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॥ दर्शन-प्राशन ॥

हर ह्रदय विदारित तार-तार संवेदन सरिता स्फुटित थार बह चली कूल दोनों नकार दामिनि दामन सुन चीत्कार। सभ्यता हो चली शर्मसार आवरण गया देह को डकारउबला अबला जबरन विकार तामस में कुचली ज्योति नार।  'हा-हा-हा-हा' कानों के द्वार कोमल कातर स्वर की कतार आती टकराती बार-बार आखेटक मन कर...
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Pratul
Tag :भावाञ्ज्ली
  March 5, 2013, 6:51 am
"एक बार काव्य-साधना के समय सहसा मेरा चिंतन साहित्यिक रसों के पथ पर निकल पड़ा। समस्त रसों को 'काम' की तीव्रता के आधार पर विभाजित करके समझने लगा। पहले पहल अतिकाम, मध्यकाम, और शून्यकाम करके सभी रसों को इन श्रेणियों में रखा। फिर श्रेणियों के नाम बदलकर उसे फिर से विभाजित ...
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Pratul
Tag :चिंतन की रस यात्रा
  March 2, 2013, 12:38 pm
प्रथम बार था मौन संयमित कोकिल का कल गानसंभवतः कर रहा पिकानद आने का अपमान। अंधकार छिपकर भी विचलित खोता था पहचानउषा-सुंदरी आयी करता अंगहीन प्रस्थान।  शयन-कक्ष में रमणी व्याकुल करने को वपु-दान पर प्रियतम से कर बैठी थी वह पहले ही मान।  कोप-भवन से निकल कोकिले! पंचम स्वर आला...
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Pratul
Tag :पंचम स्वर
  February 15, 2013, 11:02 pm
निशा आधी नग्न होकर मेरी शैया के किनारे आई सुधा-मग्न होकर लिए नयनों में नज़ारे। आँख के तारे नचाकर अनुराग से पाणि बढ़ाकर कर लिया मेरा आलिंगन बिन हया ही मुस्कुराकर। मैं विमर्ष से निशीथ में निस्पंद, नीरव नेह को किस तरह कर दूँ निराहत?विदग्ध तृषित देह को।  श्वास में मिलती मलय-...
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Tag :निमिष
  January 28, 2013, 9:33 pm
सच कहता हूँ, सच कहता हूँ अकसर तो मैं चुप रहता हूँ तन मन पर पड़ती मारों को बिला वजह सहता रहता हूँ .... सच कहता हूँ। वर्षों से जो जमा हुआ था जो प्रवाह हृत थमा हुआ था आज नियंत्रित करके उसको धार साथ में खुद बहता हूँ ... सच कहता हूँ। इस दृष्टि में दोष नहीं था भावुकता में होश नहीं था खु...
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Tag :धूर्तराज
  January 13, 2013, 3:33 pm
राजेन्द्र स्वर्णकार जी द्वारा स्वरबद्ध लयबद्ध काक कंठ जब तक कोकिल कंठ नहीं सुन लेता ... इतराया घूमता है। पारस से स्पर्श पाकर लौह कण भी स्वर्णिम निखार पा जाते हैं। गीति के निकष पर उतरकर ही कोई साधारण गीत और कविता अपने सौंदर्य की प्रतीति करा पाते हैं।ओ चन्द्रमा - सम प्रिय...
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Tag :दर्शन अभिलाषा
  January 11, 2013, 4:04 pm
 ओ चन्द्रमा - सम प्रियतमा कै से क रूँ - तुम को क्षमा है क्या मिला - जीवन जला तुम हो प र न्तु है अमा। ओ चन्द्रमा ... मे रा प रा जि त प्रेम है उस पर बिगड़ता क्षेम है तुम व्यर्थ शीतलता धनी तन राख से उड़ता धुँआ। ओ चन्द्रमा ... हूँ देखता तुमको निरंतर नयन चल पाते कहाँ है दैव को स्वीकार ...
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Tag :दर्शन अभिलाषा
  December 1, 2012, 11:50 pm
एक राह में बार-बार मिलने से मैं परच गया उससे। चाहा बात करूँ उससे परिचय से स्नेह हुआ जिससे। एक बार मैं असमंजस में थाकि क्या बात करूँ मिलने पर। सहसा वह बोल पड़ी मुझसे - 'भैया' 'कहाँ खोये रहते हो, शरम से कुछ न कहते हो।' चाल रोक कर उन शब्दों का जिनमें मिला हुआ था स्नेह सुधा-सा- श्र...
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Tag :काल्पनिक स्वगतालाप
  November 15, 2012, 6:02 pm
           जला रहा हूँ आपके* बहाने  कुछ स्मृति-दीप ... "चलो किसी बहाने सही आप आये तो मिलने 'मुझसे'-- ये भ्रम पाल रहा हूँ।" "फिर से अपना परिचय मुझको दे दो तो 'मैं जानूँ' -- मानो कि भूल गया हूँ।" "फिर वही बाल छवि कवि को तुम दिखला दो तो 'दे दूँ सब'-- ना समझो टाल रहा हूँ।" "है ही क्या सोचोग...
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Tag :दीपक
  November 12, 2012, 12:48 pm
उर्मि लालिमा की लाली से माँग भर रही है सिन्दूर।आशा ले उर मिला सकेगी सागर से, तम में भरपूर।पर सागर विधु से लड़ने को सजा रहा है ज्वाला-शूल।छिपा लिया खुद को उसने पर नभ की ओर उड़ाकर धूल।चला चाँद चुपचाप चरण धर नभ पर, हँसकर धीरे-धीरे।भेद दिया तम धूल सभी को चंद बाण से सागर-तीरे।उद...
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Tag :उर्मि
  November 7, 2012, 8:30 am
'दो''नो' का है प्रेम यही वे ग्यारह नहीं कभी हो पाये। 'नो''दो' ग्यारह हुआ हास जब उसने उनके मुख पलटाये।अर्थ हुआ असमर्थ गर्त में गिरा व्यर्थ ही हाय-हाय।मुहावरे का पहन मुखौटा हास हुआ हास्यास्पद काय।किया बहुत प्रयास किन्तु कुछ, तुमसे सीधा कह ना पाये। इसीलिए सब कुछ कहने का करता ...
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Tag :हास
  October 26, 2012, 6:37 pm
अय उद्यान की प्रिये ! बैठ आ मधु पियें !! प्रेम से दो पल जियें !कौमुदी, कर दीजिये।। आइये इत आइये !उर-पुष्प बैठ जाइये !!तनु पंख खोल दीजिये !तुम वक्ष के, मेरे लिए।। निहार लूँ, मैं दृष्टि से सौन्दर्य देह-यष्टि का।मैं सदा-सदा के लिये फिर बाँध लूँगा मुष्टिका।।काव्य-शिल्प में एक दोष...
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Tag :उद्यान की प्रिये
  October 18, 2012, 6:31 pm
ओ मीत पिता, दो मुझे बता क्या दोष प्रीत में है मेरे? क्यूँ नहीं पास आने देते सविता को, अब भी घन घेरे.मन मीत कल्पनाओं में आ लिख देती हृत पर प्रेम-लेख. फिर हृदय चुरा लेती मेरा वह प्रेम लेख न सकूँ देख. प्रतिकार आपसे लूँगा मैं करवा तुमको अपराध-बोध. मेरे औ' मेरे मीत बीच शंका करके क्य...
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Tag :बहना
  September 17, 2012, 5:45 pm
तू ही मेरा मधुमेह है तू ही मेरा अस्थमातू ही है पीलिया पियारी तू ही नज़ला प्रियतमा. तुममें जितनी भी मिठास थीमैंने पूरी पान करी हृदय खोलकर सुन्दरता भी तुमने मुझको दान करी. स्पर्श तुम्हारा मनोवेग को शनैः शनैः उकसा देता उस पर शीतल आलिंगन फिर स्नेह वर्षण करवा लेता.  तुम हो ...
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Tag :मधुमेह
  September 1, 2012, 1:48 pm
पहली बार जब आईं तुम मेरी जिह्वा अपरिचित थी.ना बैठाया मैंने तुमकोना जाना था तुम जीवन हो. पय पीकर भी तरसते थे पीने को स्नेह-नीर अधर.तुम अधरों तक आईं किन्तु मैंने अज्ञ बन विदा किया. तुम मेरे सह हँसी खेली मुझको निज मीत बनाकरलोय-लोर शैशव के तुमने सुखा दिये लोरी गाकर. वय-संधि म...
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Tag :लोरी
  August 27, 2012, 6:56 pm
द्वार पर शुक बैठा-बैठा राम का नाम लिया करता.दिया था जो तुमने उपहार वही है उसका कारागार बद्ध करना उसका विस्तार कहाँ तक किया उचित व्यवहार.द्वार पर शुक बैठा-बैठा काल की बाट जुहा करता. रूठता प्राणों से पवमान देह जाने को है श्मसान आपका बहुत किया सम्मान नेह का होता है अवसान.द्...
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Tag :आपका नाम
  August 14, 2012, 5:49 pm
ओ न्यायकारि परमेश्वर !तू न्याय एक सा तो करउर्वरा और ऊसर पर वर्षण करके न चुपकर!!उर्वरा पे है हरियाली ऊसर की गोदी खाली ये न्याय तुम्हारा कैसा!दोनों के तुम हो माली!!ये भेद दृष्टि अनुचित है ऊसर में भी संचित हैअंकुरित करन की इच्छा पर रोध हुआ किञ्चित है.कैसे भी उसे हटाओतुम जिस ...
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Pratul
Tag :दुविधा
  August 4, 2012, 5:37 pm
सोम-शनि है प्राची प्रतिकूलदिवस रवि का उसके अनुकूल.प्रतीची में मंगल-बुध जावशुक्र-रवि में होवें दिकशूल.उदीची में बुध-मंगल भारशुक्र शुभ होता शुभ गुरुवार.अवाची को जाना शनि-सोमगुरु को चलना शकुन-विलोम.______________उदीची - उत्तर दिशाअवाची - दक्षिण दिशाप्राची - पूर्व दिशा प्रतीची - प...
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Tag :उदीची
  July 28, 2012, 3:45 pm
तुम धरा धीर धारो बेशक बदले में ना कुछ चाह करो. ये धरा सहिष्णु स्वभावी केवल स्व-गुण प्रवाह करो. तुम रहो पपीहे-सी प्यासी बदले में ना कुछ आह करो. ये बहुत अधिक स्वाभिमानी  वारिवाह की ना वाह करो. तुम करो स्वयं को रजनीगंध बदले में ना अवगाह करो. ये गंध देखती नहीं अमा, राका की अ...
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Tag :आलोकिता
  July 27, 2012, 3:14 pm
आँखें तलाशती हैं मेरी कविता के लिये नई चेरी आ बन जावो प्रेरणा शीघ्रमत करो आज़ बिलकुल देरी.है कौन प्रेरणा बने आज़मैं देख रहा हूँ सभी साज बैठे हैं अपने गात लिये पाने को मेरा प्रेम-राज.आकर्षित करने को सत्वर कुछ नयन कर रहे आज़ समरशर छूट रहे हैं दुर्निवार कुछ डरा रहे हैं लट-व...
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Tag :प्रेरणा
  July 18, 2012, 1:30 pm
पिता-पुत्री का प्रेम कैसा हो?.... इस कविता में एक रूपक के माध्यम से बताना चाहा है. जाने क्या फिर सोच घटा के पास चला मारुत आया.केशों में अंगुलियाँ डाल फिर धीरे-धीरे सहलाया.सुप्त घटा थी जगने वाली दूज पहर होने आया.कोस रहा मारुत अपने को क्यूँ कल वो अंधड़ लाया.थकी पड़ी थी आज़ घटा...
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Tag :पुत्री-प्रेम
  June 29, 2012, 5:36 pm
उड़ रहे हृदय में दो विमान* सपनों का ईंधन* ले-लेकर.वे जाल फैंकते हैं विशाल बंदी करने पिय-उर बेघर.पिय का उर पर हर बार बचा छोटा था जाल छविजाल तुल.शर छोड़ रहे दोनों विमान पुष्पित करने हृदयस्थ-मुकुल.पर नयन-बाण सम्मुख सब शर अपनी लघुता को दिखा रहे.निश्चल नयनों के चपल बाण रण-कौशल अब त...
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Pratul
Tag :छविजाल
  June 8, 2012, 6:19 pm
पलकों तले मेरे बसा एक स्वप्न था.जिसमें थी सोती एक सुन्दर वल्लभा.लावण्य की सारी निधि उस पर ही थी.वह स्वयं थी लेटे हुए निधि द्वार पर.पुष्प-शैया पुष्प-कण से थी विभूषित.पुष्प-वृष्टि हो रही पलकों तले नित.स्वप्न-जग में घूमती वह देखकर यह.हाथ में है हाथ पिय का साथ में वह.जा रही पिय...
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Pratul
Tag :स्वप्न
  May 31, 2012, 11:26 am
बस में बिलकुल भी नहीं धार बह रही हृदय से जो अपार राशि-रत्नों की हुई क्षेम* जो आया था वो गया प्रेम.रस में निमग्न आनंद-धामको जाऊँगा होकर अवाम. हो राग-द्वेष से दूर, काम में लाकर पूरा मैं विराम.ममता माया मोह मध्य धार में डूबेगी होकर विकार लाएगा सिन्धु जब भी ज्वारला देगा उनको फि...
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Pratul
Tag :मेरा विराग
  May 21, 2012, 4:19 pm
हे अंध निशा, गूंगी-बहरी !मत देखों निज पीड़ा गहरी.तेरी दृष्टि पड़ते ही खिल उठती है हिय में रत-लहरी. न बोलो तुम, मृदु हास करो चन्दा किरणों सह रास करो तुम सन्नाटे के साँय-साँय शब्दों पर मत विश्वास करो. हे मंद-मंद चलने वाली,तम-पद-चिह्नों की अनुगामी ! पौं फटने से पहले जल्दी प्रिय-...
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Pratul
Tag :गूंगी-बहरी
  May 17, 2012, 6:08 pm
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