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प्रेम का दरिया

मुझे एक बार मेरी जान-पहचान वाले एक व्‍यक्ति ने यह घटना बताई थी।उन दिनों में मास्को में पढ़ता था। मेरे पड़ोस में एक ऐसी महिला रहती थी, जिसकी प्रतिष्‍ठा को वहां सन्दिग्ध माना जाना था। वह पोलैंड की रहने वाली थी और उसका नाम टेरेसा था। मर्दों की तरह लम्बा कद, गठीला डील-डौल, का...
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Tag :प्रेम
  August 3, 2013, 6:26 pm
हिंदुस्‍तान के सबसे बड़े और महानतम नास्तिक अमर शहीद भगत सिंह को समर्पित हैं ये कविताएं। भगत सिंह जो हमें हर समय मनुष्‍य की अपराजेय कर्मशीलता की याद दिलाते रहते हैं। मुझे तो हर मुश्किल में भगत सिंह का रास्‍ता ही दिशा दिखाता है। उसी महान प्रेरक को लाल सलाम कहते हुए प्रस...
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Tag :
  September 27, 2012, 9:26 am
दरख्तों से सरसब्ज पहाड़ी पर पुराने फैशन की एक हवेली थी। ऊंचे और लंबे छायादार पेड़ों की हरियाली उसे घेरे हुए थी। एक विशाल बाग था, जिसके आगे घना जंगल और फिर एक खुला मैदान था। हवेली के सामने की तरफ पत्थर का एक विशालकाय जलकुंड था, जिसमें संगमरमर में तराशी हुई परियां नहा रह...
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Tag :अनुवाद
  August 5, 2012, 6:31 pm
जिंदगी की किताब स्त्री पुरुष के एक बाग में मिलने से शुरू होती है और ईश्वरीय ज्ञान पर खत्म हो जाती है। - ऑस्कर वाइल्डजी हां, बहुत से लोगों की जिंदगी की किताब भी उसी अध्याय से शुरू होती है जिसमें स्त्री का प्रवेश होता है। मेरे साथ भी यही हुआ। वह मेरी जिंदगी में तब आई, जब मैं ...
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Tag :कहानी
  July 5, 2012, 6:25 pm

मां की ममता पर सदियों से कविता, कहानी और उपन्‍यास लिखे जा रहे हैं। गोर्की का उपन्‍यास 'मां' तो अपने में क्‍लासिक है ही। आज मातृ-दिवस यानी मदर्स डे पर पश्चिमी साहित्‍य की ये तीन क्‍लासिक कहानियां हिंदी पाठकों के लिए विशेष रूप से प्रस्‍तुत हैं। इनमें से शुरु की दो कहानिया...
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  May 13, 2012, 8:05 am
मां की ममता पर सदियों से कविता, कहानी और उपन्‍यास लिखे जा रहे हैं। गोर्की का उपन्‍यास 'मां' तो अपने में क्‍लासिक है ही। आज मातृ-दिवस यानी मदर्स डे पर पश्चिमी साहित्‍य की ये तीन क्‍लासिक कहानियां हिंदी पाठकों के लिए विशेष रूप से प्रस्‍तुत हैं। इनमें से शुरु की दो कहान...
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Tag :
  May 13, 2012, 8:05 am
अभी-अभी उस अभय वाजपेयी को आखिरी सलाम कहकर आया हूं, जो हरदिलअजीज था। राजस्‍थान पत्रिका के पॉकेट कार्टून ‘झरोखा’  के विख्‍यात त्रिशंकु, जिसे लाखों पाठकों कीबेपनाह मोहब्‍बत हासिल थी... जिसने अपने मुंह से कभी नहीं कहा कि मैं ही त्रिशंकुहूं और मैं ही कलाकार, रंगकर्मी, निर्द...
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Tag :जयपुर सांस्कृतिक पत्रकारिता कला
  January 29, 2012, 5:36 pm
शुक्रवार की साहित्‍य वार्षिकी-2012 में ये दो नई कविताएं प्रकाशित हुई हैं। मेरे मित्र और पाठक जानते हैं कि इधर मेरी कविताओं का स्‍वर बहुत बदला है और ये कविताएं इसे बताती हैं। कुछ मित्रों ने इन कविताओं को पहले सुना भी है और शायद एकाध ने पढ़ा भी है। आज मैं अपने तमाम दोस्‍तों ...
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  January 12, 2012, 10:30 am
नौ ग्रहों में सबसे चमकीले शुक्र जैसी है उसकी आभाआवाज़ जैसे पंचम में बजती बांसुरी तीन लोकों में सबसे अलग वह दूसरा कोई नहीं उसके जैसा नवचंद्रमा-सी दर्शनीय वह लुटाती मुझ पर सृष्टि का छठा तत्‍व प्रेम नौ दिन का करिश्‍मा नहीं वह शाश्‍वत है हिमशिखरों पर बर्फ की मानिंद सात मह...
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  November 13, 2011, 11:17 am
2005 में अपनी पहली पाकिस्‍तान यात्रा के दौरान कराची देखने का अवसर मिला। शहर कराची को लेकर कुछ कविताएं लिखी थीं। उनमें से एक कविता यहां प्रस्‍तुत कर रहा हूं। सब दोस्‍तों को ईद की दिली मुबारकबाद के साथ सबकी सलामती की कामनाओं के साथ। न जाने कितनी दूर तक चली गई हैयह बल्लियों ...
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  November 7, 2011, 11:49 am
ठीक से याद नहीं आता, लेकिन इन कविताओं को लिखे हुए 15 साल से अधिक हो चुके हैं। उस समय वैचारिक परिपक्‍वता नहीं थी, लेकिन जीवन-जगत को एक कवि की दृष्टि से देखने की कोशिश तो चलती ही रहती थी। उन दिनों ठोस गद्य की कविताएं लिखने का भी एक चलन चला था। अमूर्त विषयों पर भी खूब लिखा जाता ...
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  October 24, 2011, 9:59 am
श्रेष्‍ठ विचार और आदर्शों को लेकर चलने वाला एक आंदोलन कैसे दिशाहीनता और दिग्‍भ्रम का शिकार होकर हास्‍यास्‍पद हो जाता है, जनलोकपाल आंदोलन इसका ज्‍वलंत उदाहरण है। एक गैर राजनीतिक आंदोलन अंततोगत्‍वा राजनीति की शरण में जा रहा है या कहें कि अन्‍ना हजारे की साफ सुथरी छवि ...
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  October 13, 2011, 3:43 pm
आज बेटियों का दिन है। मेरी बड़ी बेटी दृष्टि के जन्‍म पर यह कविता अपने आप फूटी थी, आत्‍मा की गहराइयों से। आज आप सब दोस्‍तों के लिए यह कविता दुनिया की तमाम बेटियों के नाम करता हूं। दृष्टि तुम्‍हारे स्‍वागत मेंदृष्टितुम्‍हारे स्‍वागत मेंमरुधरा की तपती रेत पर बरस गयीसाव...
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  September 25, 2011, 9:46 am
हम चाहे नास्तिक हों या आस्तिक, पारिवारिक संबंध आपको कभी भी अनास्‍थावान नहीं होने देते, यह कारण है कि नास्तिक लोग शायद आस्तिकों की तुलना में मानवीय और पारिवारिक संबंधों को कहीं ज्‍यादा सम्‍मान देते हैं। मेरे पिता जब आठवीं कक्षा में पढ़ते थे, तभी दादाजी की अकाल मृत्‍यु ...
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  September 20, 2011, 9:47 am
इधर मेरी कुछ कविताएं लखनऊ से प्रकाशित होने वाले जनसंदेश टाइम्‍स में प्रकाशित हुईं और फिर भाई प्रभात रंजन ने इन्‍हें जानकी पुल पर प्रकाशित किया। ये कविताएं अब आप सबके लिए यहां भी प्रस्‍तुत कर रहा हूं। देह विमर्शएकपरिचय सिर्फ इतना कि नाम-पता मालूममिलना शायद ही कभी हुआ...
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  September 12, 2011, 9:36 am
(एक असमाप्‍त लंबी कविता का पहला ड्राफ्ट )इस जहां में हो कहांइशरत जहांतुम्‍हारा नाम सुन-सुन कर पक ही गए हैं मेरे कानआज फिर उस उजड़ी हुईबगीची के पास से गुज़रा हूं तोतुम्‍हारी याद के नश्‍तर गहरे चुभने लगेतुम कैसे भूल सकती हो यह बगीचीयहीं मेरी पीठ पर चढ़कर तुमने तोड़ी थीं ...
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Tag :साम्रदायिकता
  August 31, 2011, 12:29 pm
भ्रष्‍टाचार भारत सहित तीसरी दुनिया में खास तौर एशियाई देशों में एक विकराल समस्‍या है, जिससे आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्‍सा परेशान है। सभी देशों में इससे निपटने के कानून भी बने हुए हैं, बावजूद इसके भ्रष्‍टाचार रुकने का नाम नहीं ले रहा। भारत में ही देखा जाए तो बैंकिंग और ...
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Tag :
  August 20, 2011, 10:01 am
तेरा घर और मेरा जंगल भीगता है साथ साथऐसी बरसातें कि बादल भीगता है साथ साथ                            *परवीन शाकिर क्‍या घर, क्‍या जंगल और क्‍या बादल, सावन में तो यूं लगता है जैसे पूरी कायनात भीग रही है। पत्‍ता-पत्‍ता, बूटा-बूटा, रेशा-रेशा, ...
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Tag :मौसम
  July 24, 2011, 8:54 am
साप्ताहिक पत्रिका ‘शुक्रवार’ में मेरी तीन कविताएं प्रकाशित हुई हैं। आज से ब्लॉग का सिलसिला फिर शुरू करते हैं। सिक्के तल में पड़े रह जाते हैंनदियां समंदर तक पहुंच जाती हैंआस्था नदियों में है कि जल मेंमालूम नहींपर श्रद्धा में अर्पित किए गए सिक्के नदी के तल में हैंआस्थ...
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Tag :
  May 26, 2011, 9:28 pm
यह कहानी मेरी प्रिय प्रेम कहानियों में से एक है। पिछले दिनों प्रेम दिवस के पूर्व रविवार 13 फरवरी, 2011 को यह राजस्‍थान पत्रिका के रविवारीय संस्‍करण में प्रकाशित हुई। इस लंबी कहानी को अखबार के लिए कुछ संक्षिप्‍त किया गया है। "उसने कहा है कि अगर मैं उसके लिए एक लाल गुलाब ले आ...
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Tag :प्रथम प्रेम
  February 23, 2011, 7:48 pm
भोर की पहली किरण की तरह आता है जिंदगी में पहला प्रेम और पूरे वजूद को इस तरह जकड़ लेता है जैसे आकाश में परिंदों का एक अंतहीन काफिला हमें उड़ाता लिए चला जा रहा हो। कोई नहीं जानता कि यह कब, क्यों और कैसे होता है, लेकिन जिसके जीवन में पहला प्रेम आता है उसके लिए ही नहीं दुनिया क...
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Tag :प्रथम प्रेम
  February 20, 2011, 6:34 pm
तीन बाई दो की उस पथरीली बेंच पर तुमने बैठते ही पूछा था किबसन्त से पहले झड़े हुए पत्तों काउल्काओं से क्या रिश्ता हैपसोपेश में पड़ गया था मैं यह सोचकर किउल्काएँ कौनसे बसंत के पहले गिरती हैं किपृथ्वी के अलावा सृष्टि में और कहाँ आता है बसन्तचंद्रमा से पूछा मैंने तो उसने क...
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Tag :बसंत
  February 6, 2011, 2:43 pm
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