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बहस की श्रृंखला के रूप में मैंने सोशल मिडिया पर लिखा “मैं रंगमंच में वैसे निर्देशकों, नाट्यदलों और आयोजकों का कायल हूँ जो अपने नाटकों में बिना टिकट कटाए अपने करीबी से करीबी रिश्तेदारों, दोस्तों और रंगकर्मियों तक को सभागार में घुसने नहीं देते। इसके बावजूद उनके नाटकों...
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  August 6, 2016, 6:35 pm
समय-समय पर फेसबुक पर कुछ सार्थक बहसें भी होती रहतीं हैं। ऐसी ही एक बहस रंगकर्मीं, नाट्य-समीक्षक और समकालीन रंगमंच नामक पत्रिका के सम्पादक राजेश चन्द्र के फेसबुक वाल पर चल रही है। इस बहस में अबतक राजेश चंद्र के अलावे मृत्युंजय शर्मा (पटना), पुंज प्रकाश (पटना), परवेज अख्तर ...
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  August 4, 2016, 7:15 am
धूमिल की कविता पटकथा की रंग-यात्रा दिल्ली में जारी है। अब तक इसके तीन मंचन हो चुके हैं। पहला मंचन सत्यवती कॉलेज मे,दूसरा सफदर स्टुडियो मे और तीसरा मंचन हंसराज कॉलेज में हुआ है। कई अन्य मंचनों का आमंत्रण है – देखते हैं कितना संभव हो पाता है। अभिनेता और निर्देशक की अन्य र...
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  April 15, 2016, 8:05 am
पुंज प्रकाश भीष्म साहनी की कहानी 'लीला नंदलाल की'का मंचन जब पटना के कालिदास रंगालय में हुआ तो दूसरे दिन एक प्रमुख अखबार में कमाल की पूर्वाग्रह भरी समीक्षा प्रकाशित हुई। प्रस्तुति के समाचार के बीच में अलग से एक कॉलम का शीर्षक था – ऐसी रही निर्देशक की लीला। आगे जो कुछ भी ...
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  January 31, 2016, 1:18 pm
पुंज प्रकाशहाय, हाय ! मैंने उन्हें देख लिया नंगा, इसकी मुझे और सजा मिलेगी  । – अंधेरे में, मुक्तिबोधहिंदी रंगमंच के सन्दर्भ में एक बात जो साफ़-साफ़ दिखाई पड़ती है वो यह कि वह ज़्यादातर समकालीन सवालों और चुनौतियों से आंख चुराने में ही अपनी भलाई देखता है । नाटक यदि समकालीन सव...
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  January 29, 2016, 1:31 pm
नाटक का पोस्टरसुदामा पांडेय “धूमिल” लिखितपटकथाआशुतोष अभिज्ञका एकल अभिनयप्रस्तुति नियंत्रक – अशोक कुमार सिन्हा एवं अजय कुमारध्वनि संचालन – आकाश कुमारपोस्टर/ब्रोशर – प्रदीप्त मिश्रापूर्वाभ्यास प्रभारी – रानू बाबूप्रकाश परिकल्पना – पुंज प्रकाशसहयोग –  ह...
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  January 15, 2016, 1:01 pm
मुन्ना कुमार पांडे का आलेखभिखारी ठाकुर भोजपुरी अंचल के बीसवीं शताब्दी के सबसे बड़े कलाकार थे। भारतीय पारंपरिक रंगमंच से प्रेरणा ग्रहण करके उन्होंने एक नए किस्म का नाट्य रूप विकसित किया, जिसका एक सूत्र संस्कृत रंगमंच की परंपरा से जुड़ता था तो दूसरा पारंपरिक भारतीय ...
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  December 28, 2015, 3:38 pm
पुंज प्रकाश  आर्तो के रंगमंच सम्बन्धी विचारों को समझने के लिए रंगमंच की प्राचीनतम अवस्था से लेकर बीसवीं शताब्दी के मनोवैज्ञानिक रंगमंच तक की समझ होना अनिवार्य है । यदि ऐसा नहीं किया गया तो आर्तो का चिंतन एक पागलपन और प्रलाप से ज़्यादा शायद ही कुछ लगे । मोटे तौर पर बात...
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  August 2, 2015, 2:54 pm
पुंज प्रकाशकला, संस्कृति और रंगमंच के विकास और बढ़ावा के नाम पर हर ना जाने कितने रूपए स्वाहा होते हैं; किन्तु विकास के सारे दावे ध्वस्त हो जातें हैं जब यह पता चलता है कि देश के अधिकांश शहरों में सुचारू रूप से नाटकों के मंचन के योग्य सभागार तक नहीं हैं. महानगरों में जो हैं ...
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  July 31, 2015, 8:40 pm
पुंज प्रकाशमीडिया मूलतः दो प्रकार का है - प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक। रंगमंच के बारे में विद्वानों का मत है कि यह भी मूलतः दो प्रकार का ही है – शौकिया और व्यावसायिक। जात्रा, पारसी, नौटंकी के साथ ही साथ पारंपरिक रंगमंच लगभग लुप्तप्राय हो चुके हैं। भारत में व्यावसायिक रंगमं...
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  July 30, 2015, 8:38 pm
पुंज प्रकाश का यह साक्षात्कार इप्टानामा के सम्पादक दिनेश चौधरी द्वारा लिया गया. इसे इप्टानाम के नए अंक और कल के लिए (अंक 87-88) में भी पढ़ा जा सकता है. हिंदी रंगमंच के समक्ष आज सबसे बड़ी चुनौती क्या है? पूंजी, प्रशिक्षण, पूर्वाभ्यास की जगह, नाट्य प्रदर्शन के लिए उचित सभागार...
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  July 30, 2015, 8:33 pm
पुंज प्रकाशअपवादों को छोड़ दिया जाय तो हिंदी समाज में रंगमंच आर्थिक मामलों में कभी भी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाया और ना हीं कभी आवाम की ज़रूरतों में ही शामिल हो पाया है। इसीलिए टिकट खरीदकर नाटक देखने की प्रथा का विकास होना संभव ही नहीं हुआ। इसके केन्द्र में रंगमंच का अ...
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  July 29, 2015, 12:35 pm
पुंज प्रकाश अमेरिकी नाटककार व रंग-चिन्तक डेविड ममेट ने अपनी किताब “सत्य और असत्य” (true and false : heresy and common sense for the actors) में लिखा है कि “आपका काम नाटक को दर्शकों तक पहुंचना है, इसलिए शुतुरमुर्ग की तरह रेत में गर्दन घुसा लेने या विद्वता मात्र से काम नहीं बनेगा।"वैसे कुछ अति-भद्रजनों ...
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  February 23, 2015, 12:55 pm
बिहार के गांवों-कस्बों में उत्सवों के अवसर पर नाटकों को मंचित करने की अपनी एक अनूठी और रोचक परम्परा रही है। तमाम उतार चढाओं के बीच यह परम्परा आज भी कायम है। संजय कुमार का यह आलेख उसी नाट्य परम्परा की एक झलक पेश करती है। इस आलेख के केन्द्र में हैं फुलवरिया (भागलपुर) नामक ग...
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  November 30, 2014, 10:47 pm
बंगला पुस्तक “प्रसंगः नाट्य” में प्रकाशित ख्याति प्राप्त रंगकर्मी शंभू मित्र द्वारा मूलतः बंगला में लिखित इस महत्वपूर्ण अभिनय चिंतन का हिंदी अनुवाद प्रसिद्द रंग-चिन्तक नेमीचन्द्र जैन ने किया था। जो वर्ष 1976में “नटरंग” के 25वें अंक में प्रकाशित हुआ था। शंभू दा ने रंग...
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  October 19, 2014, 8:12 pm
नटमेठिया एक जीवनीपरक (Bio-graphical) नाटक है जिसके केन्द्र में हैं बिहार के लेखक, कवि, अभिनेता,निर्देशक, गायक, रंग-प्रशिक्षक भिखारी ठाकुर और भारतीय समाज की जटिल वर्गीय व जातीय बुनावट । भिखारी ठाकुर की संघर्षशील जीवनयात्रा का काल 1887से 1971 रहा है यानि ब्रिटिश राज स...
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  August 30, 2014, 8:25 pm
पिछले दिनों बिहार संगीत नाटक अकादमी में व्याप्त भ्रष्टाचार, अराजकता और अकलात्मक नज़रिए के प्रतिरोध स्वरुप पटना के संस्कृतिकर्मियों ने आंदोलन किया । धरना, मशाल जुलुस, नुक्कड़ नाटक, जनगीत तथा आम जनता के बीच पर्चा वितरण का कार्यक्रम चलता रहा और कला-संस्कृति से जुड़ा सरकार...
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  August 30, 2014, 8:24 pm
देखता हूँ कि एक चौराहे पर एक कलाकार माइक पर स्थानीय भाषा में किसी लोकगीत की पैरोडी गा रहा है, उसके बगल में दो स्त्रियां कठपुतलियों को नचाने की कोशिश में लगी है, एक नाल वादक ज़मीन पर उकडू सा बैठा गीत के साथ ताल मिला रहा है और पीछे पार्टी का बड़ा सा बैनर लगा है जिसमें एक खास पा...
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  August 30, 2014, 8:23 pm
नेमीचन्द्र जैन की पुस्तक भारतीय नाट्य परम्परा के आधार पर बनाया गया संछिप्त नोट    आदिम या पौराणिक युगों से ही किसी न किसी तरह का रंगमूलक कार्यकलाप भारतीय जीवन का एक अनिवार्य अंग रहा है । कई शताब्दियों तक वह सामान्य लोक जीवन में केवल अनुष्ठानमूलक, गीत-नृत्य, ...
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  August 30, 2014, 8:21 pm
गुरुशरण सिंहजन्म - सन 1929, निधन - 28 सितम्बर 2011हमारे समाज की यह कठोर, दुखद और त्रासदपूर्ण सच्चाई है कि जिन्हें हमारा आदर्श होना था उनकी स्थिति अधिकांशतः या तो दयनीय है, या हास्यास्पद या फिर उपेक्षित ! सदियों से वर्गों-वर्णों में विभाजित, रोटी-कपड़ा-मकान की जद्दोजह...
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  August 30, 2014, 8:20 pm
भारत अपने चंद शहरों में नहीं बल्कि सात लाख गांवों में बसता है, लेकिन हम शहरवासियों का ख्याल है कि भारत शहरों में ही है और गांव का निर्माण शहरों की ज़रूरत पूरा करने के लिए हुआ है । –  गांधी.प्राकृतिक सुंदरता से लबरेज़ छत्तीसगढ़ का क़स्बा डोंगरगढ़, आज मूलतः बमलेश्वरी मंदिर ...
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  August 30, 2014, 8:18 pm
विगत दिनों मुकेश बिजौल (आवरण), रोहित रूसिय, पंकज दीक्षित के रेखाचित्रों से सुसज्जित रंगमंच पर केंद्रित पत्रिका ‘इप्टानामा’ (भारतीय जन नाट्य संघ की वेब-पत्रिका का प्रथम वार्षिकांक) का प्रकाशन हुआ. पत्रिका का सम्पादन अविनाश गुप्ता व अपर्णा के सहयोग से दिनेश चौधरी न...
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  August 30, 2014, 8:17 pm
सोमवार,(7 अक्टूबर 2013), की रात करीब बारह बजे बेगुसराय (बिहार) के युवा रंगकर्मी प्रवीन कुमार गुंजन काम खत्म करने के पश्चात अपने सहकर्मी के साथ बेगुसराय रेलवे स्टेशन पर चाय पी रहे कि पुलिस की जीप आकर रुकी और पूछताछ करने लगी. हम कलाकार हैं, काम खत्म करके स्टेशन चाय पीने आए ह...
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  August 30, 2014, 8:14 pm
“हमें हिम्मत नहीं हारनी है. काम करते रहना है और बढ़ते रहना है, लेकिन खराब नाटक नहीं करना है, खराब गाने नहीं गाना है. लगातार नई चीज़ों को, नए लोगों को रंगमंच से जोड़ना है.” – ए के हंगल.चारों ओर से छोटी-छोटी पहाड़ियों और हर पहाड़ी पर विराजमान देवी-देवताओं और गुरुओं के आश्रमों...
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  August 30, 2014, 8:12 pm
अमितेश कुमारमध्य मई और मध्य जून के बीच राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (आगे रानावि) रंगमंडल का ग्रीष्मोत्सव होता है। रानावि के बदले निजाम के तहत यह पहला ग्रीष्मोत्सव था और लंबी छुट्टी के बाद रंगमंडल प्रमुख भी इस बार  काम पर लौटे थे। इस बार महोत्...
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  August 6, 2014, 7:44 pm
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