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रचनाधर्मिता

माँ तुम अपने साथ ले गयीमेरा बचपन भी।जब तक थीं तुममुझमें मेराशिशु भी जीवित थावात्सल्य से सिंचितमन काबिरवा पुष्पित थारंग-गंघ से हीन हो गएरोली-चन्दन भी।झिड़की, डांट-डपट भी तुम थीतुम थी रोषमयीसहज स्नेह सलिलाभी तुम थीतुम थी तोषमयीसुधियाँ दुहराती हैं खट्टी-मीठी अनब...
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  January 27, 2016, 12:49 am
कैसी घिरीं घटायें नभ परकैसी घिरी घटायेंधूप कर रही धींगा-मस्ती छायाओं से गरमी रिसती आँचल का अपहरण कर रहीहैं मनचली हवाएं।कैसी घिरी घटायें।हंस तज गए मानसरोवर मत्स्यों का है जीना दूभर घडियालों के झुण्ड किनारों पर डूबें उतरायें।कैसी घिर...
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  January 27, 2016, 12:46 am
सुन रहे होबज रहा है मृत्यु का संगीत!मृत्यु तन की ही नहीं हैक्षणिक जीवन की नहीं हैमर गये विश्वास कितनेपर क्षुधा रीती नहीं हैरुग्ण-नैतिकता समर्थित आचरण की जीतसुन रहे हो.....ताल पर हैं पद थिरकतेजब कोई निष्ठा मरी हैमुखर होता हास्य, जब भीआँख की लज्जा मरी हैगर्व का पाखण्ड करत...
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  January 27, 2016, 12:41 am
उसी पुरानी हाँड़ी मेंअब कब तक भात पकायेंगे!युग बदला निर्मितियाँ बदलींसृजन और स्वीकृतियाँ बदलींबदल गये जीवन के मानकयज्ञ और आहुतियाँ बदलींपुरावशेषों को बटोर कर कब तक भूत जगायेंगे!राजा, भाँट, विदूषक बदलेदरबारी, सन्देशक बदलेबदल गये तात्पर्य अर्थ केमिथको के सँग रूपक बद...
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  January 27, 2016, 12:26 am
तुम्हें कैसे बताऊँ...मेरे मन के विवर में तुमविचरती रागिनी सी होतुम्हें कैसे बताऊँ।प्रलय के बाद जब निर्जन भुवन में,लगे थे आदि मनु एकल यजन में,अप्रत्याशित तभी जैसेमिली कामायनी सी हो।तुम्हें कैसे बताऊँ।मधुर विश्रांति के कोमल पलों में,छुअन स्नेहिल छिपाए अंचलों में,गगन ...
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  January 27, 2016, 12:25 am
साँस-साँस चन्दन होती है, जब तुम होते होअँगनाई मधुबन होती है, जब तुम होते होजब प्रवास के बाद कभी तुम, आते हो घर मेंखुशियों के सौरभ का झोंका,लाते हो घर मेंतुम्हें समीप देख कर बरबस अश्रु छलक जातेअंग-अंग पुलकन होती है,जब तुम होते होरोम-रोम अनुभूति तुम्हारे, होने की ह...
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Tag :प्रेम
  July 7, 2015, 1:49 am
किसका बाट जोहती है तूनैया री!जिनको तूने पार उताराकोई तेरा हुआ सहारासबने दाम दिये नाविक कोतुझे पैर से धक्का मारासब चुप चाप सहा करती हैकभी न कहती दैया रीकेवट ने सुख लूटा सारास्वयं तरा पुरखों को ताराप्रभु तेरी गोदी में बैठेधन्यवाद क्या किया तुम्हारातुझे मुसाफ़िर भी ठग...
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  May 28, 2015, 7:07 pm
मित्रो! आज टमाटर खायाभावातीत परमसुख पायाबीस रूपये किलो बिक रहाथी दुकान पर मारा-मारीदैहिक, वाचिक संघर्षों केबाद लगी मेरी भी बारीएक शतक का नोट बढ़ाकरझोले का श्रीमुख फैलाया"बीस रूपये खुल्ले देनाएक किलो आडर सरकारी"टूट गया झोले का भी मनचेहरे पर छाई लाचारीबटुआ, झोला, वस्त्...
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Tag :नवगीत - मित्रो आज टमाटर खाया।
  August 4, 2014, 1:22 pm
गुरु तुम सम न कोई उपकारीद्वार तुम्हारे आकर पाईमैंनें सम्पति सारीगुरु तुम बिन न कोई उपकारीबुद्दि-विवेक विहीन फिरा मैंतृष्णा से सब ओर घिरा मैंहे करुणामय! तृप्त हुआ मैंपाकर कृपा तुम्हारीगुरु तुम बिन न कोई उपकारीघोर निशा में दिशाहीन सेजल से बिछुड़ी हुई मीन सेभय-व्याकुल...
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Tag :भजन
  March 14, 2014, 1:19 pm
कहते रहो कहानी बीरअपनी आँधी-पानी बीरतुम पहरे पर खड़े रहेडूब गई रजधानी बीरसारे चारण और कहारबोल रहे हैं जै जै कारमहरानी ने ठोंकी पीठडटे रहे तुम राज कुमारहैं दीवान सयाने जीपरखे और पहचाने जीलेकिन इनकी उमर हुईअब ख़ुद लो निगरानी बीरसवा अरब से ज़्यादा भालइन्द्रप्रस्थ में...
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Tag :नवगीत - कहते रहो कहानी बीर
  October 7, 2013, 8:45 pm
दर्द ऐसा, बयाँ नहीं होताजल रहा हूँ, धुआँ नहीं होताअपने अख़्लाक़ सलामत रखियेवैसे झगड़ा कहाँ नहीं होताआसमानों से दोस्ती कर लोफिर कोई आशियाँ नहीं होताइश्क़ का दौर हम पे दौराँ थाख़ुद को लेकिन ग़ुमाँ नहीं होताकोई सब कुछ भुला दे मेरे लियेये तसव्वुर जवाँ नहीं होताजब तलक वो...
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Tag :ग़ज़ल - दर्द ऐसा
  August 13, 2013, 12:41 am
इन्ही मेंघों से निकलकरचंचला की श्रृंखलायेंसुपथ आलोकित करेंगीइन्हीं मेघों से झरेंगीसुधा की रसमयी बूँदेपुनः नवजीवन भरेंगीइन्हीं मेघों से फिसलकररश्मियाँ नक्षत्रपति कीइन्द्रधनु मोहक रचेंगीइन्ही मेंघों से हुआ प्रेरितपवन, सन्देश देगानेह की नदियाँ बहेंगीइन्हीं म...
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  July 11, 2013, 10:28 am

निद्रित  नहीं उनींदा सा हूँस्नात नहीं पर भीगा सा हूँजग की विषम व्यथायें कितनीनिज की पीर-कथायें कितनीउलझी मनोदशा से अपनीत्रस्त नहीं पर खीझा सा हूँयह विस्तृत आयोजन क्या हैमेरा यहाँ प्रयोजन क्या हैजीवन एक समस्या अनगिनअशक्यता में तीखा सा हूँ।विडम्बनाओं की है गठरीयं...
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Tag :मेरे गीत
  July 7, 2013, 10:05 pm
निद्रित  नहीं उनींदा सा हूँस्नात नहीं पर भीगा सा हूँजग की विषम व्यथायें कितनीनिज की पीर-कथायें कितनीउलझी मनोदशा से अपनीत्रस्त नहीं पर खीझा सा हूँयह विस्तृत आयोजन क्या हैमेरा यहाँ प्रयोजन क्या हैजीवन एक समस्या अनगिनअशक्यता में तीखा सा हूँ।विडम्बनाओं की है गठरीयं...
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Tag :मेरे गीत
  July 7, 2013, 10:05 pm
दो घनाक्षरियाँ होली पर ( होली २०१३ में लिखी गई)भंग की तरंग में अनंगनाथ झूम रहे, फागुनी बयार से जटा भी छितराई है।गंग की तरंग भी उमंग में कुरंगिनी सी,शैलजेश की जटाटवी को छोड़ धाई है।थाप पे मृदंग की नटेश नृत्यमान हुयेदुंदुभी रतीश ने भी जोर से बजाई है।रुद्र के निवास में वसन...
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Tag :होली
  April 16, 2013, 3:05 am
सभी कहते हैं इसको ख़ुदकुशी हैभीड़ सी फिर यहाँ क्यूँकर लगी हैएक पल की किसी मीठी चुभन कादर्द क्यूँ ज़िन्दगी में लाजिमी हैलामकाँ, लाइलाज़, लापरवाइन ख़िताबों का हासिल आशिक़ी हैग़फ़लतों में तमाम हो जातीचार दिन भी कहाँ अब ज़िन्दगी हैहम सुकूँ की तलाश में अक्सरचैन दुश्वार ...
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Tag :मेरी गज़लें
  February 14, 2013, 11:27 am
ख़्वाब ही था ज़िन्दगी कितनी सहल हो जायेगीतुम जो गाओगे रुबाई भी ग़ज़ल हो जायेगीइतने आईनों से गुज़रे हैं यक़ीं होता नहींअज़नबी सी एकदिन अपनी शकल हो जायेगीमर्हले ऐसे भी आयेंगे नहीं मालूम थाउम्र भर की होशियारी बेअमल हो जायेगीहै बहुत मा’कूल फिर भी शक़ है मौसम पर मुझेतज्...
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Tag :मेरी गज़लें
  December 17, 2012, 10:02 pm
दिल मुसाफ़िर ही रहा सूये-सफ़र आज भी हैहाँ! तसव्वुर में मगर पुख़्ता सा घर आज भी हैकितने ख्वाबों की बुनावट थी धनुक सी फैलीकूये-माज़ी में धड़कता वो शहर आज भी हैबाद मुद्दत के मिले, फिर भी अदावत न गयीलफ़्जे-शीरीं में वो पोशीदा ज़हर आज भी हैनाम हमने  जो अँगूठी से लिखे थे मिलकर...
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Tag :मेरी गज़लें
  December 11, 2012, 9:47 pm
शहर मुझको तेरे सारे मुहल्ले याद आ्ते हैंदुकाँ पर चाय की बैठे निठल्ले याद आते हैंम्यूनिसपैलिटी के बेरोशन चराग़ों की कसम मुझकोउठाईगीर जेबकतरे चिबिल्ले याद आते हैंतबेलों और पिगरी फार्म का अधिकार पार्कों परखुजाती तन मिसेज डॉग्गी औऽ पिल्ले याद आते हैंमैं हाथी पार्क क...
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Tag :हास्य ग़ज़ल - शहर मुझको तेरे सारे मुहल्ले याद आते हैं।
  December 7, 2012, 10:42 am
आकुल हो तुम बाँह पसारेकिन्तु देहरी पर रुक जातेअसमंजस में पाँव तुम्हारेअवहेलना जगत की करताहै, मन का व्याकरण निरालाकिन्तु रीतियों की वेदी परजलते स्वप्न विहँसती ज्वालासब कुछ धुँधला-धुँधला दिखतानयन-नीर की नदी किनारेआकुल हो तुम बाँह पसारेसमझौतों में जीते-जीतेमरुथल ह...
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Tag :मेरा गीत संग्रह
  December 4, 2012, 9:08 pm
जग तू मुझे अकेला कर दे।इच्छा और अपेक्षाओं मेंस्वार्थ परार्थ कामनाओं मेंश्लिष्ट हुआ मन अकुलाता ज्योंनौका वर्तुल धाराओं मेंसूना कर दे मानस का तटअब समाप्त यह मेला कर देजग तू मुझे अकेला कर दे।सम्बन्धों के मोहजाल मेंगुँथा हुआ अस्तित्व हमाराचक्रवात में तृण सा घूर्णितख...
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Tag :गीत - जग तू मुझे अकेला कर दे।
  November 23, 2012, 9:45 pm
कब किसी ने प्यार चाहाआवरण में प्यार के,बस, देह का व्यापार चाहाप्रेम अपने ही स्वरस की चाशनी में रींधता हैशूल कोई मर्म को मीठी चुभन से बींधता हैहै किसे अवकाश इसकी सूक्ष्मताओं को निबाहेलोक ने, तत्काल विनिमय का सुगम उपहार चाहाकब किसी ने प्यार चाहाप्रेम अपने प्रेमभाजन मे...
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Tag :गीत - कब किसी ने प्यार चाहा
  September 17, 2012, 12:32 pm
व्यर्थ की संवेदनाओं से डराना चाहते हैंसुन रहा हूँ इसलिये उल्लू बनाना चाहते हैंमेरे जीवन की समस्याओं के साये में कहींअपने कुत्तों के लिये भी अशियाना चाहते हैंधूप से नज़रे चुराते हैं पसीनों के अमीरकिसके मुस्तकबिल को फूलों से सजाना चाहते हैंमेरे क़तरों की बदौलत जिनक...
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Tag :मेरी गज़लें
  May 10, 2012, 10:48 am
 यद्यपि मैंने जीवन हारामैं बीता कल हुआ तुम्हाराघिरती हैं सुरमई घटायेंसंध्या के कंधों पर फिर सेसरक गया आशा का सूरजआशंकाओं भरे क्षितिज सेपूछ रहा अपने जीवन सेक्या इच्छित था यही किनारा?मैं बीता कल हुआ तुम्हारामिला अयाचित जो धन उसकेरक्षण में सब शक्ति लगा दीकिन्तु चंचल...
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Tag :मेरा गीत संग्रह
  May 2, 2012, 10:07 pm
जी को जी भर रो लेने दोआँखों को जल बो लेने दोकिसी और को बतलाना क्यामन थक जाये सो लेने दोकिसने समझी पीर पराईफिर क्यों सबसे करें दुहाईजिससे मन विचलित है इतनाहै अपनी ही पूर्व - कमाईछिछले पात्र रीतते-भरतेक्षण-क्षण, नये रसों में बहतेतृष्णा की इस क्रीड़ा को हमशोक-हर्ष से देखा ...
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Tag :गीत
  March 27, 2012, 7:30 am
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