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रचना डायरी

डिब्रूगढ़ मे मदारी का खेल देख कर एक तरफ होता था नेवलाएक तरफ सांप और मदारी की हांककरेगा नेवला सांप के टुकड़े सातखाएगा एक छै ले जाएगा साथकभी नहीं छूटा रस्सी से नेवलाऔर पिटारी से सांपललच कर आते गए लोग, ठगा कर जाते गए लोगखेल का दारोमदार था इस एक बात पर उब कर बदलते रहें तमाशाई...
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  September 28, 2013, 9:33 pm
जिस घड़ी चाह करकुछ कर नहीं सकता हूँ मैं,बन जाता हूँ एक जोड़ी झपकती हुई आँखें,निर्लिप्त, निर्विकारमुझे देख चीखता है हड़ताली मजदूर, और गूँजता है आसमान में नारा”प्रबंधन के दलालों कोजूता मारो सालों को”-तब बस एक जोड़ी आँखें ही तो होता हूँ मैं,भावहीन, झपकती हुई आँखेंजिस समय ...
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  September 24, 2013, 4:49 pm
इस डेढ़ पंखों वालीतितली की मृत्यु का प्रातःकाल है यहवायु उन्मत्त, धूप गुनगुनीवह जो है मेरा सुख पीठ के बल पड़ी इस तितली का दुख है वहयोजन से कम नहींअधकटे पंख की दूरी उसके लिए,वह जो है मेरे लिए बस एक हाथनहीं होगी शवयात्रा इसकी/शवयात्राएं तो होती हैंउन शवों कीजिनसे निकलती ...
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  September 22, 2013, 11:55 am
http://sitabdiyara.blogspot.in/2013/09/blog-post_8.html?spref=fb...
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  September 9, 2013, 10:42 am
एक नई कविता.... जहाँ दूर-दूर तक नज़र आते हैं लोगों के हुजूम,माचिस की शीत खाई तीलियों की तरह, ...खुशकिस्मत हो कि अब भी बाकी है तुम्हारे पास कुछ आंचबचा कर रखो उस बहुमूल्य ताप कोजो अब भी बचा हुआ हैतुम्हारे अंदरवो चाहते हैं कि चीखो तुम, चिल्लाओ और हो जाओ पस्तपहुंच से बाहर खड़ी बि...
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  September 5, 2013, 8:21 pm
http://lekhakmanch.com/%e0%a4%aa%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ad-%e0%a4%97%e0%a5%8c%e0%a4%a4%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%8f%e0%a4%82.html...
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  September 1, 2013, 6:17 pm
उत्तर पूर्व मे रहते हुए रचना कर्म करने वाले 33 कवियों की कविताओं के संकलन "अवगुंठन की ओट से सात बहने" (प्रकाशक- बोधि प्रकाशन, जयपुर )मे संग्रहित कुछ कविताएँ ...  1. जगत रासमुँह अंधेरे उठती है वहऔरउसके पैरों की आहट से हड़बड़ाकर कर जागा कलगीदार मुर्गाबाँग दे कर बन जाता ह...
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  July 30, 2013, 8:45 pm
http://kathakram.in/jan-mar13/Poetry.pdf1. मौसमसर्दियों की आहट सुनते हीबुनना शुरू कर देती हैवह मेरा स्वेटर हर साल,लपेट कर उंगलियों मेंसूरज की गुनगुनी किरनें,एक उल्टा-दो सीधाया ऐसा ही कुछबुदबुदाते हुए,हजार कामों मेंफंसी-उलझीबुन पाती है रोज इसेबस थोड़ा ही,पर अभीआहिस्ता-आहिस्ताउसकी उंगलियाँब...
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  March 10, 2013, 9:12 pm
मार्गदर्शक  पत्र  प्रतिक्रियाएँ .........कविता से इतने वर्षों दूर रहने के बाद भी ये नहीं खोईं.......यह एक कवि के लिए सबसे बड़ी खुशी एक प्रतिक्रिया होती है ..इसलिए महत्वपूर्ण ....और तब ये पोस्ट कार्ड पर चल कर आती थीं मीलों-मील ...आज की तरह क्लिक पर सवार नहीं  ...-------------------------------------------------------...
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  October 20, 2012, 10:00 pm
कांधे पर रखकरकविताओं का खाली थैलानिकल पड़ा हूँ मैंनजरें चुराताउस पहाड़ से,जो ताकता है मुझेअपने ठीहे से दिनरातऔर जिसे मैंअपनी  बालकनी से,जो भरता हैमेरा खालीपनउतरकर मेरे अन्दर,तब भी, जब किसो चुकी होती है सारी दुनियामेरे रतजगे से बेपरवाह,और जब रात के चौथे पहरखोजता हू...
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  October 11, 2012, 6:31 pm
दृष्टि चाहिए उनके लिएऔर वे भी चाहती हैं दृष्टिबुन-छींट करउगाई नही जा सकती हैं वेफसलों की तरह,उन्हें तो केवल भर कलेजासूँघ सकते हैं हमखदकते अदहन में डलेभात की गमक साया पढ़ सकते हैं ताजी गही धान केललछर-मटिहर रंग मेंवे जो हैं हमारे इर्द-गिर्दहमेशा से मौजूदअभी उस दिन देखा ...
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  October 5, 2012, 3:24 pm
2004 मे प्रकाशित संग्रह "कुछ विषम सा"की गज़लें ...(1)शांति के आलाप मे रणनाद कैसासंधि ध्वज के शीर्ष पर उन्माद कैसाभस्म हो यदि होलिका विस्मय नहीं हैपर स्वतः जल जाए वह प्रहलाद कैसालो पिघल कर बह चली जलधार खारीअश्रुओं को हर्ष क्या अवसाद कैसाखो चुकी ध्वनि लौट कर आनी नहीं हैवीतराग...
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  October 3, 2012, 10:23 pm
जी भर करसींच भी नहीं पाया थाआंसुओं से जिसेबीजने के बाद,ना जाने कैसेजी गया है एक दुःखअपने ही हाथोंसिरजा हुआआज अचानकआ खड़ा हुआ है सामनेशरारत भरीमुस्कान के साथ,दरवाजे कीसांकल पकड़े,एक पैर थपकतेज़मीन पर,अनजाने नम्बर से आईकिसी बरसों पुरानेदोस्त कीआवाज़ की तरहपह...
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  September 29, 2012, 7:05 pm
दुनिया से अलगसात बहनों केकुटुंब की है जोजीवन रेखा,इन दिनोंलोहित है नाराज़।पाँच दिनों से अँधेरे  में हैं हम,और कोने में पड़ा  इन्वर्टरबता रहा है कंधे उचका करहमारे लिए विज्ञान की सीमा।नाराज लोहित ने भी तोदिखाई है हमेप्रकृति की सीमा हीबंद हैइन दिनों डिब्रूगढ -आलंग ...
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  September 27, 2012, 7:21 pm
कुछ पुरानी पत्रिकाएँ जो अरुणाचल मे मिल पायीं , उनमें प्रकाशित कविताएँ - पोखरी खदान मे कोयला बीनते मारे गए बच्चे के लिए. (प्रगतिशील वसुधा-66 जुलाई-सितम्बर 2006)लड़ रहा था  वह योद्धा उस पोखरी खदान मे भूख, समय और सर पर छतरी बन कर तने ईश्वर से, कई लड़ाइयाँ एक साथ उठा ...
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  September 27, 2012, 7:07 pm
                               बैकुण्ठपुर में समकालीन साहित्य से जुड़े लोगों का अड्डा था 'ककउआ होटल'। जैसा कि नाम से ही अंदाज़ा लगा सकते हैं, यह कोई बड़ा होटल नहीं बल्कि केवल एक चाय-पकौड़ों की दुकान भर थी। पुराने बस स्टैंड में एक पुरानी खपरैल वाली दुकान, जिसक...
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  September 25, 2012, 6:38 pm
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