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मिर्ज़ा ग़ालिब : View Blog Posts
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मिर्ज़ा ग़ालिब

कभी नेकी भी उसके जी में आ जाये है मुझ से जफ़ायें करके अपनी याद शर्मा जाये है मुझ से,ख़ुदाया! ज़ज़्बा-ए-दिल की मगर तासीर उलटी है कि जितना खींचता हूँ और खिंचता जाये है मुझ से, वो बद-ख़ू (बदमिजाज़), और मेरी दास्तान-ए-इश्क़ तूलानी (लम्बी) इबारत मुख़्तसर (छोटी), क़ासिद (डाकिया) भी ...
मिर्ज़ा ग़ालिब...
इमरान अंसारी
Tag :गज़लें
  July 2, 2012, 3:39 pm
कब वो सुनता है कहानी मेरीऔर फिर वो भी ज़बानी मेरी,ख़लिशे-ग़म्ज़-ए-खूँरेज़ (तंज की चुभन) न पूछदेख ख़ूनाबा-फ़िशानी (खून के आँसू) मेरी,क्या बयाँ करके मेरा रोएँगे यारमगर आशुफ़्ता-बयानी (बकवास) मेरी,हूँ ज़िख़ुद-रफ़्ताए-बैदा-ए-ख़याल(ख्यालों में खोया)भूल जाना है निशानी मेरी,मु...
मिर्ज़ा ग़ालिब...
इमरान अंसारी
Tag :गज़लें
  May 25, 2012, 3:38 pm
अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ (प्यार के इज़हार) के क़ाबिल नहीं रहा जिस दिल पे नाज़ था मुझे, वो दिल नहीं रहा जाता हूँ दाग़-ए-हसरत-ए-हस्ती(जिंदगी के ज़ख्म) लिये हुए हूँ शमआ़-ए-कुश्ता(बुझी हुई शमा) दरख़ुर-ए-महफ़िल(महफिल के काबिल) नहीं रहा मरने की ऐ दिल और ही तदबीर कर कि मैं शायाने-दस्...
मिर्ज़ा ग़ालिब...
इमरान अंसारी
Tag :गज़लें
  May 10, 2012, 3:39 pm
इब्ने-मरियम (ईसा मसीह) हुआ करे कोई मेरे दर्द की दवा करे कोई, शरअ-ओ-आईन (पाक दर)पर मदार (इन्साफ) सही ऐसे क़ातिल का क्या करे कोई,चाल, जैसे कड़ी कमाँ का तीर दिल में ऐसे के जा (जगह) करे कोई,बात पर वाँ ज़बान कटती हैवो कहें और सुना करे कोई,बक रहा हूँ जुनूँ में क्या-क्या कुछकुछ न समझे ख...
मिर्ज़ा ग़ालिब...
इमरान अंसारी
Tag :गज़लें
  April 18, 2012, 3:00 pm
हैरां हूँ, दिल को रोऊँ कि पीटूँ जिगर को मैं मक़दूर (अमीर) हूँ तो साथ रखूँ नौहागर (मौत पर रोने वाले) को मैं, छोड़ा न रश्क (जलन) ने कि तेरे घर का नाम लूँ हर इक से पूछता हूँ कि जाऊँ किधर को मैं ?जाना पड़ा रक़ीब (दुश्मन) के दर पर हज़ार बार ऐ काश, जानता न तेरी रहगुज़र को मैं, है क्या जो ...
मिर्ज़ा ग़ालिब...
इमरान अंसारी
Tag :गज़लें
  March 31, 2012, 2:49 pm
आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसेऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे,हसरत ने ला रखा तेरी बज़्म-ए-ख़याल मेंगुलदस्ता-ए-निगाह सुवैदा ( दिल का दाग़) कहें जिसे,फूँका है किसने गोश-ए-मुहब्बत (सनम के कान) में ऐ ख़ुदा !अफ़सून-ए-इन्तज़ार (इंतज़ार का जादू) तमन्ना कहें जिसे,सर पर हुजू...
मिर्ज़ा ग़ालिब...
इमरान अंसारी
Tag :गज़लें
  March 12, 2012, 2:34 pm
दायम (हमेशा) पड़ा हुआ तेरे दर पर नहीं हूँ मैंख़ाक ऐसी ज़िन्दगी पे कि पत्थर नहीं हूँ मैं,क्यों गर्दिश-ए-मुदाम (बुरा वक़्त) से घबरा न जाये दिल ?इन्सान हूँ, प्याला-ओ-साग़र (शराब का प्याला) नहीं हूँ मैं,या रब! ज़माना मुझको मिटाता है किस लिये ?लौह-ए-जहां (लोहे के वरक़) पे हर्फ़-ए-मुक...
मिर्ज़ा ग़ालिब...
इमरान अंसारी
Tag :गज़लें
  February 21, 2012, 3:16 pm
आ, कि मेरी जान को क़रार नहीं है ताक़त-ए-बेदाद-ए-इन्तज़ार (इंतज़ार के बर्दाश्त की ताक़त) नहीं है, देते हैं जन्नत हयात-ए-दहर (दुनिया की जिंदगी) के बदले नशा बअन्दाज़ा-ए-ख़ुमार (खुमार का अंदाज़) नहीं है,गिरियां (गिरते आंसू) निकाले है तेरी बज़्म से मुझको हाय कि रोने पे इख़्तियार...
मिर्ज़ा ग़ालिब...
इमरान अंसारी
Tag :गज़लें
  February 4, 2012, 2:33 pm
हर एक बात पे कहते हो तुम कि 'तू क्या है'? तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू (तरीका) क्या है,न शो'ले (आग) में ये करिश्मा न बर्क़ (बिजली) में ये अदा कोई बताओ कि वो शोखे-तुंद-ख़ू (शरारत, अकड़) क्या है, ये रश्क है कि वो होता है हमसुख़न (बातचीत) तुमसे वर्ना ख़ौफ़-ए-बद-आमोज़िए-अ़दू...
मिर्ज़ा ग़ालिब...
इमरान अंसारी
Tag :गज़लें
  January 17, 2012, 2:13 pm
रहिये अब ऐसी जगह चलकर जहाँ कोई न हो हमसुख़न (हमदर्द) कोई न हो और हमज़बाँ (अपनी भाषा जानने वाला) कोई न हो, बेदर-ओ-दीवार सा इक घर बनाया चाहिये कोई हमसाया (साथी) न हो और पासबाँ (हिफाज़त करने वाला) कोई न हो, पड़िये गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार (बीमार की सेवा करने वाला) और अगर मर जा...
मिर्ज़ा ग़ालिब...
इमरान अंसारी
Tag :गज़लें
  January 5, 2012, 3:51 pm
 प्रिय ब्लॉगर साथियों,आज पेश है मिर्ज़ा असद उल्लाह ख़ां उर्फ “मिर्ज़ा ग़ालिब” कि शान में लिखी आज के दौर के बेहतरीन शायर 'गुलज़ार' साहब कि एक नज़्म.....उम्मीद है आप सबको पसंद आएगी|----------------------------------------------------------------------सुबह का झटपटा, चारों तरफ़ अँधेरा, लेकिन उफ़ुक़ पर थोड़ी- सी लाली...
मिर्ज़ा ग़ालिब...
इमरान अंसारी
Tag :ग़ालिब कि शान में
  December 19, 2011, 3:04 pm
है बस कि हर इक उनके इशारे में निशाँ और करते हैं मुहब्बत तो गुज़रता है गुमाँ और, या रब वो न समझे हैं न समझेंगे मेरी बात दे और दिल उनको जो न दे मुझको ज़ुबाँ और, आबरू से है क्या उस निगाह -ए-नाज़ को पैबंद है तीर मुक़र्रर मगर उसकी है कमाँ और, तुम शहर में हो तो हमें क्या ग़म जब उठें...
मिर्ज़ा ग़ालिब...
इमरान अंसारी
Tag :गज़लें
  December 8, 2011, 1:23 pm
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