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                               जब हम इतने छोटे थे कि                                चल तो सकते थे ,पर                                चलने की समझ नहीं थी,                               तब गर्मियों की छुट्टियों में                               दिल्ली की दिवालिया दुपहरियों से निकालकर                                माँ हमें नानी-घर ले जातीं....          ...
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  July 29, 2012, 8:57 pm
चार दीवारों के भीतरवे दोनोँ मौजूद थे कभी जिनके मौन में भी थीं ढेर सारी बातें !!जिनकी आँखें भीड़ में भी पल भर को टकराकररचती थीं आख्यानक !!जिनके बीच संवादों, अभिव्यक्तियों के दौर चला करते थे,कम लगती थी जिन्हें जिंदगी अपनी बातों के लिए, चार दीवारों के भीतर मौजूद वे दोनों ...
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  March 1, 2012, 10:54 pm
बस स्टैंड पर बैठी लड़की कि नज़रडूबते सूरज कि लालिमा पर पड़ी और उसकी आँखे चमक उठीउसने तुरंत उस बेहद दिलकश नज़ारे को साझा करने के लिएबगल ही में बैठे प्रेमी से कहादेखो मुझे उसमे तुम ही दिख रहे हो.....तुम्हारा नाम आसमान कि लाल बिंदी बन गया है......प्रेमी ने उसकी उत्सुक आँखों में ...
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  December 8, 2011, 5:24 pm

बाज़ार में बिक रही थीहत्या करके लायी गई मछलियाँ ढेर पर ढेर लगी मरी मछलियाँ धड़ कटा-खून सना बदबू फैलाती बाज़ार भर में.मरी मछलियों पर जुटी भीड़ हाथों में उठाकर भांपती उनका ताज़ापनलाश का ताज़ापन.भीड़ जुटी थी मुर्गे की दूकान पर बड़े-बड़े लोहे के पिंजरों म...
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  November 15, 2011, 6:43 pm
बातेंसायास नहींअनायास की जाए तो ज़्यादा सुंदर होती हैं.बातेंलफ़्ज़ों से नहींआँखों से की जाए तोज़्यादा मार्मिक होती हैं.बातेंहिचक से परेहृदय के उच्छवास से आये तो ज़्यादा स्थान लेती हैं.बातें क्षणिक प्रतिक्रिया से नहीं स्वप्न के आशियाने में सजे तो ज़्यादा उम्र पाती हैं.इस...
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  November 29, 2010, 12:27 pm
माँ से पहले मैंन तत्व थीन अस्तित्व थान जान थीन जीवन थामाँ ने दिया सब कुछ मुझेहे माँ अपर्ण हर पल तुम्हेंजीवन में आने से पहलेमाँ ने मुझे अपना गर्भ दियाजीवन में आने पर मुझे अपने तन से भोजन दियाजीवन का हर एक पलआपके कर्ज में डूबा हुआजीवन का हर पल आपकेप्यार से सींचा हुआमहिमा ...
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  October 7, 2010, 12:19 pm
मायके से लेते हुए विदा,बस यही ले आई थी साथजो कि रह सकेगा उम्र भरमेरा ‘अपना’  लेकिन परम्परा, रीति के नाम परवह भी मुझसे छीन लिया जायेगा !!जैसे छीन लियाबाबा कोआई कोभाई-बहन कोउस आँगन कोजिसमें महक रहा होगामेरा अस्तित्व आज भी!!छोड़ दिया अगर इसे भी- तो खत्म हो जाएगी मेरे जन्म की ...
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  September 8, 2010, 2:43 pm
"क्या है! जब भी किताब लेकर बैठती हूँ दरवाजे पर घंटी ज़रूर बजती है. खोलने भी कोई नहीं आएगा." दरवाजा खोला तो सामने दस-बारह साल की एक छोटी लड़की फटे मैले फ्रॉक में खड़ी थी. शरीर और बालों पर गर्द इतनी जमी थी मानों सालों से पानी की एक बूँद ने भी इसे नहीं छूआ..."क्या है?" मैंने एक ही पल ...
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  August 21, 2010, 2:22 pm
तुम्हारी कनखियों में कहींआज भी छिपी बैठी हैमेरी मुस्कान....जिसे तुम्हारी आँखों की चमक से,चुरा लिया था मैंने !!अब भी तुम्हारे हाथों में रची हैमेरे तन की महकमेरी नम हथेलियों परअब भी महक उठता है,तुम्हारा चमकीला स्वेद....!!मेरी उलझी लटेंअब भी यकायक निहारने लगती हैंतुम्हारी भ...
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  August 8, 2010, 12:56 pm
हरी घास के दरीचों परजहाँ मेरे तुम्हारे बीचदुनिया का अस्तित्व नहीं होता थातुम कितने प्रेम भरे अंदाज़ में कहतेकरो जो करना चाहती होबस एक बार आवाज़ देनामैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगातब तो तुम प्रेमी थे, ना!सफ़र बहुत लम्बा नहीं थापर हमने दूरियाँ बहुत सी तय कर लींजब मैं परे...
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  July 16, 2010, 9:10 am
नौकरी की अर्जी भरते हुएबैंक की पर्ची भरते हुएपरिचय के समय नाम बताते हुएमुझसे क्यों कहा जाता है“पूरा नाम बताइए”क्यों नाम के लिए जातिकिसी पूरक का काम करती हैक्यों संविधान ने आरक्षण लागू कियापर नहीं बनाया वह कानूनजिसमें मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा जाता“केवल नाम लिखें,...
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  May 7, 2010, 10:30 pm
खाली कैनवास पर पहलेपेंसिल से कुछ बनाती हूँताकि गलती हो तो मिटा सकूँजचे न तो हटा सकूँफिर संभल संभल करतैयार किए रंग भरती हूँअब गलती की कोई गुंजाइश नहींक्योंकि मैं जानती हूँमुझे अलग नहीं सामान्य के बीच रहना है...
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  April 27, 2010, 10:16 am
हरी-हरी घास के दरीचों परघने-घने पेड़ों के साये मेंबैठी हैं चिड़ियाँजिनका कोई एक ठिकाना नहींएक जगह से उड़कर यहाँ आई हैंयहाँ से उड़कर फिर कहीं जाएँगीहँसी से गूँजतेखुस-फुसाहट और बातों से भरेकोने-कोने को चिरजीवा करअमरता का नया राग गातीकॉलेज की लड़कियाँ....
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  April 23, 2010, 8:13 pm
चुगलख़ोर सुर्ख गुलाबखोल गया मेरे सीने में दफ़्न राज़यूं तो आंखों से छलकता थातुमने देखा नहींहोंठों पर थिरकता थातुमने सुना नहींरोम रोम में उछलता थातुमने छुआ नहींऔर चुगलख़ोर गुलाब नेसब कह दिया!...
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  February 17, 2010, 7:31 pm
थक गई हूँ रोज-रोजपतझड को बुहारते बुहारते,गिर जाने दोजमीं परसारे पत्तों कोएक एक कर,किमैं समेट सकूँएक साथ सबको।...
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  February 7, 2010, 12:49 pm
अगर मैं दिल हूँ तुम्हारा,तो मुझे ये दिल दे दो.मैं माफ़ी नहीं चाहती,बस हाथों में हाथ दे दो.ज़िन्दगी भर न भूलूँ जो मैं,वो अहसास दे दो.बख्श दो मुझको - यूँ पल,तुम तड़पाओ ना,सोने से पहलेअपना एक ख्वाब दे दो.आती-जाती सांसों मेंएक शब्द सा सुनती हूँ,इन धुंधले शब्दों को सुन सकूं मैं,ऐ...
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  February 2, 2010, 6:50 pm
कुछ बंद दरवाजे हैंकुछ रोज़ सुनी जाने वाली आवाज़ेंदीवारें हैं,और बहुत कुछ है बिखरा हुआजिसे रोज़ समेटती हूँबस यही तो करती हूँअपनी ज़िन्दगियों को “हमारी” बनाने की कोशिश मेंजितनी बार मुँह खोलतीबाँहें फैलातीउतनी बार नासमझ करार दी जातीउलटबाँसियों से दबा दिया जाताउछलत...
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  December 30, 2009, 10:41 am
दिन उगता है तो उम्मीद करती हूँदोपहर होने पर उम्मीद करती हूँदिन ढलने पर भी उम्मीद करती हूँरात को उसी उम्मीद के साथअपने बिस्तर परकम्बल में लिपटकरसो जाते हैंमैं और मेरी उम्मीद !...
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  December 27, 2009, 1:38 pm
वे कुछ कहना चाहते हैंकहने के लिए बहाना चुन लियाहाथी कानाक, कान, सूँड़, पूँछपर नाम न कह सकेहाथी कासब कह कर पहेली गढ़ दीउत्तर में मुझ से भीनाम सुनना चाहाहाथी का!...
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  September 10, 2009, 12:02 pm
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