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मंजुश्री

ग्लोबल गाँव का आदमी इन्टरनेट ,वाई फाई ,लैपटॉप ,कंप्यूटर .....वेबकैम ,हेड फोन ,ब्लू टूथ ,एंड्राइड फोन तरह तरह के उपकरणों से .....लैस हुआ जाता है  ग्लोबल गाँव का आदमीट्विटर ,फेस बुक ,मेसंजेर, स्काइप, व्हाट्स एपसे दुनिया भर के लोगों से जुड़ जाता हैमगर घर ,परिवार और पड़ोस में क्या ह...
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  May 26, 2013, 11:27 pm
आम आदमी अर्थशास्त्रीय सिद्धांतों की भूलभुलैया  और आंकड़ों की बाजीगरी में गुम  हो जाता है आम आदमी !हर पांच वर्ष में नयी योजना बनती है हर साल बजट आता  है साल दर साल गरीबी हटाओ ,रोजगार बढाओ और इंक्लूसिव ग्रोथ के नारे लगते हैं किन्तु खुद को जहाँ का तहांखड़ा  पाता  है आम...
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  May 24, 2013, 11:58 am
     दौड़ सारे तीरथ भागे दौड़े मन की थाह न ली तो क्या?इधर उधर बाहर को दौड़े घर की बात न की तो क्या?हर एक को खुश करने में खुद की ख़ुशी नहीं पहचानी दुनिया भर को वक़्त दिया अपनों को दिया बिसार  तो क्या?धन ,पद ,यश और काम की दौड़े मंजिल कभी मिली है क्या?क्या राजा क्या रंक  धरा पर ...
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  May 4, 2013, 5:09 am
 ग्लोबल मानव इन्टरनेट ,वाई फाई ,लैपटॉप ,कंप्यूटर .....वेबकैम ,हेड फोन ,ब्लू टूथ ,एंड्राइड  फोन तरह तरह के उपकरणों से .....लैस हुआ जाता है  है ग्लोबल मानव ट्विटर ,फेस बुक ,मेसंजेर, स्काइप, व्हाट्स एप से दुनिया भर के लोगों से जुड़ जाता है मगर घर ,परिवार और पड़ोस में क्या हो  रहा है...
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  April 23, 2013, 10:40 am
कई बार सभी को संतुष्ट करने की चेष्टा में व्यक्ति यह नहीं समझ पाता  कि वह स्वयं क्या चाहता है?उसे स्वयं किस बात से ख़ुशी मिलती  है?सबकी दृष्टि में अच्छा बनने की चेष्टा में वह स्वयं खंड खंड हो कर रह जाता है ...
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  April 20, 2013, 3:15 pm
शुभचिंतक मन के विचार कुछ बुरे कुछ अच्छे गुत्थम गुत्था हो जाते हैं जैसे डिब्बे में बंद अलग अलग रंगों के रेशमी धागों के लच्छे तुम एक कुशल कशीदाकार की तरह अपने शब्दों के मखमली  स्पर्श से धीरे धीरे धीरज से सुलझाती हो अलग अलग धागों को !कभी गांठों को तोड़ती  भी हो अपने क...
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  April 17, 2013, 3:03 am
मन उपवनमन के उपवन मेंउगते हैंफूल भी कांटे भीये तुम पर निर्भर हैकी तुम क्या बोते हो .....मगर दूसरों के लिए बोये गए कांटेघायल करते हैं खुद के मन कोकभी न चाहने पर भी उग आते हैंअनचाहे जंगली पौधे औए कांटे .माली तो हम स्वयं हैंक्यों न निराई गुडाई करेंफेंक दें ईर्ष्या ,द्वेष,कटुत...
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  April 17, 2013, 2:44 am
ये  दिवस क्यों?महिला दिवस हिंदी दिवस मदर डे फादर दे क्यों????क्योंकि ये उपेक्षित हैं साल के 365 दिनों में सिर्फ एक दिन इनका?कभी सुना है?पुरुष दिवस?इंग्लिश डे?पुत्र दिवस या पुत्री दिवस?नहीं!क्योंकि साल के सारे  365 दिन इनके हैं साल का एक दिन आधी आबादी को देकर हम कौन सा न्या...
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  March 8, 2013, 9:19 am

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  March 6, 2013, 10:32 pm
मौन का संवाद "काव्य संकलन का लोकार्पण  27 जनवरी 2013 को स्थानीय जवाहर रंगमंच में श्रीमती प्रतिभा चौधरी द्वारा किया गया ....
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  February 28, 2013, 1:53 pm
                                                     मेरा प्रथम काव्य संकलन "मौन का संवाद"...
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  February 28, 2013, 1:43 pm
प्रेम -कुछ भिन्न आयाममैं और तुम कुछ ऐसे प्रेम करें की मैं मैं ही रहूँऔर तुम तुम ही रहोमैं दिन को अगर रात कहूंतो तुम मुझे सुधारोहम चाँद के पार न जाकरयहीं धरती पर सुलझाएं और लड़ेजमीनी वास्तविकताओं काहम कल्पनाओं में नहीं जियें वरन  जिंदगी की आपाधापी में  एक दूसरे का स...
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  February 14, 2013, 8:27 am
                                          लघुकथा -अनाथ                                             घर के सब लोग उसे छोड़ कर पार्टी में गए थे।आठ  साल के नन्हे आदित्य की समझ में नहीं आ  रहा था कि  वह क्या करे?रोते रोते वह बिना कुछ खाए सो गया .                                   मम्मी -पापा के कार एक्सीडेंट में गुज...
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  January 29, 2013, 9:38 am
कितना अच्छा  लगता है कितना अच्छा लगता है सर्दी की धूप में बैठ कर अमरुद खाना . गर्मी की अलस दोपहर में कूलर की ठंडी हवा में पसर कर सो जाना .रोटी बनाते समय रेडियो पर बज रहे अपने प्रिय गीत को गुनगुनाना .कितना अच्छा लगता है सोते हुए बच्चे का मुस्कुराना अच्छे नंबर लेकर बच्चे क...
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  January 8, 2013, 5:14 pm
 हम सब अपराधी हैंहम समाज को दोष देते समय एक उंगली सामने की ओर  उठाते हैंतो तीन उंगलियाँ हमारे अपनी तरफ होती हैंहाँ हम सब अपराधी हैं, भ्रष्ट हैंआईने के सामने खड़े हो करक्या हम स्वयं से नजरें मिला पाते  हैं?कितना सहज है उपदेश और गलियाँ देनाकितना कठिन है आदर्शों पर चलनाहम ह...
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  December 31, 2012, 3:39 pm
नव वर्ष की शुभकामनायें  फिर से नया वर्ष  आ गया हर वर्ष की तरहकैलेन्डर के पन्ने बदले दिसम्बर माह से जनवरी हुआ हर वर्ष की तरहफोने कॉल, ग्रीटिंग कार्ड ,ई मेल .....वही घिसी पिटी उधार  ली हुयी भाषाफ़ॉर्वर्डेड  एस एम् एस और ई मेल क्या बदला ?तारीख के अलावा समाज में ?हमारे दिलों में...
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  December 31, 2012, 10:30 am
कविता की मृत्यु एक बच्चा जनमता  है आश्चर्य सृष्टि का आँखों में कौतूहल  लिये बड़ा होता है नित नए आश्चर्य जन्म लेती है कविता वह कवि  बन जाता है अपनी कल्पनाओं की रंगीन दुनिया में खोया हुआबच्चा बड़ा और बड़ा होता जाता है दुनिया के बदलते रंगों को महसूसता है-भोगता है छल कपट ,धोखा ...
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  December 30, 2012, 9:18 am
बालिकाओं में कुपोषण -गंभीर प्रश्न राजकीय  कन्या महाविद्यालय में राष्ट्रीय सेवा योजना की संयोजिका का पद भार सँभालने के साथ ही सामाजिक सिद्धांतों के परे जमीनी वास्तविकताओं का साक्षात्कार करने का अनुभव हो रहा है।कुछ स्थितियां मन मस्तिष्क को आंदोलित कर देती हैं। मह...
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  November 29, 2012, 10:10 pm
    भारतीय नारी -अस्मिता की तलाश                           नारी को हमेशा से या तो देवी रूप में महिमा मंडित किया जाता है अथवा उसेदोयम दर्जे का प्राणी समझ कर व्यवहार किया जाता है.यत्र नार्यस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता  या ढोल गंवार शूद्र पशु नारी ये सब ताडन केअधिकारी.....या फि...
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  November 28, 2012, 4:13 am
आत्मदीप काली अंधियारी रात भयंकर झंझावात वर्ष घनघोर प्रलयंकर पूछती हूँ प्रश्न मैं घबराकर है छुपा कहाँ आशा दिनकर?मन ही कहता क्यूँ भटके तू इधर उधर?खुद तुझसे ही है आस किरण तुझ जैसे होंगे कई भयभीत कातर कर प्रज्ज्वलित पथ स्वयं ही दीप बन !दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ ...
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  November 12, 2012, 10:22 am
 कला अंकुर पिछले वर्ष अजमेर की प्रमुख कला प्रोत्साहन संस्था कला अंकुर( www.kalaankur.org ) से जुड़ने का व उसकी सदस्य बनने का मौका मिला.इसके कार्यक्रमों की स्क्रिप्ट राइटिंग में सक्रिय भागेदारी से मेरी रचनात्मकता को खुराक मिलती है .कला अंकुर के रूपक कार्यक्रम में मेरा परिचय कराय...
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  October 30, 2012, 8:53 pm
कविता का प्रसव हर  आने   वाले  दिन  का  वाकया  और  जाने  वाले  दिन  की   उथल  पुथल  क्यों  जागते  नहीं   एहसास  कोई ? उमड़ता  घुमड़ता  रहता  है  दिल   में  कुछ  कुछ  क्यों  उतार  नहीं  पाती  हूँ  पन्नो   पर  कविता  में ?क्यों  महसूस  नहीं  पाती  हूँ  गम  की  चुभन  या  ख़ुशी  की  छुअन  ह...
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  October 9, 2012, 9:47 pm
पानी की पुकार!मैं......नदियों और समुद्रों से भाप बन उड़ताबादलों में समाताफिर बरसता तुम्हारे घर आंगन ,झीलों ,नदियों वन ,उपवन में आकांक्षा यही है मेरीकोई प्यासा न रहेवन उपवनहरे भरे रहें ....मगर तुम क्या कर रहे हो?तुम्हारी संख्या तो बढती ही जा रही हैकैसे बुझाऊँ तुम सबकी प्यास...
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  September 28, 2012, 10:06 pm
खंड खंड जिंदगीखंड खंड जिंदगीटुकड़ा टुकड़ा मैं!जिंदगी का एक सिरा सँभालने की कोशिश करती हूँतो दूसरा छूटजाता है..........घर -परिवारपति- बच्चेसास -ससुरनाते -रिश्तेदारऑफिस-बॉस ऊपर  से तीज -त्यौहारIसुनती हो.....मम्मी....बहू...की हमेशा लगती रहती है गुहारऔर ऑफिस में अक्सरबॉस की पड़त...
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  September 13, 2012, 8:56 pm
मौन का संवादमैं लिख रही हूँकिताबजिंदगी की यथार्थ कविताओं कीक्या तुम पढ़ सकते हो?मेरी आँखों में तैरते शब्द?सुन सकते हो?आंसुओं से टपकते गीतमुस्कान के पीछे छिपा हुआदर्द का संगीत?समझ सकते हो?हर रोटी के साथ सिंकती मेरी भावनाएं?चख सकते होसब्जी में उतरा कविता का रस?बच्चों ...
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  September 13, 2012, 4:40 pm
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