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रौशनी का जज़ीरा

मुहम्मदअल्वीसाहबकीनज़्र/ محمّد علوی صاحب کی نذرदुआकामलबाहटाकेदेखेंतमामचेहरेख़ुदाकेदेखेंدوا کا ملبہ ہٹا کے دیکھیںتمام چہرے خدا کے دیکھیںयहीरखेंचाँदऔरसूरजज़मींदुबाराबनाकेदेखेंیہی رکھیں چاند اور سورجزمیں دوبارہ بنا کے دیکھیںलगादेंबोसेकोपंखऔरफिरतुम्हारीजानिबउड़ाकेदेखेंلگا دیں بوسے کو پنکھ اور پھرتمہار...
रौशनी का जज़ीरा ...
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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  February 8, 2017, 11:24 am
دسمبر میں بھی تیری دھند میں ہوںمیں پچھلی جنوری کی دھند میں ہوںदिसंबर में भी तेरी धुंध में हूँमैं पिछली जनवरी की धुंध में हूँوہ مبہم شخص بھی میں ہی ہوں شایدبچاؤ ! میں طلسمی دھند میں ہوںवो मुबहम शख़्स भी मैं ही हूँ शायदबचाओ ! मैं तिलिस्मी धुंध में हूँمیں اس کوہسار کی چوٹی پے ہوں اورتیری یادوں کی گہری دھند میں ہوںमैं इस कुहसार की ...
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स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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  December 25, 2016, 5:45 pm
जबभीदिखजाएँवोहैरतकरनाऐसेरंगोंकीहिफ़ाज़तकरनाجب بھی دیکھ جائیں وہ، حیرت کرنا ایسے..رنگوں کی حفاظت کرنا उसकामुझसेयूँहीलड़लेनाऔरघरकीचीजोंसेशिकायतकरनाاس کا مجھ سے یوں ہی لڑ لینا اور گھر کی چیزوں سے شکایات کرنا कामयेकोईभीकरदेगापरइश्क! तुममेरीवज़ाहतकरनाکام یہ کوئی بھی کر دیگا پر عشق ! تم میری وضاحت کرنا इससेपहलेकेउ...
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स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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  October 19, 2016, 9:04 pm
काली रात हैकाली रात पे रंग नहीं चढ़ता है कोईझिलमिल झिलमिल करते तारेसुर्ख़ अगर हो जाएँ भी तोकिस की नज़र में आएंगे येचाँद ही होतासुर्ख़ रंग उस पर फबता भी।काली रात हैकाली रात पे रंग नहीं चढ़ने वाला हैमैंने अपनी नब्ज़ काट करअपना लहू बर्बाद कर दिया...کالی رات ہےکالی رات پہ رنگ نہیں چڑھتا ہے کو...
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स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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  October 13, 2016, 9:48 am
मुझे ये पता थाके दीवार घर कीनदी की तरह बह न पायेगी फिर भीमैं तस्वीरें ले आया था मछलियों की...مجھے یہ پتا تھا کہ دیوار گھر کی ندی کی طرحبہ نہ پائے گی پھر بھی میں تصویر لے آیا تھا مچھلیوں کی ... -Swapnil-...
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स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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  September 2, 2016, 10:29 am
इंतज़ार सुर है इकमुद्दतों जो इक लय मेंखामुशी से बजता है ...दूर-पास की चापेंतेज़-धीमी हर आहटदस्तकें जो दर पे हुईंऔर जो नहीं भी हुईंबोल हैं जो इस सुर मेंवक़्त भरता रहता हैउम्र चलती रहती हैगीत बनता रहता है.....انتظار سر ہے اک مدّتوں جو اک لے میں خامشی سے بجتا ہےدور پاس کی چاپیں تیز دھیمی ہر آہٹ دستکیں جو دار پہ ...
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स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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  August 30, 2016, 11:34 am
मैंधीमारागहूंभाताहैयेउतारमुझेसदाकीओटमेंआख़ामुशीपुकारमुझेघुमाताहैजोलड़कपनकारेगज़ारमुझेउठायेफिरताहैकाँधेपेइकग़ुबारमुझेनतैरनाहीबनेऔरनडूबहीपाऊंहरएकमौजकियेजायदरकिनारमुझेकुछऐसादर्दहैजीचाहताहैतेरीयादवोधुनबजायेकरेअबजोतारतारमुझेनहींहैदूसरीगाड़ीकोई...
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स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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  June 15, 2016, 9:12 pm
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स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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  May 14, 2016, 11:20 am
यूँहीएड़ीपेघूमनाहैमुझेअबयेनुक़ताहीदायराहैमुझेरतजगाहूंकिनींदहूंउसकीउसनेआँखोंमेंरखलियाहैमुझेमैंहूंतस्वीरइकख़मोशीकीएकआवाज़नेरचाहैमुझेउससेपहलेभीगुमहुआहूंमैंउसनेइसबारखोदियाहैमुझेमेरेसाहिलसेशामकोसूरजदेरतकयूँहीदेखताहैमुझेमेरीहरइककलासेवाक़िफ़हैचाँ...
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स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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  April 26, 2016, 11:01 am
ایک بنجارے کی آوارہ کہانی میں ہوں میںیعنی اک موج ہوں اور رقصو روانی میں ہوں میں تو فلک ہے میری جاناں تو شفق ہوں میں بھی    دن کے توہفے میں ہوں اور شب کی نشانی میں ہوں میںتم محبّت میں ادا کار  کی کیوں اے ہواب کہ کردار کسی اور کہانی میں ہوں میںاونگھتے وقت نظر آیا تھا مجھ کو وہ سرابآنکھ مندتے ہی یہ پایا تھا کہ پانی میں ہوں میںسوچتا ہوں کے میرا عشق امر ہے جاناںیہ الگ بات ترے کوچہ فا...
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स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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  April 26, 2016, 10:41 am
दबी है कोई दुखती रग खुदायाज़मीं ने आसमां सर पर उठायाدبی ہے کوئی دکھتی رگ خدایا زمیں نے آسماں سر پر اٹھایا वो चलता जा रहा था दूर मुझसेघना कुहरा था चारो सिम्त छायाوہ چلتا جا رہا تھا دور مجھ سے گھانا کوہرا تھا چاروں سمت چھایا ये किस की याद-सी है दिल में मेरेये वीरानों को है किसने सजायाیہ کس کی یاد سی ہے دل میں میرے یہ ویر...
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स्वप्निल कुमार 'आतिश'
Tag :ग़ज़ल
  April 9, 2016, 10:46 pm
इश्क़कीरुतसेहमआहंगदिलकेअंदरएकमलंगशबकीक़ैदसेभागनेकोचाँदकीओटमेंएकसुरंगइकमछलीकीराहबनेंधारोंमेंइसबातपेजंगअब्रकीपीठपेफैलाहैछूटरहाहैचाँदकारंगसँकरीसँकरीकिरणेंहैंधनक! तुम्हाराघरहैतंगमांझाअबइसज़िदपरहैहाथकटेयाकटेपतंगनींदमेंख़ाबकाकंकरफेंकसुब्हतलकफैल...
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स्वप्निल कुमार 'आतिश'
Tag :
  March 27, 2016, 6:34 pm
घुटनहीघुटनहैफ़ज़ाजैसेइकबोझउठायेहुएहैयेआधाउजालातोबेहोशसाहैअधूराअँधेराभीबेहिसपड़ाहैयहांकेसवेरोंमेंशामेंमिलीहैंतोरातोंमेंकिरनोंकीकिरचेंमिलेंगीघुटनहीघुटनहैयेतस्वीरतेरीजोदीवारपरहैइसेक्याहटादूँ?किमुमकिनहैपीछेदरीचाछुपाहो.....گھٹن ہی گھٹن ہے فضا جیسے اک بوجھ اٹھا...
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स्वप्निल कुमार 'आतिश'
Tag :swapnil tiwari 'aatish'
  March 27, 2016, 6:25 pm
नदी की लय पे ख़ुद को गा रहा हूँमैं गहरे और गहरे जा रहा हूँचुरा लो चाँद तुम उस सिम्त छुप करमैं शब को इस तरफ़ उलझा रहा हूँवो सुर में सुर मिलाना चाहती हैमैं अपनी धुन बदलता जा रहा हूँ मुझे ये ख़्वाब आया था कि जग करमैं अपनी नींद पर पछता रहा हूँपड़ा हूँ ज़िन्दगी के जाम में मैंमज़ा ये ह...
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स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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  March 15, 2016, 11:55 pm
किसी ने भी न मिरी ठीक तर्जुमानी कीधुंआ धुआँ हैं फ़ज़ा मेरी हर कहानी कीचलो ! निकालो मिरे पाँव में चुभा ताराज़मीं की सत्ह तुम्हीं ने तो आसमानी कीये वक़्त लंबे दिनों का है सो ये रातें अबबढ़ा रही हैं उदासी ही रातरानी कीमैं रो के उट्ठा तो आँखों से रेत झड़ने लगीकि तिशनगी ही वसीयत है ...
रौशनी का जज़ीरा ...
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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  March 15, 2016, 11:51 pm
चांदनी मुझ से भी कभी बिखरेदाग़ मुझ में हैं चाँद से गहरेचोट करते हुए छुपा दी थीअपनी तस्वीर घाव में तेरेधूप की इक नदी में उतरा हूँले के पलकों पे ख़्वाब के क़तरेये शरर ही कहानियां हैं मिरीउड़ते हैं जो अलाव से मेरेवरना मरकज़ नहीं मैं नुक़्ता हूँमुझको रहते हैं दायरे घेरेएक रनवे ...
रौशनी का जज़ीरा ...
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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  August 11, 2015, 7:03 pm
छुपी नहीं हैं शक्ल रात में भी रहगुज़ार कीहै रौशनी फ़ज़ा में पुरउम्मीद इंतज़ार कीअजीब ताल-मेल है हमारी चाल-ढाल मेंजमी हुई है मुझ पे ही नज़र मिरे शिकार कीन जाने कैसा ग़म पिला दिया है तूने दिल इसेहमारी शब को लत सी लग गयी है तेरे बार कीनए सुरों की कोंपले उगें मुझे सदा तो देकि गिर च...
रौशनी का जज़ीरा ...
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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  June 25, 2015, 12:38 pm
रंग में तेरे रंगी हो वो उदासी लाऊँतुझ से वाबस्ता कोई और कहानी लाऊँघूम फिर कर मुझे याद आना है इक वो ही शख़्सअब कहाँ से मैं कोई दूसरा माज़ी लाऊँपहले तो ध्यान में लाऊँ तिरा उजला चेहराफिर गुमाँ में मैं तिरी नर्म सदा भी लाऊँइस जज़ीरे पे मिरे क़त्ल का इलज़ाम तो हैपर कहाँ से मैं समं...
रौशनी का जज़ीरा ...
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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  March 25, 2015, 12:28 pm
कैसी कैसी ख़ूबसूरत कितनी प्यारी मछलियाँजाल में पानी के फँस जाती हैं सारी मछलियाँशाम होते ही उदासी चल पड़ी चुनने उन्हेंदिन के साहिल पर पड़ी हैं ग़म की मारी मछलियाँदिल के दरिया में जो आई शाम चारा फेंकनेंसत्ह पर आने लगीं यादों की सारी मछलियाँअश्क गर सूखे तो सारे ख़ाब मारे ज...
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स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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  November 14, 2014, 7:12 pm
मौसमे-हिज्र का हर वार संभाले हुए हैंहम तिरी याद की बौछार संभाले हुए हैंموسم ہجر کا ہر وار سنبھالے ہوئے ہیںہم تری یاد کی بوچھار سنبھالے ہوئے ہیںदश्त के हो चुके सारे कि जो दीवाने थेहुस्ने-जानाँ को तो हुशियार संभाले हुए हैंدشت کے ہو چکے سارے کہ جو دیوانے تھےحسن جاناں کو تو ہوشیار سنبھالے ہوئے ہیںइश्क़ और मैं तो हमआह...
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स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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  October 30, 2014, 12:54 pm
एक शह्र था जिसमें थोड़ी सी दिल्ली, थोड़ी मुंबई, थोडा बनारस, थोडा कलकत्ता, थोडा पटना, इत्यादि ठीक वैसे ही थे जैसे दिल्ली में थोडा पटना, थोडा कलकत्ता, थोडा बनारस इत्यादि हैं। उस शह्र में शायद बिहार का या उत्तर प्रदेश का या शायद मध्यप्रदेश का एक लड़का था, जो शायद आई ए एस, या आय आय ...
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स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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  October 6, 2014, 11:35 am
दिल, ज़बां, ज़हन मेरे आज संवरना चाहेंसब के सब सिर्फ तेरी बात ही करना चाहेंدل زباں ذھن مرے آج سنورنا چاہیںسب کے سب صرف تری بات ہی کرنا چاہیں दाग़ हैं हम तेरे दामन के सो ज़िद्दी भी हैंहम कोई रंग नहीं हैं के उतरना चाहेंداغ ہیں ہم ترے دامن کے سو ضدی بھی ہیںہم کوئی رنگ نہیں ہیں کے اترنا چاہیںआरज़ू है हमें सहरा की सो हैं भी...
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स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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  September 12, 2014, 11:41 am
ہاں دھنک کے رنگ سارے کھل گئےمجھ پے تیرے سب اشارے کھل گئےहाँ धनक के रंग सारे खुल गएमुझे पे तेरे सब इशारे खुल गएایک تو ہم کھیل میں بھی تھے نۓاس پے پتے بھی ہمارے کھل گئےएक तो हम खेल में भी थे नएउस पे पत्ते भी हमारे खुल गएجھیل میں آنکھوں کی تم اترے ہی تھےاور خابوں کے شکارے کھل گئےझील में आँखों की तुम उतरे ही थेऔर ख़ाबों के शिकारे...
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स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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  August 26, 2014, 1:40 pm
وو خوشبو بدن تھیمگر خود میں سمٹی سی اک امر تک یوں ہی بیٹھی رہیبس اک لمس کی منتظراسے ایک شب جیوں ہی میں نے چھوا اس سے تتلی اڑی پھر اک اور اک اور تتلی اڑی دیر تک تتلیاں یوں ہی اڑتی رہیںچھنٹی تتلیاں جب کہیں بھی نہ تھی ووتبھی سے تعقب میں ہوں تتلیوں کےکیے جا رہا ہوں انہیں میں اکٹھا کہ اک روز انسے دوبارہ میں تخلیق اس کو کرونگاجو خوشبو بدن تھاوو خوشبو بدن تھا -swapnil tiwari-वो ख़ुश्बू बदन ...
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स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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  August 24, 2014, 10:44 am
छुप के किरनों में सदा दें तुमकोजी में आता है जगा दें तुमकोچھپ کے کرنوں میں سدا دیں تم کو جی میں آتا ہے جگا دیں تم کو मेरे साहिल पे न लिक्खी जाओमेरी लहरें न मिटा दें तुमकोمیرے ساحل پے نہ لکھی جاؤ میری لہریں نہ مٹا دیں تم کوरोज़ इक शाम का है ख़र्च इन परख़ाली कर दें न ये यादें तुमकोروز اک شام کا ہے خرچ ان پرخالی کر دی...
रौशनी का जज़ीरा ...
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
Tag :
  April 29, 2014, 2:07 pm
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