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छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ कवि व पत्रकार स्वर्गीय श्यामलाल चतुर्वेदी का 7 दिसंबर 2018 की सुबह बिलासपुर स्थित एक निजी चिकित्सालय में इलाज के दौरान निधन हो गया। वह 92 वर्ष के थे। उनका जीवन महात्मा गांधी के आदर्शों से पूरी तरह से प्रभावित रहा। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से प्रभावित...
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  December 8, 2018, 3:14 pm
आजकल पटाखे फोड़ना ‘दबंग’ संस्कृति वाले लोगों के बीच खुशी का इजहार करने का फैशन बन गया है। शायद उन्हें नहीं पता कि इन पटाखों के फोड़ने से किस कदर प्रदूषण फैल रहा है और हमारी जलवायु जहरीली होती जा रही है। देश की राजधानी दिल्ली में फैले वायु प्रदूषण से शायद हर कोई अवगत हो चु...
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  December 3, 2018, 3:47 pm
एक लघु व्यथा : सम्मान करा लो---जाड़े की गुनगुनी धूप । गरम चाय की पहली चुस्की --कि मिश्रा जी चार आदमियों के साथ आ धमके।[जो पाठक गण    ’मिश्रा’ जी से परिचित नहीं है उन्हे बता दूँ कि मिश्रा जी मेरे वो  ’साहित्यिक मित्र’ हैं जो किसी पौराणिक कथाऒ के पात्र की तरह अचानक अवतरित ह...
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  December 1, 2018, 12:13 pm
चन्द माहिया : क़िस्त 521जब जब घिरते बादलप्यासी धरती क्योंहोने लगती पागल ?:2:भूले से कभी आतेमेरी दुनिया मेंरिश्ता तो निभा जाते:3:कुछ मन की उलझन हैधुँधला है जब तकयह मन का दरपन है:4:जब छोड़ के जाना थाक्यों आए थे तुम?क्या दिल बहलाना था?:5:लगनी होती ,लगतीआग मुहब्बत कीताउम्र नही बुझती-...
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  November 24, 2018, 11:04 am
एक ग़ज़ल :वक़्त सब एक सा  नहीं होतारंज-ओ-ग़म देरपा नहीं होताआदमी है,गुनाह  लाज़िम हैआदमी तो ख़ुदा  नहीं  होताएक ही रास्ते से जाना  हैऔर फिर लौटना नहीं होताकिस ज़माने की बात करते होकौन अब बेवफ़ा नहीं  होता ?हुक्म-ए-ज़ाहिद पे बात क्या करिएइश्क़ क्या है - पता नहीं  होतालाख मा...
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  November 16, 2018, 6:01 pm
Laxmirangam: अतिथि अपने घर के: अतिथि अपने घर के बुजुर्ग अम्मा और बाबूजी साथ हैं,  उन्हे सेवा की जरूरत है, घर में एक कमरा उनके लिए ही है  और दूसरा हमारे पा......
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  November 7, 2018, 8:40 pm
एक ग़ज़ल : एक समन्दर ,मेरे अन्दर...एक  समन्दर ,  मेरे  अन्दर शोर-ए-तलातुम बाहर भीतरएक तेरा ग़म  पहले   से हीऔर ज़माने का ग़म उस परतेरे होने का ये तसव्वुरतेरे होने से है बरतर चाहे जितना दूर रहूँ  मैंयादें आती रहतीं अकसरएक अगन सुलगी  रहती हैवस्ल-ए-सनम की, दिल के अन्दरप्य...
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  November 2, 2018, 1:42 pm
ग़ज़ल  : हमें मालूम है संसद में फिर ---हमें मालूम है संसद में कल फिर क्या हुआ होगाकि हर मुद्दा सियासी ’वोट’ पर  तौला  गया होगावो,जिनके थे मकाँ वातानुकूलित संग मरमर  केहमारी झोपड़ी के  नाम हंगामा   किया  होगाजहाँ पर बात मर्यादा की या तहजीब की आईबहस करते हुए वो गालि...
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  October 27, 2018, 7:40 pm
तोहमतें हजार मिलती हैं,नफरतें हर बार मिलती हैं,टूट कर बिखरने लगता है दिल,आंखें जार-जार रोती हैं,देख कर भी अनदेखा कर देते हैं लोग,आंसुओं को पनाह नहीं मिलती।।मुफलिसी के आलम में गुजरती जिंदगी,सपनों को बिखरते देखा करे जिंदगी ,फिरती है दर-बदर ठोंकरे खाती,किस्मत को बार - बार आ...
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  October 26, 2018, 11:19 am
चन्द माहिया : क़िस्त 55:1:शिकवा न शिकायत हैजुल्म-ओ-सितम तेराक्या ये भी रवायत है:2:कैसा ये सितम तेरासीख रही हो क्या ?निकला ही न दम मेरा :3:छोड़ो भी गिला शिकवाअहल-ए-दुनिया सेजो होना था सो हुआ:4:इतना ही बस मानाराह-ए-मुहब्बत सेघर तक तेरे जाना:5:ये दर्द हमारा हैतनहाई में बसइसका ही सहार...
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  October 20, 2018, 4:54 pm
मेरी इस रचना का उद्देश्य किसी वर्ग विशेष परआक्षेप करना नहीं है बल्कि मैं उस सत्य कोशब्द रूप में प्रकट कर रहीं हूँ जो प्रतिदिन हमारे सामने आता है।बड़ा अच्छा धंधा है, शिक्षा का न फंदा है।न ही कोई परीक्षा है, लेनी बस दीक्षा है।बन जाओ किसी बाबा के चेले।नहीं रहोगे तुम कभी अक...
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  October 17, 2018, 9:03 am
जब टूटता है दिलधोखे फरेब सेअविश्वास और संदेह सेनफरतों के खेल सेतो लहराता है दर्द का समंदररह जाते हैं हतप्रभअवाक् इंसानों के रूप सेसीधी सरल निष्कपट जिन्दगीपड़ जाती असमंजस मेंबहुरूपियों की दुनिया फिररास नहीं आतीउठती हैं अबूझ प्रश्नों की लहरेंआता है ज्वार फिर दिल क...
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  October 14, 2018, 10:15 pm
एक लघु व्यथा : सबूत चाहिए.....[व्यंग्य]विजया दशमी पर्व शुरु हो गया । भारत में, गाँव से लेकर शहर तक ,नगर से लेकर महानगर तक पंडाल सजाए जा रहे हैं ,रामलीला खेली जा रही है । हर साल राम लीला खेली जाती है , झुंड के झुंड लोग आते है रामलीला देखने।स्वर्ग से देवतागण भी देखते है रामलीला -...
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  October 14, 2018, 5:03 pm
वातानुकूलित आप ने आश्रम बना लिएसत्ता के इर्द-गिर्द ही धूनी रमा  लिए’दिल्ली’ में बस गए हैं ’तपोवन’ को छोड़कर’साधू’ भी आजकल के मुखौटे चढ़ा लिएसब वेद ज्ञान श्लोक ॠचा मन्त्र  बेच करजो धर्म बच गया था दलाली  में खा लिएआए वो ’कठघरे’ में न चेहरे पे थी शिकनसाहिब हुज़ूर जेल ही ...
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  October 13, 2018, 3:02 pm
ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं के समक्षबनी ये झुग्गियांविषमता का देती परिचयमारती हैं तमाचा समाज के मुख परचलता है यहां गरीबी का नंगा नाचभूखे पेट नंगे तनभटकता भारत का भविष्यमांगता जीवन की चंद खुशियांजिंदगी जीने की जद्दोजहदमजदूरी करते मां-बापदो वक्त की रोटी की चिंतामें जूझत...
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  October 12, 2018, 10:35 am
एक ग़ज़ल : जड़ों तक साजिशें गहरी---जड़ों तक साज़िशें गहरी ,सतह पे हादसे थेजहाँ बारूद की ढेरी , वहीं  पर  घर  बने थेहवा में मुठ्ठियाँ ताने  जो सीना  ठोकते थेज़रूरत जब पड़ी उनकी ,झुका गरदन गए थेकि उनकी आदतें थी देखना बस आसमाँ हीज़मीं पाँवों के नीचे खोखली फिर भी खड़े थेअँधेरा ले ...
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  October 6, 2018, 11:39 am
Laxmirangam: तुम फिर आ गए !!!: तुम फिर आ गए !!! --------------------------- बापू, तुम फिर आ गए !!! पिछली बार कितना समझाया था, पर तुम माने नहीं. कितनी ......
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  October 3, 2018, 11:40 pm
शब्द मय है सारा संसार,शब्द ही काव्य अर्थ विस्तार ।शब्द ही जगती का श्रृंगार,शब्द से जीवन है साकार।शब्द से अर्थ नहीं है विलग,शब्द से सुंदर भाव सजग।शब्द का जैसा करो प्रयोग,वैसा ही होता है उपयोगी।शब्द कर देते हैं विस्फोट,कभी लगती है गहरी चोट ।नहीं शब्दों में कोई खोट,शब्द ल...
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  October 1, 2018, 2:52 pm
Laxmirangam: चाँदनी का साथ: चाँदनी का साथ चाँद ने पूछा मुझे तुम अब रात दिखते क्यों नहीं? मैंने कहा अब रात भर तो साथ है मेरे चाँदनी. क्या पता तुमको, मैं कितना ......
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  September 27, 2018, 9:54 am
हर पलकहता है कुछफुसफुसा करमेरे कानों मेंमैं जा रहा हूँजी लो मुझेचला गया तोफिर लौट न पाऊंगाबन जाऊंगा इतिहासकरोगे मुझे यादमेरी याद मेंकर दोगे फिर एक पल बर्बादइसलिए हर पल को जियोउठो सीखो जीनाअतीत के लिए क्या रोनाभविष्य से क्या डरनायह जो पल वर्तमान हैहै वही परम सत्यबा...
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  September 26, 2018, 11:54 am
क्या यही संसार है?क्या यही जीवन है?झुठलाना चाहती हूंइस सत्य कोपाना चाहती हूंउस छल कोजो भटका देता हैछोटी सी नौका कोइस विस्तृत जलराशि मेंडूब जाती है नौकाखो देती है अपनाअस्तित्व......!भुला देता है संसारउस छोटी सी नौका कोजिसने न जाने कितनोंको किनारा दिखाया !सब कुछ खोकर भीउस...
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  September 25, 2018, 11:17 am
एक ग़ज़लकौन बेदाग़ है  दाग़-ए- दामन नहीं ?जिन्दगी में जिसे कोई उलझन नहीं ?हर जगह पे हूँ मैं उसकी ज़ेर-ए-नज़रमैं छुपूँ तो कहाँ ? कोई चिलमन नहींवो गले क्या मिले लूट कर चल दिएलोग अपने ही थे कोई दुश्मन नहींघर जलाते हो तुम ग़ैर का शौक़ सेक्यों जलाते हो अपना नशेमन नहीं ?बात आकर रुकी बस इस...
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  September 22, 2018, 11:46 am
चन्द माहिया  :क़िस्त 54:1:ये कैसी माया हैतन तो है जग मेंमन तुझ में समाया है:2:जब  तेरे दर आयाहर चेहरा मुझ कोमासूम नज़र आया:3:ये कैसा रिश्ता हैदेखा कब उसकोदिल रमता रहता है:4:बेचैन बहुत है दिलकब तक मैं तड़पूंबस अब तो आकर मिल:5:यादें कुछ सावन कीतुम न आए जोबस एक व्यथा मन की-आनन्द.पाठक...
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  September 15, 2018, 9:43 pm
चिड़िया: क्षितिज: जहाँ मिल रहे गगन धरा मैं वहीं तुमसे मिलूँगी, अब यही तुम जान लेना राह एकाकी चलूँगी । ना कहूँगी फ़िर कभी कि तुम बढ़ाओ हाथ अपना, ......
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  September 15, 2018, 2:37 pm
दया सभ्यता प्रेम समाहित जिसके बावन बरनों मेंशरणागत होती भाषाएं जिसके पावन चरनों मेंजिसने दो सौ साल सही है अंग्रेजों की दमनाईधीरज फिर भी धारे रक्खा त्याग नहीं दी गुरताईतुमको अब तक भान नहीं है हिन्दी की करूणाई काजिसने सबको गले लगाया ममतारूपी माई कालेकिन बातें चल निक...
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Tag :हिन्दी
  September 15, 2018, 10:39 am
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