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Blog: उजाले उनकी यादों के

Blogger: kuldeep thakur
सन् १९१७ का दिसम्बर था। भयानक सर्दी थी। दिल्ली के दरीबे-मुहल्ले की एक तंग गली में एक अँधेरे और गन्दे मकान में तीन प्राणी थे। कोठरी के एक कोने में एक स्त्रीबैठी हुई अपने गोद के बच्चे को दूध पिला रही थी, परन्तु यह बात सत्य नहीं है, उसके स्तनों का प्रायः सभी दूध सूख गया था और ... Read more
clicks 251 View   Vote 0 Like   12:30am 13 Jan 2015
Blogger: kuldeep thakur
पत्थर और चूना बहुत था, लेकिन अगर थोड़ी-सी जगह पर दीवार की तरह उभरकर खड़ा हो जाता, तो घर की दीवारें बन सकता था। पर बना नहीं। वह धरती पर फैल गया, सड़कोंकी तरह और वे दोनों तमाम उम्र उन सड़कों पर चलते रहे.... सड़कें, एक-दूसरे के पहलू से भी फटती हैं, एक-दूसरे के शरीर को चीरकर भी गुज़र... Read more
clicks 203 View   Vote 0 Like   7:27am 12 Jan 2015
Blogger: kuldeep thakur
जब गाड़ी खचाखच लदी होने के कारण मानो कराहती हुई स्टेशन से निकली, तब रामलाल ने एक लम्बी साँस लेकर अपना ध्यान उस प्राण ले लेनेवाली गर्मी, अपने पसीने से तरकपड़ों और साथ बैठे हुए नंगे बदनवाले गँवार के शरीर की बू से हटाकर फिर अपने सामने बैठी हुई अपनी पत्नी की ओर लगाया; और उसकी... Read more
clicks 214 View   Vote 0 Like   7:17am 10 Jan 2015
Blogger: kuldeep thakur
रामनिहाल अपना बिखरा हुआ सामान बाँधने में लगा। जँगले से धूप आकर उसके छोटे-से शीशे पर तड़प रही थी। अपना उज्ज्वल आलोक-खण्ड, वह छोटा-सा दर्पण बुद्ध की सुन्दरप्रतिमा को अर्पण कर रहा था। किन्तु प्रतिमा ध्यानमग्न थी। उसकी आँखे धूप से चौंधियाती न थीं। प्रतिमा का शान्त गम्भीर ... Read more
clicks 210 View   Vote 0 Like   1:47am 9 Jan 2015
Blogger: kuldeep thakur
आज मैंनेअपने घर का नम्बर मिटाया हैऔर गली के माथे पर लगागली का नाम हटाया हैऔर हर सड़क कीदिशा का नाम पोंछ दिया हैपर अगर आपको मुझे ज़रूर पाना हैतो हर देश के हर शहर कीहर गली का द्वार खटखटाओयह एक शाप है यह एक वर हैऔर जहाँ भीआज़ाद रूह की झलक पड़ेसमझना वह मेरा घर है।   [प्रस्तु... Read more
clicks 218 View   Vote 0 Like   6:10am 7 Jan 2015
Blogger: kuldeep thakur
कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना थाभावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना थास्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारास्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना थाढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों कोएक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना हैहै अँधेरी रात पर दी... Read more
clicks 197 View   Vote 0 Like   12:12pm 4 Jan 2015
Blogger: kuldeep thakur
कार्निवल के मैदान में बिजली जगमगा रही थी। हँसी और विनोद का कलनाद गूँज रहा था। मैं खड़ा था। उस छोटे फुहारे के पास, जहाँ एक लडक़ा चुपचाप शराब पीनेवालों कोदेख रहा था। उसके गले में फटे कुरते के ऊपर से एक मोटी-सी सूत की रस्सी पड़ी थी और जेब में कुछ ताश के पत्ते थे। उसके मुँह पर ... Read more
clicks 225 View   Vote 0 Like   4:59am 12 Dec 2014
Blogger: kuldeep thakur
स्वप्न झरे फूल से,मीत चुभे शूल से,लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहेकारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई,चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,गीत अश... Read more
clicks 245 View   Vote 0 Like   2:03pm 11 Dec 2014
Blogger: kuldeep thakur
मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगेइस बूढे पीपल की छाया में सुस्ताने आयेंगेहौले-हौले पाँव हिलाओ जल सोया है छेडो मतहम सब अपने-अपने दीपक यहीं सिराने आयेंगेथोडी आँच बची रहने दो थोडा धुँआ निकलने दोतुम देखोगी इसी बहाने कई मुसाफिर आयेंगेउनको क्या मालूम निरूपित इस... Read more
clicks 244 View   Vote 0 Like   4:23pm 23 Aug 2014
Blogger: kuldeep thakur
"ओ रे प्रेत -"कडककर बोले नरक के मालिक यमराज -"सच - सच बतला !कैसे मरा तू ?भूख से , अकाल से ?बुखार कालाजार से ?पेचिस बदहजमी , प्लेग महामारी से ?कैसे मरा तू , सच -सच बतला !"खड़ खड़ खड़ खड़ हड़ हड़ हड़ हड़ काँपा कुछ हाड़ों का मानवीय ढाँचा नचाकर लंबे चमचों - सा पंचगुरा हाथ रूखी - ... Read more
clicks 250 View   Vote 0 Like   10:22am 20 Aug 2014
Blogger: kuldeep thakur
दोनों ओर प्रेम पलता है !सखि पतंग भी जलता है हा ! दीपक भी जलता है !!सीस हिलाकर दीपक कहताबंधु वृथा ही तू क्यों दहतापर पतंग पड़कर ही रहताकितनी विह्वलता है!दोनों ओर प्रेम पलता है !बचकर हाय पतंग मरे क्याप्रणय छोड़कर प्राण धरे क्याजले नही तो मरा करें क्याक्या यह असफलता है!दोनों... Read more
clicks 264 View   Vote 0 Like   6:10am 2 Nov 2013
Blogger: kuldeep thakur
झोपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए हैं और अन्दर बेटे की जवान बीबी बुधिया प्रसव-वेदना में पछाड़ खा रही थी। रह-रहकरउसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़ों की रात थी, प्रकृति सन्नाटे ... Read more
clicks 235 View   Vote 0 Like   8:00am 22 Sep 2013
Blogger: kuldeep thakur
जो तुम आ जाते एक बार ।कितनी करूणा कितने संदेशपथ में बिछ जाते बन परागगाता प्राणों का तार तारअनुराग भरा उन्माद रागआँसू लेते वे पथ पखारजो तुम आ जाते एक बार ।हंस उठते पल में आद्र नयनधुल जाता होठों से विषादछा जाता जीवन में बसंतलुट जाता चिर संचित विरागआँखें देतीं सर्वस्व व... Read more
clicks 274 View   Vote 0 Like   9:03am 21 Sep 2013
Blogger: kuldeep thakur
जय जन भारत जन- मन अभिमतजन गणतंत्र विधाताजय गणतंत्र विधातागौरव भाल हिमालय उज्जवलहृदय हार गंगा जलकटि विंध्याचल सिंधु चरण तलमहिमा शाश्वत गाताजय जन भारत ...हरे खेत लहरें नद-निर्झरजीवन शोभा उर्वरविश्व कर्मरत कोटि बाहुकरअगणित-पद-ध्रुव पथ परजय जन भारत ...प्रथम सभ्यता ज्ञात... Read more
clicks 288 View   Vote 0 Like   1:16am 19 Sep 2013
Blogger: kuldeep thakur
मन समर्पित, तन समर्पितऔर यह जीवन समर्पितचाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँमॉं तुम्हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचनकिंतु इतना कर रहा, फिर भी निवेदनथाल में लाऊँ सजाकर भाल में जब भीकर दया स्वीकार लेना यह समर्पणगान अर्पित, प्राण अर्पितरक्त का कण-कण समर्पितचाहता हूँ देश क... Read more
clicks 298 View   Vote 0 Like   11:30pm 17 Sep 2013
Blogger: kuldeep thakur
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।करता नहीं क्यों दुसरा कुछ बातचीत,देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफिल मैं है ।रहबर राहे मौहब्बत रह न जाना राह मेंलज्जत-ऐ-सेहरा नवर्दी दूरिये-मंजिल में है ।यों खड़ा मौकतल में कातिल कह रहा है बार... Read more
clicks 339 View   Vote 0 Like   11:30pm 17 Sep 2013
Blogger: kuldeep thakur
बार बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी |गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी ||चिंता रहित खेलना खाना वह फिरना निर्भय स्वछंद?कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?उंच नीच का ज्ञान नही था , छुआ छूत किसने जानी?बनी हुई थी वहां झोपडी और चीथड़ों में रानी ||किए दूध के कुल्ले ... Read more
clicks 270 View   Vote 0 Like   11:30pm 16 Sep 2013
Blogger: kuldeep thakur
था कली के रूप शैशव में, अहो सूखे सुमन हास्य करता था, खिलाती अंक में तुझको पवन खिल गया जब पूर्ण तू मंजुल, सुकोमल पुष्पवर लुब्ध मधु के हेतु मँडराने लगे आने भ्रमर स्निग्ध किरनें चाँद की, तुझको हंसाती थी सदा,रात तुझ पर वारती थी मोतियों की संपदा लोरियां गा कर मधुप निद्रा-विवश ... Read more
clicks 272 View   Vote 0 Like   11:00pm 16 Sep 2013
Blogger: kuldeep thakur
फूल-सी हो फूलवाली।किस सुमन की सांस तुमनेआज अनजाने चुरा ली!जब प्रभा की रेख दिनकर नेगगन के बीच खींची।तब तुम्हीं ने भर मधुरमुस्कान कलियां सरस सींची,किंतु दो दिन के सुमन से,कौन-सी यह प्रीति पाली?प्रिय तुम्हारे रूप मेंसुख के छिपे संकेत क्यों हैं?और चितवन में उलझते,प्रश्न स... Read more
clicks 254 View   Vote 0 Like   11:00pm 15 Sep 2013
Blogger: kuldeep thakur
वह आता--दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,चल रहा लकुटिया टेक,मुट्ठी भर दाने को-- भूख मिटाने कोमुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता--दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये,बायें से वे मलते हुए पेट को चलते,और दाहिना द... Read more
clicks 268 View   Vote 0 Like   10:30pm 15 Sep 2013
Blogger: kuldeep thakur
जो बीत गई सो बात गई जीवन में एक सितारा थामाना वह बेहद प्यारा थावह डूब गया तो डूब गयाअम्बर के आनन को देखोकितने इसके तारे टूटेकितने इसके प्यारे छूटेजो छूट गए फिर कहाँ मिलेपर बोलो टूटे तारों परकब अम्बर शोक मनाता हैजो बीत गई सो बात गई जीवन में वह था एक कुसुमथे उसपर नित्य नि... Read more
clicks 252 View   Vote 0 Like   11:30pm 14 Sep 2013
Blogger: kuldeep thakur
जीवन वाटिका का वसंत, विचारों का अंधड़, भूलों का पर्वत, और ठोकरों का समूह है यौवन। इसी अवस्था में मनुष्य त्यागी, सदाचारी, देश भक्त एवं समाज-भक्त भी बनतेहैं, तथा अपने ख़ून के जोश में वह काम कर दिखाते हैं, जिससे कि उनका नाम संसार के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिख दिया जाता ... Read more
clicks 264 View   Vote 0 Like   10:30pm 14 Sep 2013
Blogger: kuldeep thakur
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल । अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन । उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय । निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं ... Read more
clicks 301 View   Vote 0 Like   7:00pm 13 Sep 2013
Blogger: kuldeep thakur
जीवन की अंधियारीरात हो उजारी!धरती पर धरो चरणतिमिर-तम हारी परम व्योमचारी!चरण धरो, दीपंकर,जाए कट तिमिर-पाश!दिशि-दिशि में चरण धूलिछाए बन कर-प्रकाश!आओ, नक्षत्र-पुरुष,गगन-वन-विहारी परम व्योमचारी!आओ तुम, दीपों को निरावरण करे निशा!चरणों में स्वर्ण-हास बिखरा दे दिशा-दिशा!पा कर ... Read more
clicks 226 View   Vote 0 Like   6:30pm 13 Sep 2013
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