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Kavya-Sansaar

कवि श्री हस्तीमल 'हस्ती' की रचना:ऐसा नहीं कि जिस्म में सिमटा हुआ हूँ मैं,नज़रे जहाँ तलक मेरी फैला हुआ हूँ मैं |मिट्टी से पाटने की हुई जब से कोशिशे,तब से तो और  ज्यादा ही गहरा हुआ हूँ मैं |कितनी जुदा है मेरी बनावट भी दोस्तों,देखो तो बद्दुआओ से अच्छा  हुआ हूँ मैं |सी लो मुझे भी ...
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Tag :
  December 10, 2011, 10:04 am

कवि श्री हस्तीमल 'हस्ती' की रचना:ऐसा नहीं कि जिस्म में सिमटा हुआ हूँ मैं,नज़रे जहाँ तलक मेरी फैला हुआ हूँ मैं |मिट्टी से पाटने की हुई जब से कोशिशे,तब से तो और  ज्यादा ही गहरा हुआ हूँ मैं |कितनी जुदा है मेरी बनावट भी दोस्तों,देखो तो बद्दुआओ से अच्छा  हुआ हूँ मैं |सी लो मुझे ...
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  December 10, 2011, 10:04 am
संकल्प: कवि- निर्मल चन्द्र 'तेजस्वी'फिर खौफनाक  अंधेरो ने मुझे डराना चाहा है,राह के पत्थरो ने मुझे रोकना चाहा है.मेरे भविष्य को नेस्तनाबूद करने के अभियान मेंआज वे लोग भी शामिल हैजो पूर्व के मेरे विजय जुलूसो कीअग्रिम पंक्तियों में थेपर में भाग्य या समय को दोष नहीं दूंग...
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  December 9, 2011, 3:24 pm
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