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अल्फ़ाज़

कहीं तो किसी को ज़रूर खलते होंगे,कुछ ख्वाब बेबात जब पलकों से फिसलते होंगे.अपनी आँखों में लेकर अश्क भी आग भी,नासेह अदावतों के बाज़ार में निकलते होंगे.कोई कैसे करें उम्मीद मुकम्मल जहान की,उन बच्चों से जो नफरती दरारों में पलते होंगे.जिन्हें यकीन हैं की सब ठीक हो जाएगा,वो भी ...
अल्फ़ाज़ ...
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  November 20, 2015, 7:51 pm
चलो आज फ़रिश्तों से ख़ुदाई मांगी जाए,रिसते हुए ज़ख्मों की दवाई मांगी जाए.उसकी एक झलक देखी और शरीर हो गए,ये कैसी मोहब्बत इससे रिहाई मांगी जाए.उसकी शान में एक ज़माने से लिखते रहे हैं हम,थोड़ा सा सच लिख सकें ऐसी रौशनाई मांगी जाए.महफ़िलों को हमारी ग़ज़लों ने तन्हा ही किया है,दानिश-वर...
अल्फ़ाज़ ...
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  January 23, 2015, 4:14 pm
फ़क़त इक कली में हासिल-ए-बहार ढूंढते हैं, हम शगुफ़्ता चेहरों में इश्क के आसार ढूंढते हैं.जिसके ज़रिये दो घरों की बातें हो जाती थीं,कहाँ गया खिड़कियों से बंधा वो तार ढूंढते हैं.इक अब्र आवारा मिरे सर-ए-बाम क्या दिखा,लोग मेरे आँगन में खोयी बहार ढूंढते हैं.किसने कब क्यों कैसे ...
अल्फ़ाज़ ...
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  January 22, 2015, 6:01 pm
हज़ार चुप रख लो मगर कभी तो सुनानी ही होगी,जो उम्रों के मरासिम हैं तो कोई कहानी भी होगी.जो भर रहे हो तो गिन के भरना इसे अज़ाबों से,क़यामत के रोज़ ये जिस्म की गठरी उठानी भी होगी.उनकी आँखों के चराग़ फूंकते हो मगर याद रहे,तुम्हारे घर की रौशनी कभी सयानी भी होगी.हम अपने रहनुमाओं की रह...
अल्फ़ाज़ ...
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  January 21, 2015, 10:03 pm
एक एक फंदे गिन कर पलकों पर जो थे बुने गए,कुछ ख्वाब कल रात वहीँ दीवारों में चुने गए.बरसों जिनकी आवाजों पर ख़लाओं की पाबंदी थी,वो सियाह सन्नाटे फिर कई बज्मों में सुने गए. रात की रौशनी में उनकी गिरहें साफ़ दिखती हैं,जो मनहूस रिश्ते दिन के अंधेरों में थे बुने गए.तुझे है उम...
अल्फ़ाज़ ...
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  January 19, 2015, 2:20 pm
दिल की दिल में रखने से रिश्ते तो बच जाते हैं,ये अन्दर के ज़लज़ले मगर हम को खा जाते हैं.यूँ तो सभी को ज़माने में रौशनी से इश्क है,फिर भी यूँ ही कभी अँधेरे नज़रों को भा जाते हैं.बराए खौफ़ झुकते हैं सर उसकी सभाओं में,सुना है फ़रिश्ते रहमत में घर जला जाते हैं.अपने आगे फैली हुई नन्ही हथ...
अल्फ़ाज़ ...
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  January 16, 2015, 10:33 pm
उसने कभी जो मुड़ के आवाज़ लगायी होती, हम उम्मीदों के असीर थे हमारी रिहाई होती. बहुत सुना है ज़माने से कि ख़ुदा होता है, उसे देख सके आँखों में ऐसी बीनाई होती . कहने को उसकी आँखों में इश्क का समंदर है, हम डूब जाते काश इतनी तो गहराई होती.अधजले से कुछ ख्वाब रह गए इन आँखों मे...
अल्फ़ाज़ ...
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  January 13, 2015, 10:05 pm
वो रख के चौखट पे चराग देखते हैं,बुझते हुए सूरज की आग देखते हैं.उम्र ने लगाई थी कुछ यादें ज़ेहन पर,वक़्त कैसे धो रहा है वो दाग देखते हैं.किस सम्त इस जहां में जल रही है ख़ुदाई,हम राख में सने हुए बाग़ देखते हैं.दुनिया के साथ गोल-गोल वो भी घूमते हैं,इस बात से बेखबर हैं लोगबाग देखते ह...
अल्फ़ाज़ ...
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  January 13, 2015, 6:47 pm
खुद को इंसान कहता है और शैतान से बदतर है, हर लफ्ज़ उसका ज़हर में डूबा हुआ नश्तर है. उसे रहा इश्क किसी भी बात से नहीं है, बस इश्क के नाम पे वो लूटता अक्सर है, कोई भी तारीख हो यही हुनर जानता है,बस्तियां उजाड़ के ज़मीन को करता बंजर है. तरक्की मान के जिसपे गुरुर कर रहा है, वो देख नही...
अल्फ़ाज़ ...
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  January 11, 2015, 12:08 am
ऐसा नहीं है कि नादानी से काम अटक जाता है,रास्ता मालूम हो तो भी इंसान भटक जाता है.कितनी भी होशियारी से तुम बातों को दफ्न करो,वक़्त कहीं से ढूंढ कर उन्हें पैरों पर पटक जाता है.सबको है शौक़ नया सारा सच जानने का,और अगर सच कह दो तो खटक जाता है.उससे कह दो सूरज का इंतज़ार न किया करे,चा...
अल्फ़ाज़ ...
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  January 10, 2015, 5:53 pm
विरह की गोद में कोई सिर रख कर रोता है,दर्द मिलता है जब टूट कर इश्क होता है.दूर तक निगाहों में नफरत और रंजिश के खेत हैं,बुज़ुर्ग कहते थे काटेगा वही जो तू बोता है.कितने ही दर-ओ-बाम उजाड़े हैं आजादी के लिए,लेकर आजादी अपनी अब वो क़फ़स को रोता है.एक उम्र से ख्वाहिशों के सफ़र में था,थक ग...
अल्फ़ाज़ ...
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  January 10, 2015, 1:07 pm
मेरी बेइंतेहा मसरुफ़ियत देख कर वो,छोड़ कर मुझे सफ़र पर तनहा निकल गया.उसके चेहरे को ग़ज़लों में ढूंढता हूँ मैं,जो एक शेर सा चुपके से निकल गया.बिखरे हैं तस्बीह के सब दाने ज़मीं पर,जिसने थाम के रखा था वो धागा निकल गया.खुद ही रखने होंगे ज़ख्मों पर मरहम अब तुझे,मसीहाओं का जो दौर था कब ...
अल्फ़ाज़ ...
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  January 9, 2015, 1:38 pm
उसकी तकलीफों का एक ही लिबास होता है,वो चुप हो जाता है जब भी उदास होता है.सर सब्ज़ पेड़ सारे पत्तों को दफ्न करने लगते हैं,खिज़ा का मौसम जब पास होता है.कौन आसानी से खींच लेता है ज़मीं औरों की,ये हुनर ही इस जहां में ख़ास होता है.हर चौखट हर दीवार पे जिंदा लाशें टंगी हैं,ख़ुदा मर गया है ...
अल्फ़ाज़ ...
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  January 8, 2015, 9:18 pm
तमाम उम्र की दौड़-भाग,ख्वाहिशों की बेतरह कांट-छांट,और बेहिसाब चौखटों की धूल पिये,गयी रात उसकी हामला बेचैनी ने,एक बेतरतीब सा ख्वाब जना है...प्रशांत ...
अल्फ़ाज़ ...
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  January 8, 2015, 6:28 pm
रहेगा गम उसे हर उम्र इस बात का,मेरे साथ कर न सका वो सौदा जज़्बात का.मेरे इज़हार पर उसने मज़हब पूछ कर,दे दिया था फ़र्क हमारे ख़यालात का.जाम है, शाम है और रकीबों का हुजूम,देखें क्या होगा हश्र इस मुलाकात का.उसे न दिखा तो उसकी नज़रों का दोष था,अँधेरे में डूबना तो मुकद्दर है रात का.प्रश...
अल्फ़ाज़ ...
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  January 3, 2015, 5:21 pm
आज शाख से फिर एक फूल उतर जाएगा,उन्हीं बहानों से ये साल भी गुज़र जाएगा.मैं जानता हूँ की वो मेरा सुकून ले गया है,मुझे ये भी पता है पूछने पे मुकर जाएगा.मुद्दतें हो गयीं मुझे घर से निकले हुए,मेरी छत ले आना कोई जो उधर जाएगा.मेरा वक़्त हो कर भी मुझे ही नहीं मिलता,उम्मीद है इस बरस शाय...
अल्फ़ाज़ ...
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  January 2, 2015, 4:46 pm
बेवजह लफ़्ज़ों को जोड़ कर कोई नज़्म कही जाए,या कि ज़िन्दगी की नज़्म को लफ़्ज़ों की डोर दी जाए.खुदापरास्तों ने सर सब्ज़ हवा को शर कर दिया है,काफिरों ने सहेजी हैं कुछ सांसें, आओ बांटी जाए.मुर्दा किताबों के हर्फ़ में जब इंसानियत घुटने लगे,समझो वक़्त हो चला है कि किताब बदल दी जाए.अब की शा...
अल्फ़ाज़ ...
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  December 19, 2014, 12:31 pm
मैं आज भी रुका हूँ वहीँ इंतज़ार सा,तेरे स्पंदन से स्पंदित तार सा,कश्ती पे टंगी पतवार सा,मैं आज भी रुका हूँ वहीँ इंतज़ार सा.टहनियां सब हरे पत्तों से भर गयीं,ज़मीं तक उतरती धूप शीतल कर गयीं,रह गया हवाओं में फिर भी खार सा,मैं आज भी रुका हूँ वहीँ इंतज़ार सा.उम्रों के टेढ़े रास्ते अब...
अल्फ़ाज़ ...
Tag :उधार
  December 17, 2014, 7:54 pm
आज-कल ज़िन्दगी को थोड़ा कम पीते हैं, है प्यास बड़ी और प्यासे जीते हैं.  रफ़्तार में कहाँ कुछ नज़र आता है कभी, जो दिखते हैं मंज़र धुंधले दिखते हैं. लोगों से सुनते थे कभी तश्नगी-ए-मंजिल का हाल,हमें भी हर कदम अब सराब ही मिलते हैं. वो मिल जाएँ कभी तो हमारा हाल कह देना, फ़रिश्ते कहाँ ...
अल्फ़ाज़ ...
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  May 28, 2014, 9:40 am
वो घर अपना छोड़ के मकान ढूंढता है, गली-गली जीने का समान ढूंढता है.  खानाबदोशों को मिलता है सफ़र और तनहाई, कैसे-कैसे दिल में अरमान लिए घूमता है.  टुकड़ा-टुकड़ा रोटी के ढेर में दबा,वो रेहन पर रखे सारे ख्वाब भूलता है....
अल्फ़ाज़ ...
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  May 25, 2014, 4:28 pm
राघव अभी गेट के अन्दर घुसा ही था, कि शोभा की नरकट सी आवाज़ ने उसके सुकून को तार-तार कर दिया. एक बार तो उसका मन हुआ कि उलटे पाँव वापस चला जाए. जाकर किसी घाट किनारे बैठे या फिर कहीं मंदिर में डेरा डाल लें. पर दिन भर की थकान के बाद उसे बैठने का मन भी नहीं होता. खैर सारी हिम्मत बट...
अल्फ़ाज़ ...
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  May 22, 2014, 5:45 pm
उसने कुछ देर इधर-उधर देखा और फिर धीरे से सब की नज़र बचा कर एक लड्डू उठा लिया. अब भला उससे कैसे इतना देर इंतज़ार होता कि पहले भगवान जी खा लें फिर वो खाये. और ऐसा भी नहीं है कि उसने संयम नहीं रखा. माँ के कहने पर पिछले दो घंटे से खुद को संभाले बैठा है. कभी कोई बोलता राहुल ये ले आ, तो क...
अल्फ़ाज़ ...
Tag :god
  May 20, 2014, 11:29 pm
मुश्किलों में देख कर कश्ती अपनी वो रोने लगे, काफ़िर भी ख़ुदा के नाम से आस्तीनें भिगोने लगे. इन आतिश-फ़िशानी राहों का जब इल्म था तुम्हें,फ़िर क्यों दामन-ए-हयात में यूँ सपने पिरोने लगे. कुव्वते बर्दाश्त से बढ़ने लगे जब बोझ ज़िन्दगी के, लोग बाखुशी खुद को शराब में डुबोने लगे. तेरी स...
अल्फ़ाज़ ...
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  May 19, 2014, 2:40 pm
कुछ लिखने की चाहत और कुछ अर्थपूर्ण लिखने में बड़ा फ़र्क है. कागज़-कलम ले कर अगर बैठ भी जाओ तो शब्दों की स्याही नहीं मिलती. और अगर थोड़ी मशक्कत करके शब्दकोष से थोड़ी सी स्याही ले भी ली तो भावनाओं का खुरदुरापन कागज़ पर उतरने लगता है. फिर जो कुछ थोड़ा-बहुत पढ़ने लायक होता है वह अक...
अल्फ़ाज़ ...
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  May 18, 2014, 9:13 pm
अपनी और अपने देश की हालत आजकल कुछ ऐसी ही है।  हमें ऊपर वाले ने दर्शन देने से इनकार कर दिया और देश को सरकार वालों ने।  बड़ी उम्मीद ले के हम पहली तारिख को हाजरी देने गए थे, पर वहां जाके पता चला की आजकल ऊपर वाले को भी सिक्योरिटी की चिंता सत रही है। हमारे कंधे पे काला बैग देखा औ...
अल्फ़ाज़ ...
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  January 3, 2013, 11:36 am
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