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Blog: स्वयं शून्य

Blogger: राजीव उपाध्याय
नदियाँ, झीलें, तालाब और भूगर्भ का जल हर बीतते दिन के साथ सूखता जा रहा परन्तु इस धरती को जल की आवश्यकता बढती ही जा रही। दिल्ली में यमुना नाला बन चुकी है तो कानपुर में गंगा। कावेरी भी रो रही है और नर्मदा का हाल भी कुछ बहुत अच्छा नहीं है। झीलें हम इन्सानों की जमीन हवस पूरा करन... Read more
clicks 72 View   Vote 0 Like   6:44pm 23 May 2016
Blogger: राजीव उपाध्याय
जिन अंधेरों से बचकर भागता हूँहमदम हैं वो मेरे।जिनके साथ हर पल मैं जीता हूँऔर मरता भी हूँ हर पलकि आखिरी तमन्ना हो जाए पूरी।मगर वो तमन्ना आज तक ना पाया हूँकि बेवश फिरता रहता हूँपूछता रहता हूँमैं मेरे अंधेरों से"कि कुछ तो होगीतुम्हारे होने की वजह?"अक्सर वो चुप ही रहते हैं... Read more
clicks 75 View   Vote 0 Like   7:01am 19 May 2016
Blogger: राजीव उपाध्याय
हर तस्वीर साफ ही हो ये जरूरी नहींजमी मिट्टी भी मोहब्बत की गवाही देती है।-----------------------------------मैं भी कभी हो बेसुध, नीड़ में तेरी सोता थाबात मगर तब की है, जब माँ तुझे मैं कहता था।-----------------------------------मोहब्बत में फकीरी है बड़े काम कीदिल को दिल समझ जाए तय मुकाम की॥-----------------------------------क़त्ल-ओ-गारद का स... Read more
clicks 90 View   Vote 0 Like   6:00pm 16 May 2016
Blogger: राजीव उपाध्याय
जिन स्वर लहरियों पर गुनगुना तुमने कभी सीखाया थावो आज भी अधुरे हैंकि नाद अब कोई नहीं। हर ध्वनि जो अब गूँजतीतुम तक क्या पहुँचती नहीं?या अनसुनी कर देने की कला भी तुम जानती हो? काश तुम कुछ ऐसा करतीकि संदेश हर तुम तक पहुँचताया फिर तुम ही कोई पाती पठातीकि कहानियों में तेरे कु... Read more
clicks 66 View   Vote 0 Like   3:58pm 8 May 2016
Blogger: राजीव उपाध्याय
जिन स्वर लहरियों पर गुनगुना तुमने कभी सीखाया थावो आज भी अधुरे हैंकि नाद अब कोई नहीं। हर ध्वनि जो अब गूँजतीतुम तक क्या पहुँचती नहीं?या अनसुनी कर देने की कला भी तुम जानती हो? काश तुम कुछ ऐसा करतीकि संदेश हर तुम तक पहुँचताया फिर तुम ही कोई पाती पठातीकि कहानियों में तेरे कु... Read more
clicks 97 View   Vote 0 Like   3:58pm 8 May 2016
Blogger: राजीव उपाध्याय
हम सभी भारत नामक अजायबघर में रहते हैं। इस अजायबघर में इस अजायबघर के लिए जान देने वालों की कीमत कुछ भी नहीं। चाहे वो मरने वाले सी आर पी एफ के जवान हों या सरहदों पर जान देने वाले वीर सैनिक (हो सकता है वो कायर भी हों। जांच की आवश्यकता है। संसद की कोई समिति बनानी चाहिए।)। इस अज... Read more
clicks 92 View   Vote 0 Like   6:29pm 9 Apr 2016
Blogger: राजीव उपाध्याय
आज फिर मैं, दिल अपना लगाना चाहता हूँ खुश है दुनिया, खुद को जगाना चाहता हूँ॥ तन्हाइयों की रात, गुजारी हमने अकेले सारी बहारों की फिर कोई, दुनिया बसाना चाहता हूँ॥ देर से लेकिन सही, आया हूँ लौटकर मगर मैं दर बदर अब नहीं, घर मैं बसाना चाहता हूँ॥ देखो मुड़कर इक बार फिर, अब पराया मैं ... Read more
clicks 108 View   Vote 0 Like   6:13pm 2 Apr 2016
Blogger: राजीव उपाध्याय
मुश्किल नहीं बातों कोभुलाकर बढ जाना आगे;पर धूल जो लगी है पीठ परसालती है जब ना तबऔर सालती रहेगी जब तककुछ ना कुछ होता रहेगाकि होने से फिर होने काइक सिलसिला हो जाएगाजो फिर कहानी में कईमोड़ तक ले जाएगाऔर जाने का सिलाजानिब तक पहुँच ना पाएगा।---------------------------- राजीव उपाध्याय... Read more
clicks 109 View   Vote 0 Like   9:52am 17 Mar 2016
Blogger: राजीव उपाध्याय
कर जो-जो तू चाहता हैकि मुक्कमल जहाँ में तू रहता है।हसरतें तेरी आसमानी हैंकि सब कुछ तू, तू ही चाहता है।जमीं आसमां एक करता हैआसमां मगर जमीं पर ही रहता है।कोई सवाल नहीं है तुझसेमगर सवाल तो बनता है।अब तू जवाब दे ना देआईना मगर सब कहता है। ----------------------------राजीव उपाध्याय... Read more
clicks 108 View   Vote 0 Like   5:04pm 6 Mar 2016
Blogger: राजीव उपाध्याय
वो कत्ल करने से पहले मेरा नाम पूछते हैं नाम में छुपी हुई कोई पहचान पूछते हैं। शायद यूँ करके ही ये दुनिया कायम है जलाकर घर मेरा वो मेरे अरमान पूछते हैं। तबीयत उनकी यूँ करके ही उछलती है जब आँसू मेरे होने का मुकाम पूछते हैं। ऐसा नहीं कि दुनिया में और कोई रंग नहीं पर कूँचें म... Read more
clicks 159 View   Vote 0 Like   6:37am 1 Mar 2016
Blogger: राजीव उपाध्याय
छोटा बेटा था मैं हाँ सबसे छोटा जिसके बालों की चाँदी को अनदेखा करके किसी ने बच्चा बनाए रखा था जिससे लाड़ था प्यार था दुलार था कि आदत जिसकी हो गई खराब थी कि अचानक अनचाही एक सुबह यूँ करके उठी कि मायने हर बात के बदल गए कि वो बच्चा आदमी सा बन गया कि बिस्तर भी उसका सोने का बदल गया क... Read more
clicks 125 View   Vote 0 Like   8:39am 31 Jan 2016
Blogger: राजीव उपाध्याय
ढूँढ रहा हूँ जाने कब से धुँध में प्रकाश में कि सिरा कोई थाम लूँ जो लेकर मुझे उस ओर चले जाकर जिधर संशय सारे मिट जाते हैं और उत्तर हर सवाल का सांसों में बस जाते हैं। पर जगह कहां वो ये सवाल ही अभी उठा नहीं की आदमी अब तक अभी खुद से ही मिला नहीं।--------------------- राजीव उपाध्याय... Read more
clicks 172 View   Vote 0 Like   8:35am 28 Jan 2016
Blogger: राजीव उपाध्याय
ये जिन्दगी बड़ी अजीब है कि हर आदमी जो मेरे करीब है कि संग जिसके कुछ पल कुछ साल गुजारे थे मैंने; जिनमें से कइयों ने तो अँगुली पकड़कर चलना भी सिखाया था, दूर बहुत दूर चले जा रहे हैं जहाँ से वो ना वापस आ सकते हैं और ना ही मैं मिल सकता हूँ उनसे और इस तरह हर पल थोड़ा कम और अकेला होता जा ... Read more
clicks 96 View   Vote 0 Like   8:33am 25 Jan 2016
Blogger: राजीव उपाध्याय
मेरे कहे का यूँ कर ना यकीन करमतलब मेरे कहने का कुछ और था।---------------------मेरे जानिब भी तो कभी रूख हवा का करोकि उदासियाँ भी सर्द मौसम सी होती हैं।---------------------है ही नहीं कुछ ऐसा कि मैं कहूँ कुछ तुमसेबात मगर जुबाँ तक आती है कोई ना कोई।--------------------- राजीव उपाध्याय... Read more
clicks 130 View   Vote 0 Like   6:02am 2 Jan 2016
Blogger: राजीव उपाध्याय
याद है तुम्हें? हर रोज हम उस सड़क पर घूमने जाया करते थे? वही सड़क जो बहुत दूर तक जाती थी। हमने सुना था, बहुत दूर वह किसी दूसरे देश तक जाती थी। वह सड़क बागों के बीच से होकर गुज़रती थी। शायद इस दुनिया में कोई और सड़क बागों के बीच से होकर नहीं गुज़रती --- जो इतनी लंबी हो और बहुत दूर किसी ... Read more
clicks 131 View   Vote 0 Like   5:59am 31 Dec 2015
Blogger: राजीव उपाध्याय
ये कौन आया है, दरवाजे पर खड़ा? देता नहीं जवाब, है मौन मुस्करा रहा नाम पूछा, पता पूछा आने की वजह पूछा कुछ ना बोला मुस्कराता रहा चुपचाप मगर कुछ बताता रहा। ये कौन आया है, दरवाजे पर खड़ा? जानना जब हो गया जरूरी हाथ लगा कर छूकर देखा पर हाथ ना आया कुछ भी; भ्रम होने लगे कई निराकार हो वो ग... Read more
clicks 124 View   Vote 0 Like   6:27pm 21 Dec 2015
Blogger: राजीव उपाध्याय
तुमने मुझसे वो हर छोटी-छोटी बात वो हर चाहत कही जो तुम चाहती थी कि तुम करो कि तुम जी सको पर शायद तुमको कहीं ना कहीं पता था कि तुमने अपनी चाहत की खुश्बू मुझमें डाल दी वैसे ही जैसे जीवन डाला था कभी कि मैं करूँ; और इस तरह शायद वायदा कर रहा था मैं तुमसे उस हर बात की जिससे जूझना था म... Read more
clicks 119 View   Vote 0 Like   6:25pm 19 Dec 2015
Blogger: राजीव उपाध्याय
कि उम्र सारी बदल कर चेहरे खुद को सताता है जब जूस्तजू जीने की सीने में जलाता है; उम्र के उस पड़ाव पर आ कर ठहर जाना ही सफ़र कहलाता है आदमीजब आदमी नज़र आता है।------------------------------------ राजीव उपाध्याय... Read more
clicks 137 View   Vote 0 Like   6:23pm 17 Dec 2015
Blogger: राजीव उपाध्याय
दोस्ती दुश्मनी का क्या? कारोबार है ये। कभी सुबह कभी शाम तलबगार है ये॥ कि रिसालों से टपकती है ये कि कहानियों में बहती है ये। कभी सितमगर है ये और मददगार भी है ये॥ इनके होने से आपको जीने की वजह मिलती और इस तरह चेहरे के आपके सरमाएदार हैं ये॥----------------------------- राजीव उपाध्याय... Read more
clicks 112 View   Vote 0 Like   6:21pm 15 Dec 2015
Blogger: राजीव उपाध्याय
मिरी आँखों से कुछ आँसू ऐसे भी रिसते हैं जो किसी को दिखते नहीं और शायद अब उनका कोई मतलब भी नहीं। पर इतना यकीन मुझको मेरे आँसुओं के बह जाने में है कि साँसे भी मेरी कई बार फीकी पड़ जाती हैं और मेरे होने की वजह भी उन आँसुओं तक चली आती है।------------------- राजीव उपाध्याय... Read more
clicks 132 View   Vote 0 Like   6:00pm 13 Dec 2015
Blogger: राजीव उपाध्याय
रहता हूँ शहर में जिसअजनबी है।कभी कहींतो कभी कहीं है॥हालात है येकि ना कोई जानने वालाऔर ना हीसड़कें पहचानती हैं।रहता हूँ शहर में जिसअजनबी है।हर तरफ शोर ही शोर हैऔर चकाचौंध भीपर मनहूस सी खामोशी कोईभारी है सीने में;जो जीने का सबब भी देती हैऔर मरने की वजह भी;और यूँ कर के बेख... Read more
clicks 103 View   Vote 0 Like   7:41pm 2 Dec 2015
Blogger: राजीव उपाध्याय
बाज़ार तो बाज़ार है जो खुद में ही गुलज़ार है उसे क्यों कर फर्क पड़ता गर कोई लाचार है। बाज़ार तो बाज़ार है॥ कीमत ही यहाँ हर बात में है मायने रखती बिकता यहाँ है सब कुछ हर कोई किरदार है। बाज़ार तो बाज़ार है॥ तुम बात कोई और आ कर यहाँ ना किया करो कीमत बिगड़ती जाती है और हर कोई तलबगार है। ब... Read more
clicks 118 View   Vote 0 Like   9:05pm 26 Nov 2015
Blogger: राजीव उपाध्याय
क्या शहर क्या गांव सब बदलने लगे एक घर में कई चूल्हे जलने लगे॥कहाँ दफ़न हो गयीं ममतामयी माएँगृहणियों के बच्चे आया से पलने लगे॥कितना परायापन लगा उसकी आँखों मेंजब बेटे के घर से माँ- बाप चलने लगे॥मुफ़लिसी क्या होती है उनसे जाकर पूछियेजो रोटी की एक टुकड़े पर मचलने लगे॥लगती है... Read more
clicks 123 View   Vote 0 Like   3:09pm 23 Oct 2015
Blogger: राजीव उपाध्याय
रोज़ घर से निकलते हैं, यह सोचकर ---एक हमराही आज ढूँढ़ लाएंगेहम गलियों-नुक्कड़ पर मंडराते हैंहर गली हर मुहल्ले चक्कर लगाते हैंमन की आँखों से हर चेहरें निहारते हैंइस उम्मीद से कि हमराही ढूँढ़ लेंगेहम तैयार हैं --- हर काँटे को फूल समझने के लिएबस एक हसरत है ---मेरे मन को वह आबाद करेफ... Read more
clicks 103 View   Vote 0 Like   3:50pm 22 Oct 2015
Blogger: राजीव उपाध्याय
ये दिल है कि टूटा हुआ मक़ान? बुर्ज़ें सारी, ढ़ह गई हैं पर, खिड़कियाँ बंद हैं। घर में कोई दरवाजा नहीं, शायद कोई आता जाता नहीं। अज़ीब विरानगी है; इस घर में, आदमी तो रहता पर आदमी नहीं। ये दिल है कि टूटा हुआ मक़ान? ---------------------राजीव उपाध्याय ... Read more
clicks 139 View   Vote 0 Like   3:56pm 20 Oct 2015
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