garg8 घंटे · Kumar MukulMukul ji wonderful!!!Kumar Mukulमहास्त्री.................कितनी लंबी हैमहापुरूषों की कतारपर हायइतने महापुरूष मिलकर...अधिक देखेंनापसंद ·  · साझा करेंआपको और Abhishek Kumar को यह पसंद है.Bharat Sharma The narrative of women as a victim is a very western narrative. Look at books like Second Sex of Simone de Beauva. It is promoted - both by the communists who want to see everything from lens of class / conflict instead...
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कुमार मुकुल
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  February 16, 2015, 12:09 am
1945 की आजादी के बाद देश बदल गया. ना वो हुक्मराने रहे, न वो आजादी. 90 के बाद देश उदार हुआ. ऐसा उदार कि इसने हमें गुलाम बना दिया. ऐसा गुलाम जो मालिक का नहीं रंगबिरगे बाजार का है. तेजी से राजनीति बदली और केंद्र सत्ता में 10 साल( 2004-2014) के लिए कांग्रेस आ गई. इसके बाद तो विकास गई और भ्रष्टा...
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कुमार मुकुल
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  February 12, 2015, 11:31 pm
‘ मौत अब नये-नये बच्चे जन रही है।जगह-जगह दाँतदार भूल,हथियार-बन्द ग़लती है,जिन्हें देख,दुनिया हाथ मलती हुई चलती है। ’ मुक्तिबोध  की 1966 में  लिखी गयी कविता ‘ शून्य ’  की उपरोक्त्  अंतिम पंक्तियां आज के&nb...
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कुमार मुकुल
Tag :shamsher
  January 29, 2015, 3:25 pm
अनास्था से जूझते 'सूर्य तेजोवान' : महेंद्रभटनागरकेगीत -  कुमाररवीन्द्र  आज की गीतिकविता में ‘गीत’और ‘नवगीत’एक साथ उपस्थित दिखाई देते हैं| नवगीत ने जो नये अचरजभरे आयाम विरचे, उनसे पारम्परिक गीत भी सम्मोहित होने से बच नहीं सका| कवि-सम्मेलनों से कविता के नदारद हो ज...
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कुमार मुकुल
Tag :
  November 25, 2014, 8:29 am
कारवॉं karvaan: घर-संजय कुमार शांडिल्य...
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कुमार मुकुल
Tag :
  November 19, 2014, 6:50 pm
घर के भीतर भी एक घर होता हैदीवारों के भीतर भी होती है दीवारतुम्हें ढहते देख पाया मैंबहते भी अटलांटिक के पारतीन बिल्लियो...
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कुमार मुकुल
Tag :
  November 19, 2014, 6:49 pm
जितनी ऊंची होती हैं इमारतेंउतनी ही भीतर तक होती हैंअँधेरे में ।खूब गहरे खड्डे में धरी जा रही हैं बुनियाद उतर रहा है लोहì...
कारवॉं karvaan...
कुमार मुकुल
Tag :
  November 13, 2014, 10:29 am
                                             रामलीला (नरेन्द्र किशन की कहानियाँ लघु पत्रिकाओं में छपती रही हैं । इस  कहानी को कभी संवेद में पढ़ा था। पिछले दिनों इस कहानी की याद आयी तो आपको पढ़वाने के लिए माँग लिया)                          ...
कारवॉं karvaan...
कुमार मुकुल
Tag :
  November 5, 2014, 11:06 pm
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  हमारीवाणी पर ब्लॉग-पोस्ट के प्रकाशन के लिए 'क्लिक कोड' ब्लॉग पर लगाना आवश्यक है। इसके लिए पहले लोगिन करें, लोगिन के उपरांत खुलने वाले प...
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