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बचपन में खेले गए किसी खेल को पूरी तमयता के साथ खेलिए फिर देखिए कि क्या जादू घटित होता है। लेकिन इस जादू को समझने के लिए जागरूक दिमाग की आवश्यकता पड़ेगी, साधारण दिमाग से यह शायद ही समझ में आए। कोई भी खेल केवल खेल नहीं होता बल्कि वो अपने आपमें ऐतिहासिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक आ...
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  March 20, 2018, 11:03 am
व्यस्ता ज़्यादा होने की वजह से डायरी का चाहकर भी स्थगित होता रहा। आज से कोशिश रहेगी रोज़ आपके समक्ष हो। यह आलेख कुछ दिन पहले का है।#चंदन - आज हमलोगों ने एक खेल खेलने की कोशिश की जिसे कभी हमलोग बचपन मे खलते थें। क्या मज़ा आता था। लेकिन आज फिर से वही खेल को खेल के वो वाला मज़ा नही ...
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  March 19, 2018, 6:53 pm
एक सच्चे कलाकार की कोई जाति नहीं होती और ना ही उसका कोई धर्म होता है, जैसे कला जाति-धर्म से परे होती है। रंगमंच का एक कलाकार समूह में कार्य करता है और उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके साथ काम करनेवाले लोग किस जाति, धर्म या समुदाय के हैं। इसप्रकार वो अनजाने में ही दु...
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  March 6, 2018, 8:58 am
यह बात अमूमन सुनने को मिलती है कि स्थितियां अनुकूल नहीं मिली नहीं तो मैं क्या से क्या होता. यह बात किसी भी बहाने से ज़्यादा कुछ नहीं हैं क्योंकि यदि हम समय और अनुकूल स्थिति के इंतज़ार में बैठे रहे तो वो कभी भी अनुकूल नहीं होने वाला है. जिसमें दम होता है वो स्थितिओं को अनुकू...
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  February 27, 2018, 11:00 pm
शिक्षित होने और साक्षर होने में ज़मीन आसमान का फर्क है। आज की व्यवस्था साक्षर तो बना रही है, शिक्षित बनाने में उसे कोई रुचि नहीं है। लेकिन यह भी सत्य है कि एक ज़िम्मेदार कलाकार का कार्य केवल साक्षरता मात्र से नहीं चल सकता।भिन्न-भिन्न प्रकार के अभ्यासों को करना, उसे समझना ...
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  February 26, 2018, 4:23 am
जीवन और रंगमंच नित्य नया कुछ सिखने-सिखाने का नाम है। जिस प्रकार प्रकृति नित गतिशील है जड़ नहीं, ठीक उसी प्रकार जीवन भी परिवर्तनशील है और कला भी। जो कोई भी अतीतजीवी है, वो दरअसल अप्राकृतिक है। जीवन कल में नहीं बल्कि आज में चलता है और हमारे आज से ही हमारा कल बनता-बिगड़ता है। ...
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  February 24, 2018, 11:50 pm
प्रसिद्द फ़िल्म अभिनेता दिलीप कुमार एक अभिनेता और उसके सामाजिक दायित्वों के बारे में अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि"मेरा सदैव यह मानना रहा है कि अभिनेता को सामाजिक उत्तरदायित्व निभाते हुए समाज के प्रति समर्पित रहना चाहिए। एक अभिनेता, जो असंख्य लोगों का चहेता होता है, ...
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  February 23, 2018, 9:23 pm
बतौर एक इंसान हमारी मानसिक, शारीरिक हालात और व्यस्तता जो भी हो लेकिन हमारे पास सतत अभ्यास और कठोर श्रम के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। नाटकों का पूर्वाभ्यास और उसका प्रदर्शन तो परिणाम है, प्रक्रिया नहीं। एक कलाकार बनने की प्रक्रिया का रास्ता कठोर और नित्य अभ्यास क...
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  February 22, 2018, 3:18 pm
आज के अभ्यास की शुरुआत थोड़ी अलग प्रकार से हुई। मेरा एक विद्यार्थी है – राकेश। बहुत मेहनती लेकिन पूरा काफ्काई और दोस्त्रोवासकी के चरित्रों के द्वन्द से भरा हुआ – अंतर्मुखी, शर्मिला और कई सारी मनोग्रंथियों के बोझ से लदा हुआ। ज़रूरत से ज़्यादा संवेदनशील और गुस्सैल। ख़ूब म...
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  February 21, 2018, 1:58 pm
बहस की श्रृंखला के रूप में मैंने सोशल मिडिया पर लिखा “मैं रंगमंच में वैसे निर्देशकों, नाट्यदलों और आयोजकों का कायल हूँ जो अपने नाटकों में बिना टिकट कटाए अपने करीबी से करीबी रिश्तेदारों, दोस्तों और रंगकर्मियों तक को सभागार में घुसने नहीं देते। इसके बावजूद उनके नाटकों...
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  August 6, 2016, 6:35 pm
समय-समय पर फेसबुक पर कुछ सार्थक बहसें भी होती रहतीं हैं। ऐसी ही एक बहस रंगकर्मीं, नाट्य-समीक्षक और समकालीन रंगमंच नामक पत्रिका के सम्पादक राजेश चन्द्र के फेसबुक वाल पर चल रही है। इस बहस में अबतक राजेश चंद्र के अलावे मृत्युंजय शर्मा (पटना), पुंज प्रकाश (पटना), परवेज अख्तर ...
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  August 4, 2016, 7:15 am
धूमिल की कविता पटकथा की रंग-यात्रा दिल्ली में जारी है। अब तक इसके तीन मंचन हो चुके हैं। पहला मंचन सत्यवती कॉलेज मे,दूसरा सफदर स्टुडियो मे और तीसरा मंचन हंसराज कॉलेज में हुआ है। कई अन्य मंचनों का आमंत्रण है – देखते हैं कितना संभव हो पाता है। अभिनेता और निर्देशक की अन्य र...
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  April 15, 2016, 8:05 am
पुंज प्रकाश भीष्म साहनी की कहानी 'लीला नंदलाल की'का मंचन जब पटना के कालिदास रंगालय में हुआ तो दूसरे दिन एक प्रमुख अखबार में कमाल की पूर्वाग्रह भरी समीक्षा प्रकाशित हुई। प्रस्तुति के समाचार के बीच में अलग से एक कॉलम का शीर्षक था – ऐसी रही निर्देशक की लीला। आगे जो कुछ भी ...
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  January 31, 2016, 1:18 pm
पुंज प्रकाशहाय, हाय ! मैंने उन्हें देख लिया नंगा, इसकी मुझे और सजा मिलेगी  । – अंधेरे में, मुक्तिबोधहिंदी रंगमंच के सन्दर्भ में एक बात जो साफ़-साफ़ दिखाई पड़ती है वो यह कि वह ज़्यादातर समकालीन सवालों और चुनौतियों से आंख चुराने में ही अपनी भलाई देखता है । नाटक यदि समकालीन सव...
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  January 29, 2016, 1:31 pm
नाटक का पोस्टरसुदामा पांडेय “धूमिल” लिखितपटकथाआशुतोष अभिज्ञका एकल अभिनयप्रस्तुति नियंत्रक – अशोक कुमार सिन्हा एवं अजय कुमारध्वनि संचालन – आकाश कुमारपोस्टर/ब्रोशर – प्रदीप्त मिश्रापूर्वाभ्यास प्रभारी – रानू बाबूप्रकाश परिकल्पना – पुंज प्रकाशसहयोग –  ह...
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  January 15, 2016, 1:01 pm
मुन्ना कुमार पांडे का आलेखभिखारी ठाकुर भोजपुरी अंचल के बीसवीं शताब्दी के सबसे बड़े कलाकार थे। भारतीय पारंपरिक रंगमंच से प्रेरणा ग्रहण करके उन्होंने एक नए किस्म का नाट्य रूप विकसित किया, जिसका एक सूत्र संस्कृत रंगमंच की परंपरा से जुड़ता था तो दूसरा पारंपरिक भारतीय ...
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  December 28, 2015, 3:38 pm
पुंज प्रकाश  आर्तो के रंगमंच सम्बन्धी विचारों को समझने के लिए रंगमंच की प्राचीनतम अवस्था से लेकर बीसवीं शताब्दी के मनोवैज्ञानिक रंगमंच तक की समझ होना अनिवार्य है । यदि ऐसा नहीं किया गया तो आर्तो का चिंतन एक पागलपन और प्रलाप से ज़्यादा शायद ही कुछ लगे । मोटे तौर पर बात...
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  August 2, 2015, 2:54 pm
पुंज प्रकाशकला, संस्कृति और रंगमंच के विकास और बढ़ावा के नाम पर हर ना जाने कितने रूपए स्वाहा होते हैं; किन्तु विकास के सारे दावे ध्वस्त हो जातें हैं जब यह पता चलता है कि देश के अधिकांश शहरों में सुचारू रूप से नाटकों के मंचन के योग्य सभागार तक नहीं हैं. महानगरों में जो हैं ...
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  July 31, 2015, 8:40 pm
पुंज प्रकाशमीडिया मूलतः दो प्रकार का है - प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक। रंगमंच के बारे में विद्वानों का मत है कि यह भी मूलतः दो प्रकार का ही है – शौकिया और व्यावसायिक। जात्रा, पारसी, नौटंकी के साथ ही साथ पारंपरिक रंगमंच लगभग लुप्तप्राय हो चुके हैं। भारत में व्यावसायिक रंगमं...
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  July 30, 2015, 8:38 pm
पुंज प्रकाश का यह साक्षात्कार इप्टानामा के सम्पादक दिनेश चौधरी द्वारा लिया गया. इसे इप्टानाम के नए अंक और कल के लिए (अंक 87-88) में भी पढ़ा जा सकता है. हिंदी रंगमंच के समक्ष आज सबसे बड़ी चुनौती क्या है? पूंजी, प्रशिक्षण, पूर्वाभ्यास की जगह, नाट्य प्रदर्शन के लिए उचित सभागार...
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  July 30, 2015, 8:33 pm
पुंज प्रकाशअपवादों को छोड़ दिया जाय तो हिंदी समाज में रंगमंच आर्थिक मामलों में कभी भी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाया और ना हीं कभी आवाम की ज़रूरतों में ही शामिल हो पाया है। इसीलिए टिकट खरीदकर नाटक देखने की प्रथा का विकास होना संभव ही नहीं हुआ। इसके केन्द्र में रंगमंच का अ...
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  July 29, 2015, 12:35 pm
पुंज प्रकाश अमेरिकी नाटककार व रंग-चिन्तक डेविड ममेट ने अपनी किताब “सत्य और असत्य” (true and false : heresy and common sense for the actors) में लिखा है कि “आपका काम नाटक को दर्शकों तक पहुंचना है, इसलिए शुतुरमुर्ग की तरह रेत में गर्दन घुसा लेने या विद्वता मात्र से काम नहीं बनेगा।"वैसे कुछ अति-भद्रजनों ...
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  February 23, 2015, 12:55 pm
बिहार के गांवों-कस्बों में उत्सवों के अवसर पर नाटकों को मंचित करने की अपनी एक अनूठी और रोचक परम्परा रही है। तमाम उतार चढाओं के बीच यह परम्परा आज भी कायम है। संजय कुमार का यह आलेख उसी नाट्य परम्परा की एक झलक पेश करती है। इस आलेख के केन्द्र में हैं फुलवरिया (भागलपुर) नामक ग...
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  November 30, 2014, 10:47 pm
बंगला पुस्तक “प्रसंगः नाट्य” में प्रकाशित ख्याति प्राप्त रंगकर्मी शंभू मित्र द्वारा मूलतः बंगला में लिखित इस महत्वपूर्ण अभिनय चिंतन का हिंदी अनुवाद प्रसिद्द रंग-चिन्तक नेमीचन्द्र जैन ने किया था। जो वर्ष 1976में “नटरंग” के 25वें अंक में प्रकाशित हुआ था। शंभू दा ने रंग...
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  October 19, 2014, 8:12 pm
नटमेठिया एक जीवनीपरक (Bio-graphical) नाटक है जिसके केन्द्र में हैं बिहार के लेखक, कवि, अभिनेता,निर्देशक, गायक, रंग-प्रशिक्षक भिखारी ठाकुर और भारतीय समाज की जटिल वर्गीय व जातीय बुनावट । भिखारी ठाकुर की संघर्षशील जीवनयात्रा का काल 1887से 1971 रहा है यानि ब्रिटिश राज स...
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  August 30, 2014, 8:25 pm
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