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पूर्णिमा

शार्प रिपोर्टर, (सं) अरविन्द कुमार सिंह, वर्ष 9, अंक 2, अप्रैल 2016, पत्रकारिता विशेषांक, संपादकीय कार्यालय : नीलकंठ होटल, जिला कलेक्ट्रेट, आजमगढ़ प्रायः यह कहा जाता है कि मीडिया को आत्मालोचन और आत्ममंथन करना चाहिए. लेकिन मीडिया को दूसरों की आलोचना और डंकबाजी से ही फुर्सत नह...
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  June 29, 2016, 1:25 pm
रमजान महीने को नेकियों का महीना कहा गया है। जो आम दिनों में अल्लाह की इबादत नहीं कर पाता है वह भी रमजान का पूरा महीना इबादत में गुजार देता है। इस महीने को सब्र का महीना भी कहा जाता है। माना जाता है कि सब्र के बदले जन्नत मिलती है। यह महीना समाज के गरीब और जरूरतमंद लोगों के ...
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Tag :प्रकाश किरण
  June 21, 2016, 7:56 pm
चक्रवर्ती विजयराघवाचारीअर का जन्म  18 जून 1852को एक वैष्णव ब्राह्मण परिवार में हुआ. उनके पिता सद्गोपारचारीअर एक पुजारी थे और विजय को  प्रारंभिक शिक्षा के अंतर्गत संस्कृत भाषा और वेदों का अध्ययन कराया गया. उनका अंग्रेजी शिक्षण 12  वर्ष की आयु में प्रारंभ हुआ, और 1870 में ...
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Tag :प्रकाश किरण
  June 21, 2016, 7:48 pm
11 जून 1897 को जन्मे राम प्रसाद बिस्मिल भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की क्रान्तिकारी धारा के प्रमुख सेनानी थे। सन् 1916 के कांग्रेस अधिवेशन में स्वागताध्यक्ष पं॰ जगत नारायण ‘मुल्ला’ के आदेश की धज्जियाँ बिखेरते हुए रामप्रसाद ने जब लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की पूरे लखनऊ शहर में...
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Tag :प्रकाश किरण
  June 21, 2016, 7:41 pm
ओंकारनाथ ठाकुर (1897-1967) भारत के शिक्षाशास्त्री, संगीतज्ञ एवं हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीतकार थे। उनका सम्बन्ध ग्वालियर घराने से था। उन्होंने वाराणसी में महामना पं॰ मदनमोहन मालवीय के आग्रह पर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में संगीत के आचार्य पद को सुशोभित किया। वे तत्क...
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Tag :प्रकाश किरण
  June 21, 2016, 7:38 pm
[आजमगढ़, उत्तर प्रदेश, में 28 और 29 मार्च, 2016 को आयोजित  राष्ट्रीय सम्मलेन ''मीडिया समग्र मंथन -2016"के  "मीडिया और सरकारी तंत्र"शीर्षक विचार-सत्र में प्रस्तुत किया गया आलेख]आदरणीय अध्यक्ष महोदय, सम्मानित मंच, देवियो और सज्जनो!सबसे पहले तो मैं इस भव्य और विराट आयोजन के लिए आयो...
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Tag :पत्रकारिता
  April 2, 2016, 3:52 pm
नई सदी के हिंदी आत्मकथा साहित्य पर चर्चा करते समय सबसे पहले तो यह तथ्य विचारणीय है कि नई सदी या उसके आरंभ से ठीक पूर्व के दशक में प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में आत्मकथा साहित्य ने नई करवट ली. इससे पहले यह समझा जाता था कि आत्मकथा का चरितनायक कोई ‘महापुरुष’ होना चाहिए. शायद ...
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  March 1, 2016, 3:24 am
सत्य या सच के साथ मुहावरे की तरह दो विशेषणों का प्रयोग होता है. एक है नग्न और दूसरा है कटु. आपने भी बहुत बार यह कहा-सुना होगा कि सच नंगा होता है और सच कड़वा होता है. मुझे लगता है कि सच के नग्न होने का अर्थ है कि जहाँ कोई पर्दा हो, आवरण हो, दुराव-छिपाव हो वहां झूठ और पाखंड निवास कर...
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Tag :प्रकाश किरण
  March 1, 2016, 3:00 am
हम मनुष्य हैं. हमने लम्बी साधना करके मनुष्यता का विकास किया है. यह मनुष्यता ही हमें जगत के अन्य समस्त प्राणियों से श्रेष्ठ बनाती है. इसका आधार वे सुनहरे सिद्धांत हैं जिन्हें हम मानव-मूल्य और जीवन-मूल्य कहते हैं. इन उत्तम मूल्यों में जीवन को सुंदर और धरती को सुरक्षित रखन...
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Tag :प्रकाश किरण
  March 1, 2016, 2:57 am
भारतीय परंपरा में माँ को इतना अधिक महत्त्व और सम्मान दिया गया है कि यदि यह कहा जाए कि भारतीय संस्कृति माँ पर केन्द्रित संस्कृति है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति न होगी. माँ जननी और पालन करने वाली तो है ही, ममता और वात्सल्य के रूप में ईश्वर की तरह सर्व-व्यापक भी है. सबसे बड़ी बात ...
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Tag :प्रकाश किरण
  March 1, 2016, 2:54 am
रोटी-रोजी की व्यवस्था के लिए जीवन की आपाधापी में लगे साधारण नागरिक के जीवन को जो चिंताएं कै जाती हैं, उनमें ‘महँगाई’ का स्थान संभवतः सबसे ऊपर है. आम नागरिक रूपी हनुमान की विकास-यात्रा के मार्ग में मुँह फाड़े बैठी सुरसा है – महँगाई. अर्थशास्त्र की शब्दावली में, वस्तुओं और...
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Tag :प्रकाश किरण
  March 1, 2016, 2:50 am
बरसों पहले मैंने धरा था पहला पाँव अग्नि की लीक पर और तुमने जला ली थीं अपनी हथेलियाँ मेरे तलवे बचाने को. तबसे मैं चलती आई हूँ तुम्हारी हथलियों पर बरसों-बरस, मीलों-मील. बुढ़ाने लगी  हैं तुम्हारी हथेलियाँ;काँपते हैं मेरे पैर. और तुम कहते हो –अभी तोमीलों जाना है!         ...
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  January 20, 2016, 2:06 pm
नन्हीं लाल चुन्नी!यह कहाँ आ गईं बिटिया तुम?नानी के लिए फूल लेने आई थी न?पर अब इस बगिया में फूल नहीं खिलतेअब तो यहाँहवा भी हाथ में खंजर लेकर चलती है,नई कोपलें मातम में लिपटी रहती हैं, फूलों से खून टपकता है. वह जो देख रही हो ण तुम फुलवारी के बीचों-बीच; समाधि है तुम्हारी छोटी बह...
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  January 20, 2016, 2:05 pm
एक पेड़ हुआ करता था यहाँ बरगद का छतनार.सरदी, गरमी, बारिश, आंधी, तूफ़ानऔर बर्फबारी झेलता रहा बरसों-बरस;बचाता रहा हमेंप्रकृति के प्रकोप से.हम बड़े सुरक्षित थेबरगद की गोद में.एक दिन एक गिद्ध आया,बैठ गया बरगद के शिखर पर,फैलाने लगा अपने पंख.दैत्याकार पंखऔर-और फैलते गए,ढक लिया पूर...
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  January 20, 2016, 2:04 pm
धरती की देह परकौन लगा गया हल्दी रातों-रात?किसने दहका दिएटेसू के ये लाल गाल?संध्या के आकाश में मोर पंख से कौन लिख गया खुशियों का पैगाम?किसने पिला दी कटोरी भर-भर कर मदिरा कि महक उठे आम?लगता है, होली आ गई.            - पूर्णिमा शर्मा ...
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  January 20, 2016, 2:03 pm
पैंसठ साल पहलेकैद से छूटकर बाहर निकला था वह,शिशिर ऋतु में.सब तरफपतझड़ था;पेड़ पीले पत्ते झाड़ रहे थे.उसने सोचा –वसंत आएगा,पेड़ हरे होंगे,नीले, पीले, गुलाबी, लालफूल मुस्कुराएंगें झूमती डालियों पर.पैसठ साल से वह खड़ा हैवसंत की प्रतीक्षा मेंऔर आसमान हर साल उगल रहा है शोले ,धरती ...
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  January 20, 2016, 2:01 pm
मेरी माँ के लिए 26जनवरी एक राष्ट्रीय पर्व था – जनता के अपने राज का पर्व, संविधान की वर्षगाँठ का पर्व, राम-राज्य के सपने का पर्व .मेरे लिए  26जनवरी राष्ट्रीय अवकाश का दिन था – परेड का दिन, मिठाई बांटने का दिन, चादर तानकर सोने का दिन .मेरी बेटी के लिए26जनवरीराष्ट्रीय असुरक्षा ...
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Tag :मेरा कविता संग्रह
  November 6, 2015, 2:10 am
“नहीं, मम्मी, नहीं.”-                         गर्भ में से चीखती है एक अजन्मी लड़कीऔर दस्तक देती है माँ के दिलो-दिमाग पर,पूछती है – “मम्मी, मेरे ही साथ क्यों हो रहा है ऐसा?क्यों हो रही है मुझे ही मारने की साज़िश?जन्म से पहले क्यों पढ़े जा रहे हैं मृत्यु के मंत्र?क्यों ...
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Tag :मेरा कविता संग्रह
  November 6, 2015, 2:00 am
हम सोये थे बेखबर पड़ोसी ने गिरा दी दोनों बाजुओं की दीवारें;और खुद बुला लाया पंचों को .हम चुप हो गए,पंचों को परमेश्वर मानकर फिर सो गए .                      पड़ोसी पूरा शैतान थाहर रात चुपके-चुपकेकभी नींद में तेज़ाब डालता,कभी दीवारों में सेंध लगाता ...
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Tag :मेरा कविता संग्रह
  November 6, 2015, 1:56 am
एक शाम पहुँची वहअपने घर कई घंटे देर से रस्ते में फँस गई थी .घर पहुंची तो दौड़ कर बेटा और बेटी डरे हुए कबूतर की तरह चिपक गए उसकी गोद में, पति बौखलाया हुआ सा आया झपटता हुआ – भौंहे तनी हुई थीं माथे पर बल थे चेहरा पीला पड़ गया था लगता था खून नसों में जम गया है .“तुम आ गईं?इतनी देर कैस...
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Tag :मेरा कविता संग्रह
  November 6, 2015, 1:48 am
भारतीय मनीषा ने बहुत पहले ही मानव जीवन के चरम मूल्यों के रूप में चार पुरुषार्थों की अवधारणा विकसित की थी. ये चार पुरुषार्थ हैं – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष.  धर्म का संबंध विवेक पूर्वक अपने कर्तव्य के पालन से है तो अर्थ का संबंध धर्मपूर्वक जीवन की समस्त सुख-सुविधाओं को जु...
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Tag :प्रकाश किरण
  September 11, 2015, 3:17 pm
स्थिर होकर बैठना आसन कहलाता है. इसके लिए जिस किसी शारिरिक मुद्रा का उपयोग किया जाता है वह भी आसन कहलाती है और जिस आधार पर बैठा जाता है उसे भी आसन कहते हैं. हमारे देवतागण अलग-अलग प्रकार के आसनों पर विराजते हैं. उदाहरण के लिए लक्ष्मी जी हों या प्रजापति ब्रह्मा, दोनों को कमल ...
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Tag :प्रकाश किरण
  September 11, 2015, 3:16 pm
किसी कार्य की सिद्धि के लिए अपनी समस्त शक्ति से कठोर साधना करना तपस्या है. आपने सुना होगा कि बहुत से महात्मा किसी भी प्रकार के ऋतु परिवर्तन की परवाह किए बिना इस प्रकार की साधना किया करते हैं जो सामान्य जन के लिए अकल्पनीय है. उदाहरण के लिए वे जनवरी के महीने में बर्फीले जल-...
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Tag :प्रकाश किरण
  September 11, 2015, 3:12 pm
मनुष्य की विशेषता का आधार है उसका मन. मन का स्वभाव है चंचलता. आपने अनुभव किया होगा कि मन तनिक देर भी एक स्थान पर नहीं टिकता. यहाँ तक कि जब कभी आप आध्यात्मिक भाव से अपने इष्ट का चिंतन-मनन करने बैठते हैं, यह चंचल मन तब भी चैन से बैठता नहीं है. जैसा कि संत कबीरदास कह गए हैं, हमारे...
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Tag :प्रकाश किरण
  September 11, 2015, 3:09 pm
''मैं कौन हूँ?''अपने बचपने में किया था यह सवालमैंने तुमसे.सोचा भी नहीं थाकि तुम पीले पन्नों वाली किताब केवह लाल आँखों वाले जादूगर होजो कभी सच नहीं बोलताऔर रेगिस्तान में बनेजादू के महल मेंकैद करके रखता हैढेर सारी शहजादियों को .इसीलिए मैंने नादानी में पूछा था तुमसे -''मैं क...
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  February 27, 2015, 1:12 am
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