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प्रोत्साहन-मनन-------------------मनन यह क्या मनन हो, निर्मल-चित्त तो वृहत-आत्मसात कहते हम सब उसीके ही भिन्न अवयव, पूर्णता से जुड़ पूर्ण ही बनेंगे। लेखन भी है अद्भुत विधा, कुछ न भी दिखे तथापि पथ ढूँढ़ लेती  कलमवाहक को मात्र माध्यम बना लेती, उकेरेगा जो यह चाहती। माना लेखक की सो...
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Tag :काव्य
  February 5, 2017, 11:31 pm
दर्शन-यथार्थता--------------------कैसा जहाँ हम बनाना चाहते, सोच का ही है खेल जो भी यहाँ अच्छा-बुरा जैसा है, सब है मानव-कृत। क्या सोचते हम परिवेश हेतु, जो हमारा आवास है कितनों को व क्या सबको, उसमें सम्मिलित करते ? अपने जैसों से सम्पर्क साधते, अन्यों को रखते बाहर...
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Tag :काव्य
  December 25, 2016, 6:40 pm
विश्व-बवाल ---------------क्यों मानव कष्टमय स्व-कृत व्यवधानों में, अविश्वास में विश्व उबल रहा जहाँ देखे वहाँ हिंसा-साम्राज्य, परस्पर मार रहें पता नहीं क्या पा लेंगे ?जब से पैदा हुए युद्ध विषय में सुन-पढ़ रहें, क्या हैं मूल-कारण इसके किंचित यह लोभ-तंत्र है आत्म-समृद्धि को...
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Tag :लोक
  December 17, 2016, 9:57 pm
ज्ञान-सोपान ---------------निरुद्देश्य तिसपर उत्कण्ठा तीक्ष्ण, अध्येय पर प्रखर आंतरिक-ताप जीवन स्पंदन की चेष्टा में रत, मन-संचेतना कराती स्व से वार्तालाप। बहु-विद्याऐं मैं हत्प्रद, अबूझ-अपढ़, खड़ा विशाल पुस्तकालय सम्मुखआभ्यंतर का न साहस होता, डर कहीं प्रवेश न कर दिया ज...
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Tag :काव्य
  November 21, 2016, 10:42 pm
Journey: वीरता:   वीरता  सचमुच ही   वे   कर्म योद्धा हैं, लेखनी जो  उद्देश्यार्थ  चलाते   सतत चलते दुराहों पर अकेले, विवेचन-मंथन करते हुए।   ......
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Tag :
  October 30, 2016, 6:34 pm
 सहज शब्द-प्रवाह---------------------बहु-भाँति लेख-संस्मरण, कथा-साहित्य, जन लिखते भिन्न रस-संयोग से सबका निज ढंग मनन-अभिव्यक्ति का, समग्र तो न सब कह ही सकते। लेखन-विधा अति-निराली, यूँ ही न मिलती, कुछ तो चाहिए सहज रूचि ही विशेष समय आवश्यक बतियाने को, वरन सुफियाने की ...
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Tag :काव्य
  October 12, 2016, 1:45 pm
 उत्प्रेरण-विधा ------------------वर्तमान अनूठे असमंजसता-पाश में, अबूझ हूँ जानकर भीकैसे खेऊँ नैया, पार दूर, अकेला, कभी हिम्मत खण्डित सी।  सकारात्मक मन-मस्तिष्क धारक, तथापि अनिश्चितता घेरे विवेक प्रगाढ़ न हो रहा, नकारात्मकता आकर है झिझकोरे।वातावरण जो होना चाहिए भय-म...
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Tag :आत्म-अभिव्यक्ति
  October 2, 2016, 7:03 pm
आत्मानुभूति - संज्ञान -------------------------मन बिसरत, काल बहत जात, बन्दे के कुछ नहीं हाथ हत्प्रद यूँ वह देखता रहता, कैसे क्या हो रहा नहीं ज्ञात। हर क्षण घटनाऐं घटित, कुछ के तो हम प्रत्यक्ष साक्षात्कार पर इतनी सहजता से हो रहा, मानो हमारा न हो सरोकार। हम निज एक अल्प-स्...
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Tag :काव्य
  September 18, 2016, 9:22 pm
लक्ष्य-कटिबद्धता---------------------क्यों अटके हो यत्र - तत्र, दृष्टि-प्रगाढ़ करो किंचित उत्तम लक्ष्य में यदि क्षुद्र में ही व्यस्त रहते, कहाँ से महा ग्रन्थ - काव्य जाते रचे। माना अल्प जुड़कर बृहद बनता, लक्ष्य हेतु कटिबद्धता चाहिए पर रामायण, महाभारत, बृहत्कथा संभव, क्...
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Tag :काव्य
  August 14, 2016, 1:10 am
विहंग-दर्शन -----------------निरत निनाद विहंग-वृन्द ध्वनित प्रातः, प्रेरित करें बनो शाश्वत अन्य भी चहकते लघु चेष्टाओं में, प्रमुदित हों करें दिवस आरंभ। ये हैं साम-गीतिका के ऋषि, प्रातः नीड़ों से निकल गुंजन करते आशय तो वे निज मन में समझे, हमें तो प्रायः अनुशासि...
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Tag :काव्य
  July 30, 2016, 11:48 pm
सुपथ-मनन -----------------कौन सा ज्ञान कहाँ से उदित, जब सामान्यतया तो हम होते निस्पंद विशेष परिस्थिति में विद्वान बनता मनुज, भावमय होते सब शब्द। कहाँ से देख व्याख्यान-शक्ति मिलती, कौन जोड़ता तंतु-अवयव कैसे विभिन्न पहलू होते समन्वयित, संचित हो जाता कुछ ...
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Tag :काव्य
  July 17, 2016, 4:08 pm
मेघ-सन्देश  ----------------श्रीकालिदासप्रणीतउत्तर-संदेश-------------जहाँ प्रासाद करते मेघोंकोस्पर्श, तेरी महत्तासम ऊँचे होते, जिसकेमणिमयतलों कीचमक, तेरे जल-बिन्दुओंसे करती स्पर्धा। जहाँसुन्दरभित्तिचित्र, तेरेइन्द्रधनुषी वर्ण कोमातदेते, ललित...
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Tag :काव्य
  June 27, 2016, 9:14 pm
मेघ-सन्देश  ----------------श्रीकालिदासप्रणीत(पूर्व-संदेश)------------निजकर्तव्योंसेचिंता-मुक्त एवंअपने स्वामीसे शापित, महिमा-गमित,कोईएकयक्ष दुःसहविरह से निजकान्ता सेएकवर्षहेतुहैनिर्वासित।बसतारामगिरिपरस्निग्ध छायादारवृक्षोंकेआश्रमोंमेंऔरजनक-सुताके ...
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Tag :काव्य
  June 27, 2016, 2:29 pm
कर्मभूमि - उच्छ्वास -------------------------मन मकरंद, तन स्वस्थ, उज्ज्वल - तनु, चलें भ्रमण लम्बी सैर न यदि सम्भव, यत्न हो भरने को कुछ पग। न चाहिए मुझे उपालम्भ, पूर्व ही बहुत हानि हो चुकी जीवन सीमित कोष से, अपव्ययता की अति हो चुकी। संसाधनों के उचित प्रयोग से, स्व ...
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Tag :काव्य
  June 26, 2016, 4:37 pm
नाम-चिंतन ---------------एक उन्मुक्त अभिलाषा मानव-मन की, सर्वश्रेष्ठ से सीधा जुड़ाव  तभी तो नर नाम ईश्वर पर रखते, माना उनके हैं प्रत्यक्ष अवतार। भारत में कितने ही नाम-गोत्रों का सम्बन्ध तो देवों से जुड़ा है लगतालोगों ने विशेषतया उच्च-वर्गों ने सु-नामों पर एकाधिकार ...
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Tag :काव्य
  June 20, 2016, 11:55 pm
संचार-रूप  ---------------बहुत जनों ने संस्थान हैं बनाए जग को करने निज सर्वस्व दान सदा संग्रह करते प्रत्येक अनुपम को, उपलब्धि हेतु एक स्थान। मैंने मान लिया तथाकथित क्षुद्र मानव मात्र स्वार्थी न है वरन क्यागूगल पर एक क्लिक से ही लाखों परिणाम क्षण में थे सक...
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Tag :सामाजिक
  June 12, 2016, 7:06 pm
देश-समाज ----------------गाँव, देश, समाज, जगत के कूचे, पृथक-2 ढंग से विकसित सबने निश्चित स्वरूप लिए, एक विशेष रवैया उनसे निकसित। सब छोटे-2 टोलों के स्वामी, अपनी तरह से धमकाते, गुर्राते हैं सबको निज-वश करना चाहते, विरोध-स्वर न सहन करते हैं। हमारा परिवेश सबसे अच्छा है, सब इ...
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Tag :काव्य
  May 29, 2016, 11:40 pm
सहिष्णुता -------------क्या पैमाना है निज-निष्ठा का, राष्ट्रभक्ति और देश-प्रेम का  कुछ संवाद पुनरावृत्त किए, लो हो गया अनुष्ठान सर्व-क्षेम का। क्यों एक मात्र सोच रखने की ही इच्छा, विरोध तो नहीं स्वीकार जो हमने कहा वही सत्य, अन्यों को न मनन-कथन अधिकार। वातावरण ब...
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Tag :काव्य
  May 15, 2016, 11:26 pm
नवयुग तारक------------------एक महापुरुष अवतरण भारत -धरा पर, बाबाओं के देश छाप छोड़ी स्व-व्यक्तित्व की, मानवता कृतज्ञ-उऋण निर्लेष। भारतवासी तो सदा मननशील, चराचर विश्व के जीवन-मरण प्रश्न स्व-भाँति परिभाषा देते रहें, कुछ को सुहाना अन्यों को अनुचित। 'वसुधैव कुटुम्बकम'सिद्धा...
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Tag :दर्शन
  April 14, 2016, 10:34 am
मन-सितार -------------कुछ सुर फूँटें, गीत बने, नाद-संगीत चहुँ ओर विकसित मन-रेखाऐं शब्द बन जाऐं, अनुपम योग से विस्मरणीय। सुर तो सजने ही चाहिऐं, जीवन प्राण के स्पंदन हेतु एक-२ तार झंकृत, मन-सितार के प्रचुर उपयोग हेतु। जीवन के एक-२ मर्म का हो, यहाँ मनन-चिंतन निरंतर कु...
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Tag :गीत
  April 10, 2016, 9:01 pm
न मात्र वाग्वीर ----------------------मात्र वाग्वीर ही नहीं लक्ष्य, वचन परिवर्तन कर्म-सुफल में देव-स्तुति उस जैसा निरूपण, सामंजस्य मनसा-वचसा-कर्म में। कातरता त्याग -आरूढ़ हो शुभ कर्म, तन-मन-बुद्धि  निर्मल  मातृ मेदिनी सम विशालोर, सब कुछ धारण, सहन निर्द्वन्द्व। कितनी स...
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Tag :काव्य
  March 30, 2016, 10:18 pm
एक गीत ---------------तेरा गाना बनाऊँ, सुर में गाऊँ, गाने के संग साज बजाऊँ मन में सुरीली तान बनाकर तेरी रहमत का गीत सुनाऊँ। तू तो सबको ही देखे हैं, सबके मन में तो झाँके हैं तू मेरी पहचान तो दे, आकर मेरा आईना दिखा दे। तू कैसे हो पास में मेरे, इसी बात की चिंता&nbs...
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Tag :काव्य
  March 25, 2016, 6:48 pm
सोच - अग्रसर -------------------प्रातः चार बजे का समय है, आज जल्दी जाग गया हूँ। थोड़ी देर उनींदा रहने के पश्चात उठकर कुछ करने का निश्चय किया है क्योंकि मात्र लेटे रहने से कुछ विशेष प्रगति नहीं होने वाली है। जिंदगी नाम है ठोसता का, संजीदगी का, नियम का, वस्तुओं को अपने पूर्...
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Tag :आलेख
  March 12, 2016, 2:37 pm
मानव-भूगोल -----------------क्या है मानव का भूगोल, विभिन्न किस्में दिखती एक साथ  कैसे आवागमन भूमण्डल पर, आज विश्व बना सा एक गाँव ? भिन्न क्षेत्रों में देखें तो बहुत विभिन्नताऐं प्राणी-जन में मिलती अपनी तरह विकसित, शारीरिक बनावट विशेष प्रकार लेती। छोटी भिन्नताऐं एक...
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Tag :काव्य
  March 6, 2016, 10:05 am
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