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उर-वाणी

हे! मेरे मानव तन के पिता ,कैसे सोच लिया था आपनेकि, आपका अपमान करअह्म के वशीभूत होसफलता की मंजिल में पहुँचमैं आपको ही भूल जाऊंगा ।,,,,,,,,,,,,,,,,,कुछ ऐसा ही सोचा था न आपने उस दिनजब मैंने बालपन के कारण  नहीं मानी थी-आपकी एक छोटी सी बात,तो आपने दुःख में आकर दे डाला थामेरी बुद्धि को -अष्...
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  June 23, 2012, 6:15 pm
जीवन, ग्रीष्म काल की तपती दुपहरी है,तो, बसंतकाल की मदमस्त घटाओं से घिरी शाम भी।जीवन, मृत्यु के समान सत्य है,तो, जन्म के समान झूठा और भ्रमपूर्ण भी।जीवन, दुःख और शोक का मिश्रित व्यापार है,तो,सुख और उल्लास का शाश्वत चिर-आनंद भी।जीवन, हरी-भरी वादियों से घिरा सुन्दर मनोरम द्र...
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  June 19, 2012, 3:17 pm
बन्धुओ ! क्या ?आपने समय को कभी रुकते हुए देखा है,शायद नहीं ।लेकिन, सच मानिए जनाब !हमने समय के समय को तो नहीं,मगर,खुद के काले समय को [ठहरे हुए पानी के मानिंद ,एक शांत-चित्त योगी की साधना में सा रत ,जहाँ -एक भी कंकण,तूफानी हलचल मचा देता है।]ठहरे हुए जरुर देखा है,अपने ही जीवन के शू...
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  June 19, 2012, 2:48 pm
काश! मैं पंहुचा हुआ फकीर होता,सिकंदर की तरह विश्वजीत सम्राट होता,राम, कृष्ण, ईशा, मोहम्मद में से किसी के भी समकक्ष होता,तो- लुटा देता आज इस ख़ुशी में,लौकिक-पारलौकिक समृद्धि तुम्हारे वास्ते।ऐ दोस्त!... मगर मैं मजबूर हूँ,दूर हूँ अभी-इस महान समृद्धि के खजाने से।फिर क्या करें ...
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  June 19, 2012, 2:07 pm
मुझे सब नेक इंसान कहें,सच्चा और ईमानदार कहें,सब अपने दिल में बसायें मुझे,बस यही है सबसे-अपने प्रति,ख्वाहिश मेरी .......।लेकिन -मैं किसे अपना समझूँ ,किसे नेक और ईमानदार मानूँ,कहाँ से लाउँ ऐसा 'सच मापक यंत्र'जो सच्चाई से सच की गहराइयों तक पहुंचकर,सच्चा परिणाम दे सके।और फिर मैं ...
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  June 19, 2012, 11:37 am
मित्रो! मैंने यूँ ही एक दिन सोचा,कि -कहीं प्रभात, तो कहीं ढलती शाम।कहीं दिन, तो कहीं रात।कहीं कभी अंधकार, तो कभी प्रकाश।कहीं जीवन तो कहीं मरण।कहीं शोक, तो कहीं खुशियों का त्यौहार।कहीं झूठ, तो कहीं कभी सच।ऐसे एक-दो नहीं,अनेकानेक हैं जोड़े,जो हमने-आपने नहीं बनाये,बल्कि, बने-...
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  June 19, 2012, 11:22 am
जीवन सफ़र का कितना सुहाना पथ है -कोई गौर तो करे ।मिलती है गर हार,तो जीतने के लिए ।मै ही क्या ?जानते है सब ,कि - हार के परिणाम से ही बनते हैं,जीत के बीज।गले लगती है गर मुसीबत,तो- मिलने वालीहर एक ख़ुशी का अहसास कराने के लिए।सच मानिए जनाब !एक-दो नहीं,अनेकानेक हैं- ऐसे कटीले रास्ते...
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  June 19, 2012, 10:46 am
सोचता हूँ , कि मै  भी शरीक हुआ करूँ ,परिवार में होने वाले-हर एक उत्सव में,मगर मजबूर हूँ /...हाँ ! लाचार जरूर नहीं ।क्यूँकि -ऐसा नहीं कि ,मै आ सकता नहीं अपने घर गावं ,किन्ही प्रतिबंधो के कारण ।ऐसा भी नहीं,की-मुझे रोक लेता हो कोई जबरन यहाँ ।मैं,आज तुम्हारी इन खुशियों में,सिर्फ, इस...
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  June 12, 2012, 11:43 am
मित्रो! बात है तो अटपटी किन्तु है सच ...एक सौम्य दृष्टी वाला सुन्दर अश्वडगर- डगर कुछ ढूढता सा घूम रहा थामैंने उससे पूछा इतने बेचैन हो क्या ढूढ़ रहे हो ?उत्तर में उसने कहा - कलियुग के कृष्ण को !मुस्कराते हुए मैंने कहा - अरे नादान!क्या कलियुग में भी कृष्ण हो सकते हैं ?उसने कहा -जब...
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  June 9, 2012, 7:59 pm
प्यार एक दर्द है, एक कसक है ,प्यार धड़कन है ,प्यार तड़प है ,सच, प्यार वो सब कुछ है-जो एक शायर कहता है|.............मगर,क्या? प्यार एक सत्य नहीं |क्या? प्यार एक लालसा नहीं |क्या? प्यार एक तपस्या नही | क्या? प्यार एक आराधना नहीं |सच, प्यार वह सब कुछ है....जो, एक धर्मशास्त्र कहता...
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  May 14, 2012, 3:57 pm
दोस्तो! अब मैं साहसी हो गया हूँ।मैंने डर को निकाल फेंका है,(चीथड़ से चीलर सा)मैं भय मुक्त हो रहा हूँसारे ढोंग-ढपोसलों को त्याग,आडंबर मुक्त हो रहा हूँ।सबूत........अब मैं मंगल उपवास नहीं रखता,मंदिरों में जाके धूपवत्ती जलाकर,घंटों अब घंटी भी नहीं बजाता।कारण यह नहीं, कि-अब मैं ना...
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  May 12, 2012, 12:02 pm
आज विवश हो गया हूँ,इस बारिश के मौसम में,कागज और कलम थामने को।खोलकर कॉपी के सफेद पन्ने,जबरन कलम की नोंक को घसीटे जा रहा  हूँ,इस फिराक में कि- शायद,इन टेढ़े मेढ़े जबरन घसीटे गयेअक्षरों के कुल योग से,बन जाये कोई अनसुलझी गुत्थी।और फिर, मेरे देश के सम्मानीय समीक्षक गण,भ्रम पाल ल...
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  May 12, 2012, 12:00 pm
हे! उगते हुए सूर्य देवमेरा कोटि-कोटि प्रणाम स्वीकार करें।लेकिन हॉ-इसी वक्त........क्योंकि,अभी आप शीतल तेज की आभा से अत्यन्त गुणवान हैं,और यही शीतल तेजमैं अपने अन्दर भर लेना चाहता हॅूं।क्योंकि- यही तो जीवन का वास्तविक रत्न है,जो ज्ञान का स्रोत है, मोक्ष का प्रदाता है।इसलिए, ...
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  May 12, 2012, 11:57 am
सच, मानवीय संवेदना के अन्त का गवाह है,यह मेरे महानगर का ‘कबाड़ बीनता बचपन’।ठीक, इन्हीं महानगरीय गरीब बच्चों की तरहमेरे गॉव के आदिवासी बच्चे भीबनाकर अपनी -अपनी टोलियॉपकड़ा करते थे नदियों की धार मेंछोटी-छोटी मछलियॉ,बहते हुए चश्मों के पत्थर उठाकरपकड़ते थे केकड़े,और फिर- जंग...
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  May 12, 2012, 11:55 am
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