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kabhee - kabhee ~~~~ कभी - कभी

पाँच प्रश्न और कक्षोन्नतिहमारे पडोसी गाँव से पंडित राम भरोसे दीक्षित बचपन में हमें प्रारम्भिक शिक्षा देने के लिए आते थे. शाम को पाँच बजे वे आते और बाहर छप्पर के नीचे पड़े तख़्त पर बैठ कर एक हाँक लगाते : चलौ रे . और हम जहाँ भी होते अपना अपना बस्ता पाटी लेकर भागते हुए उनके पास ...
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  April 19, 2018, 5:18 pm
रुधिर जब  मुक्त होता है तो धमनी रोक  ना पाती सहज ही बह निकलते अश्रु, विरहणी रोक ना पाती भले  ही  फेंक  दो  इसको, तले  पत्थर  शिलाओं के अंकुरित  हो  गया 'जय'तो, ये धरणी रोक  ना पाती http://kadaachit.blogspot.in/ ...
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  April 19, 2018, 4:57 pm
वो  देखो  उसकी  मुट्ठी में, एक दाना भुना सा हैलंगोटी उसके तन पर  है, माथा कुछ तना सा हैभले ही काया श्यामल हो, हृदय में गंग - धारा हैन जाने क्यों फिर से 'जय', अनजाना बना सा हैhttp://kadaachit.blogspot.in/ ...
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  April 19, 2018, 4:45 pm
जिन्होंने मुझसे सीखा था ककहरा अपने जीवन का जिन्हे हमने दिखाया था, दर्पण उनके निज-मन का समय  बीता,  दृष्टि रूठी,  हृदय  की  धड़कने बदलीं वो देखो आज आये हैं,  लिए हाथों  में  सिर 'जय'का http://kadaachit.blogspot.in/ ...
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  April 19, 2018, 3:36 pm
एक नन्हा सा पंछी बैठा था एक टहनी पर चुपचाप प्रकृति की गोद में बुन रहा था सपनों का आकाशऊपर ऊँचाई पर उड़ती चीलों को देख स्वयं से बोलाएक दिन मुझे भी स्पर्श करना है यह अनन्त आकाशअन्य रंगीले पक्षियों के साथ मैं भी कलरव करूँगासागर के असीम जल में नहाउँगा, गोते लगाऊँगाविश्व क...
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  April 19, 2018, 12:03 pm
=== मलंग ===पुष्प से सुगंध कोमन से अंतरंग कोमधुप से पराग कोमुझसे मेरी आग कोकैसे  मैं उधार दूँ ?या इन्हे ही मार दूँ !ठिठक गए हैं कदमपूर्ण सजग किन्तु मनबदल रहे हैं  रंग ढंगशशक से बना कुरंग ||1||सिंधु हो, अनंग होशुभ्र हो, बहुरंग होविकटता की छाप होया बदरंग अलाप होचाहे...
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  April 18, 2018, 11:43 pm
हमारे   नयन   देखें   जब  तुम्हारी पलक में पानी मानता मैं स्वयं को तब, जगत का तुच्छतम प्राणीकहो तो  आग  में  कूदूँ, रहूँ  इसमें अहर्निश 'जय'हमें तो आग से बढ़कर, जला देता  है  यह  पानीअहर्निश = दिन रातhttp://kadaachit.blogspot.in/ ...
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  April 18, 2018, 7:22 pm
कटहल की घनी छाँव और मंजरी रसाल की मखमल सी  हरी  कोंपले पीपल विशाल की गुच्छों में लदी फलियाँ 'जय'दूर से पुकारतीं आयी है याद आज उस  इमली  की डाल की http://kadaachit.blogspot.in/ ...
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  April 16, 2018, 10:39 pm
मदिर, मधुर, मन्द महक महुआ के फूलों कीतप्त ज्येष्ठ में  प्रकट  उन  धूल के बगूलों कीबहुत याद आते 'जय', गाँव में जब  जाता हूँममता की छाँव तले उन बचपन के झूलों कीhttp://kadaachit.blogspot.in/ ...
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  April 14, 2018, 3:58 pm
कितने अनोखे रंग समेटे है, यह बिन मौसम की राजनीति भी ।दोषियों को दण्ड देना चाहते हैं सब, बचानी है अपनी जाति भी ।। 'जय'होhttp://kadaachit.blogspot.in/ ...
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  April 13, 2018, 7:34 pm
एक नदी में कुछ ऋषि पुत्रियां नग्न-अर्धनग्न अवस्था में स्नान कर रही थीं । कुछ पानी के अंदर थी और कुछ किनारे बैठी शरीर साफ कर रही थीं । तभी उन्हें पदचाप सुनाई दी । देखा तो वृद्ध पारासर ऋषि इधर ही आ रहे थे । उनके निकट आते ही बाहर बैठीं ऋषिकन्याएँ  जल के अंदर चली गईं और उनके आ...
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  April 13, 2018, 12:31 pm
तिमिर मेघ बन गया है, चन्द्र सा बना है दीपधैर्य मेघजल बना है, हृदय-कम्प बरखा-गीतमन प्रचण्ड वायु सा, आस सुप्त  अग्नि  सी,'जय'अभी समक्ष है, ना कि वो बना प्रतीकhttp://kadaachit.blogspot.in/ ...
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  April 11, 2018, 12:04 pm
बचपन का एक वाकया याद आ गया है आज ।शायद मैं कक्षा 5 में पढ़ रहा था । पिताजी की एक परचून की दुकान होती थी उन दिनों । अच्छी खासी बड़ी दुकान थी और वे दिन भर व्यस्त रहते थे ।एक दिन वे दोपहर में घर आये और स्नान - भोजन के बाद कपड़े पहने और दुकान जाने लगे । सहसा उन्हें लगा कि उनकी जेब से ...
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  April 9, 2018, 10:01 pm
जैसे कल की बात हो ...हर रात वो अम्मा के साथ लेटने की खुशी  वो भइया की पुरानी कमीज न पहन पाने की बेबसी  फटे पुराने कपड़े पहनकर वो स्कूल जाना  पिताजी के लिए खेतों में नाश्ता ले जाना  वहीं पर मिलते अद्भुत संस्कार.. जैसे कल की बात हो ...आजकल के बच्चे! जिन्हे अपना कमरा अपना बिस...
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  April 5, 2018, 12:30 am
अब कहाँ रह गयीं वे छतें ...अब कहाँ रह गयीं वे छतें जिनमे गर्मियों की शाम हर हाल पानी छिड़क हम पहले उसकी गर्मी हटाते और बिछाते लंबा तिरपाल उस तिरपाल पर बिछ जाते अनेकों गद्दे कुछ साफ़ सुथरे और कुछ गन्दे व भद्दे पर भरपूर नींद सभी को आती थी किसी को गर्मी कभी न सताती थी  अब कहाँ र...
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  April 3, 2018, 11:07 pm
निर्मल जल सा मन है आपका, तन है आपका रेत सुनहरानील गगन सी असीम इच्छाएं, साथ है आपका हरित धराचलो,पवन संग चलें गगन तक, रेत कणों पर जल बरसायेंपुनः पल्लवित कुसुमित हो 'जय', धरती के होकर रह जाएँhttp://kadaachit.blogspot.in/ ...
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  April 1, 2018, 9:53 am
शब्द शब्द में अंतर होता, शब्द के हाथ न पाँवएक शब्द औषधि बन जाये, दूजा  करता घावशब्द बोलिये सोचकर, हर शब्द खीँचता ध्यानएक शब्द से मन दुःख जाए, दूजा  करता मानशब्द जो मुँह से निकले, वे फिर वापस न आएँप्रेम पगे शब्दों को बोलें,  ये सबके हृदय समाएँhttp://kadaachit.blogspot.in/ ...
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  March 30, 2018, 11:27 pm
कहते हो हमारे हो, दिखते  भी हमारे होमौके पे पता चलता, कि कितने हमारे होमंज़िल को चले थे हम, एक ही कश्ती से'जय'बीच मे डूबा पर, तुम तो किनारे होhttp://kadaachit.blogspot.in/ ...
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  March 28, 2018, 1:51 pm
लोगों की अनेकों क्यों, होती हैं जुबां अब तोसाया भी न नकली हो, होता है गुमां अब तोविश्वास दिलाते थे 'जय', पलकों के इशारे सेचिल्ला के भी बोलो तो, मानेगें कहाँ अब तोhttp://kadaachit.blogspot.in/ ...
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  March 28, 2018, 1:47 pm
कम शब्दों में "संस्कार"शब्द को परिभाषित करना बहुत ही कठिन कार्य है। "संस्कार"मूलतः संस्कृत भाषा का शब्द है। किसी अन्य भाषा में "संस्कार"शब्द के समकक्ष दूसरा शब्द है ही नहीं । इस शब्द का अनुवाद करना कठिन है ।विश्व की बहुत सी प्रमुख भाषाओं के शब्दकोषों और शब्दावलियों में&...
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  March 25, 2018, 8:34 pm
काँटों सी जुबां, तूफां सी सदा, चेहरे पे कई  चेहरे भी हैंजो ज़ख्म यहाँ हमने खाये, 'जय'वे तो बड़े  गहरे भी हैंविषवचन साज़िशें दण्ड सभी मैं सहज ही सह लूँगा परसाहिब! ना भूलें वक्त के डण्डे, ये गूँगे हैं, बहरे भी हैं।।http://kadaachit.blogspot.in/ ...
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  March 21, 2018, 10:27 am
धन्य ये व्यवस्थाएं, धन्य  जग  की  रीति काहम समझ रहे हैं जिन्हें, फूलों भरी  वीथिकाकाँटों भरी राह है, चलना सम्भल  सम्भल केपानी सी दीखती 'जय', ये हैं मृग - मरीचिकाhttp://kadaachit.blogspot.in/ ...
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  March 19, 2018, 10:11 pm
सिंधु ज्वार  उठ चला गगन तक, देखो किसे  बुलाने कोबाँह  पसारे निकट आ रहा, सागर  में  शशि समाने  कोतारों की गुपचुप बातें सुन, 'जय'लहरें शरम से  मुस्काईंपवन  बह चली मदिर-मदिर, पूनम  की रात  सजाने कोhttp://kadaachit.blogspot.in/ ...
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  March 17, 2018, 10:18 am
ज्वालाओं के मध्य बना यह कैसा उपवनभ्रमित और आश्चर्यचकित है मेरा मन !कभी मृगों के लिए स्वयं को चारागाह बना लेतालामाओं के लिए स्वयं को बौद्धविहार बना लेताकिसी मूर्ति के लिए कभी यह पावन मंदिर बन जाताहज़ करने वालों की खातिर यह का'बा भी बन जाताकभी कभी तो बन जाता पावन ग्रंथों ...
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  March 14, 2018, 11:10 am
'जय'अपने ग़म में खुश था पर,किसी ने यूँ नज़र डालीजली पत्तों से, कलियों से,फूलों से सजी डाली ।।http://kadaachit.blogspot.in/ ...
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  March 13, 2018, 11:50 pm
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