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अनवर सुहैल का रचना संसार

ऐतराज़ क्यों है आपको जो हम खुद को भेड़-बकरी मानते हैं तकलीफ क्यों है आपको जो हम बने हुए हैं हुकुम के गुलाम झल्लाते क्यों है आप जो हम बा-अदब खड़े मिलते हैं सिर झुकाए नाराज़ क्यों होते हैं आप जो हम अपने निजात के लिए गढ़ते रहते हैं नित नए आका             &...
अनवर सुहैल का रचना संसार ...
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  December 18, 2013, 8:12 pm
उन्हें विरासत में मिली है सीखकि देश एक नक्शा है कागज़ काचार फोल्ड कर लोतो रुमाल बन कर जेब में आ जायेदेश का सारा खजानाउनके बटुवे में हैतभी तो कितनी फूली दीखती उनकी जेबइसीलिए वे करते घोषणाएंकि हमने तुम परउन लोगों के ज़रियेखूब लुटाये पैसेमुठ्ठियाँ भर-भर केविडम्बना ये क...
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  December 14, 2013, 8:45 pm
उन्हें विरासत में मिली है सीखकि देश एक नक्शा है कागज़ काचार फोल्ड कर लोतो रुमाल बन कर जेब में आ जायेदेश का सारा खजानाउनके बटुवे में है तभी तो कितनी फूली दीखती उनकी जेबइसीलिए वे करते घोषणाएंकि हमने तुम परउन लोगों के ज़रियेखूब लुटाये पैसेमुठ्ठियाँ भर-भर केविडम्बना ये ...
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  December 9, 2013, 7:40 pm
समीक्षा : पहचान डॉ. रोहिणी अग्रवाल 'जनपथ'में प्रकाशित समीक्षा ...
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  November 24, 2013, 9:11 pm
1-बताया जा रहा हमेंसमझाया जा रहा हमेंकि हम हैं कितने महत्वपूर्णलोकतंत्र के इस महा-पर्व मेंकितनी महती भूमिका है हमारीईवीएम के पटल परहमारी एक ऊँगली केज़रा से दबाव सेबदल सकती है उनकी किस्मतकि हमें ही लिखनी हैकिस्मत उनकीइसका मतलबहम भगवान हो गए…वे बड़ी उम्मीदें लेकरआ...
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  November 14, 2013, 10:56 pm
आकाश में छाये काले बादलकिसान के साथ-साथ अब मुझे भी डराने लगे हैं...ये काले बादलों का वक्त नही है ये तेज़ धुप और गुलाबी हवाओं का समय है कि खलिहान में आकर बालियों से धान अलग हो जाए कि धान के दाने घर में पारा-पारी पहुँचने लगें कि घर में समृद्धि के लक्षण दिखें कि दीप...
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  October 27, 2013, 8:34 pm
छोड़ता नही मौकाउसे बेइज्ज़त करने का कोईपहली डाले गए डोरेउसे मान कर तितलीफिर फेंका गया जालउसे मान कर मछलीछींटा गया दानाउसे मान कर चिड़ियासदियों से विद्वानों नेमनन कर बनाया था सूत्र"स्त्री चरित्रं...पुरुषस्य भाग्यम..."इसीलिए उसने खिसिया करसार्वजनिक रूप सेउछाला उसके ...
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  October 25, 2013, 10:15 pm
बड़े जतन से संजोई किताबेंहार्ड बाउंड किताबेंपेपरबैक किताबेंडिमाई और क्राउन साइज़ किताबेमोटी किताबें, पतली किताबेंक्रम से रखी नामी पत्रिकाओं के अंकघर में उपेक्षित हो रही हैं अब...इन किताबों को कोई पलटना नही चाहताखोजता हूँ कसबे में पुस्तकालय की संभावनाएंसमाज के कर...
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  October 19, 2013, 7:47 pm
हम क्या हैंसिर्फ पैसा बनाने की मशीन भर नइसके लिए पांच बजे उठ करकरने लगते हैं जतनचाहे लगे न मनथका बदनऐंठ-ऊँठ कर करते तैयारखाके रोटियाँ चारनिकल पड़ते टिफिन बॉक्स में कैद होकरपराठों की तरह बासी होने की प्रक्रिया मेंसूरज की उठान की ऊर्जाकर देते न्योछावर नौकरी कोऔर शाम क...
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  October 4, 2013, 8:24 pm
मैं कैसे बताऊँ बिटिया हमारे ज़माने में माँ कैसी होती थी तब अब्बू किसी तानाशाह के ओहदे पर बैठते थे तब अब्बू के नाम से कांपते थे बच्चे और माएं बारहा अब्बू की मार-डांट से हमें बचाती थीं हमारी छोटी-मोटी गलतियां अब्बू से छिपा लेती थीं हमारे बचपन की सबसे सुरक्षित ...
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  September 30, 2013, 12:15 pm
एक धमाका फिर कई धमाके भय और भगदड़....इंसानी जिस्मों के बिखरे चीथड़े टी वी चैनलों के ओ बी वेन संवाददाता, कैमरे, लाइव अपडेट्स मंत्रियों के बयान कायराना हरकत की निंदा मृतकों और घायलों के लिए अनुदान की घोषणाएं इस बीच किसी आतंकवादी संगठन द्वारा धमाके में लिप...
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  September 28, 2013, 8:29 pm
उड़ रही है  धूल चारों ओरछा रहा धुंधलका मटमैली शाम काछोटे-छोटे कीड़े घुसना चाहते आँखों मेंओंठ प्यास से पपडिया गए हैंचेहरे  की चमड़ी खिंची जा रही हैछींक अब आई की तबकलेजा हलक को आ रहा हैदिल है कि बेतरतीब धड़क रहा हैसाँसे हफ़नी में बदल गई हैंबेबस, लाचार, मजबूर, बेदमऔर ऐस...
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  September 25, 2013, 8:12 pm
ये क्या हो रहा है ये क्यों हो रहा है नकली चीज़ें बिक रही हैंनकली लोग पूजे जा रहे हैं... नकली सवाल खड़े हो रहे हैं नकली जवाब तलाशे जा रहे हैं नकली समस्याएं जगह पा रही हैं नकली आन्दोलन हो रहे हैं अरे कोई तो आओ... आओ आगे बढ़कर मेरे यार को समझाओउसे आवाज़ देकर बुल...
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  September 23, 2013, 8:46 pm
ऐसा नही है कि रहता है वहाँ घुप्प अन्धेरा ऐसा नही है कि वहां सरसराते हैं सर्प ऐसा नही है कि वहाँ तेज़ धारदार कांटे ही कांटे हैं ऐसा नही है कि बजबजाते हैं कीड़े-मकोड़े ऐसा भी नही है कि मौत के खौफ का बसेरा है फिर क्योंवहाँ जाने से डरते हैं हमफिर क्योंवहाँ ...
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  September 21, 2013, 7:06 pm
एक बार फिर इकट्ठा हो रही वही ताकतें एक बार फिर सज रहे वैसे ही मंच एक बार फिर जुट रही भीड़कुछ पा जाने की आस में              भूखे-नंगों की एक बार फिर सुनाई दे रहीं,           वही ध्वंसात्मक  धुनें एक बार फिर गूँज रही फ़ौजी जूतों की थाप  एक बार फ...
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  September 10, 2013, 8:53 pm
जिसने जाना नही इस्लाम वो है दरिंदा वो है तालिबान...सदियों से खड़े थे चुपचाप बामियान में बुद्ध उसे क्यों ध्वंस किया तालिबान इस्लाम भी नही बदल पाया तुम्हे ओ तालिबान ले ली तुम्हारे विचारों ने सुष्मिता बेनर्जी की जान....कैसा है तुम्हारी व्यवस्था ओ तालिबान!...
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  September 6, 2013, 11:29 am
जैसे टूटता  तटबंध और डूबने लगते बसेरे बन आती जान पर बह जाता, जतन  से धरा सब कुछ कुछ ऐसा ही होता है जब गिरती आस्था की दीवार जब टूटती विश्वास की डोरज़ख़्मी हो जाता दिल छितरा जाते जिस्म के पुर्जे ख़त्म हो जाती उम्मीदें हमारी आस्था के स्तम्भ ओ बेदर्द नि...
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  September 3, 2013, 8:01 pm
k ravindraतुम मेरी बेटी नही बल्कि हो बेटा...इसीलिये मैंने तुम्हे दूर रक्खा श्रृंगार मेज से दूर रक्खा रसोई से दूर रक्खा झाडू-पोंछे से दूर रक्खा डर-भय के भाव से दूर रक्खा बिना अपराध माफ़ी मांगने की आदतों से दूर रक्खा दुसरे की आँख से देखने की लत से....और बार-बारकिसी क...
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  August 30, 2013, 3:23 pm
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  August 5, 2013, 10:04 pm
के रवीन्द्र की पेंटिंगतुम्हें रोने की आज़ादीतुम्हें मिल जाएंगे कंधेतुम्हें घुट-घुट के जीने कामुद्दत से तजुर्बा हैतुम्हें खामोश रहकरबात करना अच्छा आता हैगमों का बोझ आ जाए तोतुम गाते-गुनगुनाते होतुम्हारे गीत सुनकर वोहिलाते सिर देते दाद...इन्ही आदत के चलते येज़माना ...
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  August 1, 2013, 9:14 pm
उसके कहने परहमने किये गुनाह खुद फंस जाने काजोखिम उठाते हुएउसकी खुशी के लियेहमने किये अत्याचारबेज़ुबानों परनिहत्थों परमासूमों पर..उसकी नज़दीकी पाने के लियेहमने की चुगलियांऎसे लोगों कीजो जेनुईन थेजो प्रतिबद्ध थेजो उसके निज़ाम के खिलाफ़ थे...उसने हमारी प्रतिभा काभर...
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  July 27, 2013, 10:51 pm
पहचान पर प्रतिक्रिया दें कृपया राजकमल प्रकाशन सेप्रकाशितमेरे उपन्यासपहचान परआपकी प्रतिक्रियाएंअपेक्षित हैं...'सादरअनवर सुहैल ...
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  July 22, 2013, 9:27 pm
बेशक तुमने देखी नही दुनिया बेशक तुम अभी नादान हो बेशक तुम आसानी सेहो जाती हो प्रभावित अनजानों से भी बेशक तुम कर लेती हो विश्वास किसी पर भी बेशक तुम भोली हो...मासूम हो लेकिन मेरी बिटिया होशियार रहना ये दुनिया ईतनी अच्छी नहीं है ये दुनिया इतनी भरोसे लायक ...
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  July 20, 2013, 8:04 pm
Dr Rohini Aggrawalपहचान: अनवर सुहैलराजकमल प्रकाशन, दिल्ली प्रथम संस्करण 2009मूल्य दो सौ रुपए’पहचान’: वर्चस्व की राजनीति में पहचान की लड़ाई अनवर सुहैल का ताजा उपन्यास ’पहचान’ इस अर्थ में विशिष्ट रचना है कि यह बदलती परिस्थितियों के संदर्भ में अपने आसपास हो रहे परिवर्तनों को नए ...
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  July 3, 2013, 8:47 pm
श्री उमाशंकर तिवारी : अवकाशप्राप्त डी आई जी के पत्रपत्र 1.                                             3/10/2011प्रिय अनवर,आप सोचते होंगे, मैं पोस्टकार्ड पर पार्ट बार्इ पार्ट अपने विचार लिखकर क्यों भेज रहा हूं? तो सुनो:-‘पहचान’ के पन्ने पलटते ही लगा, इस पुस्तक में कुछ है। जब पूरा पढ़ा तो पाय...
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  June 28, 2013, 9:13 pm
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