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अजन्ता शर्मा

तुम्हें जिस दिन अपनी गलियों से गुज़रते देखा था,मेरा दहकता धर्मगंगोत्री के चरण धरसुरसरी संग बहने की इच्छा करने लगा था. मैं सूर्य हूँ.अपने आकाश में आंखें तरेरे आग उड़ेले अडिग बनछड़ी की नोक परसर्वत्र धमकती फिरती हूँ. किंतु, हे धवल बादल !उस दिन जब तुम्हें बहता देखा था मैंन...
अजन्ता शर्मा...
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  October 22, 2011, 12:08 am
(Struggle for Existence **)हथेलियों का अपमानमेरे गालों परअब नहीं जड़ता, न हीं अवसादों का कीचड मेरे वस्त्र को गंदा करता है. तिरस्कार की चटनी से मेरी थाल सज जाती है, मुट्ठी भर घृणा से मेरा पेट भर जाता है. अपशब्दों का आब मेरी तृष्णा को पर्याप्त है, फब्तियां कसती खिड़कियाँ हैं, अवहेलित करता ...
अजन्ता शर्मा...
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  September 27, 2011, 3:04 am
तुमसे हींअपने जीवन के उन क्षणों मेंमैं अदृश्य ही रही,अनावश्यक,अकारथ ,बेजा विषयों की दासी बनकर.व्यर्थ रहकरकाटती रही हर लम्हाअपनी एकटक निगाहों से,तुम्हारीही चाह में .तुम्हारागुजरना ही हुआ,मेरी पथराई छाती परहल सा.मुझे भेदमेरी चेतना को जगाता.तुम्हारा याद करना ही हुआकि...
अजन्ता शर्मा...
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  January 18, 2010, 11:14 pm
मल्हार अचानककिसी बसंती सुबहतुम गरज बरसमुझे खींच लेते होअंगना में .मैं तुममेंनहा लेने को आतुरबाहें पसारेढलक जाती हूँ .मेरा रोम रोमतुम चूमते हो असंख्य बार .अपने आलिंगन मेंभिगो देते होमेरा पोर पोर.मेरी अलसाई पलकों परशीत बन पसर जाते हो.माटी के बुलबुलों में छुपकरमेरी पा...
अजन्ता शर्मा...
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  July 21, 2009, 12:20 pm
जानवर से आदमीएक जानवरमेरे साथ रहता है.मेरे बगल मे सोता है.अपने बदन पर उगी हुई घासें दिखाकरमुझे उससे चिपकने को कहता है.उघरी हुई टाँगें दिखातापूरे घर मेंइधर उधर फिरता रहता है.सड़ी बदबूदार दांतों के बीच दबाकरआधी चोकलेट मुझे काटने को कहता है.अपने खुरदुरे हाथों सेमेरे गाल...
अजन्ता शर्मा...
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  June 8, 2009, 10:45 am
दूरियांमैं चली जाऊँ तो निराश मत होना.जीना ही तो है!एक सीधा-सा प्रश्नएक अटपटा-सा उत्तर.अपने अगले पलों में छिपाकर रखूँगी मैं तुम्हेंऔर तुम मुझे रखना.मौका पाते हीउन निधियों के हम सामने रख खोला करेंगे.उनके रहते ना मेरी रातें स्याह होगीना तुम्हारे दिन तपे हुए.ये पल ही होगा...
अजन्ता शर्मा...
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  April 6, 2009, 12:34 pm
उत्तरमरिचिका से भ्रमित हो वह प्रश्न कर बैठे हैंथोडा पास आकर देखेंजीवन बिल्कुल सपाट हैअपने निष्टुर आंखों सेजो आग उगलते रहते हैंउनपर बर्फ सा गिरतामेरा निश्छल अट्टहास हैजीवन ने फल जो दियावह अन्तकाल मे नीम हुआउसे निगल मुस्काती अपने रिश्ते की मिठास है...
अजन्ता शर्मा...
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  March 31, 2009, 10:15 am
(८ मार्च - महिला दिवस के अवसर पर )पूर्णतुम मुझसे डरो !क्योंकि मैं खुद को रोकना नहीं जानती.तुम मुझसे डरो !क्योंकि मैं समस्याओं के टीले पर खडी होकर भीउन्मादित हो हंसती हूँ.तुम डरो !क्योंकि तुम्हारे लाख मारने पर भीमैं ’कुछ’ प्रसंगों को पल-पल जीती हूँ.तुम चाहते हो मैं रोती रह...
अजन्ता शर्मा...
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  March 8, 2009, 12:03 pm
आईनाकाश !कि तुम आईना ही बन जाते ,मैंठिठकी खड़ी रहती ,औरतुम मेरा चेहरा पढ़ पाते ,मेरे एक एक भाव सेहोती रहती मैं ज़ाहिर ,तुमअपलक निहारते मुझेऔरबांछ्ते मेरे माथे की लकीर ,मेरे हाथ बढ़ाए बिनातुममुझे एकाकार कर लेते ,हर प्रश्न का उत्तरतुम्हारी आखों मेमेरा चेहरा होता ,मेरे शब्दबि...
अजन्ता शर्मा...
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  March 7, 2009, 1:39 pm
एकाकारएक आकार बनमेरे मानस में तुम्हारा स्थापनमुझे ठहरा गया है.न अब कोई प्रतीक्षा है.न भय है तुम्हारे जाने का.मेरी दीवारें भीअब तुम्हें खूब पहचानती हैंमहका करती हैं वोतुम्हारी खुश्बू की भांतिऔर मुझे नहलाती है.मेरी बन्द पलकों परवायु का सा एक थक्काजबतुम - सा स्पर्श करन...
अजन्ता शर्मा...
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  March 3, 2009, 1:54 pm
सूत सी इच्छाएं...रोते रोतेजी चाहता है,मोम की तरह गलती जाऊं.दीवार से चिपककरउसमें समा जाऊं.पर क्या करुं!हाड-मांस की हूं जो!जलने पर बू आती है.औरसामने खडा वोमुझसे दूर भागता है.मेरी सूत सी इच्छाओं कोकोईउस आग सेखींचकरबाहर नहीं निकालता....
अजन्ता शर्मा...
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  March 2, 2009, 11:32 am
तुम मेरे पास हो...तुम ख्याल बन,मेरी अधजगी रातों में उतरे हो।मेरे मुस्काते लबों से लेकर...उँगलियों की शरारत तक।तुम सिमटे हो मेरी करवट की सरसराहट में,कभी बिखरे हो खुशबू बनकर...जिसे अपनी देह से लपेट,आभास लेती हूँ तुम्हारे आलिंगन का।जाने कितने रूप छुपे हैं तुम्हारे,मेरी बन्...
अजन्ता शर्मा...
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  February 28, 2009, 6:51 pm
जमावतमतमाये सूरज ने मेरे गालों से लिपटी बूंदें सुखा डालीं.ज़िन्दगी !तूने जो भी दिया...उसका ग़म अब क्यों हों?मैं जो हूँकुछ दीवारों और काँच के टुकड़ों के बीच.जहाँ चन्द उजाले हैं.कुछ अंधेरे घंटे भी.कुछ खास भी नहींजिसमें सिमटी पड़ी रहूँ.खाली सड़क परन है किसी राहगीर का अंदेशा....
अजन्ता शर्मा...
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  February 27, 2009, 10:28 am
...और बातें हो जायेंगीआओ...हम साथ बैठें।पास बैठें।कभी खोलूँकभी पहनूँ मैं अपनी अँगूठी।तुम्हारे चेहरे को टिकाएतुम्हारी ही कसी हुई मुट्ठी।चमका करे धुली हुई मेज़हमारे नेत्रों के अपलक परावर्तन से।और तब तकअंत: मंडल डबडबाएप्रश्न उत्तरों के प्रत्यारोपण से।विद्युत बन बहेह...
अजन्ता शर्मा...
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  February 25, 2009, 9:58 pm
इस बारअनगिनत आँगनअनगिनत छत,अनगिनत दियेऔर उनके उजालों का कोलाहल..इनके बीचकहीं गुम सी मैं,कहीं भागने की हठ करता हुआलौ सा मचलता मेरा मन...वो एकाकीजो तुम्हारे गले लग करमुझसे लिपटने आया हैउसकी तपिश मेंहिम सी पिघलती मेरी नज़रें...मुझसे निकलकरमुझको ही डुबोती हुई...इस शोर और रौश...
अजन्ता शर्मा...
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  February 23, 2009, 2:21 pm
अस्तित्वमुझसे वो पूछता हैकि अब तुम कहाँ हो?घर के उस कोने सेतुम्हारा निशां धुल गयाहै वो आसमां वीरां,जहाँ भटका करती थी तुम,कहाँ गया वो हुनरखुद को उढ़ेलने का?अपनी ज़िन्दगी का खाँचा बनाशतरंज की गोटियाँ चराती फिरती हो...कहाँ राख भरोगी?कहाँ भरोगी एक मुखौटा?खा गयी एक शीत-लहरतुम...
अजन्ता शर्मा...
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  February 23, 2009, 12:14 am
अनुरोधहे बादल!अब मेरे आँचल मेंतृणों की लहराई डार नहीं,न है तुम्हारे स्वागत के लियेढेरों मुस्काते रंग.मेरा ज़िस्मईंट और पत्थरों के बोझ के तलेदबा है.उस तमतमाये सूरज से भागकरजो उबलते इंसानइन छतों के नीचे पका करते हैंतुम नहीं जानते...किएक तुम ही होजिसके मृदु फुहार कीआस रह...
अजन्ता शर्मा...
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  February 18, 2009, 1:49 pm
व्यर्थ विषयक्षणिक भ्रमित प्यार पाकर तुम क्या करोगे?आकाशहीन-आधार पाकर तुम क्या करोगे?तुम्हारे हीं कदमों से कुचली, रक्त-रंजित भयी,सुर्ख फूलों का हार पाकर तुम क्या करोगे?जिनके थिरकन पर न हो रोने हँसने का गुमांऐसी घुंघरू की झनकार पाकर तुम क्या करोगे?अभिशप्त बोध करता हो ज...
अजन्ता शर्मा...
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  February 17, 2009, 1:05 pm
ज़बह हर रोज़मेरी खाल उतरती है.मुझेएक हुक से टांगा जाता है.थोडी थोडी देर मेंमुझेथोड़ा थोड़ा काटा जाता है. अपने शरीर सेटपके रक्त कोबूँद बूँद उठामैं देह से चिपकाती हूँ.फिरखाल उतरवाने कोतैयार हो जाती हूँ....
अजन्ता शर्मा...
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  February 5, 2009, 1:25 pm
तुम्हारी बाततुम जो कहते होउसे आवरण बनाअपने सर्वस्व कोउससे लपेट लेती हूँवह मेरी ऊर्जा कोसहेजता हैमुझेअपने स्पर्श सेउष्मित करता हैतुम जो कहते होउसे ओढ़कर मैंख़ुद कोजीवन-अनल मध्यप्रहलाद सा सुरक्षित पाती हूँतुम जो कहते होवह मेरे चेहरे परऐसे खिलता हैज्योंप्रातः किर...
अजन्ता शर्मा...
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  February 4, 2009, 12:04 pm
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