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समुद्र-संगम the mingling of oceans : View Blog Posts
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समुद्र-संगम the mingling of oceans

   AKHYAN AUR NAI KAVITA : a book on poetry criticizm-आख्यान की संरचना____दिलीप शाक्यआख्यान साहित्य का अर्थ हम ऐसे साहित्य से ग्रहण करते हैं जिसमें वाचक, कथा और श्रोता, की उपस्थिति का प्रायः विचार किया जाता है। मसलन प्रबंधात्मक कविता, कहानी, उपन्यास, यात्रावृतांत, आत्मकथा इत्यादि। इन सभी साहित्य रूप...
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Tag :criticizm
  June 2, 2013, 12:12 pm
.The Cinema of Poetry ____Pier Paolo Pasolini[This text was read in Italian by Pier Paolo Pasolini in June 1965 at the first New Cinema Festival at Pesaro. The present version is from the French translation by Marianne de Vettimo and Jacques Bontemps which appeared in Cahiers du Cinéma No. 171, October 1965.]–I think that henceforth it is no longer possible to begin a discourse on cinema as language without taking into account at least the terminology of semiotics. Indeed the problem, if one wishes to set it forth briefly, appears in the following way: whereas literary languages found their poetic inventions on the institutional basis of an instrumental language, quite common to all who s...
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Tag :Art-work
  April 21, 2013, 12:46 pm
क़दमों का नौहाघर.. [ख़ालिद जावेद की एक कहानी का शीर्षक]–मौत की किताब [उपन्यास]________ख़ालिद जावेद(आरंभिक अंश..)पहला पन्नाऐसी रातें कम आती हैं। पन्द्रह-बीस साल में षायद एक बार! आज की रात भी ऐसी ही है। जब चाँद से ज़मीन की दूरी कम हो जाती है और उसकी चमक भी बढ़ जाती है। मैं घबरा कर, य...
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Tag :Art-work
  April 16, 2013, 6:35 pm
कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तूने हमनशींइक तीर सा सीने में मारा कि हाय-हाय–कलकत्ता: ख़ौफ़, दहशत, अंधेरे और उत्तेजना का शहर। फ़ज़ा की बुलन्दियों से नीचे देखो तो दूर-दूर तक हरियाली दिखायी देती है, कहंी गहरी सियाही, कहीं पीलाहट लिए हुए। लेकिन ये सारा रंग-प्रदर्शन अभिव्यक्ति ...
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Tag :Literature
  March 29, 2013, 12:38 pm
.कोलकाता: ए पोर्टेट इन ब्लैक एंड ब्लड_______________शमीम हऩफीकलकत्ता: ख़ौफ़, दहशत, अंधेरे और उत्तेजना का शहर। फ़ज़ा की बुलन्दियों से नीचे देखो तो दूर-दूर तक हरियाली दिखायी देती है, कहंी गहरी सियाही, कहीं पीलाहट लिए हुए। लेकिन ये सारा रंग-प्रदर्शन अभिव्यक्ति के लिए बेचैन एक अनदे...
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Tag :Literature
  March 29, 2013, 11:59 am
Badalkar fakeeron ka hum bhes ghalib…-DIARY OF A YOUNG JOURNALIST TURNED INTO RICKSHAW-WALA________________________________GAURAV JAIN Why I became a Rickshaw-wallaI have realised that, The perspective generally doesn’t change from what you see, hear or read.It changes dramatically – sometimes in a snap – when your skin feels, sweat and bleed.I have sat in a rickshaw a zillion times, but every time in the rear seat. This seat is very cozy. It has got a shade; good amount of leg space and in most cases a good cushion as well. When the sun is over your head in all its fury, nothing beats a rickshaw ride.But what it means to be a rickshaw walla? How does it feel to pull a rickshaw righ...
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Tag :popular culture
  March 29, 2013, 1:14 am
Comics are a gateway drug to literacy…...इंद्रजाल कॉमिक्स में जाहिर तौर पर ली फॉक के किरदार ही छाए रहे, मगर बीच का एक दौर ऐसा था जब इसने कुछ नए और बड़े ही दिलचस्प कैरेक्टर्स से भारतीय पाठकों से रू-ब-रू कराया। मैं उन्हीं किरदारों पर कुछ चर्चा करना चाहूंगा। कॉमिक्स की बढ़ती लोकप्रियता के चलते 1980 म...
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Tag :popular culture
  March 22, 2013, 1:38 pm
वह रहस्यमय व्यक्ति अब तक न पायी गयी मेरी अभिव्यक्ति है…मुक्तिबोध् की कविता पर कुछ नोट्स.1आज़ादी के बाद की हिंदी कविता के सबसे महत्वपूर्ण और सबसे जुदा अंदाज़ के कवि गजानन माध्व मुक्तिबोध का जन्म 13 नवंबर 1917 को चंबल संभाग के श्योपुर ज़िले में एक मराठी परिवार में हुआ। पिता...
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Tag :Art-work
  March 18, 2013, 9:56 pm
______________The scene changes to an empty room__IEvery era has to reinvent the project of “spirituality” for itself. (Spirituality = plans, terminologies, ideas of deportment aimed at the resolution of painful structural contradictions inherent in the human situation, at the completion of human consciousness, at transcendence.)In the modern era, one of the most active metaphors for the spiritual project is “art.” The activities of the painter, the musician, the poet, the dancer et al, once they were grouped together under that generic name (a relatively recent move), have proved to be a peculiarly adaptable site on which to stage the formal dramas besetting consciousness, each indi...
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Tag :Art-work
  March 18, 2013, 12:27 pm
‘‘हमने जो तर्ज़े-फुगां की थी क़फस में ईज़ाद/फैज़ गुलशन में वही तर्ज़े-बयां ठहरी है’’_मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग…   [ click the link to listen this Nazm  MP3    ______________sung by noorjahan].गर्मियों की एक ढलती हुई दोपहर है। हल्की पीली धूप में गेंहू की पकी हुयी फसल का रंग सोने सा दमक रहा है। कुंए पर घू...
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Tag :Art-work
  March 18, 2013, 11:28 am
 शहर फिर शहर है यां जी तो बहल जाता है…__मेरे एक टीचर थे जिनकी पत्नी का देहांत हो चुका था। वे जब भी नया सूट सिलवाते थे तो पहनने के पहले ही जो भो कोई घर में आता उसे हैंगर में टंगे-टंगे ही दिखाकर पहले नये सूट की प्रशंसा सुनते। फिर पहनते तो बताते कि इसका चुनाव करने से पहले कितनी ...
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Tag :Art-work
  March 17, 2013, 4:13 pm
आईनाखाने में कोई लिए जाता है मुझे…                                           __शहरयार की शायरी का शहर और हम यह उन दिनों की बात है जब मैं झीलों के शहर भोपाल में साइकोलॉजी  आनर्स की पढ़ायी कर रहा था। वहॉं कुछ हमख़याल दोस्तों के साथ एक छोटी सा ‘ग्रुप’ बन गया था। हम सब तक़रीबन एक जैसे बैकग्रा...
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Tag :Art-work
  March 17, 2013, 8:10 am
  At the stroke of the midnight hour…__14-15 August, 1947Long years ago, we made a tryst with destiny, and now the time comes when we shall redeemour pledge, not wholly or in full measure, but very substantially. At the stroke of the midnight hour, when the world sleeps, India will awake to life and freedom…A moment comes, which comes but rarely in history, when we step out from the old to the new, when an age ends, and when the soul of a nation, long suppressed, finds utterance. It is fitting that at this solemn moment we take the pledge of dedication to the service of India and her people and to the still larger cause of humanity. At the dawn of history India started on her unending ...
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Tag :Art-work
  January 26, 2013, 10:54 am
susan_sontag-_on_photography/” rel=”attachment wp-att-78″>ON PHOTOGRAPHY/ SUSAN SONTAG=”Picture 222n” width=”351″ height=”479″ class=”alignnone Filed under: Uncategorized...
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Tag :Uncategorized
  January 25, 2013, 5:34 pm
मैं अकेला ही चला था जानिब-ए -मंज़िल मग़र…__हरिशंकर परसाई को स्मरण करते हुए ..[इस आलेख  में हिंदी के कवियों लेखकों और आलोचकों की साहित्यिक प्रतिबद्धता और ईमानदारी पर कटाक्ष करते हुए व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई को याद किया गया है। ..].आचार्य शुक्ल ने साहित्य में ‘विरुद्धों क...
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Tag :Art-work
  December 11, 2012, 9:26 am
ग़ालिब-ए-ख़स्ता के बगैर कौन से काम बंद हैंरोईये ज़ार-ज़ार क्या कीजिये हाय -हाय क्यों ?...
समुद्र-संगम the mingling of oceans...
Tag :Uncategorized
  November 10, 2012, 2:05 pm
Welcome to WordPress.com. This is your first post. Edit or delete it and start blogging!...
समुद्र-संगम the mingling of oceans...
Tag :Uncategorized
  December 4, 2009, 10:31 pm

...
समुद्र-संगम the mingling of oceans...
Tag :
  January 1, 1970, 5:30 am
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