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The Heritage

हम बस आपसे निवेदन करते हैं,कि प्रत्येक शहर में एक लाइब्रेरी होती हैऔर हमारे शहर इलाहाबाद में भी एक लाइब्रेरी हैजो अब कबूतरों और धूल का अड्डा बन चुकी हैकभी गुलजार रहने वाले उनके बगीचे अब घास और झाड़ियों से अटे पड़े हैंऔर साइकिल स्टैण्ड जुआरियों और नशेडियों की पनाहगाह।ऐ...
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  June 5, 2017, 11:42 am
कुछ अजीब सा माहौल हो चला है,मेरा रायपुर अब बदल चला है….ढूंढता हूँ उन परिंदों को,जो बैठते थे कभी घरों के छज्ज़ो परशोर शराबे से आशियानाअब उनका उजड़ चला है,मेरा रायपुर अब बदल चला है…..होती थी ईदगाह भाटा सेकभी तांगे की सवारी,मंज़िल तो वही हैमुसाफिर अब आई सिटी बस मेंचढ़ चला हैमेरा...
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  January 10, 2017, 8:42 pm
महाश्वेता देवी जी की एक बहुत अच्छी कविता ***आ गए तुम ?द्वार खुला है अंदर आ जाओपर ज़रा ठहरोदहलीज़ पर पड़ेपॉयदान परअपना अहम् झाड़ आनामधु मालती लिपटी हैमुंडेर सेअपनी नाराज़गीउस पर उंडेल आनातुलसी के क्यारे मेंमन की चटकन चढ़ा आनाअपनी व्यस्तताएँबाहर खूँटी पर टाँग आनाजूतों के सा...
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  September 11, 2016, 5:22 pm
न मैं हँसी, न मैं रोईबीच चौराहे जा खड़ी होईन मैं रूठी, न मैं मानीअपनी चुप से बांधी फाँसीये धागा कैसा मैंने कातान इसने बांधा न इसने उड़ायाये सुई कैसी मैंने चुभोईन इसने सिली न उधेड़ीये करवट कैसी मैंने लीसाँस रुकी अब रुकीये मैंने कैसी सीवन छेड़ीआँतें खुल-खुल बाहर आईंजब न ...
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  September 11, 2016, 5:12 pm
यह एक पीठ हैकाली चट्टान की तरहचौड़ी और मजबूतइस पर दागी गयींअनगिनत सलाखेंइस पर बरसाये गयेहज़ार-हज़ार कोड़ेइस पर ढोया गयाइतिहास कासबसे ज़्यादा बोझयह एक झुकी हुई डाल हैपेड़ की तरहउठ खड़ी होने को आतुर - एकांत श्रीवास्तवसौजन्य : जय प्रकाश मानस...
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  September 11, 2016, 5:06 pm
बाढ़ के बीच उस आदमी की हिम्मतटँगी है आकाश में और धरती डूबती जा रही हैपाँव के नीचे बचाने के लिएअब उसके पास कुछ नहीं है सिवाय अपनेवह बचा हुआ हैबचाने को बाढ़बाढ़ बची रहेगीतो बाढ़ से घिरे आदमी के फ़ोटू बचे रहेंगे - डॉ. श्याम सुंदर दुबेसौजन्य : जय प्रकाश मानस ...
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  September 11, 2016, 5:02 pm
रात चूसती, दिन दुत्कारेदुख-दर्दों के वारे-न्यारे।परसों मिली पगार हमें हैऔर आज जेबें खट्-खालीचौके की हर चुकती कुप्पीलगती भारी भरी दुनालीकिल्लत किच-किच में डूबे हैंअपने दुपहर, साँझ, सकारे।पिछला ही कितना बाक़ी हैऔर नहीं देगा पंसारीसूदखोर से मिलने पर भीसुनना वही राग-द...
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  September 11, 2016, 4:56 pm
(सभी महिलाओ को समर्पित)बेटी से माँ का सफ़र बेफिक्री से फिकर का सफ़ररोने से चुप कराने का सफ़रउत्सुकत्ता से संयम का सफ़रपहले जो आँचल में छुप जाया करती थी  ।आज किसी को आँचल में छुपा लेती हैं ।पहले जो ऊँगली पे गरम लगने से घर को उठाया करती थी ।आज हाथ जल जाने पर भी खाना बनाया करत...
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  May 7, 2016, 11:52 am
नये साल में फिर से याद आयी कविता ---------------------------------------एक बार हमारी मछलियों का पानी मैला हो गया थाउस रात घर में साफ़ पानी नहीं थाऔर सुबह तक सारी मछलियाँ मर गई थींहम यह बात भूल चुके थेएक दिन राखी अपनी कॉपी और पेंसिल देकरमुझसे बोलीपापा, इस पर मछली बना दोमैंने उसे छेड़ने के लिए काग...
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  March 7, 2016, 12:48 pm
पता नहीं क्योंअक्सर जी करता हैयाद करूँबचपन के उस क्षण कोकाका ने लिवाया था मुझेएक नया जूता का जोड़ा ।नए जूते की महक कोपहली बार जाना थाकाला जूता, चमकीलापूरे मन को भा गया थाकाका की हामी ने मेरा दिल भर दिया थाजैसे मेरे लिए ही बना था यह जूताक्यूँ न याद करूँ उस क्षण कोपहली बा...
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  March 7, 2016, 12:40 pm
चाहे हाड़ तोड़कर - चाहे हाथ जोड़कर सबसे अंतिम में पाँव पकड़कर इन सबसे पहले गुल्लक फोड़करले ही आते हैं अनाज पीठ लादकरसबसे मनहूस - अंधेरी गलियों मेंदिन ढ़लने से पहले जो पिता होते हैं जो पिता होते हैं वे कभी नहीं थकतेपालनहार देवता, उनके पिता ईश्वर थक हार भले मुँह छुपा लेंव...
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  March 7, 2016, 12:27 pm
हमारे भीतर होता था खिलखिलाता मनमन के बहुत भीतर सबसे बतियाता घरघर के भीतर उजियर-उजियर गाँव गाँव के भीतर मदमाते खेतखेत के भीतर बीज को समझाती माटी माटी के भीतर सुस्ताते मज़ूर और सिर-पाँवपाँव के भीतर सरसों, गेहूँ, धान की बालियाँबालियों के भीतर रंभाती गायगाय के भीतर हंकड़...
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  March 7, 2016, 12:21 pm
जल बचा था दिखना बचा हुआ थाकहीं-न-कहीं कम-से-कम कोई तालाब तालाब बचा था दिखना बचा हुआ थाकभी-न-कभी कम-से-कम कोई घाटघाट बचा था दिखना बचा हुआ थाकुछ-न-कुछ कम-से-कम कोई चित्र चित्र बचा था दिखना बचना हुआ थाकैसे-न-कैसे कम-से-कम कोई मित्र एक दिन जब मित्र न बचा था न दिखना बचा हुआ था चित्...
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  March 7, 2016, 12:09 pm
कुहरे की चादर कोभूरी एक चिड़िया ने नोकदार चोंच सेकाटा पहले,फिर चीरती चली गईदूर आसमान से सूरज ने अचानक अपना ररक्तवर्णी चेहराउठाया आसमान मेंलड़ते हुए कुहरे सेनदी ने खुली बाँहों मेंभर लिया सूरज कोफिर सूरज चिड़िया से,नदी से,काव्य पाठ करता रहामैंने सिर्फ़ सूरज का काव्य ...
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  March 3, 2016, 11:10 am
जिन पेड़ों पर बैठे बगुलेउन पेड़ों के दिन गिनती के।कैसे-कैसे लोग पालतेकैसी-कैसी आकांक्षाएँएक-एक कर टूट रही हैंइंद्रधनुष की प्रत्यंचाएँजिन नातों के नेह अचीन्हेउन नातों के दिन गिनती के।फसलें उजड़ गईं खेतों कीघर-आँगन छाया सन्नाटागाय बेच,गिरवी जमीन रखहरखू तीर्थाटन से लौ...
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  March 3, 2016, 10:57 am
सतपुड़ा जब याद करे, फिर आनाआना जी नर्मदा बुलाए जबधवल कौंच पंक्ति गीत गाएँ जबचट्टाने भीतर ही भीतर जब सीझ उठेंआना जब सुबह शाम झरनों पर रीझ उठेछरहरी वन तुलसी गंधिल आमंत्रण देंआना, जब झरबेरी लदालद निमंत्रण देंमहुआ की शाखें जब याद करें. फिर आना । घुंघची का पानी जब दमक उठेअं...
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  March 3, 2016, 10:54 am
मैं कुछ झूठा, वह कुछ सच्चाना मैं पूरा झूठाना वह पूरा सच्चा मैंने चाहा पर हो न सका पूरा-पूरा झूठाउसने चाहा पर हो न सका पूरा-पूरा सच्चाकुछ झूठा हूँ मैं मतलब कुछ मुझमें भी सच्चाईकुछ सच्चा है वह मतलब कुछ उसमें भी झूठाईहम दोनों ही करते हैं हर पल - हर क्षण - हरदम लड़ाईकरे कोई अगव...
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  March 3, 2016, 10:53 am
ज़मीन पर जो दिख रहा है ख़ून नहीं ख़ून का धब्बा है ख़ून तो सोख लिया है ज़मीन ने शरीर पर जो दिख रहा है जख़्म है दर्द तो सोख लिया है शरीर ने कुछ ही दिनों में ख़ून के धब्बे पर जम जाएगी धूल की परत धीरे-धीरे फिर मिट जाएगा जख़्म का निशान भी कोई आँख नहीं देख पाएगी दिल के जख़्म को ज़म...
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  March 3, 2016, 10:52 am
चावल के दो दाने संगचुटकी भर नमक रखाफटे जूते, दूरिहा मंजिल पाँवों की धमक रखा तन सूखा, धन भी सूखामन अविकल धमक रखा काँटे मीत, प्रीत और रीतमुरझाने के पहले गमक रखा रख सकता था महल अटारी, नहीं रखारख सकता था कृपाण कटारी, नहीं रखारख सकता था सोन थारी, कहाँ रखा रख सकता था सोलह तरकारी, ...
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  March 3, 2016, 10:49 am
पराजय का अर्थ विजय हैयह कौन जानता है मुझ से अधिकजो सबसे बुरासबसे अधिक सुन्दर हैइसे कौन जान सकता है सिवाय मेरेजो डूबते हैं, जानते हैं वे हीउस ज़मीन का पताजिसमें छुपा है आनन्द जीवन कामैं तो हूँ पराजय का मित्रलोग इसे अनुभव कहते हैं बस- लीलाधर मंडलोई  ...
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  March 3, 2016, 10:47 am
जब-बगैर किसी आंधी के गिरने लगते हैं पेड़बगैर किसी युद्ध के मरने लगते हैं महारथीपूरा हो जाता है ब्रह्मा का दिनसदी हिलने लगती हैयूं ही-यूं ही मच जाती है चिल्ल-पोंयूं ही पसर जाता है शोरमनबोध बाबूआप क्यों शामिल हैं इस गैर ज़रूरी होड़ मेंजब कोई आवाज़ साफ़ सुनाई नहीं देतीरास्ता ...
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  March 3, 2016, 10:38 am
इलाहाबाद के निराला सभागार में लगे पुस्तक मेलाके समापन अवसर पर इलाहाबाद कीे जानी मानी समाजसेवी संस्था सुसंस्कृति ने समाज में किताबों के हालात का जायज़ा लेने के विनम्र प्रयास के तहत बुद्धिजीवियों के सानिध्य में एक संगोष्ठी का आयोजन किया । इस कार्यक्रम की अध्यक्षता ...
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  March 3, 2016, 10:33 am
उनकी कविता सुनने लोग कई कोस दूर से पैदल चलकर आते थे और रात-रात भर उन्हें और-और कहकर कविता का रसपान करते थे । हिन्दी और छत्तीसगढ़ी कविता की क्लासिकता को मंच में भी जिस तरह उन्होंने संभाले रखा वह अप्रतिम है । संत होकर भी राजनीति में मंत्री पद तक पहुँचने वाले जनप्रिय संत क...
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  March 3, 2016, 10:31 am
सरस्वती त्रिपथगा यमुना,    संगम  पर्व  मनाऐगें,दर्शन अमृतपान कराकर, सभी जन्म  तर  जायेगें ।                 अर्ध्द कुम्भ हो महा कुम्भ हो,                      माघ  मास का  मेला,              &...
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  February 18, 2016, 6:08 pm
घास की हरी पत्तियों मेंछिपी हुई पगडंडियाँ थींजिन पर हम चलते थेहम चाहते थे कोई साँप हमें डस लेमगर हर साँप चौंककर रास्ता छोड़ देता थामृत्यु हर बार जीने का एक मौक़ा देती थीऔर हम जिए चले जाते थेअपने लिए कमदूसरों के लिए ज़्यादाहम खुश दिखते थेक्योंकि जीने के लिए खुश दिखना था...
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  November 27, 2015, 9:55 pm
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