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ताज़ा हवा

" बहेलिये ने उस निरीह पक्षी को मार गिराने के लिए, जो उड़ कर किसी बड़े खेत में बैठ गया था, पूरी फसल को ही आग लगाने की कोशिश की।"उस शाम मैं एनएसडी ‘समकालीन रंगमंच’के उद्घाटन कार्यक्रम में नहीं पहुंच पाया, अब सोचता हूं तो अजीब सी दुविधा होती है...एकबारगी लगता है कि काश वहां पह...
ताज़ा हवा...
मयंक
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  January 20, 2013, 7:31 am
वो अक्सर बाज़ार से लौटते हुएकहते थे मुझसे क्या लड़की जैसे चलते हो दो झोले उठाने में थक जाते हो तुमजब कभी किसी गाने परमैं नादानहिला कर कमरलगता था नाचनेतब अक्सर कहते थेचारपाई पर खांसते बुज़ुर्ग वोये क्या लड़कियों सालगते हो नाचनेखाना बनाने के मेरे शौक परमां कोअक्सर आ ...
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मयंक
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  December 31, 2012, 4:35 pm
यशवंत सिंह मामले में तीन पक्ष हैं, तीन में से सबसे पहला पक्ष है उनका जो ये मानते हैं कि यशवंत ने जो कुछ किया गलत किया लेकिन उसके बदले में जो कुछ किया वो गलत ही नहीं बल्कि आपराधिक होने की अतिरेकता है। दूसरा पक्ष है जो ये मानता है कि यशवंत ने कुछ गलत किया ही नहीं और तीसरा पक्...
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मयंक
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  July 21, 2012, 1:39 am
नैतिकता के नामर्द सिपाहियों को गौर से देख लीजिएचलती सड़क, देश के "व्यस्त शहरों" में से एक, आस पास मौजूद पढ़े लिखे ज़िम्मेदार "नौजवानों की फौज" और फ़िर भी नोच फेंके गए उसके शर्म, लज्जा और लिहाज के गहने. वही गहने जो उसकी माँ ने पैदा होते ही तन पर पहले कपडे के साथ उसे पहना दिए. औ...
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मयंक
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  July 14, 2012, 12:40 am
चित्र - साभार - 'द हिंदू'(24 दिसम्बर, 2011)एक औरत मुस्कुराती है, दूसरी अनजान औरत को देख कर बना देती है जगह, उसके बैठने को थाम लेती है उसका असबाब,सम्भाल लेती हैउसका बच्चाएक पुरुषदूसरे पुरुष को घूरता हैएक पुरुष कुहनी मारता हैदूसरे पुरुष कोदेख कर एक औरत कोएक पुरुष झगड़ता हैदूसर...
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मयंक
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  June 1, 2012, 2:59 am
तेरी ये उदासी जो जाती नहीं है मेरे दर पर अब सुबह आती नहीं है किताबें मेरी धूल में सन गई हैं वो आंखों को चेहरा दिखाती नहीं हैं चांद आया था घर, ताक पर रख दिया है कि अब धूप आंगन में आती नहीं हैतेरी आंख में एक कहानी छिपी है मगर तेरी बोली बताती नहीं हैतेरी ज़ुल्फ़ में मेरी किस...
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मयंक
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  April 29, 2012, 4:51 am
जब ढलने लगे रात पौ फटने से पहले आ जाया करो तुम मेरे सपनों में पहन वही नीली साड़ी जिसके किनारे लटकता था एक रेशमी धागा और उससे जड़ा एक नीला नग और हां उस दिन की ही मानिंद खोल कर आना अपने काले बाल उनकी खुशबू बिखरती है खुले होने पर आ जाना मेरे सपनों में मेरे सोने पर वो नीला रंग ज...
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मयंक
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  February 21, 2012, 1:04 am
ये एक चिट्ठी है, एक चिट्ठी जो शायद आप में से कुछ को सच्ची लगे और हिलाए भी...कुछ को शायद ये चिट्ठी नकली लगे, नाटक लगे, प्रोपेगेंडा लगे...कुछ को ये पढ़ कर भरोसा ही न हो..और कुछ की आंखें खुलें...पर यकीन मानिए कि ये सच है और सरकारें इस सच को जानती हैं, क्योंकि ये उन्ही का बोया हुआ सच है,...
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मयंक
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  February 14, 2012, 2:50 am
मैं तब तक शायद मारा जा चुका होऊंगा....मेरी लाश को वो गुमनाम गड्ढों में गाड़ रहे होंगे रास्ते केलैम्प पोस्ट परझूल रही होगीएक संघर्षकारी की लाशहो रही होंगीगुमशुदा बाग़ियों कीतलाशखलिहानों मेंलगा दी गई होगी आगआज़ादी के मुंह सेनिकल रहा होगाझागजंगलों में सेमातम की आवाज़...
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मयंक
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  February 6, 2012, 10:23 am
चाय की दुकान पर बैठा अखबार पर चर्चा कर रहा लोगों का वो झुंड अचानक उठ कर उस शोर की दिशा में चल देता है...शोर में आवाज़ सुनाई दे रही है, कुछ युवाओं की...अरे क्या कह रहे हैं ये...ये चिल्ला रहे हैं...आओ आओ...नाटक देखो...और फिर देखते ही देखते उस मंझोले शहर के नुक्कड़ पर लोगों का हुजूम इकट...
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मयंक
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  February 4, 2012, 2:35 am
ख्यालों की सिगरेट जलती जा रही थी...झड़ती जा रही थीतगाफ़ुलों की राख अचानक मैंने कहा तुम से ‘सुनो मेरी ओर से हां है...’तुम ने मुस्कुरा के कहा,‘मेरी तरफ से तो कब से हां है..’फिर मैंने कहा ‘फूल’तुम ने कहा खुशबू...मैंने कहा संगीततुम ने कहा जादू... मैंने कहा हवा तुम ने आसमान फिर मैंन...
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मयंक
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  December 19, 2011, 9:39 pm
देखो इतिहास का सूरजडूब रहा है समय की घाटी में देवता धर्म की किताबों में जा छुपे हैंमहापुरुषगमलो मेंउगने की तैयारी में हैंघरों की दीवारों परचढ़ते मनीप्लांटअमरबेल में बदल गए हैंज़ेहन की दीवारों परकाई जम आई हैशास्त्रों के साथदियासलाई रखी हैमहान मस्तिष्कबह गए वेश्या...
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मयंक
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  December 9, 2011, 9:02 am
सोचनाआदत ही बुरी हैफिर सोचा कि शाम हुईफिरतुम ज़ेहन में आएअब सोचता हूंकि न सोचूं तुम्हेऔर सोचता ही जाता हूंतुम्हारे बालतुम्हारे होंठतुम्हारी हंसीतुम्हारा स्पर्शऔर सर्दी की उस शाम कीवो बारिश...सोच रहा हूं बना लूं फिरवो अदरक की चायदो कप..एक मेरा, एक तुम्हारादोनो पी लूं...
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मयंक
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  November 28, 2011, 5:01 pm
(ये कविता भारतीय फौज से कोर्ट मार्शल कर के बर्खास्त की गई पहली महिला अधिकारी फ्लाइंग ऑफिसर अंजलि गुप्ता को समर्पित है...फौज से लेकर निजी जीवन तक पुरुषों के उत्पीड़न के खिलाफ लड़कर हार गई एक महिला को सैल्यूट है ये कविता...)मैंने जब भी देखा उनको उनकी निगाहें बस मेरी देह पर थ...
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मयंक
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  September 22, 2011, 6:54 am
(ये कविता किन के लिए लिखी गई है, इसे लिखने से इसका मर्म समाप्त हो जाएगा...मैं जानता हूं कि आप जानते हैं...ये पहला भाग है, अगले का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा)बिनायक सेन लड़ रहे थे आदिवासियों के लिए गांव में और वो उनके साथ थे अपने एसी कमरों में बैठे जब इरोम अनशन पर थी तो वो उड़ा रह...
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मयंक
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  September 6, 2011, 7:10 am
प्रेम कविताओं के बीच के संक्षिप्त अंतराल में याद आती रही बच्चों की फीस घर का राशन पेट्रोल के दाम मां की दवा पिता का इलाज पत्नी की फटी साड़ियां अपने पुराने गल चुके जूते दफ्तर के दोस्तों से लिया गया उधार गली का बनिया बॉस का गुस्सा कागज़ों के बढ़ते दाम प्रकाशक की अकड़ और फ...
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मयंक
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  September 1, 2011, 11:26 am
पिछले लम्बे वक्त से ग्रीस में चल रहे वित्तीय संकट को लेकर ज़ाहिर है कि यूरोपीययूनियन के सभी देश लगातार चिंतित हैं। लेकिन भारत समेत एशियाई देशों में इस पूरे परिदृस्य को लेकर लगभग बेसुधी सा आलम है। दरअसल ये आश्चर्यजनक भी नहीं है क्योंकि ग्रीस या किसी भी पश्चिमी देश की स...
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मयंक
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  July 22, 2011, 11:08 am
चवन्नी की विदाई का वक्त है पूरे मुल्क के साथ लखनऊ का दिल भी बुझा-बुझा सा है. क्योंकि ये वो अमीर शहर है जिसने हमेशा चवन्नी को भी सर आंखों पर उठाया है. सुबूत चाहिए तो आफताब लखनवी के कुछ अश्आर आपकी खिद्मत में पेश किए दे रहा हूं-मै अगर छू लूं चवन्नी को अधन्ना हो जाए‘वो’ अगर बां...
ताज़ा हवा...
मयंक
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  June 30, 2011, 2:12 am
बेमौसम बरसात ने दिल्ली को भिगो डाला है...अब बैठे ठाले मोबाइल में कुछ अशआर लिखे...उन्हें दिल्ली की बेमौसम लेकिन बामज़ा बारिश को समर्पित करता हूं...ये कौन से मौसम में चले आए हो बादल क्या तुम भी शायरों की तबीयत में ढल गए तपते थे जिस्म तुमने भिगोए हैं इस तरह मौसम की तरह रूह के ते...
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मयंक
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  April 17, 2011, 6:47 pm
तात को गए आज चार दिन हो गए....सबने उनके लिए खूब लिखा...सब उस जीवट को सलाम करते रहे जो केवल आलोक तौमर की ही बपौती था...सब उनके साथ वक्त को याद करते रहे...सबने कहा कि वो आदमी हमेशा साहसी रहा....लड़ता रहा....और मौत से भी लड़ता रहा....पिछली कविता मेरी थी, जो तात को समर्पित थी....आज ये वो कविता ...
ताज़ा हवा...
मयंक
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  March 24, 2011, 5:14 pm
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