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कदाचित : View Blog Posts
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कदाचित

1990 के आसपास सोवियत संघ और उससे जुड़े देशों में कम्युनिस्ट व्यवस्थाओं के एकाएक ढह जाने का सबसे प्रकट कारण वहाँ की अर्थव्यवस्थाओं का जड़ हो जाना था। इस स्थिति को मार्क्सवादी सिद्धांत, जो निजी लाभ की प्रेरणा को सामूहिक हित के लक्ष्य में रूपांतरित करता है, की विफलता के तौ...
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  June 12, 2017, 7:35 pm
रीवा में मनोज मिश्रा ने एक बैंक्वेट हॉल को प्रेक्षागृह की शक्ल दे दी है। मशक्कतों से तैयार किया गया इसका स्टेज अच्छा-खासा किंतु अस्थायी है। शादियों के सीजन में उसे उखाड़ देना पड़ता है। रंग-अलख नाट्य उत्सव में इसी स्टेज पर मंडप आर्ट्स की प्रस्तुति ‘एक विक्रेता की मौत’ ...
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  June 2, 2017, 4:38 pm
ग्वालियर के नाट्य मंदिर प्रेक्षागृह में जाने से लगता है मानो आप वक्त के किसी लंबे वक्फे का हिस्सा हों। यहाँ की दीवारों, कुर्सियों, पंखों तक में कई दशक पुराना माहौल आज भी अक्षुण्ण है। प्रेक्षागृह का स्वामित्व आर्टिस्ट कंबाइन नाम की जिस 75 साल पुरानी संस्था के पास है उसक...
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  June 2, 2017, 4:37 pm
जबलपुर के दिनेश ठाकुर स्मृति प्रसंग में वसंत काशीकर की प्रस्तुति ‘खोया हुआ गाँव’ देखी। वसंत काशीकर में आंचलिकता की अच्छी सूझ है। उनकी पिछली प्रस्तुति ‘मौसाजी जैहिंद’ में तो फिर भी पड़ोस के बुंदेलखंड का परिवेश था, पर इस बार तो बिल्कुल ही बेगानी जगह कश्मीर को दिखाया ग...
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  June 2, 2017, 4:31 pm
मल्लाह टोली=========नीलेश दीपक की प्रस्तुति ‘मल्लाह टोली’ एक बस्ती का वृत्तचित्र है। ‘कैमरा’ यहाँ ठहर-ठहरकर कई घरों के भीतर जाता है, और एक छोटे से परिवेश में तरह-तरह के किरदारों से बनी एक दुनिया को दिखाता है। यह मिथिलांचल के तीन बड़े कथाकारों में से एक राजकमल चौधरी की कहानी...
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  June 2, 2017, 4:28 pm
रायपुर में 20 से 23 मई तक आयोजित ‘रंग-जयंत’ में शामिल प्रस्तुतियों में ‘सखाराम बाइंडर’ सबसे नई थी। यह इसका दूसरा ही शो था। निर्देशक जयंत देशमुख ‘आधे अधूरे’ के बाद एक बार फिर इसमें मंच-सज्जा की एक विशद विवरणात्मकता के साथ मौजूद थे। सखाराम के घर में दो कमरे हैं। छोटा कमरा र...
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  June 2, 2017, 4:22 pm
हिंदी नाटक में आधुनिकता के कई चरण रहे हैं। पिछली शताब्दी के पूर्वार्ध में एक ओर जहाँ विपरीत ध्रुवों पर खड़े प्रसाद और भुवनेश्वर दिखाई देते हैं, वहीं उनसे भी थोड़ा पहले 1916 में लक्ष्मण सिंह चौहान ‘कुली प्रथा’ जैसा गठा हुआ यथार्थवादी नाटक लिख चुके थे। लेकिन बीस...
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  April 3, 2017, 10:35 am
इस संस्मरण के लेखक जॉन लैंग  (1816-1864) का जन्म सिडनी में हुआ था। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई करने के कुछ साल बाद सन 1842 में वह भारत आ गया। यहाँ आगरा कोर्ट में सन 1851 में ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ कंपनी के ही एक कॉन्ट्रैक्टर रहे लाला जोती प्रसाद के मुकदमे में बतौर ...
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  January 26, 2017, 11:21 pm
अल्बेयर कामू के नाटक ‘जस्ट एसेसिन’ उर्फ ‘जायज़ हत्यारे’ को परवेज़ अख्तर ने ‘न्यायप्रिय’ शीर्षक से मंचित किया है। नाटक कामू के प्रिय विषय ‘एब्सर्ड’ की ही एक स्थिति पेश करता है, और शायद समाधान भी। इसकी थीम 1905 के दौरान सोवियत क्रांतिकारियों के एक ग्रुप से...
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  December 26, 2016, 1:24 pm
तोलस्तोय को हमारे देश में अक्सर गांधी के प्रसंग से याद किया जाता है। गांधी अपने आरंभिक दौर में उनसे गहरे प्रभावित रहे और दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने एक तोलस्तोय आश्रम भी बनाया। ईश्वर, अहिंसा, निजी संपत्ति और शाकाहार पर गांधी के विचार लगभग वही थे जो तोलस्तोय के थे। इस ...
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  December 24, 2016, 10:54 pm
नोटबंदी पर तमाम आलोचनाओं के कुल दो निचोड़ निकल रहे हैं—पहला, इससे लोगों को लाइन वगैरह में लगने की परेशानी हो रही है;दूसरा, बीजेपी ने अपने फायदे के सारे बंदोबस्त करने के बाद इसे लागू किया है। इन दोनों बातों को अगर बगैर किसी जिरह के मान भी लिया जाए तो भी नोटबंदी से होने वाल...
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  November 24, 2016, 4:02 pm
एक गांव में एक बूढ़ा आदमी अपनी बुढ़िया के साथ रहता था। दोनों खेत में बीज बोने गए, तभी उन्हें दो चालाक सियार मिले। एक सियार ने उनसे कहा कि उसने काफी कृषि विज्ञान पढ़ रखा है और अगर उन्हें अच्छी फसल चाहिए तो उन्हें बीज को उबाल कर बोना चाहिए। बूढ़े ने ऐसा ही किया। उधर रात को द...
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  November 8, 2016, 10:24 am
अभी तीन साल पहले जीवन और रंगमंच में 60 साल तक उनकी सहचर रहीं पत्नी फ्रांका रेमे का निधन हुआ था, और अब इस 13 अक्तूबर को इतालवी नाटककार दारियो फो भी 90 साल की उम्र में दुनिया को विदा कह गए। फो अपने जीते-जी रंगमंच में प्रतिरोध की बहुत बड़ी आवाज थे। उनके लिखे 80 नाटक दुनिया की तीस से...
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  October 18, 2016, 7:17 pm
अनारकली की कहानी सबसे पहले ‘गुजिश्ता लखनऊ’के लेखकअब्दुल हलीम शरर ने लिखी थी। शरर का जन्म मटियाबुर्ज में हुआ था, जहाँ लखनऊ से बेदखल कर दिए जाने के बाद अवध के नवाब वाजिद अली शाह और उनके साथ गए लोगों को बसाया गया था। वाजिद अली शाह ने अंग्रेजों से मिलने वाली मोटी पेंशन से इ...
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  October 12, 2016, 2:46 pm
जयंत देशमुख सिनेमा के जाने-माने सेट डिजाइनर हैं। उनका यह हुनर एमपीएसडी के छात्रों के लिए निर्देशित नाटक ‘आधे अधूरे’ में भी पूरे उरूज पर नुमाया था। मोहन राकेश की सुझाई सीमित सज्जा से परे उनका मंच तरह-तरह के मध्यवर्गीय सामानों से खचाखच भरा हुआ है। काले कोट वाला आदमी कम ...
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  August 8, 2016, 12:04 pm
संजय उपाध्याय निर्देशित ‘आनंद रघुनंदन’एक देखने लायक नाट्य प्रस्तुति है। सन 1830 में रीवा के राजा विश्वनाथ सिंह द्वारा ब्रजभाषा में लिखित इस नाटक को हिंदी का पहला नाटक भी माना जाता है। प्रस्तुति के लिए रीवा के ही रहने वाले योगेश त्रिपाठी ने इसका अनुवाद और संपादन वहीं क...
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  August 8, 2016, 12:04 pm
भारत में सबसे पहला अंग्रेज थॉमस स्टीवन एक पुर्तगाली कर्मचारी था, जो 24 अक्टूबर 1579 को समुद्र के रास्ते गोवा पहुँचा था। वह एक समर्पित कैथोलिक था जिसे गोवा के एक उपनगर का अफसर नियुक्त किया गया। यहाँ रहते हुए उसने मराठी और कोंकणी भाषा सीखी और यहीं की भाषा में ‘क्राइस्ट पुरा...
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  August 3, 2016, 3:27 pm
कहानी- 1मैं जब छोटा था तो मेरे दोस्त मुझे ‘ओये मोटे’कहकर बुलाते थे। एक बार एक दोस्त ने घर आकर जब मुझे ऐसे बुलाया तो मम्मी ने उससे कहा- ‘उसको मोटा क्यों बुलाते हो, सेहत अच्छी होने से कोई मोटा थोड़े ही हो जाता हैं।’मम्मी की यह बात सुनकर मुझे अपने मोटा होने के बारे में पता च...
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  June 20, 2016, 2:40 pm
यह भारत रंग महोत्सव का अठाहरवाँ साल था। सन 1999 में संस्कृति मंत्रालय की एक ग्रांट को उसी वित्तीय वर्ष में तुरत-फुरत खर्च करने के अभिप्राय से शुरू हुआ यह महोत्सव अब भारतीय रंगमंच की एक केंद्रीय परिघटना बन चुका है। 1999 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक रामगोपाल बजाज ...
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  May 20, 2016, 12:44 pm
नीरज कुंदेर और रोशनी मिश्रा निर्देशित ‘कर्णभारम्’ डेढ़ साल पहले भारंगम में देखी थी। शनिवार को दोबारा उसे सीधी के मंच पर देखा। प्रस्तुति में शास्त्रीय और लोक नाट्य तत्त्वों का बहुत अच्छा संयोजन है। पिछली बार सीधी के गाँवों में ‘अहिराई लाठी’ के ओरिजिनल प्रदर्शन देखे...
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  May 12, 2016, 9:48 am
पिछले से पिछले हफ्ते कानपुर में होने से संक्षिप्त रूप से बिठूर जाना हुआ। करीब साल भर पहले जब जॉन लैंग का नाना साहब पर लिखा संस्मरण पढ़ा था तभी से वहाँ जाने का मन था। यह संस्मरण 1855 के आसपास का है जब जॉन लैंग नाना साहब के यहाँ दो दिन ठहरा था। इसके दो साल बाद की वे घटनाएँ हैं ज...
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  May 12, 2016, 9:46 am

रायपुर फिल्म फेस्टिवल में पाँच दिन--------------------------------------------------------------------------------------------------------पिछले दो साल से कथाकार-अभिनेता सुभाष मिश्रा निजी साधनों से इस फिल्म फेस्टिवल का आयोजन कर रहे हैं। इस बार उनके निमंत्रण पर 9 से 14 फरवरी तक पाँच दिन के लिए मैं भी वहाँ था। इस दौरान की कुछ बातें।-------------...
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  April 28, 2016, 12:43 pm
शाहिद अनवर भावुक और दूसरों की फिक्र करने वाले इंसान थे। यूँ वे चीजों को सैद्धांतिक ढंग से देखते थे, लेकिन उनका मन हमेशा ऐसे कथानकों से प्रभावित होता, जिनमें एक भावुक दुस्साहस होता। उनके लिखे या उनके चुने हुए नाटकों के पात्र ऐसी बेचैनी से भरे होते जो अपनी एकांतिकता में ...
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  March 7, 2016, 12:11 am
‘बर्फ’:सौरभ शुक्ला===============यह एक तीन पात्रों की अजीबोगरीब कहानी है। कश्मीर गया हुआ एक डॉक्टर किसी गफलत में अपने टैक्सी ड्राइवर के एक बीहड़ एकांत में स्थित गाँव में पहुँचा हुआ है। ड्राइवर का घर इस निर्जन गाँव का अकेला आबाद घर है, जहाँ वह अपनी बीवी के साथ रहता है। पार्श्व म...
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  February 21, 2016, 5:33 pm
रतन थियम के थिएटर का मूल तत्त्व मौन है, जिसमें ध्वनि और स्वर खिलकर सामने आते हैं। इसी तरह वे अँधेरे का इस्तेमाल भी करते हैं, जिसमें रोशनियाँ मानो अपने क्लासिक अभिप्रायों में बरती जाती दिखती हैं। बेसिक रंग अक्सर ही उनके यहाँ अपने तीखेपन के साथ दिखाई देते हैं। तीसरी चीज ...
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  February 17, 2016, 11:09 am
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