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कविता कैफ़े .. [ KAVITA CAFE ] : View Blog Posts
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कविता कैफ़े .. [ KAVITA CAFE ]

------------------कविता-श्रृंखला[7]शहर में जब सियासत के समीकरण बिगड़ रहे थेऔर एक समुदाय का उम्मीदवार दूसरे समुदाय के उम्मीदवार की जड़े खोद रहा थामैंने उससे कहा : चलो एक पेड़ उगाएंउसे संशय था : फूल खिलेंगे?मैंने कहा : मौसम तो पतझड़ का है...फिर भी लैट्स ट्राईउसने पूछा : अपनी मुस्कुराहट बो दू...
कविता कैफ़े .. ...
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  November 18, 2014, 2:48 am
आसमान में एक पीले त्रिकोण की तरह रुका हुआ हूं मैं बरसों सेधूप में जलता हूं तो बारिश मुझेनहला देती हैअंधेरे से डरता हूं तो चांदनी मुझेबहला देती हैअपनी ही दिशाओं का बंदी मैंकिसी स्थगित यात्रा के कटे हुए वृत्तांत-साटंगा हूं अनन्त मेंमेरी भुजाओं में अलग होने की ताक़त ...
कविता कैफ़े .. ...
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  November 16, 2014, 9:13 am
नीम के दरख़्त कीपत्ती-पत्ती पर फिसलती हवा नेउसके हरेपन को और भी गाढ़ा कर दियादेखोकैसे धूप में चमक रही हैंदरख़्त की दबी हुई खिलखिलाहटेंहवा से कहोथोड़ी देर और ठहर जाएअभी पूरी तरह लौटी नहींनीम के दरख़्त की खोई हुई मिठास___________दिलीप शाक्य...
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  November 16, 2014, 9:09 am
मासिक पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ में ज़ारी सिनेमा-स्तंभ जलसाघर  से‘ब्रीफ़ एनकांटर’ एक ब्लैक एंड व्हाइट ब्रिटिश फ़िल्म है। 1946 में निर्मित। यह फ़िल्म डेविड लीन की निर्देशकीय प्रतिभा का अद्भुत शाहकार है। फ़िल्म की कहानी निऑल कॉवर्ड के 1936 के मशहूर नाटक ‘स्टिल लाइफ’ का ही...
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  October 1, 2014, 12:13 pm
जलसाघर Column by dilip shakya on Cinema/Art [मासिक पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ में ज़ारी]              गांवों क़स्बों और जनपदों सेरेलों, मोटरों और लारियों में भरकर खिंचे आ रहे थेमेलों, गीतों और लोककथाओं की दुनिया के हज़ारों क़िरदारसिनेमा की दुनिया में ऐसे खोएकि भूल गए अपने ही पैरों के निश...
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  July 20, 2014, 11:11 am
जलसाघर Column by dilip shakya on Cinema/Art [मासिक पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ में ज़ारी]दादा साहब फालके निर्मित भारतीय सिनेमा की पहली फ़िल्म राजा हरिश्चन्द्र में फ़िल्म की नायिका तारामती का परिधान साड़ी है किन्तु यह दिलचस्प तथ्य है कि पत्रिका इन्द्रप्रकाश के मई 1912 के अंक में विज्ञापन देने के...
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  June 6, 2014, 3:21 pm
[क़िस्सा एक स्कूटी-राइड का]बरसों बाद एक लड़का जब अपने शहर लौटा तो उसने उस लड़की से मिलने के बारे में सोचा जिसके बारे में अब यह सोचना एक फ़िज़ूल ख़याल था कि वह कभी उसे प्रेम करता था। लड़के की तरह लड़की भी एक सुखी संपन्न गृहस्थ जीवन जी रही थी। लड़का कार से आया था फिर भी उसने उस बस का टि...
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  April 25, 2014, 12:39 pm
जलसाघर Column by dilip shakya on Cinema/Art [मासिक पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ में ज़ारी]वीडियो हॉल मतलब छोटे क़स्बों के सिनेमाघर [तीसरी किश्त]_________________________________________2002 के गुजरात दंगों के बाद टीवी समाचारों में बाबरी विध्वंश के वृत्तांत फिर जीवित होने लगे थे। ऐसे में आनंद पटवर्धन की वृत्तचित्र फ़िल्म...
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  April 23, 2014, 11:04 am
कैंची से गुलाब की पत्तियॉं काटती एक औरतहवा के जोर से खुल गयी खिड़कियों कोपलट रही है बार-बारश्रंगार-मेज़ के आईने में झलक-झलक उठते हैंएक चेहरे के छूटे हुए अक़्सचेहरे में एक गुलाब गुमशुदा हैगुलाब में एक चेहराहिंदी कवि शमशेर बहादुर सिंह की आवाज़आह बनकर खिंचती है सीने में‘ल...
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  April 19, 2014, 9:34 am

[Remembering Gabriel Garcia Marquezwho left a great solitude behind..]गैब्रियल गार्सिया मार्केज़ तुम्हारे माकोन्दो विलेज कीरेमेदियोस द ब्यूटी तो नहीं थी वो?जो हमारे क़स्बों की सरहदों पर उठे पीले आसमानों मेंअपना नीला उत्तरीय लपेटेउड़ गयी थी एक अलसायी दोपहरवह एक अपार्टमेंट के बाथरूम में नहाते हुएदेख रही है मु...
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  April 19, 2014, 9:22 am
पानी नहीं थापानी की परछाईं थी महज़मैंने ख़ूब ख़ूबबहुत ख़ूब टटोलकर देखाप्यास के जिस्म में जान नहीं थीप्यास की परछाईं थी महज़जो पानी की परछाईं केघुटनों पर झुकी थी धरती के सीने सेरिस-रिस कर फूट रहा थाआंसुओं का एक नमकीन सोता_______________दिलीप शाक्य...
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  March 22, 2014, 6:57 pm
ये दिल का बाग़ शहर में खिला रहा हूं मैंपलट भी आ ऐ गुलेतर बुला रहा हूं मैंतुम्हारे पैर की आहट से गुलफिशां थी जोवो शाख़ कबसे शज़र की हिला रहा हूं मैंये देख हंसता है मुझपे ज़माना सदियों सेशिक़स्ता साज़ है और सुर मिला रहा हूं मैंचली है छेड़ तो कह दूं कि तू नहीं जानांये कार-ए-शौक़ जहां ...
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  March 7, 2014, 12:48 pm
भर गयी है गुलमोहर की शाख़ फूलों सेदुख रही है जाने फिर क्यों आंख फूलों से जिस घड़ी देखा उन्हें आते हुए कचनार नेझड़ गयी मेरे जिगर की राख फूलों से खोजता ब्रज की गली मथुरा नगर की भीड़ में मधुबन दबाए फिर रहा है कांख फूलों से क्या हुआ मधुमास ने पतझर दिया तारे तो हैंलो भर गया फ...
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  April 28, 2013, 11:06 am
हर इक मुक़ाम पे पैकर बदल रही है तूहै किसकी सांस ज़माने से चल रही है तूतुझे बना के ज़माने ने ख़ुद पे रश्क़ कियामिटा के ख़ुद को ज़माना बदल रही है तूसजा के मोर मुकुट सिर पे, बांसुरी छेड़ेअजीब ढंग से मधुबन को छल रही है तूफिरुं मैं रात के जंगल में अपना चांद लिएशहर में सुब्ह की ...
कविता कैफ़े .. ...
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  March 2, 2013, 1:05 pm
हर इक मुक़ाम पे पैकर बदल रही है तूहै किसकी सांस ज़माने से चल रही है तूतुझे बना के ज़माने ने ख़ुद पे रश्क़ कियामिटा के ख़ुद को ज़माना बदल रही है तूसजा के मोर मुकुट सिर पे, बांसुरी छेड़ेअजीब ढंग से मधुबन को छल रही है तूफिरुं मैं रात के जंगल में अपना चांद लिएशहर में सुब्ह की ...
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  March 2, 2013, 1:05 pm
____________________________ या मेरे ख़्वाब की दुनिया मुझे नवाज़ करोया ख़ुद को अपनी निगाहों में शर्मसार करो  ये किसकी आंख का मंज़र मुझे दिखाते हो मैं बाज़ आया मनाज़िर मेरे बहाल करो  तुम्हारे अहद की तस्वीर बन नहीं सकता ख़ुदा के वास्ते वापस मुझे किताब करो  क्यों इश्तहार की सूरत लुभा रहे हो मुझे ...
कविता कैफ़े .. ...
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  February 25, 2013, 6:43 pm
डुबो के ख़ून में धागे रफ़ू लिबास कियायूं हमने जिस्म को फिर जां से रूशनास कियाउलझ रहे थे जो रेशे जुदा जुदा होकर सुलझ रहे हैं इन्हें जब से पास-पास किया वो बात बात पे रेशम का ख़्वाब बुनता थामैं अपने चरखे पे क़ायम रहा कपास कियामेरी कबीर से, ग़ालिब से, आशनाई हैगिला नहीं जो मु...
कविता कैफ़े .. ...
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  February 23, 2013, 11:56 am
डुबो के ख़ून में धागे रफ़ू लिबास कियायूं हमने जिस्म को फिर जां से रूशनास कियाउलझ रहे थे जो रेशे जुदा जुदा होकर सुलझ रहे हैं इन्हें जब से पास-पास किया वो बात बात पे रेशम का ख़्वाब बुनता थामैं अपने चरखे पे क़ायम रहा कपास कियामेरी कबीर से, ग़ालिब से, आशनाई हैगिला नहीं जो मु...
कविता कैफ़े .. ...
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  February 23, 2013, 11:56 am
नई है शाख़ गुलों पर जमाल आया हैगिरा फिराक़ का पर्दा विसाल आया हैगले लगाके सुना हाले-दिल मुसाफ़िर कोतेरी तलाश में होकर निढाल आया हैहै चांद रात सुलगती है ख़्वाब की टहनीफिर आज नींद में तेरा ख़याल आया हैजो आस्मां पे बसाया था जलके राख हुआघर इक ज़मीं पे बनाऊं ? सवाल आया हैपरि...
कविता कैफ़े .. ...
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  February 23, 2013, 11:52 am
नई है शाख़ गुलों पर जमाल आया हैगिरा फिराक़ का पर्दा विसाल आया हैगले लगाके सुना हाले-दिल मुसाफ़िर कोतेरी तलाश में होकर निढाल आया हैहै चांद रात सुलगती है ख़्वाब की टहनीफिर आज नींद में तेरा ख़याल आया हैजो आस्मां पे बसाया था जलके राख हुआघर इक ज़मीं पे बनाऊं ? सवाल आया हैपरि...
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  February 23, 2013, 11:52 am
__________________________________दोस्तों की शाम को गुलज़ार करके देखिएइश्क़ के सहरा को फिर बाज़ार करके देखिएज़िंदगी के हुस्न का हर बाब खुलता जाएगादैरो-हरम के द्वार को दीवार करके देखिएजल रही है दिल में जो शामो-सहर इक रात से ख़्वाब की उस ईंट को मीनार करके देखिए दर्द की शिद्दत है क्या शायद उस...
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  January 31, 2013, 8:58 am
नीली रात की अलगनी पर टांगकर सितारों की झालरें अपनी डायरी में लिख रहा है चांद उन लड़कियों की मुख़्तसर दास्तानें जिन्हें उनके क़ातिलों ने घने जंगलों में ज़हर देकर सुला दिया था अपने गुनाहों का लिबास छोड़कर वे किसी शहर के शॉपिंग-मॉल में सजे-धजे घूम रहे होंगे धूप के चश्...
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  December 23, 2012, 10:14 am
वरक़ ज़िंदगी का उलटते रहे हमकहॉं तेरी जानिब पलटते रहे हमकभी दर खुलेगा इसी आरज़ू मेंजबीं आस्तां पर रगड़ते रहे हमवो आए हमें खोजने जब शहर मेंघने जंगलों में भटकते रहे हमइधर बाग़-ए-दिल में कई फूल आएमग़र तेरी ख़ुश्बू में जलते रहे हमलबों पर लबों का तबस्सुम न आयाबहुत खूं की र...
कविता कैफ़े .. ...
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  November 30, 2012, 7:43 pm
तितलियों, तितलियों तुम कहॉं हो?हम कब से पुकार रहे हैंहमारी मसें भीग रही हैंहमारा दिल धड़क रहा हैबाग़वान की कैंची के शिकार होने से पहलेहम तुम्हारे परों से लिपट जाना चाहते हैंहम ओस की बूंदों में नहाकर आए हैंअछूती सॉंसों में खुश्बुओं की सरगोशियॉं लाए हैं                           ...
कविता कैफ़े .. ...
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  October 13, 2012, 10:59 am
वो चिड़िया जिसके सिर पर सुंदर कलगी हैवो चिड़िया जिसके पंख बहुत चमकीले हैंवो चिड़िया जिसकी बोली के सुर गीले हैंउस चिड़िया को तुम पिंजरे से आज़ाद करोवो चिड़िया जिसने दूब के धानी तिनकों सेइक पेड़ की शाख पे एक नशेमन छाया थाजिसमें चिड़िया के सपनों का सरमाया थाउस चिड़िया ...
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  June 17, 2012, 12:49 pm
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