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saara aakash

माँ बरसाती नदी हैरिमझिम बूँदों की सुंदरता न होपर जीवन को भरे-पूरे रूप में समो लेने की शक्ति है वहहर आने वाली बारिश मेंभर जाती है पूरी-की-पूरीऔर बीतते मौसम के साथजब उतर जाता है समूचा पानीउसकी सोंधी आँखों में कौंध जाता हैकिसी बिखरते हुए बादल का वह दृश्य जो उसकी मिट्टी की ...
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  November 13, 2013, 5:31 pm
एक नदी थीकुछ काई की रंगत वालीपहाड़ों के चादर में लिपटी हुईउसके शांत स्थिर पानी मेंदिखती थीं कई-कई विस्मृतियां हाँ, जब धूप उसके पैरों के कोने से फिसलकर चादर के पीछे सो रहती है।सतह के नीचे फैले शैवालों से झाँकती हैं किलकारियाँ और रात घिरने पर ढेर के ढेर उगे अंगूरों पर आव...
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  September 24, 2013, 12:11 pm
सोया हुआ शहर आँखों में उतरा आये ख्वाब की तरह होता है.कुछ रातरानी के फूल अनगिन दीयों की टिमटिमाती महक मेंघुल गए हों जैसेहल्की सरसराहटों मेंबीता हुआ वक़्त आकाशके झीने चादर कोगहराता चला जाता हैऔर चांदी की नदीसपनीली घाटियों में आते-आते ठिठक पड़ती है                                  ...
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  April 19, 2012, 10:16 am
जब तुम अपनी तोतली आवाज़ में शब्दों के घरौंदें बुनती होमेरे आकाश की डाली परएक गुलमोहर खिलता हैअपनी नन्हीं उँगलियों के स्पर्श सेतुम मन की किसी अदृश्य वीणापर छेड़ देती होकोई सुहाना राग.वसंत के पूर्वागमन-सी  स्वप्न में मुकुलित तुम्हारी आँखेंमरुभूमि के उपवन तो नहीं!क्...
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Tag :muskan chandani jiwan sangit
  April 6, 2012, 4:19 pm
जब कभी तुम अपने सफ़ेद पंखों मेंमुझेलपेट लेती होतुम्हारे सादेपन की रंगतमेरा कुछ ले उड़ती है.घने गांछों के सिर परजहाँ सांझ उगती हैऔर डूब जाता हैअनमना-सा सूरजकुछ भी तो नहीं बदलताफिर जाने क्यों टहनियां झुक जाती हैंउदास होकरऔरजरा सा रूककर तुम  मुझे छोड़ देती हो वही...
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  March 4, 2012, 12:36 pm
जब कभी तुम अपने सफ़ेद पंखों मेंमुझे लपेट लेती हो तुम्हारे सादेपन की रंगतमेरा कुछ ले उड़ती है.घने गांछों के सिर पर जहाँ सांझ उगती है और डूब जाता है अनमना-सा सूरज कुछ भी तो नहीं बदलताफिर जाने क्यों टहनियां झुक जाती हैं उदास होकरऔरजरा सा रूककर तुम  मुझे छोड़ देती हो वहीँ कह...
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  March 4, 2012, 12:36 pm
पहले ख्वाब केवल तीन तरह के होते थे- बच्चों का ख़्वाब, जवानों का ख़्वाब और बूढों का ख़्वाब. फिर ख्वाबों की इस फ़ेहरिस्त में आजादी के ख़्वाब भी शामिल हो गये. और फिर ख्वाबों की दुनिया में बड़ा घपला हुआ. माता-पिता के ख़्वाब बेटे-बेटियों के ख्वाबों से टकराने लगे. पिताजी बेटे क...
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  January 15, 2012, 6:34 am
saara aakash: मौसम...
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  January 12, 2012, 8:42 pm
जब हम साथ होते हैंकभी मौसम के बारे में नहीं पूछते क्या ही बेमानी सी चीज़  मालूम पड़ती हैकि कहें- देखो आज धूप खिली है वह उगती है और छा जाती हैहम परहवा चलती है और बहका जाती हैबारिश में घुलती मिट्टी कीमहकबहुत जानी-सी हैऔरतुम्हारी बूंदों में पल-पल सोंधा हो जाना मैंने सीखा...
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  January 9, 2012, 8:07 pm
सिल्क, एक ऐसी लड़की की कहानी है जो अस्सी की दशक में पैदा तो हुई लेकिन वह अपने समय से काफी आगे की सोच रखती है. व्यक्ति स्वातंत्रय की उस आदिम भावना को अपने जिस्म के लिफाफे में लपेटे वह लड़की अपने रास्ते खुद चुनती है और सोचती है कि वह अपनी मंजिल भी चुनेगी,ये उसका नितांत निजी च...
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Tag :बाजार
  December 10, 2011, 12:24 pm
मन है और उसको ओढ़े हुए एक देहकुछ है जो नहीं हैजीवन हैधरती हरी चुनर ओढ़े खड़ी हैऔरविस्तृत मरुप्रांतर की शुष्क हवाके ऊपर खिला है आकाश.समुद्र है कहीं दूर उस न देखे झरोखे-सानदी कीछूटी हुई  धारा की पहुँच से बाहरआँखों के काजल में डूबती दिशाएंकुछ चिटक-सा जाता है हर बार.आह भगवान!...
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  August 18, 2011, 5:17 pm
saara aakash: एक सवाल: "एक प्रश्न मेरे ज़ेहन में बार-बार उठता है कि जातिवादी व्यवस्था जो हमारे समाज में एक अरसे से चली आ रही है,उसका समाधान क्या हो! आखिर वह कौन सी..."...
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  August 8, 2011, 5:07 pm
एक प्रश्न मेरे ज़ेहन में बार-बार उठता है कि जातिवादी व्यवस्था जो हमारे समाज में एक अरसे से चली  आ रही  है,उसका समाधान क्या हो! आखिर वह कौन सी मानसिकता या कि सामाजिक समझ थी जिसने इस विचार को जन्म दिया होगा कि समाज खांचे में बटा हो.लेकिन इधर कुछ मित्रों की असहिष्णुता देखक...
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  August 8, 2011, 5:07 pm
saara aakash: जानेवालों से - निदा फाजली: "जानेवालों से राब्ता* रखना दोस्तों, रस्मे-फातहा रखना जब किसी से कोई गिला रखना सामने अपने आइना रखना घर की तामीर* चाहे जैसी हो इसमें ..."...
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  August 8, 2011, 5:04 pm
जानेवालों से राब्ता* रखनादोस्तों, रस्मे-फातहा रखना जब किसी से कोई गिला रखनासामने अपने आइना रखना घर की तामीर* चाहे जैसी होइसमें रोने की कुछ जगह रखना जिस्म में फैलने लगा है शहरअपनी तन्हाईयाँ बचा  रखना मस्जिदें हैं नमाज़ियों के लिएअपने दिल में कहीं खुदा रखना मिलना-जुल...
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  August 8, 2011, 5:04 pm
कभी शब्द और अर्थ पास होकर भी किसी अनजाने क्षितिज की ओर खुलने लगते हैं ...क्या है ये ! इस इंद्रजाल की सोंधी सी महक में हलके बहुत थोड़े से भींगे पत्तों की छुअन डाल से अभी-अभी टपके फूल की लजाई मुस्कानऔर रात के अन्धकार में डूबते अंतिम तारे की अटूट निष्ठा ये सब और बहु...
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  August 8, 2011, 10:12 am
saara aakash: कला: "'यह शायद मस्तिष्क का एक ही उचित पक्ष होता है जो एक पुरुष को आभूषणों और कला के अपेक्षाकृत अधिक स्थिर सिद्धांतों से सम्बंधित सत्य या क्या सही ..."...
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  August 4, 2011, 9:01 pm
"यह शायद मस्तिष्क का एक ही उचित पक्ष होता है जो एक पुरुष को आभूषणों और कला के अपेक्षाकृत अधिक स्थिर सिद्धांतों से सम्बंधित सत्य या क्या सही है - इसका एक विचार बनाने में सक्षम बनाता है. इसमें पूर्णता का एक ही केंद्र होता है,हालाँकि यह अपेक्षाकृत छोटे वृत्त का केंद्र होता ...
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Tag :fashion and interests
  August 4, 2011, 9:01 pm
  " विद्रोही बनते नहीं, उत्पन्न होते हैं.विद्रोह्बुद्धि परिस्थियों से संघर्ष की सामर्थ्य, जीवन की क्रियाओं से,परिस्थितियों केघात-प्रतिघात से नहीं निर्मित होती. वह आत्मा का कृत्रिम परिवेष्टन नहीं है, उसका अभिन्नतम अंग है. मैं नहीं मानता कि दैव कुछ है, क्योंकि हममें को...
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  July 26, 2011, 5:15 pm
निदा फाजली की शायरी में  बारिश के बाद धुले आकाश में खिलते इन्द्रधनुष की-सी कशिश है.इनके अंदाज़-ए-बयां में जिंदगी के हर रंग ढलें हैं, आज हम जिस कठिन समय में जी रहें हैं...जहाँ इन्सानियत की दुहाई देना बुझदिली समझी जाती है और दूसरों को चोट पहूँचाने को कला.मुंबई में हूआ  सि...
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  July 15, 2011, 3:41 pm
स्त्री पदबंध का जो रूप आज हमारे सामने है,वह पुरूष वर्चस्व की विरासत है. एक स्त्री कैसे सोचती है,किस तरह उसे अभिव्यक्ति देती है या किस तरह का उसका रहन सहन होना चाहिए, इन सब पर भी उसी वर्चस्व का नियंत्रण है.इस तरह एक सांचे में ढली स्त्री हमारे सामने आती है..जीव-विज्ञान की दृष...
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  October 27, 2010, 11:15 pm
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