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रूप-अरूप

नीला अम्‍बर, नीली झीलखोजती फि‍रती हूंनीले दर्पण मेंझांकती दो चंचल अंखि‍यांउड़ रही यादों की बदलि‍यांहि‍लता नहींझील का पानीपार दुर्गम पहाड़ों केनि‍कल गया कोई गांव-शहरपहाड़, समुंदर, रेगि‍स्‍तानजाने कहां-कहां...
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  April 6, 2018, 5:17 pm
मन की दीवार पर हैंयादें अनगिनतकुछ मिट चलीं, कुछ हैं अमिटकुछ का लिखायाद नहीं आता कुछ इतनी गहरी किउन पर नहीं चढ़ती कोई और यादबाहरी दीवार पर उकेरासबको नज़र आता हैमन की दीवार पर जो खुदा हैउसे किसको दिखाऊँकुरेद-कुरेद कर उकेर गयाजो एक बात कोईकिस तरह उसे भुलाऊँ, उसे मिटाऊँ...
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  April 4, 2018, 12:11 pm
भिंचे होंठों मेंछुपी है जो मुस्कानवो आँखों से बजाहिर हैयूँ न देखा करोप्यार पर बंदिशे नहीं होतींउँगलियाँ मचलतीं हैंसुलझेबाल बिखराने कोशब्दों और आँखों सेअलग बातें न करोकह तो दियाहाँ, गहरी हैंआँखें तुम्हारीपढ़ना मगर हमें भी आता है ।...
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  March 27, 2018, 10:05 pm
पलाश से प्रेम है मुझे...बहुतों को होगा, क्‍योंकि‍ यह है ही इतना खूबसूरत कि‍ सबको अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। अभी फाल्‍गुन-चैत के महीने में आप झारखंड में कहीं भी शहर से दूर नि‍कल जाइए, पलाश के फूलों पर आपकी नजरें अटक जाएगी। आप मुरी से रांची आ रहे हों या रांची से जमशेदपुर क...
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  March 24, 2018, 7:45 pm
इस फागुन-चैत के मौसम में आप झारखंड में आसपास कहीं नि‍कल जाइए, ढेरों सफेद फूल की झाड़ि‍यां मि‍ल जाएगी। पांच पंखुड़ि‍यों वाला सफेद फूल, जि‍सके मूल में गुलाबी रंग होता है जि‍ससे भीनी-भीनी खुश्‍बू आती है। यह जंगली फूल है, मगर औषधीय पौधा है। डायरि‍या, लीवर डि‍सआर्डर, पेट में...
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  March 23, 2018, 6:41 pm
एक दि‍न पहले साल में रसम की तरह फि‍र से गाैरैया दि‍वस की के तौर पर गायब होते प्‍यारे पक्षी गौरैया के लि‍ए फि‍क्र जता ली गई। इसके बाद अब हम सब अपनी-अपनी रोजमर्रा की जि‍ंदगी को सुवि‍धाजनक बनाने में लग जाएंगे। उसमें गौरैया की याद भी शायद नहीं हो। पि‍छले दि‍नों मैं नानी क...
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  March 21, 2018, 1:38 pm
त्‍योहार उल्‍लास का प्रतीक है। एक ऐसा अवसर जि‍समें परि‍वार के अलावा संगी-साथी और कई बार अनजाने लोगों के साथ मि‍लकर सौहार्दपूर्वक खुशी मनाई जाती है, जीवन का सुख लि‍या जाता है दैनि‍क कामों के अलग हटकर। और सरहुल एक ऐसा त्‍योहार है जि‍समें केवल उत्‍साह है, उमंग है और नृत्...
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  March 20, 2018, 12:00 pm
अक्सर लताओं की तुलना स्त्री से की जाती है। पर क्या आप जानते हैं कि यह पीली लता जो आपको आसपास किसी बेर , कीकर या बबूल पर लिपटी हुई दिखती है, यह कितनी ख़तरनाक होती है उस पेड़ के लिए ?इसका नाम आकाशबेल, अमरबेल या आकाशवल्लरी, आलोकलता है। स्वर्णलता भी इसे ही कहते हैं। सुनने में बड...
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  March 19, 2018, 12:48 pm
चैत आ गया फि‍र से..केवल आया ही नहीं, पूर्ण यौवन पा इठला रही है हवा। कोमल कुसुम की ललछौहीं पत्‍ति‍यां मोह रही मन को। रक्‍तपलाश से दहक रहा गांव-जंगल। सुबह-सवेरे पलाश की नारंगी चादर बि‍छी है धरती पर।  पीले महुए से पटी गई है जमीन भोर में।मंद-मंद बहती है बयार सुबह सवेरे चैत म...
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  March 18, 2018, 9:43 pm
तुम दुःखी हो !नहीं लगता मुझे बिल्कुल ऐसाईश्वर का दिया सब हैपास तुम्हारेतुमने जो अर्जित किया उसका भी सुख भोग रहे होदुःख क्या होता हैदरअसल तुमने जाना नहींदेखो अपने आसपास किसीतन-धन से लाचार वृद्ध कोऔर महसूस करो दर्द उसकाऐसी पीड़ा जो तन से अधिकमन को व्यथित करेऔर उसे प्...
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  March 16, 2018, 11:25 am
विकास के नाम पर महानगरों से होड़ करते नगर कई साल पहले ही दिखने लगे थे। फ्लैट और मॉल कल्चर अब नगरों के लिए सामान्य बात हो चुकी है। पर इन दिनों जो सुखद बदलाव  देखने को मिल रहा है वह यह कि नगर के युवाओं में भी स्त्री सशक्तीकरण की छटपटाहट  दिखने लगी है। सोचने-समझने और समाज ...
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  March 12, 2018, 12:48 pm
बाँस...जिसे आप अब कह सकते हैं घास....बाँस ऐसा पौधा है जो किसी भी वातावरण में तेज़ी से बढ़ता है इसकी उम्र साठ वर्षों की होती है.... जब फूल आते हैं तो पूरे झुरमुट में एक साथ खिलते हैंऔर ख़त्म भी हो जात...
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  March 10, 2018, 3:22 pm
अंतरराष्‍ट्रीय महि‍ला दि‍वस है आज। कब और क्‍यों शुरू कि‍या गया, इसकी चर्चा अब बेमानी है क्‍योंकि‍ खुद महि‍लाएं कहती हैं कि‍ हमारे लि‍ए साल का एक दि‍न क्‍यों ? हर दि‍न महि‍ला दि‍वस है , और सच पूछि‍ए तो सुबह के छह बजे से रात के ग्‍यारह तक हर दि‍न महि‍ला दि‍वस होता है, क्‍यो...
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  March 8, 2018, 1:08 pm
बेहद बेचैन होता हैमनऔर जब वक्‍त कठि‍न होता हैभागती-फि‍रती हूंउन सवालों सेजो कि‍सी इंसान कीचीर-फाड़ को आतुर होता हैमन मेें बसी छवि‍ कोनकारता है जब जेहनतो सब पि‍छलाकि‍ताब के पृष्‍ठों सा फड़फड़ाता हुआ पलटता चला जाता हैहम देखते हैंचीजों को, बातों कोनए दृष्‍टि‍कोण से...
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  March 4, 2018, 10:07 pm
उस बार होली में खूब शरारत हुई....भांग वाली मि‍ठाई खा ली। लोग होली के अवसर पर भांग के पेड़े खाते थे तो कोई ठंडई के ग्‍लास पर ग्‍लास उड़ेलता तो कोई हरी बरफी के डब्‍बे खत्‍म कर देता। हमलोग हमेशा देखते मगर कभी खाने की हि‍म्‍मत नहीं की। कई बार धोखे से खि‍लाने की कोशि‍श की गई, मग...
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  March 1, 2018, 1:36 pm
कोई आज ये कहे आपको....होली आ रही है। क्­या इरादा है इस बार। आप गहरी सांस लेंगे और बोलेंगे...भई, अब कौन खेलता है पहले सी होली। लोगों से मि­लना-जुलना होगा, अबीर लगा लेंगे। हो जाएगी होली। इस जवाब के साथ ही दीर्घ श्­वांस लेकर कहेंगे आप...होली तो हमारे जमाने में होती थी। असल फगुआ का ...
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  February 28, 2018, 2:03 pm
चाँदनी तब देखा था जब मन में हसरतें करवट लेनी शुरू होती हैं। स्कूल में ख़ूब बात करते चाँदनी और श्रीदेवी की। इस फ़िल्म ने एक हसरत जगायी कि कोई ऐसा हो जो हमारी भी इतनी तस्वीरें अपने दीवार पर लगाए।तब दौर ही ऐसा था कि ख़ुद के लिए श्रीदेवी का सम्बोधन सुनना मन को गुदगुदा देता थ...
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  February 25, 2018, 3:00 pm
पेड़ों पर खूब आए हैं बेर इस बार। कच्‍चे-पक्‍के बेर बेच रही थी आजी। शहर से दूर ... दाम भी बेहद कम। केवल 10 रूपये कि‍लो। मैंने पूछा- 'आजी'के तोइड़ देलव जे बेचे लायन ही ( कि‍सने तोड़ दि‍या बेर बेचने के लि‍ए)।आजी बोली - लाह खाति‍र डाइर काइट देलय, तो हम बेचे ले आलि‍यव।( बेर की डाल काट द...
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  February 24, 2018, 10:49 pm
साँझ के झुटपुटे मेंछाये की तरहफैलती है उम्मीदपाँव का महावर ईर्ष्यादग्ध है अब तकउसके अधर आलते सेयोजन भर की दूरीदेह तय नहींकर पाती कभी पल मेंआमंत्रण परआत्मा क्षणांश मेंलिपटती है आकरआज भी रास्ता देखाप्रतिदिन की तरहदिन के अवसान मेंसूरज ढले-निकलेएक बार की विदाईसहस्...
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  February 23, 2018, 2:48 pm
जैसे खेलते हैं कुछेक गाँव में छुप्पम-छुपाई का खेल अब भी कुछ बच्चे, वैसे ही कभी खेलते थे आदिवासी बच्चेअत्ती-पत्ती कौन पत्तीअलग-अलग पेड़ की पत्तियों के रंग और गंध सूँघते थे,छूते थे पेड़, पत्ती और झाड़ों को पहचानते थे आदिवासी बच्चेखेल ही खेल में सीखते थे ला...
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  February 20, 2018, 3:12 pm
युवा दिलों की धड़कनों के लिए किसी महापर्व से कम नहीं है 'वेलेंटाइन डे'अर्थात 'प्रेम दिवस'। प्रत्येक वर्ष 14 फरवरी को यह मनाया जाता है। लेकिन इसे सिर्फ स्त्री-पुरुष की सीमा में बांधेंगे तो यह अपना असली मकसद खो देगा। यह पर्व हर उस रिश्ते के लिए है  जो प्रेम की डोर से बंधे है...
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  February 14, 2018, 9:44 pm
बहुत शोर है हवाओं का सरसरा रहे हैं पत्तेझूम रहे हैं पेड़ सभीधूलों का बवंडरउठ-उठ कर खिड़कियों के रास्तेबिछ रहा कमरे की फ़र्श परमन भी ज़रा अनमना सा हैबताए कोईयह बसंत है याहै पतझड़ की आहट.......
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  February 9, 2018, 1:28 pm
देखा मैंने चाँद को बढ़ते, घटतेफिर बढ़तेतिल-तिल कर आधा चाँद जब छुपा था धरती के साये मेंतब भी लगा था ख़ूबसूरतऔर जब लाल होते हुएग़ायब हुआनहीं लगा एक बार भीलगा है कोई ग्रहणछुपते-छुपते निकल ही आयामाघी पूर्णिमा कादूधिया चाँद...
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  January 31, 2018, 11:02 pm
जाने कहाँ गयीवोजो मेरे साथ रहती थीनहीं देखाबहुत दिनों से नाज़ुक कोंपलों परऊँगलियाँ फिरातेकबूतरों के झुंड कोधप्प से कूदकर डरातेरात कोतारों भरे आकाश मेंनक्षत्रों को झूठ-मूठ दौड़ातेजाने कहाँ गयीवोजो मेरे साथ रहती थीहर मौसम, हर सुबहहर शाम से प्यार था उसकोकभी बारिश ...
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  January 31, 2018, 2:03 pm
प्रकृति का उत्सव है बसंत।मौसम का यौवन है बसंत। फूलों के खिलने और धरती के पीले वसन में रंगने का समय है बसंत।यौवन का प्रतिनिधित्व करता है बसंत। इस संत धरती की ख़ूबसूरती इतनी अधिक बढ़ जाती है कि सब कुछ जवाँ लगता है। पेड़ पुराने पत्तों को छोड़ देता है, झाड़ देता है अपने तन स...
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  January 23, 2018, 5:09 pm
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