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उजाले उनकी यादों के

सन् १९१७ का दिसम्बर था। भयानक सर्दी थी। दिल्ली के दरीबे-मुहल्ले की एक तंग गली में एक अँधेरे और गन्दे मकान में तीन प्राणी थे। कोठरी के एक कोने में एक स्त्रीबैठी हुई अपने गोद के बच्चे को दूध पिला रही थी, परन्तु यह बात सत्य नहीं है, उसके स्तनों का प्रायः सभी दूध सूख गया था और ...
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Tag :कहानी
  January 13, 2015, 6:00 am
पत्थर और चूना बहुत था, लेकिन अगर थोड़ी-सी जगह पर दीवार की तरह उभरकर खड़ा हो जाता, तो घर की दीवारें बन सकता था। पर बना नहीं। वह धरती पर फैल गया, सड़कोंकी तरह और वे दोनों तमाम उम्र उन सड़कों पर चलते रहे.... सड़कें, एक-दूसरे के पहलू से भी फटती हैं, एक-दूसरे के शरीर को चीरकर भी गुज़र...
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Tag :कहानी
  January 12, 2015, 12:57 pm
जब गाड़ी खचाखच लदी होने के कारण मानो कराहती हुई स्टेशन से निकली, तब रामलाल ने एक लम्बी साँस लेकर अपना ध्यान उस प्राण ले लेनेवाली गर्मी, अपने पसीने से तरकपड़ों और साथ बैठे हुए नंगे बदनवाले गँवार के शरीर की बू से हटाकर फिर अपने सामने बैठी हुई अपनी पत्नी की ओर लगाया; और उसकी...
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Tag :कहानी
  January 10, 2015, 12:47 pm
रामनिहाल अपना बिखरा हुआ सामान बाँधने में लगा। जँगले से धूप आकर उसके छोटे-से शीशे पर तड़प रही थी। अपना उज्ज्वल आलोक-खण्ड, वह छोटा-सा दर्पण बुद्ध की सुन्दरप्रतिमा को अर्पण कर रहा था। किन्तु प्रतिमा ध्यानमग्न थी। उसकी आँखे धूप से चौंधियाती न थीं। प्रतिमा का शान्त गम्भीर ...
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Tag :जयशंकर प्रसाद
  January 9, 2015, 7:17 am
आज मैंनेअपने घर का नम्बर मिटाया हैऔर गली के माथे पर लगागली का नाम हटाया हैऔर हर सड़क कीदिशा का नाम पोंछ दिया हैपर अगर आपको मुझे ज़रूर पाना हैतो हर देश के हर शहर कीहर गली का द्वार खटखटाओयह एक शाप है यह एक वर हैऔर जहाँ भीआज़ाद रूह की झलक पड़ेसमझना वह मेरा घर है।   [प्रस्तु...
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Tag :कविता
  January 7, 2015, 11:40 am
कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना थाभावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना थास्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारास्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना थाढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों कोएक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना हैहै अँधेरी रात पर दी...
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Tag :हरिवंशराय बच्चन
  January 4, 2015, 5:42 pm
कार्निवल के मैदान में बिजली जगमगा रही थी। हँसी और विनोद का कलनाद गूँज रहा था। मैं खड़ा था। उस छोटे फुहारे के पास, जहाँ एक लडक़ा चुपचाप शराब पीनेवालों कोदेख रहा था। उसके गले में फटे कुरते के ऊपर से एक मोटी-सी सूत की रस्सी पड़ी थी और जेब में कुछ ताश के पत्ते थे। उसके मुँह पर ...
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Tag :जयशंकर प्रसाद
  December 12, 2014, 10:29 am
स्वप्न झरे फूल से,मीत चुभे शूल से,लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहेकारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई,चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,गीत अश...
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Tag :गोपालदास "नीरज"
  December 11, 2014, 7:33 pm
मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगेइस बूढे पीपल की छाया में सुस्ताने आयेंगेहौले-हौले पाँव हिलाओ जल सोया है छेडो मतहम सब अपने-अपने दीपक यहीं सिराने आयेंगेथोडी आँच बची रहने दो थोडा धुँआ निकलने दोतुम देखोगी इसी बहाने कई मुसाफिर आयेंगेउनको क्या मालूम निरूपित इस...
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Tag :
  August 23, 2014, 9:53 pm
"ओ रे प्रेत -"कडककर बोले नरक के मालिक यमराज -"सच - सच बतला !कैसे मरा तू ?भूख से , अकाल से ?बुखार कालाजार से ?पेचिस बदहजमी , प्लेग महामारी से ?कैसे मरा तू , सच -सच बतला !"खड़ खड़ खड़ खड़ हड़ हड़ हड़ हड़ काँपा कुछ हाड़ों का मानवीय ढाँचा नचाकर लंबे चमचों - सा पंचगुरा हाथ रूखी - ...
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Tag :नागार्जुन
  August 20, 2014, 3:52 pm
दोनों ओर प्रेम पलता है !सखि पतंग भी जलता है हा ! दीपक भी जलता है !!सीस हिलाकर दीपक कहताबंधु वृथा ही तू क्यों दहतापर पतंग पड़कर ही रहताकितनी विह्वलता है!दोनों ओर प्रेम पलता है !बचकर हाय पतंग मरे क्याप्रणय छोड़कर प्राण धरे क्याजले नही तो मरा करें क्याक्या यह असफलता है!दोनों...
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Tag :कविता
  November 2, 2013, 11:40 am
झोपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए हैं और अन्दर बेटे की जवान बीबी बुधिया प्रसव-वेदना में पछाड़ खा रही थी। रह-रहकरउसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़ों की रात थी, प्रकृति सन्नाटे ...
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Tag :कहानी
  September 22, 2013, 1:30 pm
जो तुम आ जाते एक बार ।कितनी करूणा कितने संदेशपथ में बिछ जाते बन परागगाता प्राणों का तार तारअनुराग भरा उन्माद रागआँसू लेते वे पथ पखारजो तुम आ जाते एक बार ।हंस उठते पल में आद्र नयनधुल जाता होठों से विषादछा जाता जीवन में बसंतलुट जाता चिर संचित विरागआँखें देतीं सर्वस्व व...
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Tag :कविता
  September 21, 2013, 2:33 pm
जय जन भारत जन- मन अभिमतजन गणतंत्र विधाताजय गणतंत्र विधातागौरव भाल हिमालय उज्जवलहृदय हार गंगा जलकटि विंध्याचल सिंधु चरण तलमहिमा शाश्वत गाताजय जन भारत ...हरे खेत लहरें नद-निर्झरजीवन शोभा उर्वरविश्व कर्मरत कोटि बाहुकरअगणित-पद-ध्रुव पथ परजय जन भारत ...प्रथम सभ्यता ज्ञात...
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Tag :सुमित्रानंदन पंत
  September 19, 2013, 6:46 am
मन समर्पित, तन समर्पितऔर यह जीवन समर्पितचाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँमॉं तुम्हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचनकिंतु इतना कर रहा, फिर भी निवेदनथाल में लाऊँ सजाकर भाल में जब भीकर दया स्वीकार लेना यह समर्पणगान अर्पित, प्राण अर्पितरक्त का कण-कण समर्पितचाहता हूँ देश क...
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Tag :कविता
  September 18, 2013, 5:00 am
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।करता नहीं क्यों दुसरा कुछ बातचीत,देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफिल मैं है ।रहबर राहे मौहब्बत रह न जाना राह मेंलज्जत-ऐ-सेहरा नवर्दी दूरिये-मंजिल में है ।यों खड़ा मौकतल में कातिल कह रहा है बार...
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Tag :रामप्रसाद बिसमिल
  September 18, 2013, 5:00 am
बार बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी |गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी ||चिंता रहित खेलना खाना वह फिरना निर्भय स्वछंद?कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?उंच नीच का ज्ञान नही था , छुआ छूत किसने जानी?बनी हुई थी वहां झोपडी और चीथड़ों में रानी ||किए दूध के कुल्ले ...
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Tag :कविता
  September 17, 2013, 5:00 am
था कली के रूप शैशव में, अहो सूखे सुमन हास्य करता था, खिलाती अंक में तुझको पवन खिल गया जब पूर्ण तू मंजुल, सुकोमल पुष्पवर लुब्ध मधु के हेतु मँडराने लगे आने भ्रमर स्निग्ध किरनें चाँद की, तुझको हंसाती थी सदा,रात तुझ पर वारती थी मोतियों की संपदा लोरियां गा कर मधुप निद्रा-विवश ...
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Tag :कविता
  September 17, 2013, 4:30 am
फूल-सी हो फूलवाली।किस सुमन की सांस तुमनेआज अनजाने चुरा ली!जब प्रभा की रेख दिनकर नेगगन के बीच खींची।तब तुम्हीं ने भर मधुरमुस्कान कलियां सरस सींची,किंतु दो दिन के सुमन से,कौन-सी यह प्रीति पाली?प्रिय तुम्हारे रूप मेंसुख के छिपे संकेत क्यों हैं?और चितवन में उलझते,प्रश्न स...
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Tag :रामकुमार वर्मा
  September 16, 2013, 4:30 am
वह आता--दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,चल रहा लकुटिया टेक,मुट्ठी भर दाने को-- भूख मिटाने कोमुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता--दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये,बायें से वे मलते हुए पेट को चलते,और दाहिना द...
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Tag :कविता
  September 16, 2013, 4:00 am
जो बीत गई सो बात गई जीवन में एक सितारा थामाना वह बेहद प्यारा थावह डूब गया तो डूब गयाअम्बर के आनन को देखोकितने इसके तारे टूटेकितने इसके प्यारे छूटेजो छूट गए फिर कहाँ मिलेपर बोलो टूटे तारों परकब अम्बर शोक मनाता हैजो बीत गई सो बात गई जीवन में वह था एक कुसुमथे उसपर नित्य नि...
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Tag :कविता
  September 15, 2013, 5:00 am
जीवन वाटिका का वसंत, विचारों का अंधड़, भूलों का पर्वत, और ठोकरों का समूह है यौवन। इसी अवस्था में मनुष्य त्यागी, सदाचारी, देश भक्त एवं समाज-भक्त भी बनतेहैं, तथा अपने ख़ून के जोश में वह काम कर दिखाते हैं, जिससे कि उनका नाम संसार के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिख दिया जाता ...
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Tag :अमृतलाल नागर
  September 15, 2013, 4:00 am
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल । अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन । उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय । निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं ...
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Tag :कविता
  September 14, 2013, 12:30 am
जीवन की अंधियारीरात हो उजारी!धरती पर धरो चरणतिमिर-तम हारी परम व्योमचारी!चरण धरो, दीपंकर,जाए कट तिमिर-पाश!दिशि-दिशि में चरण धूलिछाए बन कर-प्रकाश!आओ, नक्षत्र-पुरुष,गगन-वन-विहारी परम व्योमचारी!आओ तुम, दीपों को निरावरण करे निशा!चरणों में स्वर्ण-हास बिखरा दे दिशा-दिशा!पा कर ...
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Tag :नरेन्द्र शर्मा
  September 14, 2013, 12:00 am
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