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मदन मोहन सक्सेना की ग़ज़लें

आँख  से  अब  नहीं दिख रहा है जहाँ ,आज क्या हो रहा है मेरे संग यहाँ  माँ का रोना नहीं अब मैं सुन पा रहा ,कान मेरे ये दोनों क्यों बहरें हुए.उम्र भर जिसको अपना मैं कहता रहा ,दूर जानो को बह मुझसे बहता रहा.आग होती है क्या आज मालूम चला,जल रहा हूँ मै...
मदन मोहन सक्सेना की ग़ज़लें ...
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  July 22, 2013, 10:18 am
मेरे हमनसी मेरे हमसफ़र ,तुझे खोजती है मेरी नजर तुम्हें हो ख़बर की न हो ख़बर ,मुझे सिर्फ तेरी तलाश है मेरे साथ तेरा प्यार है ,तो जिंदगी में बहार है मेरी जिंदगी तेरे दम से है ,इस बात का एहसाश है तेरे इश्क का है ये असर ,मुझे सुबह शाम की ना  ख़बर मेरे दिल में तू रहती सदा , तू ना द...
मदन मोहन सक्सेना की ग़ज़लें ...
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  July 19, 2013, 12:34 pm
दुनिया  बालों की हम पर जब से इनायत हो गयीउस रोज से अपनी जख्म खाने की आदत हो गयीशोहरत  की बुलंदी में ,न खुद से हम हुए वाकिफ़ गुमनामी में अपनेपन की हिफाज़त हो गयीमर्ज ऐ  इश्क को सबने ,गुनाह जाना ज़माने में अपनी नज़रों में मुहब्बत क्...
मदन मोहन सक्सेना की ग़ज़लें ...
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  July 18, 2013, 4:38 pm
सोचकर हैरान हैं  हम , क्या हमें अब हो गया है चैन अब दिल को नहीं है ,नींद क्यों  आती नहीं है बादियों में भी गये  हम ,शायद आ जाये सुकून याद उनकी अब हमारे दिल से क्यों  जाती नहीं हैहाल क्या है आज अपना ,कुछ खबर हमको नहीं है  देखकर मेरी ये हालत  , तरस क्यों खाती नहीं ह...
मदन मोहन सक्सेना की ग़ज़लें ...
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  July 15, 2013, 9:37 pm
मिली दौलत ,मिली शोहरत,मिला है मान उसको क्यों मौका जानकर अपनी जो बात बदल जाता है .किसी का दर्द पाने की तमन्ना जब कभी उपजे जीने का नजरिया फिर उसका बदल जाता है  ..चेहरे की हकीकत को समझ जाओ तो अच्छा हैतन्हाई के आलम में ये अक्सर बदल जाता है ...किसको दोस्त माने हम और किसक...
मदन मोहन सक्सेना की ग़ज़लें ...
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  July 14, 2013, 10:26 am
नरक की अंतिम जमीं तक गिर चुके है आज जोनापने को कह रहे , हमसे बहदूरियां आकाश की ..इस कदर भटकें हैं युबा आज की इस दौर में खोजने से मिलती नहीं अबगोलियां सल्फ़ास कीआज हम महफूज है क्यों दुश्मनों के बीच मेंदोस्ती आतीनहीं है रास अब बहुत ज्यादा पास कीबँट  गयी सारी जमी ,फिर ब...
मदन मोहन सक्सेना की ग़ज़लें ...
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  July 13, 2013, 8:17 pm
ख्बाब था मेहनत के बल पर , हम बदल डालेंगे किस्मत ख्बाब केवल ख्बाब बनकर, अब हमारे रह गए हैं कामचोरी, धूर्तता, चमचागिरी का अब चलन है बेअरथ से लगने लगे है ,युग पुरुष जो कह गए हैं दूसरोंका किस तरह नुकसान हो सब सोचते हैत्याग ,करुना, प्रेम ,क्यों इस जहाँ से बह गए हैं अब करा करता है शो...
मदन मोहन सक्सेना की ग़ज़लें ...
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  July 12, 2013, 4:49 pm
आगमन नए दौर का आप जिसको कह रहेवो सेक्स की रंगीनियों की पैर में जंजीर हैसुन चुके है बहुत किस्से वीरता पुरुषार्थ केहर रोज फिर किसी द्रौपदी का खिंच रहा क्यों चीर हैखून से खेली है होली आज के इस दौर मेंकह रहे सब आज ये नहीं मिल रहा अब नीर हैमौत के साये में जीती चार पल की जिन्द...
मदन मोहन सक्सेना की ग़ज़लें ...
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  July 11, 2013, 8:33 pm
सजाए  मौत का तोहफा  हमने पा लिया  जिनसे ना जाने क्यों बो अब हमसे कफ़न उधार दिलाने  की बात करते हैं हुए दुनिया से  बेगाने हम जिनके इक इशारे पर ना जाने क्यों बो अब हमसे ज़माने की बात करते हैं दर्दे दिल मिला उनसे बो हमको प्यार...
मदन मोहन सक्सेना की ग़ज़लें ...
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  July 11, 2013, 10:51 am
प्यार की हर बात से महरूम हो गए आज हमदर्द की खुशबु भी देखो आ रही है प्यार सेदर्द का तोहफामिला हमको दोस्ती के नाम परदोस्तों के बीच में हम जी रहे थे भूल सेबँट  गयी सारी जमी फिर बँट गया ये आसमानअब खुदा बँटने  लगा है इस तरह की तूल सेसेक्स की रंगीनियों के आज के इस दौर मेंस...
मदन मोहन सक्सेना की ग़ज़लें ...
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  July 10, 2013, 12:17 pm
गर कोई हमसे कहे की रूप कैसा है खुदा काहम यकीकन ये कहेंगेजिस तरह से यार है....संग गुजरे कुछ लम्हों की हो नहीं सकती है कीमतगर तनहा होकर जीए तो बर्ष सौ  बेकार हैं सोचते है जब कभी हमक्या मिला क्या खो गयादिल जिगर सांसे है अपनीपर न कुछ अधिकार हैयाद कर सूरत सलोनी खुश हुआ करते ह...
मदन मोहन सक्सेना की ग़ज़लें ...
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  July 9, 2013, 4:27 pm
मेरे मालिक मेरे मौला ये क्या दुनिया बनाई हैकिसी के पास खाने को  मगर बह खा नहीं पाये तेरी दुनियां में कुछ बंदें, करते काम क्यों गंदेंकिसी के पास कुछ भी ना, भूखे पेट सो जाये जो सीधे सादे रहतें हैं मुश्किल में क्यों रहतें हैतेरी बातोँ को तू जाने, समझ अपनी ना कुछ आयेतुझे...
मदन मोहन सक्सेना की ग़ज़लें ...
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  July 8, 2013, 4:25 pm
दीवारें ही दीवारें नहीं दीखते अब घर यारों बड़े शहरों के हालात कैसे आज बदले है. उलझन आज दिल में है कैसी आज मुश्किल है समय बदला, जगह बदली क्यों रिश्तें आज बदले हैं जिसे देखो बही क्यों आज मायूसी में रहता है दुश्मन दोस्त रंग अपना, समय पर आज बदले हैं जीवन के सफ़र में जो पाया है सह...
मदन मोहन सक्सेना की ग़ज़लें ...
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  July 7, 2013, 1:29 pm
जिसे चाहा उसे छीना , जो पाया है सहेजा है  उम्र बीती है लेने में ,मगर फिर शून्यता क्यों हैं सभी पाने को आतुर हैं , नहीं कोई चाहता देनादेने में ख़ुशी जो है, कोई बिरला  सीखता क्यों है  कहने को तो , आँखों से नजर आता सभी को है अक्सर प्यार में ,मन से मुझे फिर दीखता क्यों है&nbs...
मदन मोहन सक्सेना की ग़ज़लें ...
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  April 3, 2013, 3:47 pm
क्या सच्चा है क्या है झूठा अंतर करना नामुमकिन है.हमने खुद को पाया है बस खुदगर्जी के घेरे में ..एक जमी बक्शीथी कुदरत ने हमको यारो लेकिनहमने सब कुछ बाट दिया मेरे में और तेरे मेंआज नजर आती मायूसी मानबता के चहेरे परअपराधी को सरण मिली है आज पुलिस के डेरे मेंबीरो की क़ुरबानी का ...
मदन मोहन सक्सेना की ग़ज़लें ...
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  April 2, 2013, 5:12 pm
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