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समर्पण

मैं पथिकएकांत पथ पर चला जा रहा थाहर तरफकोहरे का साम्राज्य,एक दिनपत्तों पर अपने ओसकण छोड़ करकोहरा हटाऔर मुझे दिखी उस पथ की सुन्दरताजिस पर मैंअनमना सा चलता रहा थादूर तक,और उसी पथ परमेरे स्वागत मेंमुस्कराते हुए खड़े थेमेरे मुक्तिदाता!...
समर्पण...
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  April 20, 2014, 2:13 pm
तुम सागर होमैं हूँ इक लहर,मेरी नियति हैतुम्हारी बाहों में समानाआ कर तुम मेंमिल जाना,मैंइक लहरसमर्पण करती हूँअपना अस्तित्व तुमको,तुम ही दोगेमेरे अस्तित्व कोपहचान,मैं तो यूँ हीमिटाती रहूंगीअपना अस्तित्वतुम्हारी बाहों मेंसदियों तक!...
समर्पण...
Tag :
  April 15, 2014, 5:11 pm
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