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स्याही के बूटे ..... : View Blog Posts
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स्याही के बूटे .....

मैं बीत गयी इक और साल ...लम्हे-लम्हे कुछ ठहरी सीलम्हा-लम्हा ही बढ़ी चलीविकट रहा समय का जालमैं बीत गयी इक और साल ...रोयी तो मुस्कायी भीसपनों की परछाई सीअभी सुकूं अभी बेहालमैं बीत गयी इक और साल ...पलकें ना झपकाई थींरात कहाँ मुरझाई थीजलना जिसे, बुझी मशालमैं बीत गयी इक और साल ...हवा...
स्याही के बूटे ........
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  January 3, 2015, 11:54 am
डूबते-डूबते फिर  धीरे-धीरे उबरती हूँ छितरी हुई  बिखरी सी सागर के थपेड़ों से टूटी रह जाती हूँ मात्र अवशिष्ट समान जानती हूँ ... मैं ही हूँ दुर्गा मैं ही सिंदूर खेलती स्त्री और मैं ही हूँ वो अभिशप्त जिससे छीना गया अधिकार सिंदूर खेलने का दुर्गा-सम क...
स्याही के बूटे ........
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  October 7, 2014, 5:14 pm
मखमली रूई के फाहे सा बादलों से चुहल करता ग़ज़लों में बसा आशिक़ महबूबा ... नज़्मों-रुबाई का रातों का सूरज सितारों का शहंशाह आसमान के सहन में इठलाता था चाँद चांदनी बिखेरता ... अपनी गोलाइयों पर मुस्कुराता था चाँद आसमां से पिघल ... पानी में अकसर उतर आता था चा...
स्याही के बूटे ........
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  July 19, 2014, 5:55 pm
लोमड़ की टोली ने जम कर शिकार किया माँस इकठ्ठा कर दावतें उड़ायीं लहू के रंगों से आतिश सजायी जो जी भर गया तो कुछ निशानियाँ रख लीं जश्न की और पूँछ फटकारते फेंक दिये माँस के लोथड़े सड़ने के लिये उनके साथ चले आये थे खून सने पंजों के निशान उनके दाँतों में अभी भी क...
स्याही के बूटे ........
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  April 14, 2014, 3:09 pm
देखो! रोज़ की तरहउतर आयी हैसुबह की लालीमेरे कपोलों परमहक उठी हैं हवायेंफिर से ...छू कर मन के भावपारिजात के फूलसजाये बैठे हैं रंगोलीपंछी भी जुटा रहे हैंतिनके नये सिरे सेसजाने को नीड़सुनो! कोयल ने अभी-अभीपुकारा हमारा नामअच्छा,कहो तो...आज फिर लपेट लूँचंपा की वेणी अपने जूडे म...
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  March 22, 2014, 4:38 pm
मेरे तुम्हारे संबंधों कीक्यूँ सदा पृथक रही धुरीजो तुम रहे सदा से तुममात्र मेरे लिये ही क्यूँलक्ष्मण-रेखित परिधि विषमस्वीकृत थी जब जानकीअग्नि-परीक्षा क्यूँ रचीकैसी प्रीत की रागिनीमेरे तुम्हारे संबंधों कीक्यूँ सदा पृथक रही धुरीनदिया की जल-धारा सेनव-जीवन सोपान ...
स्याही के बूटे ........
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  March 10, 2014, 10:20 pm
कई नाग फुँफकारते हैंअँधेरे चौराहों परअटकने लगती है साँसों मेंठिठकी सी सहमी हवायेंखौफनाक हो उठते हैंदरख्तों के साये भीअपने ही कदमों की आहटडराती है अजनबी बनसूनी राह की बेचैनीबढ़ जाती है हद से ज़्यादातब ...टाँक लेते हैं दरवाज़ेखुद ही कुंडियों में साँकलकि इनमें क़रार ह...
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  January 21, 2014, 1:30 pm
संबंधों के रेशेकुछ मुलायम कुछ चुभते सेशून्य से हो के शुरूनित नये समीकरणों से गुज़रतेपहुँचना चाहते थे जहाँ हम दोनों हों समान हक़दारसंबंधों के रेशेकुछ मुलायम कुछ चुभते सेसहेज कर पिरोते ताना-बानासरल से जटिल की ओरबुनना चाहते थे बूटे जिनमें रंग सभी हों चमकदार संबंधों...
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  December 23, 2013, 11:46 pm
मुझे स्वीकारना थाजो भी दिया गयाहँस कर ...विनम्रता सेसामंजस्य बिठाना थाहर सुख हर दुःख सेपिंजरे वही थेआस-निराश केआँसू और मुस्कान केबस ...बदल गया थाहवाओं का रुख औरपानी का स्वाद...बदल गये थेकुंजी से खेलते हाथमुझे स्वीकारना थाजो भी दिया गयाहँस कर ...विनम्रता सेक्यूंकि नहीं ह...
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  December 1, 2013, 9:40 pm
कब से पड़ी थी चौखट पे नैनन में थी समाये रहीआ थोडा तुझे निचोड़ लूँअरी !बच के कहाँ जायेगीकरती है मुझसे दिल्लगीनये खेल काहे रचाय रीधर लूँगी बैया आज तोअरी !बच के कहाँ जायेगीकूक-कूक मन को रिझाये फुदके है ज्यूँ मुनिया कोई ले पंख तेरे मैं भी उड़ूँ अरी !बच के कहाँ जायेगी...
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  November 26, 2013, 10:08 am
लौ को बचाने की जुगत मेंढीठ हवाओं से जूझ रहे थे.....कुछ मासूम दियेजाने कब ...अचानकमनचली हवाओं ने लहरा कर......तीली और बारूदउड़ा दी....रोशनी की सारी कतरनेंअब रह गया है शेष .....चीख .....धुंआबेबसी के टुकड़े और नमकीन आँखों में बुझी चिंगारियों की राख  हवाओं पे मचलता नेपथ्य का संगीतआज भी गु...
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  November 7, 2013, 6:17 pm
वो शब्द अलंकार जिन्होंने गढ़ी प्रेम की परिभाषा मेरे तुम्हारे बीच मेरी कल्पना थी कविता थी या ...थे तुम स्वप्नों का ब्रह्मांड जिसमें पूरक ग्रहों से करते रहे परिक्रमा मैं और तुम मेरी कल्पना है कविता हैया हो तुम काल से चुराया एक पल जिसको पाकरबढ़ गयी जिजीविषा मुझमें ... तुम में ...
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  October 25, 2013, 5:54 pm
शब्द ...गहरे अर्थों वाले भाव ...कुछ मनचले से श्वास भर समीर ......चंचल महकी सफेद चंपा ......कुछ पत्तियाँ पीली एक राग मल्हार एक पूस की रात घास ...तितलियाँ बत्तख ...मछलियाँ फूलों के रंग ...वसंत का मन तड़प ...थोड़ी चुभन स्मृति की धडकन एक माचिस आग एक मुठ्ठी राख एक टुकड़ा धूप चाँद का रुपहला रूप सब ...
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  September 26, 2013, 5:57 pm
सितारे जड़े आँचल में चाँद सा चेहरा किया और अन्तरिक्ष की डोर थमा दी मेरे हाथ  अब घिरी हूँ मैं ग्रहों से अपनी धुरी पे नाचती न भीतर न बाहर परिधि की लकीर भर  ....दुनिया मेरे पास नहीं ...बेवजह न था सनद में लिखना तुम्हारा आकाश मेरे नाम ...
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  September 4, 2013, 7:35 pm
ज़हर है शिराओं मेंशब्द आग-आग हैकलम के सिरों पे अबधधक रही मशाल हैरूह की बेचैनियाँस्याह रंग बदल रहींचल रही कटार सीलिए कई सवाल हैध्वस्त हैं संवेदनालोटती अंगार पे अर्थ हैं ज्वालामुखी लावे में उबाल है स्वप्न चढ़ चले सभी वेदना की सीढ़ियाँ नज़्म के उभार में लहू के भी निशान हैं ब...
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  August 26, 2013, 6:20 pm
स्वच्छ श्वेताकाश में बदलियाँकिसे चल रहीं पुकारतीबूँदें ....आसमान से टपकरह जातीं अधर में लटकीदूर ....चटख रंगों का इंद्र-धनुषकानों में गूँजती कोयल की कूक ....शायद वही .....नहीं ....पता नहीं !!मखमली घास के बिस्तर पर चुभन सीरंगीन पंखुड़ियाँ ....दूर हैं ?....पास हैं ?क्यूँ है उलझन सी ???बह जान...
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  August 12, 2013, 5:32 pm
खो गया वजूद मेरा यूँ वक़्त की सख्त दरारों में मेरे हिस्से की धूप अब मुझ तक ही आ पाती नहीं आसमां पे टँगा रहा जो  मीनारों तक पहुंचा है बिखरे टुकड़े चाँदनी,पर छत तक सीढ़ी जाती नहींतारों की झिलमिलाहट मेंसपने भी मुस्कुराये थे  अँधेरा हुआ है आसमां सपनों को सु...
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  July 23, 2013, 11:38 am
ख्वाहिशों की झील में काई ने घर बनाया हैनीला सा आसमानथोड़ा सा धुंधलाया हैकिनारों की सील में   गहराता है सन्नाटा खरपात ने दरारों में फिर आसरा सजाया हैसीढ़ियाँ लिये बैठी हैं  खामोशी के कदमयुगों से कोई प्यासा भीइस तरफ कहाँ आया हैआलीशान गुम्बदी कुकुरमुत्ती हवेली से  ...
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  July 12, 2013, 6:29 pm
आत्ममुग्धा आत्ममग्नकलकल कर चली निनादपर्वत-पर्वत उलाँघतीबही जाती थी चंचल नदीहरियाली को पंख लगानिपट जीव को कर सजीवअमिय रस धाराओं सीबही जाती थी चंचल नदीनिर्मल काया सजल हृदयतरल सुकोमल स्पर्श सेउपल-शिलायें तराशतीबही जाती थी चंचल नदीपखार तप्त रवि-वल्लरीझिलमिल आँचल प...
स्याही के बूटे ........
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  July 4, 2013, 11:00 am
आज मद में चूर है कल रोयेगा ज़ार-ज़ार धरती के आंचल को यूँ ना कर तू तार-तार पर्वत-शिलायें कर देगीं अहम के टुकड़े हज़ार सागर भी लील जायेगा घमंड का कारोबार मरुभूमि के व्यंग का तब होगा कोई जवाब ?नागफनी के फूलों से कब सजे किसी के ख्वाब !सूरज का अट्टाहास जब भेदेगा तेरे कर्ण क...
स्याही के बूटे ........
Tag :काव्य-रचना
  June 23, 2013, 3:53 pm
सुनाती हैं कहानियाँ यहाँ की वहाँ की धरती आसमां की या फिर ...होते हैं वो छूटे किनारे !!....कौन जाने सच है क्या ....और क्या छलावे .दे रखी है ड़ोर पराये हाथों में नाचती हैं इशारों पर या फिर ....होते हैं मजबूर नचाने वाले !!....कौन जाने सच है क्या ....और क्या छलावे .थिरकती मचलती हैं सज-धज...
स्याही के बूटे ........
Tag :काव्य-रचना
  June 6, 2013, 4:51 pm
सागर सी गहरी आँखों में खाली एक धुंआ सा है  सूरज तो कब का डूब चुका अब तो बस अमावस्या है मेले थे जिन राहों में नागफनी उग आयी है अपनी ही मंज़िल है लेकिन खुद से ही कतराई है स्वाद सुगंध कब बीत गए यादों में भी याद नहींसन्नाटे कहकहे लगाते  और कोई संवाद नहीं झुलस गये सपनों की गा...
स्याही के बूटे ........
Tag :काव्य-रचना
  May 25, 2013, 6:32 pm
कलाई से कांधों तक आभूषित एक नारी का प्रतिमान मोअन-जो-दाड़ो में दबा मेरा अनकथ संसार क्या हूँ मैं ?पन्नों में सिमटा .....मात्र एक युगीन वृत्तान्त ??? खोया सारा समर्पित अतीत लक्ष्मण-रेखा के पार अग्नि भी जला ना पायी एक संशय का तार क्या हूँ मैं ???युग-युग से पोषित मानस में मर्या...
स्याही के बूटे ........
Tag :काव्य-रचना
  May 7, 2013, 5:05 pm
यूँ आईने से मुलाक़ात किया करोकभी खुद को भी यारा जिया करोज़िन्दगी के सफर में बिछड़े कईकभी नाम उनका भी लिया करोरूठों को मनाना नामुमकिन नहींकभी सब्र के जाम पिया करोन रहो अपने ही उजालों में ग़ुमअँधेरों को भी रोशन किया करोमौत के इंतज़ार में बेज़ार हो क्यूँज़िन्दगी को एहत...
स्याही के बूटे ........
Tag :काव्य-रचना
  April 27, 2013, 5:50 pm
आँसू ..... एक सैलाबहदों में उफनता बिलखताया सेहरा में ....भटका समंदरपत्थर पे सर पटकनालहरों का बिखरनासब है देखा-भालावेदना ....सुलगी लकड़ीभीगे ख्यालों से नमन जलती है ...न बुझ पातीगीली लकड़ी का जलनापल-पल सुलगनासब है देखा-भालादिलासा ....महीन शब्द महज़ एक उलझन सुलझाओ तो ...हो जाते ...
स्याही के बूटे ........
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  April 26, 2013, 11:08 am
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