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आध्यात्मिक चिंतन

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं....त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्‌ ॥ (गीता १६/२१)जीवात्मा का विनाश करने वाले "काम, क्रोध और लोभ"यह तीन प्रकार के द्वार मनुष्य को नरक में ले जाने वाले हैं, इसलिये मनुष्य को इन तीनों से मुक...
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रवि कान्त शर्मा
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  May 20, 2014, 4:00 pm
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं...नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ॥ (गीता ३/८)व्यक्ति को अपना नियत कर्तव्य-कर्म ही करना चाहिये क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है, कर्म न करने से तो वर्तमान जीवन-यात्रा सफ़ल नह...
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रवि कान्त शर्मा
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  May 14, 2014, 6:24 pm
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं....यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्‌ ॥ (गीता १६/२३)भावार्थ :  जो मनुष्य कामनाओं के वश में होकर शास्त्रों की विधियों को त्याग कर अपने ही मन से उत्पन्न की गयीं विधियों से कर्म करता है। वह मनुष्...
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रवि कान्त शर्मा
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  November 19, 2011, 8:46 am
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं....मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्‌ ।सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥(गीता १४/३)मेरी यह आठ तत्वों वाली जड़ प्रकृति (जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार) ही समस्त वस्तुओं को उत्पन्न करने वाली माता है और मैं ही ब्रह्म र...
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रवि कान्त शर्मा
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  November 5, 2011, 8:07 pm
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं....एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।कुरु कर्मैव तस्मात्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्‌ ॥ (गीता ४/१५)हे अर्जुन! पूर्व समय में बन्धन से मुक्त होने की इच्छा वाले मनुष्यों ने मेरे दिव्य-ज्ञान को समझकर कर्तव्य-कर्म के द्वारा ही मोक्ष की ...
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रवि कान्त शर्मा
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  September 15, 2011, 12:40 pm
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं....अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनीः ॥ (गीता ८/१४)हे पृथापुत्र अर्जुन! जो मनुष्य मेरे अतिरिक्त अन्य किसी का मन से चिन्तन नहीं करता है और सदैव नियमित रूप से मेरा ही स्मरण करता है, उस नियमित ...
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रवि कान्त शर्मा
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  April 22, 2011, 6:15 pm
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं....यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः।ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पंडितं बुधाः॥(गीता ४/१९)जिस मनुष्य के निश्वय किये हुए सभी कार्य बिना फ़ल की इच्छा के पूरी लगन से सम्पन्न होते हैं तथा जिसके सभी कर्म ज्ञान-रूपी अग्नि में भस्म हो गए हैं,...
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रवि कान्त शर्मा
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  March 29, 2011, 2:53 pm
भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं...कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥ (गीता २/४७) हे अर्जुन! तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में अधिकार नहीं है, इसलिए तू न तो अपने-आप को कर्मों के फलों का कारण समझ और न ही कर्म करन...
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रवि कान्त शर्मा
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  March 8, 2011, 10:55 am
कार्य हमेशा तीन प्रकार से मन, वाणी और शरीर के द्वारा ही किये जाते है, किसी भी कार्य को करते समय "कब हम अज्ञानी होते हैं और कब ज्ञानी होते हैं।" भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं....त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति ...
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रवि कान्त शर्मा
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  February 25, 2011, 9:45 am
यह उन व्यक्तियों के लिये है जिनके सभी सांसारिक कर्तव्य-कर्म पूर्ण हो चुके हैं।भगवान श्री कृष्ण कहते हैं....मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥ (गीता १२/८)भावार्थ : हे अर्जुन! तू अपने मन को मुझमें ही स्थिर कर और मुझमें ही अपनी बुद्ध...
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रवि कान्त शर्मा
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  February 15, 2011, 12:51 pm
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं...मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्‌ ।सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ (गीता १४/३)मेरी यह आठ तत्वों वाली जड़ प्रकृति (जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार) ही समस्त वस्तुओं को उत्पन्न करने वाली माता है और मैं ही ब्रह्म र...
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रवि कान्त शर्मा
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  January 1, 2011, 10:21 am
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं......तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर । असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः ॥ (गीता ३/१९)भावार्थ : "कर्म-फ़ल में आसक्त हुए बिना मनुष्य को अपना कर्तव्य समझ कर कर्म करते रहना चाहिये, क्योंकि अनासक्त भाव से निरन्तर कर्तव्य-कर्म करने से मनुष्य ...
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रवि कान्त शर्मा
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  December 23, 2010, 12:46 pm
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं....यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्‌ ॥ (गीता १६/२३)भावार्थ : जो मनुष्य कामनाओं के वश में होकर शास्त्रों की विधियों को त्याग कर अपने ही मन से उत्पन्न की गयीं विधियों से कर्म करता रहता है। वह मनुष्...
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रवि कान्त शर्मा
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  December 6, 2010, 12:56 pm
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं....सांख्योगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्‌ ॥ (गीता ५/४)अल्प-ज्ञानी मनुष्य ही "सांख्य-योग" और "निष्काम कर्म-योग" को अलग-अलग समझते है न कि पूर्ण विद्वान मनुष्य, क्योंकि दोनों में से एक में भी अच्छी प्रका...
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रवि कान्त शर्मा
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  November 30, 2010, 8:33 am
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं....न मां दुष्कृतिनो मूढ़ाः प्रपद्यन्ते नराधमाः।माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमिश्रिताः॥ (गीताः ७/१५)मनुष्यों में अधर्मी और दुष्ट स्वभाव वाले मूर्ख लोग मेरी शरण ग्रहण नहीं करते है, ऐसे नास्तिक-स्वभाव धारण करने वालों का ज्ञान मेरी माया द्वारा ह...
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रवि कान्त शर्मा
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  November 12, 2010, 3:20 pm
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं....जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः । त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ (गीता: 4/9)हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य (अलौकिक) होते हैं, इस प्रकार जो कोई वास्तविक स्वरूप से मुझे जानता है, वह शरीर को त्याग कर इस संसार मे फ़िर से ज...
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रवि कान्त शर्मा
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  October 10, 2010, 11:09 am
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं...कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ (गीता २/४७)"तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में अधिकार नहीं है, इसलिए तू न तो अपने-आप को कर्मों के फलों का कारण समझ और कर्म न करने में तेरी आसक्ति भी न ह...
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रवि कान्त शर्मा
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  October 3, 2010, 6:16 pm
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं....मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥(गीताः १२/२)जो मनुष्य मुझमें अपने मन को स्थिर करके निरंतर मेरे सगुण-साकार रूप की पूजा में लगे रहते हैं, और अत्यन्त श्रद्धापूर्वक मेरे दिव्य स्वरूप की आराधन...
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रवि कान्त शर्मा
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  September 21, 2010, 7:38 am
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं....ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्नयस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥(गीता १२/६)तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्‌ । भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्‌ ॥(गीता १२/७)जो मनुष्य अपने सभी कर्मों को मुझे अर्पित करके मेरी ...
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रवि कान्त शर्मा
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  September 12, 2010, 7:46 pm
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं....मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः ॥ (गीता ७/३)हजारों मनुष्यों में से कोई एक मेरी प्राप्ति रूपी सिद्धि की इच्छा करता है और इस प्रकार सिद्धि की प्राप्ति के लिये प्रयत्न करने वाले मनुष्यों ...
आध्यात्मिक चिंतन...
रवि कान्त शर्मा
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  September 8, 2010, 4:08 pm
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं....असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्‌ ।अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥(गीता ६/३५)हे महाबाहु कुन्तीपुत्र! इसमे कोई संशय नही है कि चंचल मन को वश में करना अत्यन्त कठिन है, किन्तु इसे सभी सांसारिक कामनाओं के त्याग (वैराग्य) और न...
आध्यात्मिक चिंतन...
रवि कान्त शर्मा
Tag :
  September 5, 2010, 7:00 pm
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं....जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः ।त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥(गीता ४/९)अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य (अलौकिक) हैं, इस प्रकार जो कोई वास्तविक स्वरूप से मुझे जानता है, वह शरीर को त्याग कर इस संसार मे फ़िर से ...
आध्यात्मिक चिंतन...
रवि कान्त शर्मा
Tag :
  September 3, 2010, 3:57 pm
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