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सिमरन की कविताएँ

बर्फ दिल हो तुम अन्ना,पत्थर दिल यह सरकार तुम पिघल ना जाना आगे बढ़ो यह सरकार सिर्फ पड़ी रहती अपने दरबारी भेज देती खुले छोड़ रखे अपनी सिपाही और मंत्री,करने को भ्रष्टाचार|पत्थर दिल यह सरकार|...
सिमरन की कविताएँ...
Tag :सरकार
  October 16, 2011, 12:35 pm
मेरे पास दो कागज थे, मैंने उनकी गुड़िया बनाईगुड़िया टूटी और रूठी,मैंने उसे फिर से जुड़वाईऔर हम दोनों गई सागर ओर हमने देखे वहां दो सुन्दर मोर अपने पंख फैलता झट से उड़कर बाग में जाता फट से हम भी भागे उसके पीछे देखा तो वह कीड़े खा रहा नीचेमोर को पसंद है कीड़े खाना कोयल को मन-...
सिमरन की कविताएँ...
Tag :सागर
  October 16, 2011, 12:26 pm
"एक-दो-तीन-चार"चार पे लगाओ अपनी रोटी पर आचार "पांच-छै-सात-आठ"लगाओ सामान पर रस्सी की गांठ "नौ-दस"दस पर चलेगी अपनी सीकर की बस| ...
सिमरन की कविताएँ...
Tag :
  October 16, 2011, 12:16 pm
मेरे पास थे दो-दो बन्दर, एक था अनाड़ी एक था सिकंदर|दोनों मिलकर साथ साथ रहते,सोते,खाते,पीते साथ में नहाते|हर काम साथ साथ मिलकर करते|दोस्तों यह है अच्छी बात सदा रहना एक दूसरे के साथ|...
सिमरन की कविताएँ...
Tag :
  October 16, 2011, 12:06 pm
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