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साँझ: साँझ,जून २०१२-सामग्री: अतीत से में - शहरयार, अदम 'गोंडवी', फिराक गोरखपुरी, और परवीन शाकिर   काव्य धरा में - संजय वर्मा 'दृष्टि', विनीता जोशी, सबा युनुस, सफल...http://emagzinesanjh.blogspot.com...
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  June 1, 2012, 4:50 pm
साँझ के मई २०१२ के अंक में,अतीत से, में शहरयार की ग़ज़ल और परवीन शाकिर की नज़्म.कव्यधरा में, अंकिता पंवार, विनीता जोशी,सुधीर मौर्या 'सुधीर' की कवियाये और बरकतुल्ला अंसारी की ग़ज़ल.कथासागर में, सुधीर मौर्या 'सुधीर' की लघुकथा. http://emagzinsanjh.blogsot.com...
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  May 4, 2012, 1:07 am
आज प्रस्तुत हे उत्तराखंड की दो कवियत्री अंकिता पंवार और विनीता जोशी की भाव पूर्ण रचनाय.Ankita Panwarगरीबी दुष्चक्रप्रति छन प्रत्यक  जगह एक से हालात नहीं होतेजब कुछ लोग चैन से होते हेतो कहीं होती हेदिल दहला देने वाली चीत्कारेंकहीं उम्मीद दूर रही होती हेऔर कहीं भ्रस्टाचार की...
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  April 4, 2012, 8:27 pm
उजाड़ कुछ भी नहीं होतामेरी बंद पड़ी कलम आज कुछ लिखना चाहती  हेऔर वो स्याही मिल गई हे तेरे एहसासों मेंजो कुछ अरसे से सूख गई थीअब ये शब्द एक लंबा सफ़र तय करना चाहते हेवहां तक जहाँ तुम होमेरी आत्मा में जो कम्पन हो रहा हेउसमे से कुछ ध्वनियाँ निकलना चाह रही हेछितिज  से दूर फे...
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  April 2, 2012, 6:42 pm
विनीता जोशी की दस कविताएँमाँ जब तक रहेगीमाँजब तक रहेगीछोटी-छोटीक्यारियों में महकेगाधनिया/पुदीनाखेतों की मेड़ों परखिलेंगेगेंदे के पीले फूलआँगन मेंदाना चुगने आएगीनन्हीं गोरैयादेहरी परसजी रहेगी रंगोलीकोठरी मेंखेलेंगेभूरी बिल्ली के बच्चेरम्भाएगी बूढ़ी गायछत में ...
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  April 2, 2012, 6:14 pm
विनीता जोशीआप उत्तराखंड के अल्मोड़ा जनपद की निवासी हे. आपने कुमॉयं universiti  से हिंदी सहित & अर्थशास्त्र में ऍम. ऐ. किया हे तदुपरांत आप ने बी. एड. की टैनिंग प्राप्त की हे.वर्तमान समय में आप अध्यापन के साथ - साथ स्वलेखन में व्यस्त हे.आपकी काव्य संग्रह 'चिड़िया चुग ले आसमान' प्...
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  March 21, 2012, 8:02 pm
प्रस्तुत हे अंकिता पंवारकी एक भावपूर्ण कविता  अधूरी ख्वाहिशएक तमन्ना हे जो बढाती हे कदमख्वाहिश हे ये इसी जो अधूरी हे हरदमपल दिन क्या कहें कहीं गुज़रे तो नहींहोश आया जब तो वो थे या नहींएक कशिश थी पल की उसमे जिन्दगी तो नहींअक्स के ख्वाब साहिल हे या नहींएक तमन्ना हे जिन्द...
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  March 18, 2012, 8:03 pm
अंकिता पंवारपहाडो के प्रदेश देवभूमि उत्तराखंड की उभरती हुई कवियत्री हे अंकिता पंवार. आपका जन्म जनपद टिहरी गडवाल के भरपुरिया गावं , ल्म्ब्गावं में १२ दिसम्बर १९९० को हुआ. और यहीं से आपने स्नातक की पढाई पूरी की.वर्तमान समय में आप पुण्यभूमि ऋषिकेश में निवास करती हे. आप क...
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  March 16, 2012, 6:07 pm
 तनहइयो ने कबमेरे हाथ मेंजाम दे दियाकुछ इसका पता नहींहर शाम-हर रातहर सुबह बस में औरमेरा जाममुझे लगाअब जिन्दगीचैन से कट जायगीग़लतफ़हमी थी मेरीअब तो हाथ मेंजाम लेने से भीडर लगता हे न जाने क्योंतेरा अक्स मुझे अबउसमे नज़र आता हे. 'लम्स' सेसुधीर मौर्या 'सुधीर'...
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  March 12, 2012, 8:37 pm
हड़ताल का अर्थ मालिक के केबिन से निकलकर नंदन जब बाहर निकला तो उसकी छाती घमंड से चोडी थी.आज कंपनी के मालिक ने उसकी चिरौरी की थी हड़ताल ख़त्म करने के लिए पर वो तस से मास नहीं हुआ था. उसे डबल बोनस है हाल में चाहिए था, अगर नहीं तो हड़ताल जारी.केबिन  से बाहर निकलते ही उसके पास श्...
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  March 4, 2012, 7:28 pm
जिन्दगी जब से आई उनके घेरो मेंरौशनी दिखने लगी हमको अन्धेरो मेउनकी शरारते बड़ी भली लगने लगीकंकड़ मर के छिपने उनका मुंडेरो मेंढलती शाम अब सुहानी लगने लगीलुत्फ़ आने लगा हमको अब सवेरो मेचांदनी चाँद की आहट दर पर देती हेचमक दोस्तों हे आज हमारे डेरो मेंसुधीर मौर्या    गंज ज...
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  March 4, 2012, 2:26 pm
 दोशीजा होठो पे शबनम के कतरेलचके बदन पे कसाव जो निखरेसावन को खुमारे जिस्म की यादकंधो  पे खुलकर ज़ुल्फ़ हरसू बिखरे.  ज़ुल्फ़ खुल गए रात की अंधियारी हेदुनिया पे उनका खुमार तारी  हेसितारों का सुकूत दस्तक देता हेकोई तूफ़ान आने की तय्यारी हे.   सुधीर मौर्या 'सुधीर'गंज जलाला...
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  March 1, 2012, 8:26 pm
ये तेरा शहरये तेरा गाँवमुबारक हो तुझेमेरा क्या हेमें तो बस मेहमान हूँदो पल के लिएमहकता ही रहेचहकता ही रहेये तेरा घरये आँगन तेराक्या हुआजोन न  रहा कोई फूलमेरी ग़ज़ल के लिएतूं सवरती ही रहेतूं निखरती ही रहेअपने साजन के लिएभूल जा दिल से मुझेतूं अपने कल के लिए'सुधीर' के दा...
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  February 25, 2012, 4:29 pm
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  February 24, 2012, 12:04 pm
सपना थाउस की आँखों मेंपढने का, लिकने काआसमान में उड़ने काचाँद सितारे पाने काधनक धनक हो जाने कावो थी सुन्दरवो थी दलितउसका यही अभिशाप थावो थी मेधावी बचपन सेपर उसका गरीब बाप था.आते ही किशोर अवस्था केउसे गिद्ध निगाहें ताकने लगीगाहे बगाहे दबंगों  की छिटाकशी व...
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  February 21, 2012, 8:30 pm
असीरी शफक की धुप मेंमे जाकर छत पर तनहा खड़ा हो गयापड़ोस की छत पेबल बनाती हुई लड़कीमुस्करा दीमैंने उसकी जानिबजब कोई तवज्जो न दीतो वो उतर करनिचे चली गईकाश कुछ साल पहलेमें एसा कर पाताकिसी की जुल्फों की असीरी से खुद को बचा पाताशायद तब ये शफक ये शब् मेरे तनहा न होतेया फिर वही ...
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  February 15, 2012, 8:45 pm
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