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कवितावली

सुबह की पहली बसअक्सर छूट जाती है क्षणिक दूरी सेसांस सांस संभाले हुए देखूंबर्फ का विस्तार.  तुम्हारीपतली बाँहों की ओरन पुनारागन न पुनरावृति किन्तु लौट लौट कर आता है मन.इस जाड़े भीस्नो शू पर बनती हैं बेढब आकृतियां  उनमें दिख जाता हैउदास चेहरास्मृति से भरा हुआ.मेरे कच...
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  October 13, 2014, 6:56 am
किसी ने नहीं कहा भद्र पुरुष कहाँ जाते हो तुम प्रिय को तज कर. मोक्ष किस जगह, किस विध किन्तु एक परछाई तो बाँध जाते सिरहाने. एक अंतिम विदा कहने आना लौट कर, बस एक बार. ...
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  September 6, 2013, 8:51 pm
मैं अब अकेले चल नहीं पाती तुम्हें अपना हाथ थामते इतना सोचा है मैंने तुम्हारा परोक्ष होना इक ताबीज़ सा खुला है मेरे गले के ओर और जब सोचती हूँ कि इन गर्मियों में तुम्हारे नाम की है ठंडी मन्नतें और आधा साल बीत चुका है मैं बटोरने लगती हूँ फिर पुरानी प्रार्थनाओं के पंख ढह...
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  July 2, 2013, 2:15 am
मैं नाचती हूँ ,अपनी नदी से मृत काठ को बहा देने के लिए मैं नाचती हूँ ,उन्मादपूर्ण होकर पृथ्वी की आग को अपना घूमर देने के लिए मैं भर लेती हूँ देह की चाबियों में लचक अपनी और जब तुम गाते हो मेरे लिए मैं शांत होकर खोल देती हूँ ताले सारे रात भर दौड़ते हैं तुम्हारे साथ के सपने !...
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  July 2, 2013, 2:12 am
मेरा हर सूखा पत्ताजैसे बारिशें पी जाएउस नशे का आभास हो तुम ...मेरा हर सिकंदर शब्दजहाँ हार मान जाएउस उच्छवास की सांस हो तुम…...
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  July 2, 2013, 2:11 am
कुछ कांसे के रंग के थे छालेएक निरर्थक हीरा उँगलियों का नील छिपाता हुआमैंने सरका लिए सफ़ेद पन्ने खुद तकज़ख्म खुलते रहे बंद कमरों मेंएक घर बाकी था नसों में मेरीकुछ कम पड़े कोयले पैरों के नीचेतूने बिना किसी इश्वर की कुल्हाड़ीबना दी ये सड़क मुझ तकतुम लिख रहे हो मिटे हुए अ...
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  June 28, 2013, 8:37 pm
तुम्हारे ही पानी में खोये हैं मेरी राह के पत्थरतुम्हारे ही पानी में है नक्शा मेरे भावी काअपनी नमी पर यकीन रखना !कि मैं पानी बन कर लौट रहीं हूँ ..मैं ...तुम्हारे नीचे ,तुम्हारे पीछे ,मैं ही हूँ तुम्हारे पानी की नीली मछलीमैं ही हूँ तुम्हारे पानी में गोते लगाती लहरवहीँ हूँ मै...
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  June 28, 2013, 8:36 pm
तुम्हारे शब्दों के बीच होती है सड़केंमैं बसा लेती हूँ शहर पूराउन शहरों में होते हैं तुम्हारे सामीप्य से भरे घरतुम्हारे शब्दों के बीच होती हैं नौकाएँमैं बाँध लेती हूँ नदी पूरीउन नदियों में होती है रवानगी तुम तक पहुँच आने कीतुम्हारे शब्दों के बीच होती हैं सीढियाँमैं ...
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  June 24, 2013, 10:40 pm
जिन्हें कभी छुओगे तुम ,उन सारी चूड़ियों को इकठ्ठा किया है मैंनेचूर कर खुशबू मैंने लीप लिया है कच्ची मिटटी का आँगनउनकी मणियाँ पिरो दी है चाँद की बालियों मेंऔर अब इन चूड़ियों में उलझेंगी जब उंगलियाँ तुम्हारीआँगन में पैरेगी रस वाली स्वर्ण-सोनजूहीचाँद का चमकेगा प्रेम-ल...
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  June 24, 2013, 10:38 pm
अँधेरी रातों की अंधड़ बारिशें मैं आरज़ुओं की सड़क पर भीगती रही घर लौटने के लिए गिनती रही रुमाल में रखे दो सिक्के मैं काँपती ठंडी साँसों से बनाती रही बादलों के लच्छे तुम सहसा ओढ़ा गए महकते होंठों की शाल मुझ पर बची रही तुम्हारी मनपसंद चिपचिपाहट देर तक ! मैं खो गयी तुम्ह...
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  June 24, 2013, 10:37 pm
कुछ फाँस सी धूप की… कुछ उमस के तिनके चुभते हैं ,भर जाते हैं बालों में मैं पीछे मुड़ कर नहीं देखना चाहती वो रूखी दुपहरी जहाँ मैं गिरी थी मैं गीली ज़मीं पीती हूँ मेरे पेड़ की हर फुनगी टूटी विक्षत सी सरकती है मेरे ही जड़ों के पास मैं फूँक कर उड़ा देती हूँ सारे पीले पल मैं ग...
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  June 24, 2013, 10:35 pm
तेरे समंदर किनारे लहरों की ठंडी आग में जब पक जाती है रात तुम उनमें मेरी थाली परसना धीरे से खोलना तारों का डब्बा और चांदी की बरक वाला इक टुकड़ा चखना मैं घुल जाऊँगी ज़बां पर तेरी तू रात मेरी सुलगाये रखना .....
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  June 23, 2013, 7:01 pm
अध-ब्याही धूप कितने सुबहों से कैद खिली है इक पेड़ की छाया में.......आधी इक रात बिछी है बिस्तर पर मेरे तेरी चादर से दूर ........तू आधा वहाँ सोना मैं आधा यहाँ इक पूरी नींद बुनने को बहुत रेशे हैं प्यार केएक गर्म सा सपना सेंकेथाली दो रूहों की परसेंतेरी भूख से सने मैं बना दूँ निवाले...
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  June 16, 2013, 7:10 pm
प्राकृतिक होना ही मेरा धार्मिक होना हैकि बहुत मुश्किल है प्राकृतिक होनामानो घर के अन्दर अपनी ही प्रकृति के साथ होनाजब जब कोशिश करती हूँ खुद से बाहर आने कीखुद से परे को पकड़ लेने कीमैं कुछ नहीं छू पातीमिडास के हाथों का स्वर्ण-शाप लगता है रूह कोऔर मैं टालने लगती हूँ पुक...
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  June 16, 2013, 7:08 pm
मैं ले जा रही हूँ चादर इस रात की तुम छोड़ जाओ समेटी हुई सलवटें ना मैं बनी हूँ प्रेम के चमकीले रास्तों के लिए ना तुम्हें आदत है पथरीले राहों पर चलने की एक अँधेरे की कोख में पलती हुई चाहनायें तुम से ,तुम तक का प्रसव लिए मैं भर दुपहरी फिरती रही लादे हुए लालसाओं का गर्भ अभिश...
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  June 16, 2013, 7:07 pm
जब मैं प्रेम करती हूँ मैंने देखा है ...वो सारे हुनर जिनकी मैं अनुरागी रही हूँ एक गुच्छे में बंध कर गोद में आ गिरते हैं मेरी उँगलियों में भर जाती हैं तुम्हारे होठों के गीली अंगूठियाँ कैनवस से उठती है गेहूँ की मादक महक और मैं बन जाती हूँ एक सुघड़ चित्रकार जब तुम प्रेम क...
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  June 8, 2013, 12:05 am
इक तुम ही नहीं पास आता है बाकी सब पास आता विरोध रेल की पटरियों सा दूर दूर तक फैला असामंजस्य शाम को होने वाली उदासियाँ देह में कैद नदियाँ तुम इतनी दूर हो मैं पिछड़ जाती हूँ नजदीकियों सेउत्तेजना सेआवेग सेदेह की कीलों पर छिल जाने सेमैं चिट्ठियों से खो बैठती हूँ संदेसेअ...
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  June 5, 2013, 3:18 am
हरसिंगार से भरी थाली और उनपर गीले बालों से रिसता पानी मैं कान्हा को देने से पहले रूठती हूँ वो निस्तब्ध निर्निमेष देखता है मैं छिपा देना चाहती हूँ बंसी उसकी कहती हूँ बैठो साथ ,बताओ कहाँ छिपाया है प्रणय मेरा  और प्रेमाभाव का आरोप उस पर थोप देती हूँ वो छोड़ देता है बंसी ...
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  June 2, 2013, 5:05 am
हर शाम मुझे क्या उत्साह अपने पास बुला रहा है ?जब देखती हूँ पत्तियों को ताली बजाते हुए हवाओं के लिए तब चुपके से कानों में उम्र का क्या भाग्य पढ रहा है ?गिरती हुई बिजली मेरे रूह का कौन सा गीत गा रही है ?किन देवताओं ने जला दिए हैं पवित्र संयम वाले पौधे दिल की गुफाओं में ?नहीं ,न...
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  June 1, 2013, 1:18 am
आकाश बरस रहा है बूंदों के पैरों की नीचे दब रही है ज़मीं हालांकि नील के निशान नहीं है पर तुम जानते थे तुम ये भी जानते थे कि मैं घायल हूँ तुम समझाते रहे कि कैसे कैद की झिझक से गिरफ्त हूँ मैं मैं समझाती रही कि क्यूँ मैं उड़ान नहीं भर पाऊँगी और जैसे जैसे ठण्ड बढती गयी मैं सु...
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  June 1, 2013, 1:14 am
तुम समझ पाओगे इक दिनजो मैं कभी नहीं कहूँगीमैं कितनी अलग होकर जुड़ी हूँ तुमसेकिसी तस्वीर और उसके पीछे के हिस्से की तरहतुम्ही से विपरीत और तुम्ही से सार्थकतुम समझ पाओगे शायद उस दिनजब हम किसी सौम्य सुबह में बैठे होंगे किसी कला संग्रहालय के अन्दरऔर बुरे मौसम के बनावटी ब...
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  May 30, 2013, 4:07 am
मैं पढ़कर कहानी इक समंदर की किताब रख लेती हूँ गोद में इक तूफ़ान उठता है जड़े हुए शब्दों से यादों का बवंडर बढ़ता है…. मैं भरसक खींचती हूँ इक नाव उनमे भरी हुई थी मीठी आँखें ,नाव की पाल की रस्सी लेकिन छेद देती है हथेलियों की नसें मेरी ....ना जाने कितना बर्फीला पानी उलीचना है...
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  May 30, 2013, 3:55 am
घंटों बारिश होती रही...मैं घंटो टिप-टिप रिसती रही तेरी शिकन देख कर माथे से सरकी बूंदें तेरी उपेक्षा देख कर गालो से सरकी बूंदें तेरी बेरुखी देख कर धड़कन से सरकी बूंदें तेरी मरज़ी देखी .....और मैंने जाने दी सारी बूंदें..........
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  May 30, 2013, 3:54 am
नींद की सिल्ली से आग जलाये मैंने देग चढ़ाई सुबहों की भात सपनो का रांधा दिन भर फिर राख बुझाई रातो की...
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  May 29, 2013, 1:46 am
मासूम उँगलियों सेमैं शाम ढले उतारती हूँ सूरजकुछ मिट्टी बुहार देती हूँ अंधेरे कीसुबह की देह पर खामोशी सेइक राहगीर के हाथोंनसीब ने भिजवाई है कहानी मेरीमैं पढ़ कर आधी किताबलौट गयी हूँ कब्र में सोने फिर से...
कवितावली ...
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  May 29, 2013, 1:44 am
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