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कविता के क़रीब

इस समय कहाँ होंगी मछलियाँ ?मैं नहीं देख सकता मछलियों को पर वे हैं समुद्र के नीले फेनिल जल में वे कहीं दूर हैंवे वहाँ भी होंगी जहाँ मछुआरों की नावें हैं लाल गेंद सा तेज़ी से नीचे गिरता सूरज हैवे कहीं भी होंगी बेचैन समुद्र मेंमैं उन्हें देख नहीं सकता मेरे पाँवों तक आने वाल...
कविता के क़रीब...
RAJESHWAR VASHISTHA
Tag :
  October 4, 2009, 5:59 pm
कविता आती है मेरे दरवाज़े पर जादुई नन्हीं बच्ची की तरह वह जन्म लेना चाहती हैमेरी निष्क्रिय कोख से जिसमें वर्षों से पला नहीं है कोई भ्रूण हुए हैं कई असमय गर्भपात और कुन्द हो गई हैं समागम की सभी इच्छाएँ मैं भूल चुका हूँ गरम साँसों की दुन्दुभिऔर डूबते तैरते अँगों की जुगलब...
कविता के क़रीब...
RAJESHWAR VASHISTHA
Tag :
  September 21, 2009, 1:50 pm
कविताएं अक्सर मिलती हैं मुझे बिजली के तारों में फंसी पतंगों की तरह उन्हें देखते ही मैं भूल जाता हूँअपने सारे दायित्व और कंधों से फिसलने लगतें हैं सभी बोझजिन्हें ढोना है मुझे अपने अन्तिम सांस तकउन क्षणों में मैं सोच ही नहीं पाता बिजली के तारों में छिपी है मौत और उनकी ऊ...
कविता के क़रीब...
RAJESHWAR VASHISTHA
Tag :
  September 15, 2009, 7:23 pm
मृत्यु तुम आनाजैसे आती है पवन गुलाब के बग़ीचेमेंदबे पांव ओस की चमकती आंखों से बचते-बचातेसहलाना कुछ देर स्नेह से सभीकोदुलारना उन्हें भी जिनकी अभी तक मुरझाई नहीं है एक भी पंखुड़ीतुम्हारास्पर्श खोलता है जीवन के नित नए अर्थमृत्यु तुम आनाजैसे आते हैंस्वप्न भोर की छाया म...
कविता के क़रीब...
RAJESHWAR VASHISTHA
Tag :
  September 5, 2009, 10:41 pm
पिता मेरे पहचाना तुमने मुझे मेरी पहली चीख के साथ ही कुछ जिज्ञासा लिए हुए कुछ गर्वित होते हुए प्रसव की कोठरी के बाहर लगातार टहलते हुए उस रात सिर्फ सपने देखे थे तुमने पिता मेरे पहचाना तुमने मुझे किसी रविवार की छुट्टी के दिन धूप के कालीन पर नंगे पाँव ठिठुरते हुए अपनी कमीज़...
कविता के क़रीब...
RAJESHWAR VASHISTHA
Tag :
  August 20, 2009, 8:56 pm
वही समय था उस दिन भी : सुबह के पांचशायद जाग रही थी पत्नी आँखें बन्द किए अपने तिलिस्म मेंदूसरे कमरे में सपनीली नींद में सोईं थी दोनो बेटियांअपने मोबाइल फोन स्विच ऑफ किए उठते हुए मुझे याद था इस नए पड़ाव का आनापर खुशी नहीं थी जरा भीबाथरूम के दर्पण में था एक थका, मुरझाया चेहर...
कविता के क़रीब...
RAJESHWAR VASHISTHA
Tag :
  August 6, 2009, 6:19 pm
आसमान ढका है बादलों के शामियाने सेजिसे ठीक से धो नहीं पाया मुहल्ले का धोबी दिखाई दे रहे हैं काले-सलेटी धब्बे सिलवटें और जँग लगी इस्त्री के दागकभी-कभी अकेले बूढ़े-सा सूरज झाँक लेता है शामियाने के बाहर खँखार कर गला फिर कर लेता है उदास चेहरा सिलवटों के भीतर कई कोशिशों के बा...
कविता के क़रीब...
RAJESHWAR VASHISTHA
Tag :
  July 19, 2009, 6:45 pm
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